कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक ७१
प्रथम लम्बक ७१
वह गुणाढ्य भी मेरा पक्षपाती शिवजी का माल्यवान् नामक उत्तम गण है। मेरा पक्षपात
करने के कारण पार्वती ने उसे क्रोध से शाप दिया इसीलिए मानव-योनि में उत्पन्न हुआ है॥१३०॥
इस गुणाढ्य को शिवजी के द्वारा कही गई और मुझसे सुनाई गई यह कथा सुनाना।
तब तुम्हारी और उसकी शाप-मुक्ति होगी ॥१३१॥
इस प्रकार वररुचि काणभूति को कहकर शरीर-त्याग करने के लिए पवित्र बद्रिकाश्रम
को गया ॥१३२॥
शाकाहारी मुनि की कथा
बद्रिकाश्रम जाते हुए वररुचि ने गङ्गातट पर एक शाकाहारी ब्राह्मण को देखा। वररुचि के
सामने ही उस ऋषि का हाथ कुश से कट गया ॥१३३॥
उस ऋषि के अहंकार की परीक्षा के लिए तथा कौतुक से उस निकलते हुए रक्त को
वररुचि ने अपने प्रभाव से शाक का रस बना दिया ॥१३४॥
अपने इस प्रभाव को देखकर उस मुनि को घमंड उत्पन्न हुआ यह देखकर वररुचि ने
मुसकराते हुए कहा ॥१३५॥
मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए रक्त को शाक का रस बना दिया। किन्तु मालूम हुआ कि
अभी तक तुमने अहंकार को त्यागा नहीं है ॥१३६॥
अहंकार, ज्ञानमार्ग में कठिनाई से हटनेवाली बाधा है और ज्ञान के बिना सैकड़ों यज्ञों
से भी मुक्ति नहीं होती ॥१३७॥
पुण्यों के क्षीण होने पर नष्ट हो जानेवाला स्वर्ग मुक्ति चाहनेवाला को आकृष्ट नहीं
करता। इसलिए अहंकार का त्याग कर मुक्ति के लिए यत्न करो ॥१३८॥
इस प्रकार मुनि को शिक्षा देकर और नम्र होते हुए उससे स्तुति किया गया वररुचि
प्रणाम-पावन बद्रिकाश्रम के स्थान को गया ॥१३९॥
मनुष्य-देह को छोड़ने की इच्छा से वररुचि बद्रिकाश्रम में गाढ़ी भक्ति के साथ देवी की
शरण में प्राप्त हुआ। देवी ने स्वयं प्रकट होकर, शरीर की मुक्ति के लिए उसे स्वयं योग द्वारा
शरीर से निकली हुई अग्नि से देहपात करने के लिए कहा अर्थात् अपने शरीर से उत्पन्न योगाग्नि
से अपने शरीर की मुक्ति के लिए उसे भस्म करो ॥१४०॥
इस प्रकार वररुचि उसी देवी के द्वारा निर्दिष्ट परम्परा से योगाग्नल से मानव-शरीर को
दग्ध करके अपनी यक्ष-गति को प्राप्त हुआ और उधर काणभूति दृष्टिगत गुणाढ्य के समागम के
प्रति उत्कण्ठित था ॥१४१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का
पंचम तरंग समाप्त
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर
षष्ठस्तरङ्गः
ततः स मर्त्यवपुषा माल्यवान् विचरन् वनं।
नाम्ना गुणाढ्यः संवित्वा सातवाहनभूपतिम् ॥१॥
संस्कृताद्यास्त्वग्रे च भाषास्तिस्रः प्रतिज्ञया।
त्यक्त्वा खिन्नमना द्रष्टुमाययौ विन्ध्यवासिनीम् ॥२॥
