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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१७४ कथासरित्सागर

१७४ कथासरित्सागर
तस्थौ च वार्तामन्विष्यन् सततं पुत्रयोस्तयोः ।
तन्मात्रा सह दुःखार्तो धर्मसक्तोऽम्बिकां स्मरन् ॥११६॥
तावच्च राजपुत्रस्य तपसा सानुजस्य सा ।
तस्येन्दीवरसेनस्य तुष्टाऽभूद्विन्ध्यवासिनी ॥११७॥
दत्त्वा च खड्गं स्वप्ने सा साक्षादेवं तमादिशत् ।
अस्य प्रभावात् खड्गस्य शत्रूञ्जय्यसि दुर्जयान् ॥११८॥
चिन्तयिष्यसि यत्किञ्चित् तच्च सम्पत्स्यते तव ।
द्वावप्येतेन च युवामिष्टसिद्धिमवाप्स्यथः ॥११९॥
इत्युक्त्वाऽन्तर्हितायां च देव्यां तस्यां प्रबुध्य सः ।
तत्रेन्दीवरसेनस्तं हस्तस्थं खड्गमैक्षत ॥१२०॥
अथ खड्गेन तत्स्वप्नवर्णनेन च सोऽनुजम् ।
आश्वास्य चक्रे तद्युक्तः प्रातर्वन्येन पारणम् ॥१२१॥
ततः प्रणम्य देवीं तां तत्प्रसादबृहद्बलः ।
हृष्टस्तत्खड्गहस्तश्च समं भ्रात्रा ययौ ततः ॥१२२॥
गत्वा च दूरं स प्राप्वैकं पुरवरं महत् ।
कुर्वद्भि र्मेरुशिखरभ्रान्तिं हेममयैर्गृहैः ॥१२३॥
तत्र रौद्रं ददर्शैकं प्रतोलीद्वारि राक्षसम् ।
पप्रच्छ तं च वीरोऽस्य पुरस्याख्यां पतिं च सः ॥१२४॥
इदं शैलपुरं नाम नगरं राक्षसाधिपः ।
अध्यास्ते यमदंष्ट्राख्यः स्वामी नः क्षत्रुमर्दनः ॥१२५॥
इत्युक्ते रक्षसा तेन यमदंष्ट्रजिघांसया ।
तत्रेन्दीवरसेनोऽथ स प्रवेष्टुं प्रवृत्तवान् ॥१२६॥
निक्षिपन्तं च तं ज्ञात्वा राक्षसं स महाभुजः ।
एकखड्गप्रहारेण शिरश्छित्त्वा न्यपातयत् ॥१२७॥
तं हत्वा राजभवनं प्रविश्यान्तर्ददर्श सः ।
शूरः सिंहासनस्थं तं यमदंष्ट्रं निशाचरम् ॥१२८॥
वष्ट्राम्भोरुहमंसे वामपार्श्वस्थितवराङ्गनम् ।
आधितेतरपार्श्वं च कुमार्या दिव्यरूपया ॥१२९॥
दृष्ट्वा च सोऽम्बिकादत्तखड्गहस्तो रणाय तम् ।
माहूतवान् स चोत्तस्थौ खड्गमाकृष्य राक्षसः ॥१३ ॥

तब दोनों का द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्दीवरसेन के द्वारा बार-बार काटा जाता हुआ
भी उसका सिर फिर-फिर जुट जाता था ॥१३१॥

उस राक्षस की इस माया को देखकर उसके पास बैठी हुई और राजपुत्र पर आसक्त हुई
कुमारी द्वारा इशारे से सूचित किये गये राजकुमार ने उसके सिर को काटकर तुरन्त ही एक खड्ग
प्रहार से उसके दो टुकड़े कर डाले ॥१३२-१३३॥

कुमारी के द्वारा ज्ञात राक्षसी माया के नष्ट हो जाने पर उसका सिर फिर नहीं जुटा
और वह मर गया ॥१३४॥

उस राक्षस के मरने पर वह सुन्दरी स्त्री और कुमारी दोनों प्रसन्न हो गई। तब छोटे भाई के
साथ इन्दीवरसेन ने स्वस्थता से बैठकर पूछा—॥१३५॥

'इस एकमात्र द्वारपाल से रक्षित नगर में यह कैसा राक्षस था और तुम दोनों कौन हो
जो उसके मारे जाने पर प्रसन्न हो रही हो ? ॥१३६॥

यह सुनकर उन दोनों में से कुमारी बोली—'इस दीसपुर में वीरभुज नाम का राजा था।
यह उस राजा की मदनदंष्ट्रा नामकी पत्नी (रानी) है। इस राक्षस ने नगर में आकर राजा वीरभुज
को खा डाला उसके अन्य कुटुम्बियों और सेवकों को भी खा लिया किन्तु यह सुन्दरी है
इसलिए इसे नहीं खाया और अपनी पत्नी बना लिया ॥१३७-१३९॥

तब इस निर्जन नगर में सोने के भवन बनाकर बिना नौकर-चाकरों के ही यह इसके
साथ आनन्द-विहार करता हुआ रहता था॥१४०॥

और, मैं इस राक्षस की खड्गदंष्ट्रा नाम की छोटी बहन हूँ। मैं तुम्हें देखकर तुमसे प्रेम
करने लगी हूँ ॥१४१॥

इसलिए, इसके मरने पर यह और मैं दोनों प्रसन्न हुए। अब तुम मेरे ही मन के द्वारा
माँग की गई मुझसे विवाह करो' ॥१४२॥

ऐसा कहती हुई खड्गदंष्ट्रा को इन्दीवरसेन ने गान्धर्व विधि से विवाहित कर
लिया ॥१४३॥

और, खड्ग के प्रभाव से इच्छा करते ही अभिलषित भोगों को प्राप्त करता हुआ राजकुमार,
अपने छोटे भाई के साथ वहीं रहने लगा ॥१४४॥

एक बार उसने अपने खड्ग के प्रभाव से आकाश-यान का ध्यान किया जिससे विमान
बन कर आ गया ॥१४५॥
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