कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक ७१५
षष्ठ लम्बक ७१५
कलिङ्गसेना भी नये बाह्य भवन में जाकर अपना मनोरथ सिद्ध समझकर अत्यन्त प्रसन्न
हुई॥७३॥
बुद्धिमान् यौगन्धरायण भी राजभवन से तुरन्त अपने घर जाकर इस प्रकार सोचने
लगा। समय व्यतीत करना ही अधुना कार्य का प्रतिकार है। पहले समय में ब्रह्महत्या के भय
से इन्द्र के भाग जाने पर देवराज्य प्राप्त करके नहुष राजा ने इन्द्राणी को प्राप्त करना चाहा था।
तब देवगुरु बृहस्पति ने शरण में आई हुई इन्द्राणी की यही कहकर नहुष से रक्षा की थी कि
'आज आवेगी कल आवेगी'। इसी बीच राजा नहुष ब्राह्मणों के शाप से नष्ट हो गया और इन्द्र
पुनः देवराज बन गया। इसी प्रकार मुझे भी कलिङ्गसेना के लिए राजा का समय टालते रहना
चाहिए ॥७४-७८॥
ऐसा सोचकर सभी पण्डितों से सम्मति करके उसने एक लम्बी अवधि के पश्चात् लग्न
निर्धारणने का गुप्त परामर्श किया ॥७९॥
तदनन्तर महारानी वासवदत्ता ने आई हुई कलिङ्गसेना का समाचार जानकर मन्त्री
यौगन्धरायण को अपने भवन में बुलवाया ॥८०॥
वासवदत्ता के घर में जाकर और प्रणाम करते हुए यौगन्धरायण से रोती हुई वासवदत्ता
कहने लगी—'आर्य तुमने पहले ही मुझसे कहा था कि देवि मेरे रहते हुए पद्मावती के सिवा
दूसरी सौत तुम्हारी नहीं होगी। अब देखो यह कलिङ्गसेना भी आज विवाहित हो जायगी।
यह अत्यन्त रूपवती है और राजा उसके प्रति अत्यन्त आसक्त हैं। अतः तुम अब झूठे बन और
मैं मरी अर्थात् आत्महत्या करूँगी' ॥८१-८३॥
यह सुनकर मन्त्री यौगन्धरायण वासवदत्ता से कहने लगा—'देवि धैर्य रखो। मेरे जीने
भी यह कैसे हो सकता है? किन्तु तुम्हें इस सम्बन्ध में राजा का विरोध न करना चाहिए। प्रत्युत
धैर्य के साथ अनुकूलता ही प्रकट करनी चाहिए ॥८४-८५॥
प्रतिकूल चलने से रोगी वैद्य के वश में नहीं आता। शान्तिपूर्वक रोगी की अनुकूल
चिकित्सा करने पर ही वह उसके वश में आता है ॥८६॥
मनुष्य विपरीत क्रिया द्वारा अपने उद्योग या व्यसन से दूर नहीं होता। इसलिए
पास आये हुए राजा को तुम सरल भाव से अपनी भावना को छिपाकर विविध प्रकार से सेवा
करना ॥८७-८८॥
७१६ कथासरित्सागर
७१६ कथासरित्सागर
कलिङ्गसेनास्वीकारं श्रद्दध्यात्तस्य साम्प्रतम्।
ब्रूहि मुग्धाणा राज्यस्य महाये तत्पितर्यपि ॥८९॥
एवं कृते च माहात्म्यगुणं दृष्ट्वा परं तव।
प्रवृद्धस्नेहदाक्षिण्यो राजासौ भवति त्वयि ॥९०॥
मत्वा कलिङ्गसेनां च स्वाधीनां नोत्सुको भवेत्।
वार्यमाणस्य वाञ्छा हि विषयेष्वभिवर्धते ॥९१॥
देवी पद्मावती चैतच्छिक्षणीया स्वयानघे।
एवं स राजा कार्येऽस्मिन्कालक्षेपं सहेत न ॥९२॥
अतः परं च जानेऽहं पदयेयुक्तिरुत्तरम्।
सङ्कटे हि परीक्ष्यन्ते प्राज्ञा शूराश्च सङ्गरे ॥९३॥
तद्देवि मा विषण्णा भूरिति देवीं प्रबोध्य ताम्।
तथादृतोक्तिः स ययौ ततो यौगन्धरायणः ॥९४॥
वत्सेश्वरश्च तदहर्न दिवा न रात्रौ
देव्योर्द्वयोरपि स वासगृहं जगाम।
तादृक्स्वयंवररसापनमत्कलिङ्ग-
सेनासमाननवसंगमसोत्सुचेताः ॥९५॥
रात्रिं च दुर्लभरसोत्सुकतातिगाढ-
चिन्तामहोत्सवमयीमिव तां ततस्ते।
निन्युः स्वसद्मसु पृथक्पृथगेव देवी
वत्सेशतत्सचिवमुख्यकलिङ्गसेनाः ॥९६॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुका लम्बके
पञ्चमस्तरङ्गः।
षष्ठस्तरङ्गः
कलिङ्गसेनायाः कथा
यौगन्धरायणस्य कूटनीतिप्रपञ्चः
ततः प्रतीक्षमाणं तं वत्सराजमुपेत्य सः।
यौगन्धरायणो धूर्तः प्रातर्मन्त्री व्यजिज्ञपत् ॥१॥
'भगवन् कलिङ्गसेनाया देव्यस्य च शुभावहम्।
विवाह मङ्गलायेह किं नाद्यैव विलोक्यते ॥२॥
१ प्राचीनपुस्तकेऽस्माच्छ्लोकात्पूर्वं राजन् ! कलिङ्गदत्तस्य राज्ञस्तत्कलिकालतो
इत्यधिकः पाठः समुपलभ्यते।
षष्ठ लम्बक ७१७
षष्ठ लम्बक ७१७
इस समय कलिङ्गसेना की स्वीकृति को भी सादर मान लेना। यह भी कहना कि उसके
पिता कलिङ्गरत राजा की सहायता से राज्य की वृद्धि ही होगी ॥८९॥
ऐसा करने पर तुम्हारे हृदय की उदारता और महत्ता से बढ़ हुए स्नेहवाला राजा तुम्हारी
ओर आ जायगा ॥९०॥
और कलिङ्गसेना को स्वाधीन (स्वतन्त्र) समझकर उसके प्रति वह उत्सुक न होगा।
विषयों से रोके जाते हुए व्यक्ति की इच्छा विषयों की ओर ही अधिक दौड़ती है ॥९१॥
रानी पद्मावती को भी इसी प्रकार, शिक्षा देना। इस प्रकार, तुम लोगों से सँभाला हुआ
राजा हमारे द्वारा किये जाते हुए विलम्ब को सहन कर लेगा ॥९२॥
इससे अधिक मैं नहीं जानता। अब मेरी बुद्धि का बल देखो। सङ्कट-काल में बुद्धिमान्
और युद्ध-काल में शूरवीर की परीक्षा होती है ॥९३॥
इसलिए हे देवि खिन्न न होओ। इस प्रकार, रानी को समझाकर और अपनी बातों का
