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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१८९ कथासरित्सागर

१८९ कथासरित्सागर
मनोरथमिवारुह्य विमानं सिद्धमाशुमत् ।
आजगामोत्सुकोऽनिच्छासेनेन शैलपुरं स तत् ॥१७६॥
तत्र दृष्ट्वोत्थितं सद्यो लब्धसंज्ञं समभ्रजम्।
जग्राह पादयोः साधु कण्ठे सोऽप्येनमग्रहीत् ॥१७७॥
त्वया नौ रक्षितो मर्त्येयमे ते पादयोस्ततः।
निपत्य भ्रातृजाये तमनिच्छासेनमूचतुः ॥१७८॥
भयेन्दीवरसेनाय पृच्छते सोऽब्रवीत् सत्।
॥१७९॥
।
नाक्रुप्यत्सङ्गवष्ट्राये भ्रातर्येस्मिंस्तुताव च ॥१८० ॥
क्षुभाव चेतस्य मुक्तात्पितरौ दर्शनोत्सुकौ।
मायामपरमात्रा च कृतां तौ तद्वियोगदाम् ॥१८१॥
ततो मात्रापितं खड्गं गृहीत्वा तत्प्रभावतः ।
ध्यातोपनतमारुह्य विमानं शुमहच्च सः ॥१८२॥
सहेममन्दिरो भार्याद्वयेन सह सानुजः ।
तामिन्दीवरसेनः स्वां पुरीमागादिरावतीम् ॥१८३॥
तत्रावतीर्य नभसो विस्मयालोकितो जनैः ।
राजवेश्म पितुः पार्श्वं विवेश सपरिच्छदः ॥१८४॥
तथाभूतञ्च पितरं तं दृष्ट्वा मातरं च सः।
पपात पादयोर्बाष्पधाराधौतमुखस्तयोः ॥१८५॥
तौ च तं सहसा दृष्ट्वा पुत्रमाश्लिष्य सानुजम्।
अमृतेनेव सिक्ताङ्गौ तापनिर्वाणमीयतुः ॥१८६॥
दिव्यरूपे च तद्भार्ये कृतपादाभिवन्दने।
स्नुषे उभे ते पश्यन्तौ हृष्टावभिननन्दतुः ॥१८७॥
कथाप्रसङ्गाद् बुद्ध्वा च तस्य ते पूर्वनिर्मिते ।
दिव्यशास्त्रमिते भार्ये मयतुस्तौ परां मुदम् ॥१८८॥
विमानगतिशीर्णेर्णमन्दिरानयनादिना ।
प्रभावेण सुतस्यास्य विस्मयं नन्रदतुः ॥१८९॥
ततस्ताभ्यां स सहितः पितृभ्यां सपरिग्रहः ।
आस्तेन्दीवरसेनोऽत्र प्रदत्तप्रमदोत्सवः ॥१९०॥

इसके बाद अपने सफल मनोरथ के समान उस विमान पर चढ़कर उत्सुकता के
साथ दैत्यपुर को आया ॥१७६॥
वहाँ पर होश में आये हुए बड़े भाई को देखकर उसके चरणों पर गिर पड़ा। उसने भी
उसे उठाकर गले लगा लिया ॥१७७॥
'तुमने हम दोनों के पति की और हमारी रक्षा की'—ऐसा कहकर दोनों भौजाइयाँ
उसके चरणों पर गिर पड़ीं ॥१७८॥
तदनन्तर, सब समाचार पूछते हुए बड़े भाई इन्दीवरसेन से अनिच्छासेन ने सारा
वृत्तान्त सुना दिया ॥१७९॥
सब समाचार सुनकर इन्दीवरसेन ने यमदंष्ट्रा पर क्रोध नहीं किया और भाई के कार्यों पर
सन्तोष प्रकट किया ॥१८०॥
और, उसके मुँह से सुना कि उसके माता-पिता उसे देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं।
दूसरी विमाता के किये हुए छल-कपट को भी उसने सुना ॥१८१॥
तब छोटे भाई अनिच्छासेन से दिये गये खड्ग को लेकर उसके प्रभाव से ध्यान करते ही
उपस्थित महान् विमान पर चढ़कर सोने के महलों तथा दोनों पत्नियों और छोटे भाई के साथ
इन्दीवरसेन अपनी इरावती नगरी को आ गया ॥१८२-१८३॥
वहाँ पर जनता से आश्चर्य के साथ देखा गया इन्दीवरसेन अपने साथियों के साथ पिता के
घर में गया ॥१८४॥
वियोग से दुर्बल और दुःखी पिता और माता को देखकर आँसुओं से मुँह को धोता हुआ
वह उनके चरणों पर गिर पड़ा ॥१८५॥
वे दाता (राजा-रानी) छोटे भाई के साथ ज्येष्ठ पुत्र को देखकर उसका आलिंगन
करते हुए अत्यन्त सन्ताप को भूलकर शान्ति और सुख में मग्न हो गये ॥१८६॥
शिष्ट रूपवाली पाद-वन्दन करती हुई उन दोनों बहुओं को देखकर उन लोगों ने प्रसन्न
होकर उन्हें आशीर्वाद दिया ॥१८७॥
इस प्रकार माता-पिता को प्रसन्न करता हुआ और जनता को उत्साह देता हुआ इन्दीवरसेन
पिता के समीप ही रहने लगा ॥१८८॥
आकाश-यान सोने का महल आदि पाने के कारण और उनके प्रभाव से इन्दीवरसेन के
माता-पिता आश्चर्य में प्रसन्न होते थे। इन्दीवरसेन भी दोनों पत्नियों के साथ तथा अन्य दुर्लभ
ऐश्वर्य जनता की आँखों को तृप्त करता हुआ वहाँ रहने लगा ॥१८९-१९०॥