कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर
तस्मिन् विपन्ने भ्रातास्य वृषशूङ्गोऽथ सो मृतः ।
सोऽथ कन्यां कुटुम्बी तां नाम्ना चक्रे त्रिमार्किकाम् ॥८०॥
त्रयोऽनया सुलक्षणया ज्ञातया मारिता इति ।
कालेन यौवनस्थां तां पितुस्तस्मादयाचत ॥८१॥
त्रिमार्किकामाढ्यपुत्रः कश्चित्सद्ग्रामसम्भवः ।
पिता च तस्मै प्रादात्तां स यथावत्कृतोत्सवः ॥८२॥
तेन भर्त्रा सहारंस्त कालं कमपि तत्र सा।
अचिराच्च ततस्तस्याः स भर्ता पञ्चतामगात् ॥८३॥
दिवसैरेव सा चान्यं चपला पतिमग्रहीत् ।
सोऽप्यल्पेनेव कालेन विपत्तिं प्राप तत्पतिः ॥८४॥
ततः सा यौवनोन्मत्ता तृतीयं पतिमाववे ।
सोऽपि तस्या विपन्नोऽभूत्प्रविश्या पतिरन्यवत् ॥८५॥
एवं क्रमेण पतयो दश तस्या विपदिरे ।
ततो हास्येन सा नाम्ना पप्रथे दशमार्किका ॥८६॥१
अथान्यभर्तृस्वीकारात्पित्रा ह्रीतेन वारिता ।
सा वर्ज्यमाना च जनैस्तस्थौ तस्य पितुर्गृहे ॥८७॥
एकदा च विवेशात्र पान्थो भव्याकृतिर्युवा ।
एकरात्रिनिवासार्थं तत्पित्राऽनुमतोऽतिथिः ॥८८॥
तं दृष्ट्वा तद्गतमनाः साभवद्दशमार्किका ।
पान्थोऽपि तरुणीं दृष्ट्वा सोऽभूत्तदभिलाषुकः ॥८९॥
ततः सा मारमुषितत्रपा पितरमभ्यधात् ।
एकमेतमहं तात वृणोमि पथिकं पतिम् ॥९०॥
विपत्स्यते यदप्येष ग्रहीष्यामि ततो व्रतम् ।
एवं शृण्वति पान्थे तां ब्रुवतीं स पिताऽब्रवीत् ॥९१॥
मा पुत्रि लज्जा महती दश ते पतयो मृताः ।
तवेतेस्मिन्नपि मृते हसिष्यतितरां जनः ॥९२॥
तच्छ्रुत्वैव त्रपां त्यक्त्वा पथिकोऽपि जगाद सः ।
नाङ्गे प्रिये दश मृताः क्रमाद्भार्या ममापि हि ॥९३॥
समावार्ता शपाम्यत्र पादस्पर्शेन धूर्जटेः ।
इत्युक्ते तेन पान्थेन नाधिच्रीयेत तत्र कः ॥९४॥
१ अस्मादग्रे पुस्तकान्तरे 'डाकिनी भर्तृमक्षयमिति लोकोऽब्रवीच्च ताम्' इत्यर्धमर्धं
मधिकमस्ति ।
दशम स्तबक १८१
उस पुत्र के मरने के बाद ही उसका और एक भाई वैद्य करीम के आघात से मारा
गया। तब पिता ने उस कन्या का नाम 'त्रिमरिका' रख दिया ॥८०॥
इसलिए कि उस कुलक्षणा ने उत्पन्न होते ही घर के तीन व्यक्ति मार दिये। क्रमश:
युवावस्था में आने पर इसी गाँव में उत्पन्न हुए किसी धनवान् ने उसके पिता से त्रिमरिका को
माँगा। पिता ने भी विधिपूर्वक विवाहोत्सव करके कन्या उसे दे दी ॥८१-८२॥
वह कन्या कुछ दिनों तक उस पति के साथ रही। तदनन्तर, कुछ ही दिनों के पश्चात्
उसका पति मर गया ॥८३॥
उसके कुछ ही दिनों के उपरान्त उस चंचला ने दूसरा पति कर लिया। किन्तु कुछ ही समय
बाद वह भी मर गया ॥८४॥
तब जवानी से उन्मत्त उसने तीसरा पति कर लिया किन्तु उस पति-घातिनी का वह
पति भी पहले पतियों के समान ही मर गया ॥८५॥
इस प्रकार उसके क्रमश: दस पति मर गये। तब लोगों ने हँसी-हँसी में उसका नाम 'दस-
मारिका' रख दिया और इसी नाम से प्रसिद्ध कर दिया ॥८६॥
तदनन्तर, नया पति करने के लिए सज्जियत पिता ने उसे रोक दिया। तब अन्यान्य लोगों
से भी इसी प्रकार मना की गई वह अपने पिता के घर पर ही रहने लगी ॥८७॥
एक बार उस घर में उसके पिता की अनुमति से एक युवा पथिक आकर एक रात्रि के
लिए ठहर गया ॥८८॥
उसे देखकर वह दसमरिका उस पर मुग्ध हो गई और वह पथिक भी उस युवती को
देखकर उसे चाहने लगा ॥८९॥
तब कामदेव से नष्ट लज्जावाली वह कन्या अपने पिता से बोली—'पिता मैं एक और
इसको अपने लिए पति के रूप में वर करती हूँ ॥९०॥
यदि यह भी मर गया तो मैं व्रत करूंगी। पथिक के सुनते रहने पर इस प्रकार कहती
हुई कन्या से उसका पिता बोला ॥९१॥
'बेटी ऐसा न कर!। यह बहुत लज्जा की बात है। तेरे दस पति मर चुके हैं। अब इसके
भी मरने पर लोग अत्यधिक हँसी करेंगे' ॥९२॥
यह सुनकर पथिक भी लाज छोड़कर बोला—'मैं नहीं मरूँगा। कम से मेरी भी दस स्त्रियां
मर चुकी हैं। हम दोनों बराबर हैं। मैं शिवजी के चरणों की शपथ लेता हूँ। उस पथिक के
इस प्रकार कहने पर कौन आश्चर्य-चकित नहीं हुआ? ॥९३-९४॥