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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

४२ कथासरित्सागर

४२ कथासरित्सागर
अथैतां मानुषीभूतां स्वभार्यां परिणेष्यसि ।
प्रत्यक्षमेनामपि च द्रक्ष्यस्यन्येन सङ्गताम् ॥१२५॥
ततो विरक्तहृदयो दत्त्वा राज्यं द्विजन्मने ।
देवप्रभ यदा शान्तो वनं गन्तुं प्रपत्स्यसि ॥१२६॥
तदा प्रथममुक्तेऽस्मिन्गजरत्नावुजे तव ।
अनया भार्यया साकं शापात्त्वमपि मोक्ष्यसे ॥१२७॥
इति सिद्धोक्तशापान्ता वय प्राक्कर्मभवत् ।
एवं जाता पृथग्भोगाच्छापान्तं सैष चाद्य नः॥१२८॥
एवं सोमप्रभेणोक्ते स रत्नाधिपतिर्नृप ।
जातिं स्मृत्वाग्रवीद्धन्त सैष देवप्रभो ऽहम् ॥१२९॥
एषापि राजदत्ता मा पत्नी राजवती मम ।
इत्युक्त्वा स तया साकं भार्यया तां तनु जहौ ॥१३० ॥
क्षणात्सर्वेऽपि गन्धर्वा भूत्वा लोकस्य पश्यतः ।
समुत्पत्य निजं धाम ययुस्ते मरुद्याधस्रम् ॥१३१॥
धीरुवरयपि शीलस्य माहात्म्यात्प्राप्य सम्पदम् ।
ताम्रलिप्तीं पुरीं गत्वा तस्थौ धर्मोपसेविनी ॥१३२॥
इति जगति न रक्षितुं समर्थः क्वचिदपि कश्चिदपि प्रसह्य नारीम् ।
अवति तु सततं विशुद्ध एकः कुलयुवतीं निजमरूपाशबन्धः ॥१३३॥
एवं सर्ष्या नाम दुःशङ्कहेतुर्ह्येष पुंसां क्लेशदायी परेषाम् ।
योऽयं मा मुद्रक्षणायाङ्गनानामर्थोत्सुक्यं प्रत्युतासां करोति ॥१३४॥
इति नरवाहनदत्तो रत्नप्रभया स्वभार्यया कथिताम् ।
स निशम्य कथामभ्यां सचिवैः सार्धं परं मुमुदे ॥१३५॥
इति महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके
द्वितीयस्तरङ्गः ।

तृतीयस्तरङ्गः
निश्चयदत्तस्य अनुरागपरावरूपाश्च कथा
एवं रत्नप्रभाख्यानकपात्रमत्त इवापरम् ।
नरवाहनदत्तं तं सचिवो गोमुखोऽब्रवीत् ॥१॥

तदनन्तर तू मनुष्य-योनि में उत्पन्न इसी पत्नी को प्राप्त करेगा इसे और दूसरे पुरुष के
साथ अपनी आँखों से देखेगा। तब तू विरक्त होकर ब्राह्मण को राज्य देकर वन जाने का
यत्न करेगा। उस समय तेरा छोटा भाई सोमप्रभ भी हाथी की योनि से मुक्त हो जायगा
और तू भी इसी पत्नी के साथ मानव-योनि से मुक्त होकर अपने गन्धर्व-रूप को प्राप्त
करेगा' ॥१२६-१२७॥
हाथी ने फिर कहा—'इस प्रकार, हम लोग सिद्ध के शाप से मुक्त हो गये। अपने-अपने
कर्म के भेद से हम लोग पृथक् पृथक् योनि में उत्पन्न हुए थे। अब हम लोगों के शाप का आज अन्त
हो गया' ॥१२८॥
सोमप्रभ के ऐसा कहने पर वह राजा नलाधिपति बोला—'मैं अपने पूर्व जन्म का स्मरण
करता हूँ। वह देवप्रभ मैं ही तो था और यह राजदत्ता मेरी राजवती नाम की पत्नी है। ऐसा
कहकर राजा और रानी राजवती राजदत्ता ने अपना मनुष्य का चोला त्याग दिया। उसी समय
वे तीनों (राजा रानी और हाथी) गन्धर्व-देह धारण करके लीला के देखते-देखते आकाश में
उड़कर मरुदाचल-स्थित अपने धाम को चले गये ॥१२९-१३१॥
शीलावती भी अपने शुद्ध चरित्र के प्रभाव से प्रचुर धन प्राप्त करके ताम्रलिप्ती नगर में
जाकर धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगी ॥१३२॥
इस प्रकार, संसार में कहीं भी कोई स्त्री को नियन्त्रण में रखकर रक्षा करने में समर्थ
नहीं हो सकता। कुलीन स्त्री को उसका अपना ही एकमात्र प्रबल और विशुद्ध मन उसकी रक्षा
कर सकता है ॥१३३॥
इस प्रकार दूसरों से ईर्ष्या करना और उन पर दोष लगाना यह मानव-स्वभाव का दोष है।
यहाँ अधिक नियन्त्रण स्त्रियों की उन्मुक्तता को अत्यधिक बढ़ा देता है ॥१३४॥
नरवाहनदत्त इस प्रकार अपनी पत्नी रत्नप्रभा से कही गई कथा को सुनकर अपने
मन्त्रियों के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१३५॥
महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का
द्वितीय तरंग समाप्त

तृतीय तरंग
निश्चयबल और अनुरागपरा की कथा
इस प्रकार रत्नप्रभा से कही गई कथा के अन्त में नरवाहनदत्त का मन्त्री गोमुख उससे
कहने लगा—॥१॥