कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ५७१
नवम लम्बक ५७१
हम चारों इन सोने के कमलों को लेकर श्वेतद्वीप में भगवान् कमलापति (विष्णु) की
पूजा के लिए जा रहे हैं॥१९॥
हमलोग उन्हीं के भक्त हैं और उन्हीं की कृपा से उन पर्वतों पर हमारा राज्य है और
सिद्धियों के साथ सम्पत्तियाँ भी प्राप्त हैं॥२०॥
तो चलो श्वेतद्वीप में तुम्हें हरि का दर्शन करावें। मित्र यदि तुम्हें अच्छा लगे तो
हमलोग तुम्हें आकाश-मार्ग से ले चलें ॥२१॥
इस प्रकार कहते हुए देवपुत्रों को स्वीकृति देकर, फल और जल से स्वाधीन उस स्थान पर
गोमुख आदि सचिवों को ठहराकर वह उनके साथ जाने को तैयार होगया ॥२२॥
उन चारों में देवसिद्धि ने उसे अपनी गोद में बैठाकर आकाश-मार्ग से श्वेतद्वीप की
यात्रा की ॥२३॥
नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति
श्वेतद्वीप में पास बैठी हुई लक्ष्मी और चरणों के पास बैठी हुई धरित्री से शोभित
शरीरधारी शंख चक्र गदा और पद्म इन शस्त्रों से सेवित गन्धर्वों और नारद आदि से गाकर
स्तुति किये जाते हुए, सामने बैठे हुए गरुड़ से सेवित और शेषनाग की शय्या पर सोये हुए
हरि का उन चारों देवपुत्रों द्वारा पहुँचाये गये नरवाहनदत्त ने देखा। सच है सज्जनों का
समागम किसके कल्याण के लिए नहीं होता॥२४-२७॥
तब उन देवपुत्रों और कश्यप आदि द्वारा स्तुति किये गये भगवान् की नरवाहनदत्त ने
हाथ जोड़कर स्तुति की—॥२८॥
'हे भक्तों के कल्पवृक्ष ! हे सरसी-रूपी कान्ता से लिपटे हुए शरीरवाले ! हे अभीष्ट
फल देनेवाले तुम्हें प्रणाम है॥२९॥
सज्जनों के मानस-सरोवर में विहार करनेवाले निरन्तर नाद करते हुए और अनन्त
आकाश में विहार करनेवाले तुम दिव्य हंस के लिए नमस्कार है ॥३०॥
सबसे अतिरिक्त रहनेवाले सबके अन्दर में विराजमान गुणों से परे रहनेवाले और
पूरे षड् गुणों की मूर्तिमान् तुम्हारे लिए प्रणाम है ॥३१॥
वेदाध्ययन के कारण मन्द ध्वनि करते हुए और उससे उत्पन्न अनेक चरणोंवाले
ब्रह्मा भी आपके समीप भ्रमर के समान लगते हैं॥३२॥
आकाश तुम्हारा सिर है दिशाएँ तुम्हारे कान हैं सूर्य और चन्द्रमा तुम्हारे नेत्र हैं और
सारा ब्रह्माण्ड तुम्हारा उदर है। अतः तुम परमपुरुष कहे जाते हो ॥३३॥
त्वत्तो धामनिघृष्टासी भूतग्रामो विजृम्भते।
नाष स्फुलिङ्गसङ्घात इव प्रज्वलतोऽनलात् ॥३४॥
पुनश्च प्रविशत्येष त्वामेव प्रलयागमे।
दिनान्ते विहगव्रात इव वासमहाद्रुमम् ॥३५॥
सृजस्युल्लसित स्वांशांस्त्वमतान् भुवनेश्वरान्।
अनन्तवेलाक्षुभितस्तरङ्गानिब वारिधिः ॥३६॥
विश्वरूपोऽप्यरूपस्त्वं विश्वकर्मापि चाक्रियः।
विश्वाधारोऽप्यनाधारः कः स सत्त्वमवैति ते ॥३७॥
तां सामुद्रि सुराः प्राप्तास्त्वत्प्रसङ्गेक्षवेक्षिताः।
तत्प्रसीद प्रपन्नं मां पश्य पश्यार्द्रया दृशा ॥३८॥
एव कृतस्तुतिं दृष्ट्वा सप्रसादेन चक्षुषा।
नरवाहनदत्तं च हरिनारदमभ्यधात् ॥३९॥
गच्छ क्षीरोदसम्भूता या वराप्सरसः पुरा।
