कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम स्तबक ४२७
उस वृक्ष में एक सुग्गा सुग्गी के साथ घोंसला बनाकर रहता था। उसी सुग्गी के गर्भ से,
अपने दुष्कर्मों के कारण मैं उत्पन्न हुआ ॥३८॥
मेरे उत्पन्न होते ही वह माता सुग्गी मर गई। पिता वृद्ध थे वे अपने पक्षों के भीतर मुझे
रखकर मेरा पालन-पोषण करते थे ॥३९॥
आसपास सुग्गों के खाकर बचे (फेंके हुए) फलों को खाते हुए और मुझे देते हुए मेरे
पिता मेरा पालन करने लगे ॥४०॥
एक बार शिकार करने के लिए तूणी गोमुख आदि वाद्यों से भीषण शब्द करती हुई
भीलों की भयंकर सेना शिकार करने के लिए उस वन में आई ॥४१॥
उस सेना के भील जब जंगली प्राणियों के विनाश के लिए चारों ओर दौड़-धूप कर रहे थे
तब नाचते हुए कृष्णसार मृग-रूपी आँखोंवाली धूल से भरे हुए पत्तोंवाली भाग्य से घबराकर
इधर-उधर भागते हुए चमरी मृगों के पूँछ-रूपी केशोंवाली वह वनभूमि सहसा व्याकुल
हो उठी ॥४२-४३॥
सारे दिन उस शिकार की भूमि में विनाश-लीला करके मारे हुए पशुओं के मांस को
लादे हुए वह भील-सेना सायंकाल के समय उस वृक्ष के नीचे आ गई ॥४४॥
उसमें एक वृद्ध भील था जिसे मांस नहीं मिला था। उस भूखे भील ने सायंकाल के
समय उस वृक्ष पर दृष्टि डाली और वृक्ष के समीप आ गया ॥४५॥
आकर, तुरन्त ही वृक्ष पर चढ़कर उसने सुग्गा तथा अन्यान्य पक्षियों को घोंसलों से
निकाल-निकालकर और मार-मारकर वृक्ष के नीचे फेंकना प्रारम्भ किया ॥४६॥
उसे यम के किंकर की तरह निकट आया देख मैं भय से अपने पिता के पंखों के बीच
चुपके-से छुपक गया ॥४७॥
जब उस पापी ने क्रमशः मेरे घोंसले को देखकर मेरे पिता को घोंसले से बाहर खींचकर,
गला दबाकर मार डाला और फेंक दिया ॥४८॥
मैं भी अपने पिता के साथ भूमि पर गिरकर और उनके पंख से निकलकर घास और
पत्तों के भीतर धीरे-धीरे घुस गया ॥४९॥
तब वह भील नीचे उतरकर और मारे हुए पक्षियों को आग में भून-भूनकर खाने लगा।
शेष कुछ सुग्गों को लेकर वह पापी अपने गांव को चला गया ॥५०॥