कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
३४ कथासरित्सागर
३४ कथासरित्सागर
यद्यद्वस्तूपयुक्तं च तस्यास्तत्तदविलम्बयन् ।
व्योम्नैव प्रापयामास तत्र तेन गजेन स ॥६५॥
स्वयं तदनुरक्तश्च तत्रैवासीत्सदा निशि ।
आययौ राजकार्यार्थं रत्नकूटे दिवा पुनः ॥६६॥
एकदा स तया साकं प्रत्यूषे राजसत्तमः ।
राजा प्रतिघ्नन्सुस्वप्नं सिषेवे पानमङ्गलम् ॥६७॥
तेन मत्ताममुञ्चन्तीमपि मुक्त्वा स तां ययौ ।
रत्नकूटं स्वकार्यार्थं नित्यस्निग्धा हि राजता ॥६८॥
तत्र तस्थौ सशङ्कन कुर्वन्कार्याणि चेतसा ।
क्षीबा किमकरोन्मुक्ता सा मयेतीव त्रसता ॥६९॥
तावच्च राजवत्ता सा स्थाने तत्रातिदुर्गमे ।
महानसादिब्यप्रासु वासीष्वेकाकिनी स्थिता ॥७०॥
द्वारे निधिमिवान्यं तत्तद्रक्षाविजिगीषया ।
आगतं पुरुषं कञ्चिदृष्ट्वाश्चर्यदायकम् ॥७१॥
कस्त्वं कथमिदं स्थानमगम्यं चागतो भवान् ।
इति च भ्रान्तिकप्राप्तं क्षीबा पप्रच्छ सा किल ॥७२॥
ततः स दृष्टबहुलक्लेशस्तां पुंस्कोऽब्रवीत् ।
मुग्धे पवनसेनाख्यो वणिक्पुत्रोऽस्मि माथुरः ॥७३॥
हृतस्वो गोत्रजैः सोऽह्रमनाथः प्रमयात्पितुः ।
गत्वा विदेशे कृपणां परसेवामशिश्रियम् ॥७४॥
ततः कृच्छ्रेण सम्प्राप्य धनलेशं वणिग्मया ।
गच्छन्देशान्तरं मार्गे मुषितोऽस्म्येत्य तस्करैः ॥७५॥
ततो भिक्षां भ्रमंस्तुल्यैः सहायैर्गतवानहम् ।
रत्नानामाकरस्थानं कनकक्षेत्रसञ्ज्ञकम् ॥७६॥
तत्राङ्गीकृत्य भूपस्य भागं संवत्सरावधि ।
खातं ननक्षिति रत्नं नैकमप्यस्मि लब्धवान् ॥७७॥
मन्दत्सु लब्धरत्नेषु मन्विधेष््वपरेषु च ।
गत्वाम्भोतीरे दुःखात्तं काष्ठान्यहमुपाहरम् ॥७८॥
अग्निप्रवेशाय चितां यावत्तत्र करोमि तैः ।
धीवदताभिधस्तावत्कोऽप्यत्र वणिगाययौ ॥७९॥
वहाँ जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी उन्हें राजा आकाशगामी हाथी से
भेजता था। किसी पुरुष का विश्वास न करता था॥६५॥
स्वयं भी उसके प्रेम के कारण प्रति रात्रि को हाथी से वहाँ जाता था और दिन में फिर
रत्नकूट चला आता था॥६६॥
एक बार राजा ने बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए प्रभात-काल में ही उसके (राजदत्ता
के) साथ मद्यपान कर लिया। मद्यपान से मत्त उस रानी के बार-बार मना करने पर भी
वह राजा राजकार्यों को देखने के लिए रत्नकूट चला आया। क्योंकि राजकार्य दैनिक प्रिय
कर्तव्य है॥६७-६८॥
वहाँ राजकार्य करते हुए भी राजा मदोन्मत्ता अकेली पत्नी की चिन्ता करते हुए, अनमने
भाव से कार्य कर रहा था॥६९॥
इतने में ही वह रानी राजदत्ता दासियों के भोजन-विश्राम आदि कार्यों में व्यस्त हो जाने
पर, उस दुर्गम द्वीप के भवन के द्वार पर अकेली ही निकल आई ॥७०॥
उसके द्वार पर आते ही उसकी रक्षा भंग करने के लिए मानों दैव से प्रेरित कोई पुरुष
आया उसे मदोन्मत्ता राजदत्ता ने देखा और पास आने पर पूछा—'तुम कहाँ से आये हो
कौन हो और इस दुर्गम स्थान पर किस प्रकार आ सके ? ॥७१-७२॥
अनेक कष्टों को झेले हुए उस पुरुष ने कहा—'हे सुन्दरी ! मैं मथुरावासी पवनसेन
नामक बनिये का पुत्र हूँ। पिता की मृत्यु होने पर कुटुम्बियों द्वारा सब धन हरण कर लेने पर
विदेश जाकर दीन चाकरी करने लगा॥७३-७४॥
तब बड़ी कठिनाई से व्यापार द्वारा धन कमाकर दूसरे देश को जाता हुआ राह में चोरों
से लूट लिया गया॥७५॥
तब अपने ऐसे लोगों के साथ रत्नों की खदानोंवाले कनक-क्षेत्र में गया॥७६॥
वहाँ पर राजा को हिस्सा देने का निर्णय करके एक साल तक रत्न-प्राप्ति के लिए जमीन
खोदता रहा। गहरे गड्ढों के खोदने पर भी रत्न न मिला॥७७॥
और, मेरे साथी रत्नों को पाकर प्रसन्न हो रहे थे इसलिए मैंने दुःख से पीड़ित होकर
समुद्र के किनारे लकड़ियाँ एकत्र करके जल मरने के लिए चिता बनाई। जब मैं चिता में प्रवेश
कर ही रहा था कि इतने में जीवदत्त नामक जहाजी बनिया दैवयोग से आया॥७८-७९॥