समर्थन प्राप्त कर यौगन्धरायण चला गया ॥९४॥
स्वयंवर के रस से अभिभूत होकर बालवाली ऐसी कलिङ्गसेना के प्रथम समागम के लिए
उत्कण्ठित चित्तवाला वत्सराज उस दिन न दिन में और न रात में ही किसी भी रानी के भवन में
गया ॥९५॥
और उधर, कलिङ्गसेना ने भी यह रात दुर्लभ रस प्राप्त करने की उत्सुकता गम्भीर
चिन्ता और महोत्सव के स्मरण में व्यतीत की ॥९६॥
पंचम तरङ्ग समाप्त
षष्ठ तरंग
कलिङ्गसेना की कथा (चालू)
मन्त्री यौगन्धरायण का कूटनीति-प्रपञ्च
तदनन्तर, दूसरे दिन प्रातःकाल प्रतीक्षा करते हुए वत्सराज से धूर्त (चतुर) मन्त्री
यौगन्धरायण ने जाकर निवेदन किया—'महाराज आपके लिए कल्याणदायक कलिङ्गसेना का
विवाह-महोत्सव आज ही क्यों न देख लिया जाय' ॥१ २॥
७१८ कथासरित्सागर
७१८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्राजा ममाप्येवं हृदि स्थितम् ।
तां बिना हि मुहूर्तं मे स्थातुं न सहते मनः ॥३॥
इत्युक्त्वैव स तत्कालं प्रतीहारं पुरःस्थितम् ।
आदिश्यानाययामास गणकान् सरलाक्षयः ॥४॥
तेन पृष्टा महामन्त्रिपूर्वस्थापितसंविदः ।
ऊचुर्लग्नोऽनुकूलोऽस्ति राज्ञो मासेषु षट्स्वितः ॥५॥
तच्छ्रुत्वैव मृषा कोपं कृत्वा यौगन्धरायणः ।
अज्ञा इमे धिगित्युक्त्वा राजानं निपुणोऽब्रवीत् ॥६॥
योऽसौ ज्ञानीति देवेन पूजितो गणकः पुरा ।
स नागतोऽद्य तं पृष्ट्वा यथायुक्तं विधीयताम् ॥७॥
एतन्मन्त्रिवचः श्रुत्वा वत्सेशो गणकं तदा ।
तमप्यानाययामास दोलारूढेन चेतसा ॥८॥
सोऽप्यस्य कालहाराय स्थितसंवित्तथैव तम् ।
लग्नं पृष्टोऽब्रवीद्ध्यात्वा षण्मासान्ते व्यवस्थितम् ॥९॥
ततो राजानमद्विग्न इव यौगन्धरायणः ।
जगाद देव कर्तव्यं किमत्राविधीयतामिति ॥१०॥
राजाप्युक्तः सुरुग्नेयी स विमृश्य ततोऽभ्यधात् ।
कलिङ्गसेना प्रष्टव्या सा त्रिमाहेत्यवेक्ष्यताम् ॥११॥
सञ्छ्र्त्वा स तथेत्युक्त्वा गृहीत्वा गणकद्वयम् ।
पार्श्वं कलिङ्गसेनाया ययौ यौगन्धरायणः ॥१२॥
तया कृतादरो दृष्ट्वा तद्रूपं स व्यचिन्तयत् ।
प्राप्येमां व्यसनाद्राजा सर्वं राज्यं त्यजेदिति ॥१३॥
उवाच चैनामुद्वाहलग्नं ते गणकैः सह ।
निर्द्धातुमागतोऽस्म्येतैस्त्वं मद्य तन्निषेव्यताम् ॥१४॥
तच्छ्रुत्वा जन्मऋक्षं तस्याः परिजनोदितम् ।
गणकास्ते मृषा कृत्वा विचारं मन्त्रिसंविदा ॥१५॥
लग्नं तमेव तत्रापि मासषट्कान्तवर्त्तिनम् ।
नातीतः पुरोऽस्तीति वदन्तः पुनरभ्यधुः ॥१६॥
षष्ठ लम्बक ७१९
षष्ठ लम्बक ७१९
यह सुनकर राजा ने कहा— 'मेरे मन में भी यही है। उसके बिना मैं घड़ी भर भी
नहीं रह सकता' ॥१३॥
ऐसा कहकर उस मन्द स्वभाववाले राजा ने सामने खड़े हुए प्रधान द्वारपाल को आज्ञा
देकर गणकों (ज्योतिषियों) को बुलवाया ॥१४॥
महामन्त्री द्वारा पहले से ही सिद्ध किये गये उन गणकों ने राजा के पूछने पर कहा कि
'महाराज के लिए यात्रा में छः महीने के बाद (पश्चात्) अनुकूल लग्न आता है' ॥१५॥
यह सुनकर कृत्रिम क्रोध प्रकट करता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण 'ये मूर्ख हैं' ऐसा कहकर
राजा से कहने लगा—"जिस गणक को महाराज ने 'ज्ञानी है'—तथा कहकर सम्मानित किया
था वह आज नहीं आया। महाराज उसे बुलाकर पूछें" ॥१६-७॥
तब मन्त्री की बात सुनकर वत्सराज ने संताप—भर चित्त से उस ज्योतिषी को
बुलवाया ॥१८॥
समय लाभ के षड्यन्त्र में मन्त्री यौगन्धरायण उसे भी पहले ही सम्मन्त्रित कर चुका था
अतः उसने भी राजा के लग्न पूछने पर छह मास के पश्चात् का समय ही बतलाया ॥ ॥
तब व्याकुल भाव प्रकट करते हुए यौगन्धरायण ने राजा से कहा—'महाराज अब आदेश
दीजिए कि क्या किया जाय' ॥१ ॥
उस विपत्तिकाल पर भी शुभ लग्न का चाहनेवाला राजा कुछ सोचकर कहने लगा— कलिंग
सेना से भी पूछना चाहिए वह क्या सम्मति है देना ॥१२॥
'जो आज्ञा' ऐसा कहकर और गणकों को साथ लेकर मन्त्री यौगन्धरायण कलिङ्गसेना के
पास गया ॥१३॥
उसके द्वारा स्वागत-सत्कार किया गया यौगन्धरायण उसके रूप को देखकर सोचने लगा
कि इसे प्राप्त कर राजा दुःसह व्यसन में पड़ हुआ राज्य छोड़ देगा ॥१४॥
और उसने कहा — 'मैं तुम्हारा विवाह-लग्न स्थिर करने के लिए गणकों के साथ
आया हूँ। अतः तुम अपना जन्म-नक्षत्र बताओ' ॥१५॥
कलिङ्गसेना के सेवकों द्वारा जन्म-नक्षत्र बताने पर पहले ही सम्मन्त्रित हुए गणकों ने अपना
विचार प्रकट कहा कि 'लग्न छह महीने के पश्चात् मिलता है, इससे पूर्व नहीं। यही बात
फिर उसने भी कही' ॥ १६॥
७२० कथासरित्सागर
७२० कथासरित्सागर
श्रुत्वा दूरतरं तं च रुन्मनाविघ्नचेतसि ।
ततः कलिङ्गसेनायां समहत्तरकोऽभ्यधात् ॥१७॥
प्रेक्ष्यो लग्नोऽनुकूलः प्रायेन स्यादेतयोः शुभम् ।
यावत्कालं हि दम्पत्यो र्कि चिरेणाचिरेण वा ॥१८॥
