कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
४८० कथासरित्सागर
४८० कथासरित्सागर
प्रतिसिंहं स कोपेन तद्वधाय मृगाधिपः ।
आत्मानमक्षिपत्कूपे मूढोऽत्र व्यपादि च ॥१०५॥
शशः स प्रज्ञयोत्तीर्य मृत्योरुत्तार्य चाखिलान् ।
मृगान् गत्वा तदाख्याय स्ववृत्तं ताननन्दयत् ॥१०६॥
एवं प्रज्ञैव परमं बलं न तु पराक्रमः ।
यत्प्रभावेन निहतः शशकेनापि केसरी¹ ॥१०७॥
तदहं साधयाम्येव प्रज्ञया स्वमभीप्सितम् ।
एवं दमनकेनोक्ते तूष्णीं करटकोऽभवत् ॥१०८॥
ततो दमनकश्चापि तस्य पिङ्गलकस्य सः ।
सिंहस्य स्वप्रभोरासीदन्तिके दुर्मना इव ॥१०९॥
पृष्टश्च कारणं तेन तमुवाच जनान्तिकम् ।
बुद्ध्वा न युज्यते तूष्णीं स्थातुं चेन्न वदाम्यतः ॥११०॥
अनियुक्तोऽपि च ब्रूयाद्यदीच्छेत् स्वामिनो हितम् ।
तद्विहायायमागुण्ठिं मद्विज्ञप्तिमिमां शृणु ॥१११॥
भूप सञ्जीवकोऽयं त्वां हत्वा राज्यं चिकीर्षति ।
मन्त्रिणा हि सतानेन त्वं भीरुरिति निश्चितः ॥११२॥
धुनोति त्वां जिघांसुश्च शृङ्गाग्रमुग्रं निजायुधम् ।
निर्मर्यादो जयेष्वस्य मयि राज्ञि तृणाशने ॥११३॥
तदेतं हन्मो युष्मासु मृगेन्द्र मांसभोजनम् ।
आश्वास्योपजपन्त्येवं प्राणिनश्च वने वने ॥११४॥
तदेतं चिन्तय नृप नास्त्यस्मिन्सति शर्म ते ।
एवं दमनकेनोक्ते स तं पिङ्गलकोऽभ्यधात् ॥११५॥
बलीवर्दो वराकोऽयं किं कुर्यात्तृणभुङ्मम ।
दत्ताभयं कथं हन्यामहं च शरणागतम् ॥११६॥
[FN1] १ पञ्चतन्त्रहितोपदेशयोरियं कथा—
[FN2] बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
[FN3] पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥
[FN4] —इति शीर्षकयोल्लिखिताऽप्यन्या ।
प्रथम सम्बंध ७८१
वह मूर्ख सिंह उस दूसरे सिंह पर आक्रमण करने की दृष्टि से उस कुएँ में कूद
पड़ा और मर गया ॥१९५॥
इस प्रकार, उस शश ने अपनी मृत्यु को पार कर और अन्यान्य पशुओं को भी मृत्यु से
बचाकर और उस जंगल के सभी पशुओं को यह शुभ समाचार सुनाकर उन्हें आनन्दित
किया ॥१९६॥
'इस प्रकार, बुद्धि ही वास्तविक बल है। शारीरिक बल उसके आगे कुछ नहीं है। जिस
बुद्धि के प्रभाव से शश ने सिंह को भी मार डाला ॥१९७॥
इसलिए, मैं अपने इस कार्य को बुद्धि के बल से सिद्ध करता हूँ। दमनक के इस प्रकार
कहने पर करटक चुप हो गया ॥१९८॥
तदनन्तर, दमनक अपने स्वामी सिंह के पास आकर उदास होकर बैठ गया। जब
सिंह ने उसकी उदासीनता का कारण उससे पूछा तब उसने एकान्त में उससे कहा- 'स्वामी
किसी बात को जानकर चुप नहीं बैठा जा सकता। इसलिए कहता हूँ कि सेवक का धर्म है
स्वामी के हित को बिना अधिकार के भी कहे। इसलिए, आप इसे अन्यथा न समझकर मेरे
निवेदन को सुनें ॥१९९-१११॥
यह संजीवक बैल तुम्हें मारकर इस वन का राज्य चाहता है। इसके मन्त्री हो जाने
पर इसने निश्चय कर लिया है कि 'तुम डरपोक हो' ॥११२॥
वह तुम्हें मारने की इच्छा से अपने शस्त्र-रूपी सींगों को पैना करता रहता है और
जंगल के जीवों को घूम-घूमकर धीरज दिलाकर यह समझाता रहता है कि 'घास खानेवाले मेरे
जीते रहते तुम निर्भय रहो और मेरे साथ आओ और इस मांसभोजी सिंह को किसी प्रकार मार
डालो। दमनक से इस प्रकार कहा गया पिंगलक बोला-'घास खानेवाला बेचारा यह बैल मेरा
क्या कर सकता है? किन्तु यही एक बात है कि अभय दिये हुए और शरण में आये हुए इसे कैसे
मारूँ? ॥११३-११५॥