तदावसनं गत्वा च काणभूतिं ददर्श सः।
ततो जातिं निजां स्मृत्वा प्रबुद्धः सहसाऽभवत् ॥३॥
आदित्य भाषां पैशाचीं भाषात्रयविलक्षणाम्
श्रावयित्वा निजं नाम काणभूतिं च सोऽब्रवीत् ॥४॥
पुष्पदन्ताच्छ्रुतां दिव्यां शीघ्रं कथय मे कथाम्।
येन शापं तरिष्यावस्त्वं चाहं च समं सखे ॥५॥
गुणाढ्यकथा
तच्छ्रुत्वा प्रणतो हृष्टः काणभूतिरुवाच तम्।
कथयामि कथां किं तु कौतुकं मे महत्प्रभो ! ॥६॥
आत्मचरितं तावच्छंस मे कुर्व्वन्नुग्रहम्।
इति तेनार्थितो वक्तुं गुणाढ्योऽथ प्रचक्रमे ॥७॥
प्रतिष्ठानेऽस्ति नगरं सुप्रतिष्ठितसञ्ज्ञकम् ।
तत्राभूत्सोमशर्माख्यः कोऽपि ब्राह्मणसत्तमः ॥८॥
वत्सश्च गुल्मकश्चैव तस्य द्वौ तनयौ सता।
जायते स्म तृतीया च श्रुतार्था नाम कन्यका ॥९॥
कालेन ब्राह्मणः सोऽथ सभार्यः पञ्चतां गतः।
तत्पुत्रौ तौ स्वसारं तां पालयन्तावतिष्ठताम् ॥१०॥
सा चाकस्मात्सगर्भामूत्तद्दृष्ट्वा वत्सगुल्मयोः ।
तत्रान्यपुंष्यामापाच्छङ्कान्योग्यमजायत ॥११॥
ततः श्रुतार्था चित्तज्ञा भ्रातरौ तावभाषत।
पापशङ्का न कर्त्तव्या शृणुतं कथयामि वाम् ॥१२॥
कुमारः कीर्त्तिसेनाख्यो नागराजस्य वासुकेः ।
भ्रातुः पुत्रोऽस्ति तेनाहं दृष्टा स्नातुं गता सती ॥१३॥
ततः स मदनाक्रान्तो निजधान्वयनामनी।
गान्धर्वेण विवाहेन मां भार्यामकरोत्तदा ॥१४॥
प्रथम लम्बक ७५
प्रथम लम्बक ७५
षष्ठ तरंग
वररुचि के चले जाने पर उसका मित्र खिन्नहृदय माल्यवान् नामक गण मर्त्यशरीर
में गुणाढ्य नाम से विख्यात होकर वन में घूमता हुआ संस्कृत आदि तीन भाषाओं को
प्रतिज्ञापूर्वक छोड़कर और सातवाहन राजा की सेवा करके विन्ध्यवासिनी भगवती के दर्शन के
लिए आया॥१-२॥
विन्ध्यकामिनी की आज्ञा से उसने विन्ध्यारण्य में काणभूति को देखा। काणभूति को
देखते ही गुणाढ्य को अपनी पूर्व जाति का स्मरण हो गया और वह मानो अकस्मात् जाग उठा॥३॥
संस्कृत प्राकृत एवं देशीय (अपभ्रंश)—इन तीनों भाषाओं को छोड़कर पैशाची भाषा
में अपना नाम सुनाकर वह काणभूति से बोला॥४॥
मित्र काणभूते पुष्पदन्त से सुनी हुई उस दिव्य कथा को शीघ्र सुनाओ जिसके सुनने पर
मैं और तुम दोनों एक साथ ही शाप से मुक्त हो जायेंगे॥५॥
गुणाढ्य की कथा
यह सुनकर काणभूति ने गुणाढ्य से कहा—हे स्वामिन्! उस दिव्य कथा को तो मैं
सुनाता हूँ। किन्तु मुझे एक महान् कौतूहल है॥६॥
वह यह कि पहले आप अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाओ। इस प्रकार काणभूति के प्रार्थना
करने पर गुणाढ्य ने अपनी कथा प्रारम्भ की॥७॥
प्रतिष्ठान-प्रदेश में सुप्रतिष्ठित नामक नगर है। वहाँ पर सोमशर्मा नामक एक श्रेष्ठ