एतन्महत्तरवचः श्रुत्वा सर्वेऽपि तत्क्षणम् ।
सदुक्तमेवमेवैतदिति तत्र बभाषिरे ॥१९॥
यौगन्धरायणोऽप्याह हा कुलघ्ने कृते च न ।
कलिङ्गवतः सम्बन्धी राजा शेषं व्रजेदिति ॥२०॥
ततः कलिङ्गसेनापि सर्वांस्तानवशा सती ।
यथा भवन्तो जानन्तीत्युक्त्वा सज्जी बभूव सा ॥२१॥
तदेव च वचस्तस्या गृहीत्वामन्त्र्य तां ततः ।
यौगन्धरायणो राज्ञः पार्श्वं सगणको ययौ ॥२२॥
तत्र तस्मै तदाधाय वत्सेशाय तथैव सः ।
युक्त्या च तमवस्थाप्य स जगाम निजं गृहम् ॥२३॥
सिद्धकालातिपातश्च कार्यशेषाय तत्र सः ।
योगेश्वराख्यं सुहृदं सस्मार ब्रह्मराक्षसम् ॥२४॥
स पूर्वप्रतिपन्नस्तं स्वैरं ध्यानादुपस्थितः ।
राक्षसो मन्त्रिणं नत्वा किं स्मृतोऽस्मीत्यवोचत ॥२५॥
ततः स मन्त्री तस्मै तं कृत्स्नं व्यसनं प्रभोः ।
कलिङ्गसेनावृत्तान्तमुक्त्वा भूयो जगाद तम् ॥२६॥
कालो मया हृतो मित्र तमद्ये त्वं स्वमुचितं ।
युक्तं कलिङ्गसेनायाः प्रच्छन्नोऽन्यां निरूपयेः ॥२७॥
विद्याधरादयस्तां हि छन्नं वाञ्छन्ति निश्चितम् ।
यतोऽन्या तादृशी नास्ति रूपेणास्मिञ्जगत्त्रये ॥२८॥
अतः केनापि सिद्धेन सह विद्याधरेण वा ।
गच्छेद्विसा यदि तच्च त्वं पश्येस्तदमङ्गलं भवेत् ॥२९॥
अन्यरूपागतश्चात्र लक्ष्यस्ते दिव्यकामुकः ।
स्वापकाले यतो दिव्याः सुप्ताः स्वे रूप आसते ॥३०॥
एवं स्वदृष्टितस्तस्या दोषोऽस्माभिर्विलोक्यते ।
तस्यां राजा विरज्येच्च तत्कार्यं निर्वहेच्च न ॥३१॥
षष्ठ लम्बक ७२१
षष्ठ लम्बक ७२१
कलिङ्गसेना के बहुत लम्बे समय बाद का लग्न सुन व्याकुल होने पर उसके प्रतीहार ने
कहा—॥१७॥
'सबसे पहले शुभ लग्न देखना चाहिए, जिससे कि उन दोनों (दम्पति) का कल्याण हो।
विलम्ब और शीघ्रता का उतना महत्त्व नहीं ॥१८॥
वृद्ध प्रतीहार के वचन सुनकर सभी उपस्थित लोगों ने उसकी बात का समर्थन करते
हुए कहा कि इन्होंने ठीक ही तो कहा है॥१९ ॥
यौगन्धरायण ने भी कहा कि 'यदि अशुभ लग्न में विवाह हुआ तो हमारे सम्बन्धी कलिङ्गदत्त
को भी खेद होगा' ॥२० ॥
तब कलिङ्गसेना भी विवश होकर बोली—'जैसा आप सब लोग उचित समझें करें'—
इतना कहकर वह चुप हो गई ॥२१॥
कलिङ्गसेना की इस बात को सुनकर और उससे जाने की आज्ञा प्राप्त कर मन्त्री यौगन्धरायण
गणकों के साथ राजा के पास गया ॥२२॥
वहाँ जाकर वत्सराज से उसी प्रकार सब निवेदन करके और उसे युक्तिपूर्वक समझा
बुझाकर वह अपने घर गया ॥२३॥
समय व्यतीत करने की उसकी योजना सफल होने पर और अवशिष्ट कार्य की सिद्धि
के लिए उसने अपने मित्र योगेश्वर नामक ब्रह्मराक्षस को बुलाया ॥२४॥
वह ब्रह्मराक्षस पहले से ही सिद्ध था अतः उसके ध्यान करते ही उपस्थित हो गया ॥२५॥
राक्षस ने मन्त्री को प्रणाम करते हुए पूछा कि 'मुझे क्यों स्मरण किया है'? ॥२६॥
तब मन्त्री यौगन्धरायण ने राजा को विरक्ति देनेवाले कलिङ्गसेना के समस्त वृत्तान्त को
कहकर फिर कहा—'मित्र मैंने समय तो टाल दिया है। अभी छह् महीने हैं। इस बीच छिपे
छिपे कलिङ्गसेना का हाल-चाल देखा ॥२७॥
विद्याधर सिद्ध आदि भी उसे निश्चित रूप से चाहते हैं। कारण यह कि तीनों लोकों
में उसके समान सुन्दरी कुमारी नहीं है ॥२८॥
यदि वह किसी सिद्ध या विद्याधर के साथ सङ्गम करे तो तुम देखना इससे हमारा
शुभ होगा ॥ ॥
रूप परिवर्तन कर आये हुए दिव्य प्राणियों का भी ध्यान रखना क्योंकि दिव्य व्यक्ति
रूप परिवर्तित करने पर भी शयन करने के समय अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं ॥३० ॥
इस प्रकार तुम्हारी आँखों से हम उसके दोष देख सकेंगे। इससे राजा को उनके प्रति
वैराग्य उत्पन्न हो जायगा और हमारा कार्य सिद्ध हो जायगा ॥३१॥
९१
७२२ कथासरित्सागर
७२२ कथासरित्सागर
इत्युक्तो मन्त्रिणा तेन सोऽब्रवीद् ब्रह्मराक्षसः।
युक्त्याहमेव किं नैतां ध्वंसयामि निहन्मि वा ॥३२॥
तच्छ्रुत्वैव महामन्त्री तं स यौगन्धरायणः।
उवाच नैतत्कर्तव्यमधर्मो हि महान् भवेत् ॥३३॥
यश्च धर्ममबाधित्वा स्वेन संसरते पथा।
तस्योपयाति साहाय्यं स एवाभीष्टसिद्धिषु ॥३४॥
सतस्याः स्वोत्थितो दोषः प्रेक्षणीयस्त्वया सखे।
येनास्माभिर्भवन्मैत्र्या राजकार्यं कृतं भवेत् ॥३५॥
इति मन्त्रिवरादिष्टः स गत्वा ब्रह्मराक्षसः।
गृहं कलिङ्गसेनाया योगच्छन्न प्रविष्टवान् ॥३६॥
अत्रान्तरे सखी तस्याः सा मयासुरपुत्रिका।
आगात्कलिङ्गसेनायाः पार्श्वं सोमप्रभा पुनः ॥३७॥
सा पृष्ट्वा रात्रिवार्त्तां तां मुक्तवधूं मयात्मजा।
राजपुत्रीमुवाचैव तस्मिन् सुष्वति राक्षसे ॥३८॥
अद्य पूर्वाह्ण एवाहं विचिन्त्य त्वामिहागता।
छन्ना स्थिताऽभवत्पार्श्वे दृष्ट्वा यौगन्धरायणम् ॥३९॥
श्रुतश्च युष्मदालापः सर्वं चावगतं मया।
