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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ४५५

नवम लम्बक ४५५

जब अशोकमाला का शाप-मोक्ष होगा तभी यह भी जाति-स्मरण करके शाप से मुक्त
हो जायगा ॥८३॥
और पुनः अपने विद्याधर-शरीर को प्राप्त कर शाप का स्मरण करते हुए अभिमान रहित
होकर शीघ्र ही तुझसे विवाह करेगा और तेरे साथ सुखपूर्वक रहेगा' ॥८४॥
प्रलम्बभुज के इस प्रकार कहने पर उस पतिव्रता ने किसी प्रकार धीरज धारण किया।
अतः आपलोग मुझे वही शापमुक्त स्थूलभुज समझें ॥८५॥
मैंने अभिमान के कारण यह दुःख प्राप्त किया। सच है अभिमानी पुरुषों का जाने या
अनजाने कल्याण कैसे हो सकता है? ॥८६॥
'आज मेरा वह शाप समाप्त हुआ' ऐसा कहकर स्थूलभुज ने मानव-शरीर का त्याग कर
दिव्य विद्याधरकुमार का रूप धारण किया ॥८७॥
और, अपनी विद्या के प्रभाव से अशोकमाला के शव को अदृश्य रूप से ही गंगा में प्रवाहित
कर दिया तथा विद्या के प्रभाव से मँगाये गये गंगाजल से अलंकारवती के श्राद्ध-मज्जन को धो
दिया ॥८८-८९॥
एवं अपने भावी स्वामी नरवाहनदत्त को प्रणाम करके अपनी कार्य-सिद्धि के लिए आकाश
में उड़ गया ॥९०॥
इस घटना के कारण वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के आश्चर्य चकित हो जाने पर गोमुख ने
अनंगरति की कथा प्रारम्भ की ॥९१॥
अनंगरति की कथा
इसी पृथ्वी पर यथार्थ नामवाला शूरपुर नगर है। वहाँ महावराह नाम का अत्यन्त
बलशाली राजा था ॥९२॥
सन्तानहीन उस राजा को पद्मरति नाम की रानी से अनंगसुन्दरी नाम की कन्या
उत्पन्न हुई ॥९३॥
कालक्रम से युवावस्था में चढ़ी हुई रूपवती अनंगरति ने अनेक राजाओं के माँगने पर
भी किसी को पति बनाना स्वीकार नहीं किया ॥९४॥
और, दृढ़ निश्चय के साथ कहा कि जो शूर-वीर, रूपवान् तथा किसी विशेष विज्ञान
का वेत्ता होगा उसे ही मैं अपने को दूँगी ॥९५॥
कुछ समय के अनन्तर राजकुमारी का समाचार सुनकर उसकी इच्छा से विवाह करने
के लिए दक्षिणापथ से चार वीर, राजा महावराह के पास आये ॥९६॥

द्वाःस्थैरावेदितांस्तांश्च प्रविष्टान् पृच्छति स्म सः ।
महावराहो नृपतिरनङ्गरतिसन्निधौ ॥९७॥
नाम किं कस्य युष्माकं जातिर्विज्ञानमेव च ।
एतद्राजवचः श्रुत्वा तेष्वेकोऽस्तं व्यजिज्ञपत् ॥९८॥
पञ्चपट्टिकनामाहं शूद्रो विज्ञानमस्ति मे ।
वयामि प्रत्यहं पञ्च पट्टिकायुगलानि यत् ॥९९॥
तेभ्य एकं प्रयच्छामि ब्राह्मणाय ददामि च ।
द्वितीयं परमेशाय तृतीयं च वसे स्वयम् ॥१००॥
चतुर्थं मे भवेद् भार्या यदि तस्यै ददामि तत् ।
शरीरयात्रां विक्रीय पञ्चमेन करोम्यहम् ॥१०१॥
अथ द्वितीयोऽप्याचख्यावहं भाषाज्ञसंज्ञकः ।
वैश्यो रुतं विजानामि सर्वेषां मृगपक्षिणाम् ॥१०२॥
ततस्तृतीयोऽप्यवददहं खड्गधराभिधः ।
क्षत्रियः खड्गयुद्धेन जीये नान्येन केनचित् ॥१०३॥
चतुर्थश्चाब्रवीज्जीवदत्ताख्योऽहं द्विजोत्तमः ।
गौरीप्रसादविद्याभ्यां जीवयामि मृतां स्त्रियम् ॥१०४॥
एवमुक्तवतां तेषां शूद्रविट्क्षत्रियास्त्रयः ।
रूपं शौर्यं बलं चैव शशंसुः पृथगात्मनः ॥१०५॥
ब्राह्मणो रूपवर्जं तु बलशौर्यं शशंस सः ।
ततो महावराहः स्वं क्षत्तारमवदन्नृपः ॥१०६॥
नीत्वा विश्रामयैतांस्त्वं सम्प्रति स्वगृहेऽखिलान् ।
तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा क्षत्ता त्वानानयद्गृहम् ॥१०७॥
ततोऽब्रवीत् स राजा तामनङ्गरतिमात्मजाम् ।
एषां चतुर्णां वीराणां पुत्रि कोऽभिमतस्तव ॥१०८॥
शूद्रश्च वायकर्मकः क्रियते तस्य किं गुणैः ।
वैश्यो द्वितीयः पक्ष्यादिरुतिज्ञश्च तस्य किम् ॥१०९॥
श्रुत्वैतत्पितरं तं सा प्राहानङ्गरतिस्तथा ।
चतुर्णामपि तातैषां न कोऽप्यभिमतो मम ॥११०॥
ताभ्यां कथमहं दद्यामात्मानं क्षत्रिया सती ।
तृतीयस्तुल्यवर्णो मे भवति क्षत्रियो गुणी ॥१११॥
किं तु सेवोपजीवी स दरिद्रः प्राणविक्रयी ।
पृथ्वीपतिसुता भूत्वा कथं स्यां तस्य गेहिनी ॥११२॥