न्यासीकृत्य मया हस्ते शक्रस्य स्थापिताः स्वकाः ॥४०॥
तास्तस्मान्मम वाक्येन मृगयित्वा महामुने।
आरोप्य तद्रथे सर्वाः सत्वरं स्वमिहानय ॥४१॥
इत्युक्तो हरिणा गत्वा नारदः स उपेत्य ताः।
आनिन्येऽप्सरसः शक्रात्तद्रथेन समातरि ॥४२॥
तेन तासूर्पनीतासु प्रणतेनाप्सरःस्वथ।
वत्सराजतनुजं च भगवानादिदेश सः ॥४३॥
नरवाहनदत्तैतास्तुभ्यमप्सरसो मया।
दत्ता विद्याधरेन्द्राणां भविष्यच्चक्रवर्त्तिने ॥४४॥
त्वमासामुचितो भर्त्ता मार्यादिद्यैतास्तवापिताः।
: कामदेवावतारो हि निमित्तस्य पुरारिणा ॥४५॥
तच्छ्रुत्वा पादपतिते तस्मिन् वत्सेश्वरात्मजे।
लब्धप्रसात्समुदिते हरिर्मातलिमादिशत् ॥४६॥
नरवाहनदत्तोऽसावप्सरःसहितस्त्वया ।
प्राप्यतां स्वगृहं यावत्पद्या येनायमिच्छति ॥४७॥
एवं भगवतादिष्टः साप््सरस्कं प्रणम्य तम्।
नरवाहनदत्तं स रथे मातलिगारथिम् ॥४८॥
मत्स्य सम्भव ५७१
हे प्रभो यह समस्त प्राणियों का समूह और तेज का पुञ्ज तुममें वैसे ही उत्पन्न होता है
जैसे जलती हुई अग्नि से चिनगारियां ॥३४॥
यह सारा भूत-संघात (प्राणि समूह) प्रलयकाल में तुम्हारे ही अन्दर उसी प्रकार
समा जाता है जैसे सायंकाल के समय पक्षियों का समूह महावृक्ष में समा जाता है ॥३५॥
अखण्ड बेला से क्षुब्ध होकर समुद्र जैसे तरंग उत्पन्न करता है वैसे तुम भी अपने अंग
से इन्द्र आदि लोकपालों को उत्पन्न करते हो ॥३६॥
तुम विरञ्चर होकर भी अ-रजा (रजहीन) हो। विश्वकर्मा होकर भी अ-क्रिय (कर्म
रहित) हो। विश्व के आधार होकर भी स्वयं निराधार (आधार रहित) हो। वह कौन है जो
तुम्हारी अलक्षितता का ज्ञान रखता है ॥३७॥
तुम्हारी कृपा दृष्टि से ही देव गण देवता उस महान् ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हैं।
अतः मुझ पर कृपा करो। शरण में आये हुए मुझे सदय दृष्टि से देखो ॥३८॥
इस प्रकार, स्तुति किये गये मत्स्यावतार को प्रसन्न दृष्टि से देखकर हरि ने नारद
से कहा-जाओ क्षीरसमुद्र में उत्पन्न हुई अप्सराओं को मैंने इन्द्र के पास अपनी
धरोहर के रूप में रखा था उन सबको रथ में बैठाकर शुभ शीघ्र मेरे कहने से यहाँ ले
आओ ॥३९-४१॥
विष्णु के इस प्रकार कहने पर नारद मुनि ने 'जो आज्ञा' कहकर तुरन्त ही मातलि के
साथ रथ में बैठी अप्सराओं को लाकर उपस्थित किया ॥४२॥
नारद द्वारा अप्सराओं के लाने पर उन अप्सराओं के रूप को भगवान् ने आदेश दिया-हे
मत्स्यावतार ! दिव्यवर राजाओं व हरदेव व चक्रवर्ती ! त्वा मैंने ये अप्सराएँ दे दीं। तू इनका
योग्य पति है और ये तेरी योग्य पत्नियां। क्योंकि शिव ने पहले ही इस वरदान का अवतार
बताया है ॥४३-४५॥
यह सुनकर मत्स्यरूपधारी प्रसन्न होकर व रूप-लावण्य गुण से युक्त वे भगवान् के चरणों में
गिरने पर हरि ने मातलि को आज्ञा दी कि इन सब रत्नरूप व अप्सराओं सहित जिस कार्य
में यह आये थे, वहाँ को चले जाओ ॥४६-४७॥
भगवान् के ऐसा आदेश देने पर मत्स्यरूपधारी अप्सराओं के साथ हँसते-हँसते जलचरों द्वारा
रक्षक हुए ॥४८॥