तत्किं त्वया ह्य एवैतदारब्धं मन्निषिद्धया ॥४०॥
भव्यपोह्यानिमित्तं हि कार्यं यत्क्रियते सखि।
तदनिष्टाय कल्पेत तथा चेमां कथां शृणु ॥४१॥
विष्णुदत्तस्यतत्सप्तसहयात्रिविप्राणाञ्च कथा
अन्तर्वेद्या¹मभूत्पूर्वं वसुदत्त इति द्विजः।
विष्णुदत्ताभिधानश्च पुत्रस्तस्योदपद्यत ॥४२॥
स विष्णुदत्तो वयसा पूर्णषोडशवत्सरः।
गन्तुं प्रवृत्तो विद्याप्राप्तये वलभीं पुरीम् ॥४३॥
मिलन्ति स्म च तस्यान्ये सप्त विप्रसुताः समाः।
सप्तापि ते पुनर्मूर्खाः स विद्वान् सत्कुलोद्गतः ॥४४॥
१ अन्तर्वेदी।
षष्ठ लम्बक ७२१
षष्ठ लम्बक ७२१
मन्त्री के इस प्रकार कहने पर, वह ब्रह्मराक्षस बोला—'मैं किसी उपाय से उसे क्यों न
नष्ट कर दूँ या मार डालूँ ? ॥३२॥
यह सुनकर महामन्त्री यौगन्धरायण बोला—'ऐसा न करना चाहिए क्योंकि इससे महान्
अधर्म होगा' ॥३३॥
जहाँ धर्म की रक्षा करते हुए मनुष्य अपने इच्छानुसार चलता है या कार्य करता है
वहाँ पर धर्म ही उसकी सहायता करता है ॥३४॥
इसलिए मित्र तुम उसके निजी दोष को न देखो जिससे कि मैं तुम्हारी मित्रता के
कारण राजा का कल्याण-कार्य सिद्ध कर सकूँ ॥३५॥
मन्त्री द्वारा इस प्रकार आदेश देने पर ब्रह्मराक्षस कलिगसेना के भवन में जाकर छिपकर
बैठ गया ॥३६॥
इसी बीच कलिङ्गसेना की सखी मयासुर की पुत्री सोमप्रभा उसके पास फिर
आई ॥३७॥
उसके कलिङ्गसेना से रात की बात पूछने पर ब्रह्मराक्षस के सुनते हुए कलिङ्गसेना ने सारा
वृतान्त मयासुर की पुत्री को सुनाया जिसे ब्रह्मराक्षस सुन रहा था ॥३८॥
तब सोमप्रभा बोली—'आज मैं दिन के प्रथम प्रहर में ही तेरे पास आ गई थी किन्तु
तुम्हारे पास यौगन्धरायण को देखकर छिपी रही ॥३९॥
उस तुम्हारी बातचीत तथा और सब कुछ मैंने जान लिया। मेरे मना करने पर भी
तूने हठ ही यह कार्य क्यों कर डाला ? ॥४०॥
बिना समझे-बूझे और बिना कारण जो कार्य किया जाता है उसमें अनिष्ट ही होता है।
उदाहरण के लिए इस प्रसंग की एक कथा सुनो' ॥४१॥
विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा
प्राचीन समय में अन्तर्वेदी देश में समुद्रदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके पुत्र
का नाम विष्णुदत्त था ॥४२॥
वह विष्णुदत्त जब पूरे सोलह वर्ष की अवस्था का था तब विद्या-प्राप्ति के लिए
वलभीपुरी में जाने के लिए तैयार हुआ। साथ जाने के लिए उसे और भी सात ब्राह्मण-पुत्र मिले।
वे सातों मूर्ख थे। केवल विष्णुदत्त ही उनमें बुद्धिमान् और सद्गुणोपेत बालक था ॥४३-४४॥
७२४ कथासरित्सागर
७२४ कथासरित्सागर
कृत्स्वान्योन्यपरित्यागशपथं तैः समं सतः।
विष्णुदत्त प्रतस्थे स पित्रोरविदितो निशि॥४५॥
प्रस्थितश्चाग्रतोऽकस्मादनिमित्तमुपस्थितम् ।
दृष्ट्वा सोऽत्र वयस्यांस्तान् सहप्रस्थायिनोऽभ्यधात् ॥४६॥
अनिमित्तमिदं हन्त युक्तमद्य निवर्तितुम्।
पुनरेव प्रयास्यामः सिद्धये शकुनान्विताः ॥४७॥
तच्छ्रुत्वैव ससायस्तं मूर्खाः सप्तापि तेऽब्रुवन्।
मृषा मा जीगणः शङ्कां नह्यतो बिभिमो वयम् ॥४८॥
त्वं चेद्बिभेषि तन्मा गा वयं यामोऽधुनैव तु।
प्रातर्विदितवृत्तान्ता नास्मांस्त्यक्ष्यन्ति बान्धवाः ॥४९॥
इत्युक्तवद्भिरग्रैस्तैः साकं क्षपद्वयन्वितः।
विष्णुदत्तो ययावेव स स्मृत्वाष्टहरं हरिम् ॥५०॥
राज्यान्ते च विलोक्याम्यदनिमित्तं पुनर्वदन्।
मूर्खैस्तैः सखिभिः सर्वैः स एवं निरभर्त्स्यत ॥५१॥
एतदेवानिमित्तं न किमन्येनाप्यभीरुणा।
यत्त्वमस्माभिरानीतः काकशङ्की पदे पदे ॥५२॥
इत्यादि भर्त्सनां कृत्वा गच्छद्भिस्तैः समं च सः।
विवशः प्रययौ विष्णुदत्तस्तूष्णीं बभूव च ॥५३॥
नोपदेशो विधातव्यो मूर्खस्य स्वाभिचारिणः।
सत्कारोऽन्धकरस्येव तिरस्कारकरो हि सः॥५४॥
एको बहूनां मूर्खाणां मध्ये निपतितो बुधः।
पङ्क पायस्तरङ्गाणामिव क्लिश्यते ध्रुवम्॥५५॥
तस्मादेषां न वक्तव्यं मया भूयो हिताहितम्।
तूष्णीमेव प्रयात्तव्यं विधि र्धेयो विधास्यति ॥५६॥
इत्याद्याकलयन्मूर्खैः प्रक्रमस्तैः समं पथि।
विष्णुदत्तो दिनस्यान्ते शबरग्राममाप सः ॥५७॥
तत्र श्रान्त्वा निशि प्राप तरुप्याधिष्ठितं स्त्रिया।
गृहमर्कं ययाचे च निवासं सोऽत्र तां स्त्रियम् ॥५८॥
तया दत्तेऽववरके सहाम्यैस्तैर्विवेश सः।
सखिभिस्ते च सप्तापि तत्र निद्रां शणं ययुः ॥५९॥
तब वे आपस में एक-दूसरे का साथ न छोड़ने की प्रतिज्ञा करके माता-पिता से
छिपकर रात में एक साथ ही निकले। चलते ही उनके सामने अकस्मात् अपशकुन हुआ। उसे
देखकर विष्णुदत्त ने अपने साथी मित्रों से कहा—'यह अपशकुन है, अतः लौट जाना उचित है।
फिर कभी शुभ शकुन मिलने पर कार्यसिद्धि के लिए चलेंगे' ॥४५-४७॥
यह सुनकर उसके सातों मूर्ख साथी उससे कहने लगे—'व्यर्थ चिन्ता न करो। हमलोग
ऐसे अपशकुनों से नहीं डरते ॥४८॥
यदि तू डरता है तो मत जा हमलोग अभी जायेंगे। प्रातःकाल हमारा समाचार जान
कर घरवाले हमें नहीं छोड़ेंगे' ॥४९॥
ऐसा कहते हुए उन मूर्ख मित्रों के साथ प्रतिज्ञाबद्ध बेचारा विष्णुदत्त पापहारी भगवान्
का ध्यान करके उनके साथ चल पड़ा ॥५०॥
रात बीतने पर, प्रातःकाल ही उसने और अपशकुन देखे। फिर उसने उन मित्रों से कहा
किन्तु उन हठीले मित्रों द्वारा वह फिर फटकारा गया ॥५१॥
वे कहने लगे कि सबसे बड़ा अपशकुन तो यही है कि मार्ग के डरपोक कौवे के समान तुझे
हमलोग साथ लाये ॥५२॥
ऐसी-ऐसी फटकारों को सुनता हुआ विष्णुदत्त जाते हुए उनके साथ चलने को विवश हो
गया। सच है, मनमानी करनेवाले मूर्ख को उपदेश देना ऐसा ही है, जैसे कूड़ा-करकट साफ करता
हुआ व्यक्ति उसकी धूल-मिट्टी से अपने शरीर को गंदा करके अपना ही तिरस्कार कराता
है ॥५३-५४॥
एक बुद्धिमान् व्यक्ति बहुत-से मूर्खों की संगति में पड़कर उसी प्रकार की स्थिति में आ
जाता है, जैसे सरोवर में खड़ा हुआ एक कमल तरंगों के थपेड़ों से आहत होकर हिलता ही
रहता है ॥५५॥
अतः अब मुझे इनसे हित या अहित कुछ न कहकर चुप ही रहना चाहिए। भाग्य भला
करेगा—॥५६॥
ऐसा सोचकर उन मूर्खों के साथ जाते हुए सायंकाल विष्णुदत्त को भीलों का एक गाँव
मिला। वहाँ घूम-फिरकर उसे एक युवती स्त्रीवाला घर मिला। तब उसने उस स्त्री से रहने
के लिए स्थान माँगा ॥५७-५८॥
उसने एक स्थान उसे दे दिया और उसमें वह अपने सातों मित्रों के साथ ठहर गया। कुछ
ही समय में वे सातो मित्र मार्ग की श्रान्ति के कारण सो गये ॥५९॥
७२६ कथासरित्सागर
७२६ कथासरित्सागर
स एको जाग्रदेवांसीदमनुष्यगृहाश्रयात्।
स्वपन्त्यज्ञा हि निश्चेष्टाः कुतो निद्रा विवेकिनाम्॥६०॥
तावच्च तत्र पुरुषः कोऽप्येको निभृतं युवा।
अभ्यन्तरगृहं तस्याः प्रविवेशान्तिकं स्त्रियाः॥६१॥
तेन साकं च सा रेमे चिरं गुप्ताभिभाषिणी।
रतिश्रान्तौ च तौ दैवान्निद्रां द्वावपि जग्मतुः॥६२॥
तच्च दीपप्रकाशेन सर्वं द्वारान्तरेण सः।
विष्णुदत्तो विलोक्यैवं सनिर्वेदमचिन्तयत्॥६३॥
कष्टं क्व प्रविष्टाः स्मो दुश्चारित्र्याः स्त्रिया गृहम्।
ध्रुवं ज्ञातोऽयमेतस्या न कौमारः पतिः पुनः ॥६४॥
नान्यथा हि भवेदेषा सशङ्कनिभृता गतिः।
मया चपलचित्तेयमादावेव न लक्षिता॥६५॥
अन्यालाभात् प्रविष्टाः स्मः किं त्वत्रान्योन्यसाक्षिणः।
इत्येवं चिन्तयन् शब्दं जनानां सोऽशृणोद् बहिः॥६६॥
ददर्श प्रविशन्तं च स्वस्थानस्थानितानुगम्।
युवानमभिपश्यन्तं सशङ्गं शवराधिपम् ॥६७॥
के यूयमिति पृच्छन्तं मत्वा गृहपतिं स तम्।
भीताः पान्थाः स्म इत्याह विष्णुदत्तः पुलिन्दकम्॥६८॥
स चान्तः शबरो गत्वा दृष्ट्वा भार्यां तथास्थिताम्।
चिच्छेद तस्य सुप्तस्य तज्जारस्यासिना शिरः ॥६९॥
भार्या तु निगृहीता न तेन सा नापि बोधिता।
भुवि न्यस्तासिनान्यत्र पर्यङ्के सुप्तमेव तु ॥७०॥
तद्बुद्ध्वा सप्रतीपेक्षं विष्णुदत्तो व्यचिन्तयत्।
युक्तं स्त्रीति न यद्भार्या हता जारहरो हतः॥७१॥
किं तु क्रूरमेदं कर्म यन्नेनात्र सुप्यते।
विस्रब्धं तदहो चित्रं वीर्यमुद्रिक्तचेतसाम्॥७२॥
इत्यत्र चिन्तयत्येव विष्णुदत्ते प्रबुध्य सा।
कुस्त्री ददर्श जारं स्वं हतं सुप्तं च तं पतिम् ॥७३॥
उत्थाय च गृहीत्वा तत्स्कन्धे जारकबन्धनम्।
हस्तेनैकेन चादाय तच्छिरः सा विनिर्ययौ ॥७४॥
एक वही विष्णुदत्त अकेला जागता रहा क्योंकि जिस घर में वह ठहरा था उसमें एक
उस युवती के अतिरिक्त दूसरा कोई पुरुष न था। मुग्ध जन निश्चेष्ट होकर सो जाते हैं किन्तु
विचारशीलों को नींद कहाँ ? ॥६०॥
इसी बीच कोई एक युवा व्यक्ति छिपे तौर से उस स्त्री की कोठरी में स्त्री के पास
गया ॥६१॥
गुप्त रूप से बातें करती हुई वह स्त्री उस पुरुष के साथ रमण करने लगी। कुछ समय
पश्चात् रति की श्रान्ति एवं घोर नींद से विवश होकर वे दोनों सो गये ॥६२॥
विष्णुदत्त दरवाजे की दरार से दीपक के प्रकाश से प्रकाशित उस कोठरी में यह सब
देखता रहा और दुःखी होकर सोचने लगा—॥६३॥
कष्ट है कि हमलोग इस दुराचारिणी स्त्री के घर में आ गये। निश्चय है कि यह इसका
विवाहित पति नहीं है। यदि विवाहित पति होता तो इसकी गति इस प्रकार सशंक और छिपी न
होती। मैंने पहले ही समझ लिया था कि यह स्त्री वंचका है। इस प्रकार सोचते-सोचते उसने
घर के बाहर कुछ मनुष्यों के शब्द सुने ॥६४-६५॥
उसने अपनी-अपनी जगहों पर तैनात अनुचरों के साथ तलवार लेकर आते हुए
भीलों के युवा सरदार को देखा ॥६६॥
'तुम कौन कौन हो'—ऐसा पूछते हुए भीलराज से विष्णुदत्त ने कहा—'हमलोग पथिक
(बटोही) हैं ॥६८॥
तदनन्तर अन्दर आकर और इस प्रकार प्रेमी (जार) के साथ सोई हुई देखकर
भीलराज ने पत्नी के उस प्रेमी का सिर तलवार से काट डाला ॥६९॥
किन्तु स्त्री को न मारा और न जगाया। वह तलवार को भूमि पर रखकर पलंग पर
सो गया ॥७०॥
दीप से प्रकाशित घर में इस घटना को देखकर विष्णुदत्त ने सोचा इसने उचित ही किया
कि स्त्री समझकर पत्नी को नहीं मारा और उसका हरण करनेवाले को मार डाला ॥७१॥
किन्तु यह आश्चर्य है कि ऐसा कर्म करके भी यह विश्वासपूर्वक सो रहा है। बड़े
हुए मनवालों का ऐसा पराक्रम अवश्य आश्चर्यजनक होता है ॥७२॥
विष्णुदत्त यह सोच ही रहा था कि उस दुष्टा स्त्री ने जागकर जार को मरा हुआ और
पति को सोता हुआ देखा ॥७३॥
और, पलंग से उठकर अपने यार के शव को कन्धे पर रखकर एक हाथ से उसके सिर को
लेकर वह घर से बाहर निकली ॥७४॥
७२८ कथासरित्सागर
७२८ कथासरित्सागर
गत्वा बहिदृढं निक्षिप्य भस्मस्कूटान्तरे द्रुतम्।
कबन्धं सशिरस्तं तमाययौ निभृतं ततः ॥७५॥
विष्णुदत्तश्च निर्गत्य सर्वं दूराद् विलोक्य सत्।
मध्ये सखीनां सुप्तानां प्रविश्यासीत्तथैव सः ॥७६॥
स चागत्य प्रविश्याऽत्र पत्युः सुप्तस्य दुर्जनी।
तेनैव तत्कृपाणेन तस्य मूर्धानमच्छिनत् ॥७७॥
निर्गत्य धावयन्ती च मृत्वाऽऽक्रन्दं चकार सा।
हा हतास्मि हतो भर्त्ता ममैभिः पथिभैरिति ॥७८॥
ततः परिजनः श्रुत्वा प्रधाव्यालोक्य तं प्रभुम्।
हतं तान्विष्णुदत्तादीनम्यधावन्नुदायुधः ॥७९॥
एतैश्चाहन्यमानेषु तेषु त्रस्तोत्थितेष्वथ।
अन्येषु तत्सहायेषु विष्णुदत्तोऽब्रवीद्द्रुतम् ॥८०॥
अलं वो ब्रह्महत्यामिर्नैवास्माभिरिदं कृतम्।
एतयैव कृतं ह्येतत्कुस्त्रियाऽप्रसभंस्तथा ॥८१॥
मया पाषावृतद्वारमार्गेणामूरुमीक्षितम् ।
निर्गत्य च बहिर्दृष्टं क्षमञ्चं यदि वच्मि सत् ॥८२॥
इत्युक्त्वा तान् स शबरान्विष्णुदत्तो निवार्य च।
तेभ्यो निशोथमामूलाद् वृत्तान्तं तमवर्णयत् ॥८३॥
नीत्वा चादर्शयत्तेषां कबन्धं तं शिरोऽन्वितम्।
सद्यो हृतं तया क्षिप्तं स्त्रिया सम्भिन्नवस्करम् ॥८४॥
तत स्वेन विवर्णेन मुखेनाङ्गीकृते तया।
कुलटां तां तिरस्कृत्य सर्वे तत्रैवमब्रुवन् ॥८५॥
स्मराकृष्टा तनोत्येव या साहसमशङ्किता।
सा परस्त्रीकृता कुस्त्री रूपाजीव न हन्ति कम् ॥८६॥
इत्युक्त्वा विष्णुदत्तादीन्स वांस्ते मुमुचुस्ततः।
विष्णुदत्तं च सप्तान्ये सहायास्तेऽथ तुष्टुवुः ॥८७॥
रक्षारत्नप्रदीपस्त्वं जातो नः स्वपतां निधिः।
त्वत्प्रसादेन तीर्णा स्मो मृत्युमद्यानिमिषजम् ॥८८॥
स्तुत्वैवं विष्णुदत्तं तं सम्पूज्य च दुर्वचः।
प्रगतास्ते ययुः प्रातः स्वकार्यायेव सत्वराः ॥८९॥
षष्ठ लम्बक ७२९
षष्ठ लम्बक ७२९
बाहर निकलकर राख के ढेर में उसके सिर और शरीर को फेंककर चुपचाप वह लौट
आई ॥७५॥
विष्णुदत्त भी सबसे पीछे निकलकर और दूर से यह सब देखकर, अपने सोये हुए मित्रों
के साथ सो गया ॥७६॥
उधर उस दुष्टा स्त्री ने घर में आकर उसी तलवार से सोये हुए पति का सिर काट
डाला और बाहर निकलकर सेवकों को सुनाकर चिल्लाने लगी— हाय ! मैं मारी गई, इन
पथिकों ने मेरे पति को मार डाला' ॥७७-७८॥
यह सुनकर उसके सेवक दौड़कर आये और अपने सरदार को कटा हुआ देखकर, तलवारें
खींचकर विष्णुदत्त आदि पथिकों पर टूट पड़े ॥७९॥
'ठहरो, तुमलोग ब्रह्महत्या न करो। यह सब काण्ड जार से फँसी हुई इसी दुष्टा स्त्री
ने किया है ॥८ ॥
'मैंने प्रारम्भ से अबतक द्वार के खुली हुई दरारों से सब अपनी आँखों से देखा है और बाहर
निकलकर भी सब स्वयं देखा है। आप लोग क्षमा करें' तो मैं सब कुछ कहता हूँ ॥८१-८२॥
ऐसा कहते हुए विष्णुदत्त ने सारी बात बताकर कूड़े और राख के ढेर में पड़े हुए उस
यार के मृत शरीर और सिर को दिखाया ॥८३-८४॥
तब उतरे हुए मुँह से उस स्त्री के यह सब स्वीकार कर लेने पर वे सब उस दुराचारिणी
को डाँटते-फटकारते चले गये ॥८५॥
काम के वशीभूत होकर जो स्त्री निर्मम होकर साहस कर बैठती है वह दूसरो से स्नेहवत्
होकर तलवार के समान किसका विनाश नहीं कर डालती ॥८६॥
ऐसा कहते हुए उन भीलों ने विष्णुदत्त आदि सातों ब्राह्मणों को छोड़ दिया और वे सातों
साथी विष्णुदत्त की प्रशंसा करने लगे ॥८७॥
उन्होंने कहा— सोये हुए हम लोगों की रक्षा के लिए तुम रत्नदीप के समान सिद्ध हुए।
आज अपशकुन से होनेवाली मृत्यु को तुम्हारी कृपा से हमलोग पार कर सके' ॥८८॥
इस प्रकार विष्णुदत्त की प्रशंसा करके और अपने कहे हुए दुर्वचनों के लिए क्षमा-प्रार्थना-
पूर्वक उसे प्रणाम करके वे प्रातःकाल अपने काम में लग गये ॥८९॥
९२
इत्थं कलिङ्गसेनायाः शमयित्वा व्यथां मिथः।
सोमप्रभा सा कौशाम्ब्यां सखी पुनरुवाच ताम् ॥९०॥
एवं कार्यप्रवृत्तानामनिमित्तमुपस्थितम्।
विलम्बाद्यप्रतिहतं सस्यनिष्टं प्रयच्छति ॥९१॥
यतश्चात्रानुतिष्ठन्ते प्राप्तवाच्यावमानिनः।
प्रवर्त्तमाना रभसात्पर्यन्ते मन्दबुद्धयः ॥९२॥
अतोऽशुभे निमित्ते ऽद्य वत्सेशं प्रति यत्त्वया।
आत्मप्रहाय प्रहितो दूतो युक्तं न तत्कृतम् ॥९३॥
तदविघ्नं विवाहं च विदधातु विधिस्तव।
कुरुम्भेनागता गेहाद् विवाहस्तेन दूरतः ॥९४॥
देवा अपि च रुन्धन्ति त्वयि रत्नमिव ततः।
चिन्त्यश्च नीतिनिपुणो मन्त्री यौगन्धरायणः ॥९५॥
राजव्यसनशङ्की सन्सतोऽत्र विघ्नं समाचरेत्।
विहितेऽपि विवाहे वा दोषमुत्पादयेत्स वः ॥९६॥
धार्मिकः सङ्गं कुर्याद्वा दोषं तन्पि ते सखि।
सपत्नी सर्वथा चिन्त्या कथां वक्ष्यत्र ते शृणु ॥९७॥
ऋषिकन्यायाः कदलीगर्भायाः कथा
अस्तीहैक्षुमती नाम पुरी तस्याश्च पार्श्वतः।
नदी तदभिधानेव विश्वामित्रकृते ऽमे ॥९८॥
तत्समीपे महच्चास्ति वनं तत्र कृताश्रमः।
ऊर्ध्वपावस्तपश्चक्रे मुनिर्मङ्कणकाभिधः ॥९९॥
तपस्यता च तेनात्र गगनेनागताऽप्सराः।
अदर्शि मेनका नाम वातेन चलिताम्बरा ॥१००॥
ततो लब्धावकाशेन कामेन द्रागभिसारितः।
नूतने कदलीगर्भे वीर्यं तस्यापतन्मुनेः ॥१०१॥
जज्ञे ततश्च कन्या सा सद्यः सर्व्वाङ्गसुन्दरी।
अमोघं हि महर्षीणां वीर्यं पचति तत्क्षणम् ॥१०२॥
षष्ठ लम्बक ७३१
षष्ठ लम्बक ७३१
सोमप्रभा ने कौशाम्बी में इस प्रकार कथा सुनाकर कलिंगसेना से पुनः कहा—
ईर्ष्यालु इस प्रकार काम में लगे हुए लोगों को आनेवाले अपशकुन कार्यों में व्यवधान
उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण बुद्धिमानों की बातों को न माननेवाले मन्दबुद्धिवाले
व्यक्ति आवेश में आकर कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं और पीछे पश्चात्ताप करते हैं। इसलिए
उस अपशकुन में वत्सराज के प्रति तुमने अपने ग्रहण करने के लिए, जो दूत भेजा वह अच्छा
नहीं किया। तू घर से कुलग्न में आई है इसलिए तेरा विवाह टल गया है। अब दैव ही उसे
निर्विघ्न पूर्ण करे ॥९०-९४॥
गुण पर देवता भी रीझते हैं। इसलिए तुम्हें उसकी रक्षा करनी चाहिए और मन्त्री
यौगन्धरायण की भी चिन्ता करनी चाहिए। राज्य पर विपत्ति की आशंका से वह विवाह में
विघ्न उपस्थित करेगा। विवाह हो जाने पर भी वह तुममें दोष उत्पन्न करेगा। धार्मिक
होने पर यह संभव है कि वह तुम्हें लांछित न करे, तो भी तुम्हारी सौतें चिन्तनीय हैं।
मैं इस प्रसंग में तुम्हें कथा सुनाती हूँ सुनो ॥९५ ९७॥
ऋषिकन्या कदलीगर्भा की कथा
छेदी देश में इषुमती नाम की नगरी है। उसके पास ही इषुमती नाम की नदी है। ये
दोनों नगरी और नदी—मुनि विश्वामित्र-निर्मित हैं॥९८॥
उसके तट पर एक महान् वन है जिसमें मंकणक नाम का ऋषि ऊपर पैर करके तपस्या
करता था॥९९॥
तपस्या करते हुए उसने एक बार आकाश-मार्ग से जाती हुई मेनका नाम की अप्सरा को
देखा। आकाश-मार्ग से जाती हुई उस मेनका की साड़ी वायु से उड़ रही थी। अतः, उसे नग्न
देखने के कारण काम-वासना से ऋषि का मन क्षुब्ध हो उठा। फलतः उस ऋषि का वीर्य एक
नवीन कदली-वृक्ष के मध्य जा गिरा। और उस कदली-गर्भ से सर्वाङ्गसुन्दरी एक कन्या उत्पन्न
हुई क्योंकि ऋषियों का अमोघ (सफल) वीर्य शीघ्र ही फलीभूत होता है॥१००-१ २॥
७३२ कथासरित्सागर
७३२ कथासरित्सागर
सम्भूता कदलीगर्भे यस्मात्तस्माच्चकार ताम्।
नाम्ना स कदलीगर्भा पिता मङ्कणको मुनिः ॥१०३॥
तस्याश्रमे सा ववृधे गौतमस्य कृपी यथा।
द्रोणभार्या पुरा रम्भादर्शनच्युतवीर्यजा ॥१०४॥
एकदा च विषेधीतमाश्रमं मृगया रसात्।
दृढवर्मा धृतोऽश्वेन मध्यदेशभवो नृपः ॥१०५॥
स तां ददर्श कदलीगर्भां प्रावृतवल्कलाम्।
मुनिकन्योचितेनात्र वेषेणात्यन्तशोभिताम् ॥१०६॥
सा च दृष्ट्वास्य नृपते स्वीचक्रे हृदयं तथा।
यथावकाशोऽपि हतस्तत्रान्तःपुरयोषिताम् ॥१०७॥
अपीमां प्राप्नुयां भार्या कस्यापीह सुतामृषेः।
दुष्यन्त इव कण्वस्य मुनेः कन्यां शकुन्तलाम् ॥१०८॥
इति सञ्चिन्तयन्नेव संगृहीतसमिच्छुभम्।
सोऽप्रापश्यत्समायान्तं मुनिं मङ्कणकं नृपः ॥१०९॥
ववन्दे चैनमभ्येत्य पादयोर्मुक्तवाहनः।
पृष्टश्चात्मानमेतस्मै मुनये स न्यवेदयत् ॥११०॥
छत्रं स कदलीगर्भां मुनिराविशति स्म ताम्।
वत्से राज्ञोऽतिथिपरस्य स्वयार्घ्यं फलप्स्यतामिति ॥१११॥
तथेति कल्पितातिथ्यस्तया राजा स सम्भ्रया।
संवृक्कुतस्ते कन्येयमिति पप्रच्छ तं मुनिम् ॥११२॥
मुनिश्च स ततस्तस्यास्तामुत्पत्तिं च नाम च।
अन्वर्थं कदलीगर्भेत्यस्मै राज्ञे न्यवेदयत् ॥११३॥
ततस्तां स मुनेः कन्यां मेनकामावनोद्भवम्।
प्रत्यप्सरसमप्युक्तो राजा तस्मादयाचत ॥११४॥
सोऽप्येतां कदलीगर्भां ददौ तस्मै सुतामृषिः।
स्थित्यानुभावं पूर्वोक्तामविधाय हि धष्टितम् ॥११५॥
तच्च दृष्ट्वा प्रभावेण सम्भाव्यय सुरङ्गना।
संमदाप्रीतिरुत्सस्याप्यवदद्व्याहृष्णन्नम् ॥११६॥
दत्त्वा च मर्षपाङ्गन्मे जगदुस्तां तदैव ताः।
यान्तीं मार्गे वपस्यैतांस्त्वममभिज्ञानदिछये ॥११७॥
षष्ठ स्तम्भक ७११
उस कन्या के पिता ऋषि ने उसका नाम 'कदलीगर्भा' रख दिया। वह कन्या कदली
गर्भा अपने पिता मंचणक ऋषि के आश्रम में उसी प्रकार पलने और बढ़ने लगी जैसे रम्भा के
दर्शन से विष्णुपद स्थान पर गौतम ऋषि की कन्या और द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी पल
रही थी ॥१-३ । ४॥
एक बार मध्यदेश का राजा दृढवर्मा शिकार के प्रसंग में घोड़े द्वारा उसी आश्रम में
ले जाया गया ॥१-५॥
उस राजा ने वहाँ अकस्मात् आए हुए उस कदलीगर्भा को देखा। वह कन्या मुनिकन्या के
आभूषणहीन वेष में अत्यन्त सुन्दरी लग रही थी ॥१-६॥
उसके देखते ही राजा दृढवर्मा का हृदय उसी प्रकार आकृष्ट हो गया जिस प्रकार
कण्व के आश्रम में शकुन्तला को देखकर राजा दुष्यन्त का हृदय आकृष्ट हो गया था।
राजा सोचने लगा कि क्या मैं दुष्यन्त की शकुन्तला के समान इस कन्या को प्राप्त कर
सकूँगा ? ॥१-७-८॥
इस प्रकार सोचते हुए राजा ने नित्यकर्म के लिए समिधा और कुशा लेकर आते हुए
मंचणक ऋषि को देखा ॥१- ९ । १०॥
उस समय घोड़े से उतरते हुए राजा ने ऋषि के समीप आकर उनके चरणों में प्रणाम किया
और प्रश्न करने पर उसे अपना परिचय दिया ॥११॥
तब ऋषि ने कन्या कदलीगर्भा को आज्ञा दी कि बेटी इस अतिथि राजा के लिए तुम
अर्घ्य ला ॥१२-१३॥
इस प्रकार उस विनम्र कन्या से सन्तुष्ट राजा ने उस मुनि से पूछा कि यह स्त्री कन्या तुम्हें
कहाँ से और कैसे प्राप्त हुई ? ॥१४-१५॥
तब मुनि ने उसकी उत्पत्ति और उसके नाम का अनुकूल अर्थ 'कदलीगर्भा' बताया ॥१६-१७॥
तब राजा ने उस कन्या को मेनका अप्सरा की सन्तान समझकर अत्यन्त उत्कण्ठा के साथ
ऋषि से उस कन्या को माँगा ॥१८-१९॥
राजा के माँगने पर उस ऋषि ने भी उस कन्या दे दी क्योंकि प्राचीन व्यक्तियों को दिव्य
और प्रभावशाली व्यक्तियों पर विचार न करना चाहिए ॥१२-२०॥
अपने दिव्य प्रभाव से स्वर्ग की अप्सराओं ने यह जानकर और मेनका के प्रेम से यहाँ
आकर उस कन्या को विवाह के वेष में अलंकृत किया। और उसके हाथ में सरसों देते हुए
कहा- तू पतिके घर जाती हुई मार्ग में इसे डालती हुई जाना जिससे लौटते समय के लिए
मार्ग का परिचय बना रहे ॥१२८-१३०॥
१ उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पूर्व में प्रयाग और पश्चिम में मारवाड़
के मध्य में आया हुआ देश, मध्यदेश कहा जाता है।
२ दिव्य अतिथि के स्वागत के लिए उसे अक्षत दूब और फल डालकर जल देना
अर्घ्य है जो सम्मान का चिह्न है।
३ अर्थात् केले के वृक्ष के मध्य से उत्पन्न।
७२६ कथासरित्सागर
७२६ कथासरित्सागर
यन्मया सहसा देव्याः प्रतिज्ञा पुरतः कृता ।
विज्ञानं नात्र सादृक्ष्मे सम्यककिञ्चिच्च विद्यते ॥१३३॥
अन्यत्रेव च न व्याजः कृतः राजगृहे क्षमम् ।
ज्ञात्वा जातु हि कुर्वीरन्निग्रहं प्रभविष्णवः ॥१३४॥
एकस्तत्राभ्युपायः स्याद्यत्सुहृन्मेऽस्ति नापितः ।
ईदृग्विज्ञानकुशलः स जतुर्यादिहोद्यमम् ॥१३५॥
इत्यालोच्यैव सा तस्य नापितस्यान्तिकं ययौ ।
तस्मै मनीषितं सर्वं तच्छशंसांर्थसिद्धिदम् ॥१३६॥
तत स नापितो वृद्धो धूर्तश्चैवमचिन्तयत् ।
उपस्थितमिदं विष्ट्या लाभस्थानं ममाधुना ॥१३७॥
सन्न वाच्या नवा राजवधू रक्ष्या तु सा यतः ।
दिव्यदृष्टिः पिता तस्य सर्वं प्रख्यापयेदिदम् ॥१३८॥
विदितेऽप्येतौ तु नृपतेर्देवी सम्प्रति मुञ्चतु ।
क्रूरहस्य-सहाये हि भृते मरयामते प्रभुः ॥१३९॥
संश्लेष्य काले राजे च वाच्यमेतत्तथा मया ।
यथा स्यादुपजीव्यो मे राजा सा वणिककन्यका ॥१४०॥
एवं च नातिपापं स्याद् भवेद्दीर्घा च जीविका ।
इत्यालोच्य स तां प्राह नापितः कूटतापसीम् ॥१४१॥
अम्ब ! सर्वं करोम्येतत्किं तु योगबलेन चेत् ।
एषा राज्ञो नवा भार्या हन्यते तन्न युज्यते ॥१४२॥
यद्वा कदाचिद्राजा हि सर्वानस्मान् विनाशयेत् ।
स्त्रीहत्या पातकं च स्यात्पिता च मुनिः शपेत् ॥१४३॥
तस्माद् बुद्धिवलेनैषा राज्ञो विश्लेष्यते परम् ।
येन देवी सुखं तिष्ठेदर्थप्राप्तिर्भवेच्च नः ॥१४४॥
एतच्च न कियत्क्षिप्रं हि न बुद्ध्या साधयाम्यहम् ।
प्रज्ञानं मायरूपं च श्रूयतां वक्ष्यामि ते ॥१४५॥
अभूदस्य पिता राज्ञो दुःशीलो दुष्टवल्लभः ।
अह च दासस्तस्याहं गतः स्वाक्षिप्तकर्मकृत् ॥१४६॥
स कदाचिदिह भ्रान्त्या भार्यामन्तः मामकीम् ।
तस्यां तस्य सुरूपायां तरुण्या च मनो ययौ ॥१४७॥