ब्राह्मण रहता था॥८॥
उस ब्राह्मण के वत्स और गुल्म नामक दो बालक और तीसरी श्रुतार्था नाम की एक
कन्या थी॥९॥
कालक्रम से सोमशर्मा और उसकी भार्या दोनों मर गये। उनके मरने पर वत्स और
गुल्म दोनों भाई बहन श्रुतार्था का पालन-पोषण करने लगे॥१०॥
उन्होंने किसी समय बहन को गर्भवती देखा। वहाँ अन्य किसी तीसरे पुरुष के अभाव में
उन दोनों को परस्पर शंका हुई॥११॥
भाइयों को शंकित देखकर चित्त की बात को समझनेवाली श्रुतार्था ने भाइयों से कहा—
'तुम्हें किसी प्रकार की शंका न करनी चाहिए। मैं सत्य बात तुम्हें बताती हूँ'॥१२॥
नागराज वासुकि के भाई का पुत्र कुमार कीर्तिसेन है। मुझे स्नान के लिए आते हुए
उसने देखा॥१३॥
मुझे देखकर काम-पीड़ित हुए कीर्तिसेन ने अपना वंश और नाम बताकर गान्धर्वविधि से
मुझे अपनी पत्नी बना लिया॥१४॥
इसलिए मेरा यह गर्भ ब्राह्मण-जाति में है। इस प्रकार बहन की बात सुनकर वत्स और
गुल्म बोले कि इसमें क्या प्रमाण है? ॥१५॥
७६ कथासरित्सागर
७६ कथासरित्सागर
विप्रभ्रातरय तस्मान्मम गर्भे इति स्वसु ।
श्रुत्वा क प्रत्ययोऽत्रेति वत्सगुल्माववोचताम् ॥१५॥
ततो रहसि सस्मार सा च नागकुमारकम्।
स्मृतमात्रागत सोऽथ वत्सगुल्मावभाषत ॥१६॥
भार्या कृता मयैवेय शापभ्रष्टा वराप्सरा ।
युष्मत्स्वसा युवा चैव शापेनैव च्युतौ भुवि ॥१७॥
पुत्रो जनिष्यते चात्र युष्मत्स्वसुरसंशयम्।
ततोऽस्या शापनिर्मुक्तिर्युवयोरपि भविष्यति ॥१८॥
इत्युक्त्वाऽन्तर्हितः सोऽभूत्तत स्तोकैश्च वासरै ।
श्रुताथाया सुतो जातःस्त हि जानीहि मा सख ! ॥१९॥
गणावतारो जातोऽय गुणाढ्यो नाम ब्राह्मणः।
इति तत्कालमुदमूदन्तरिक्षात्सरस्वती ॥२०॥
क्षीणशापास्ततस्ते च जननी मातुलौ मम।
कालेन पञ्चतां प्राप्ता गतश्चाहमधीरताम् ॥२१॥
अथ शोक समुत्सृज्य बालोऽपि गतवानहम्।
स्वावष्टम्भेन विद्यानां प्राप्तये दक्षिणापथम् ॥२२॥
कालेन तत्र सम्प्राप्य सर्वा विद्याः प्रसिद्धिमन्।
स्वदेशमागतोऽभूव वर्धयिष्यन्निजान् गुणान् ॥२३॥
प्रविशंश्च चिरात्तत्र नगरे सुप्रतिष्ठिते
अपश्य शिष्यसहित शोभां कामप्यह तदा ॥२४॥
क्वचित्सामानि छन्दोगा गायन्ति च यथाविधि।
क्वचिद् विवादो विप्राणामभूद् वेदविनिर्णये ॥२५॥
योऽत्र द्यूतकला वेत्ति तस्य हस्तगतो निधिः।
इत्यादिसर्ववेर्धूर्तमस्तुवन्कितवा क्वचित् ॥२६॥
अन्यान्यं निजवाणिज्यदशाक्रोधप्रवादिनाम्।
क्वचिच्च वणिजां मध्य वणिगेकोऽब्रवीदिदम् ॥२७॥
मूषकदर्शनं प्राप्तवतो वणिजः कथा
अर्थं सयत्नवानर्थात्प्राप्नोति कियदद्भुतम्।
मया पुनर्विनेवार्थं लक्ष्मीरासादिता पुरा ॥२८॥
गर्भस्थस्य च मे पूर्वं पिता पञ्चत्वमागतः।
मन्मातुश्च तदा पापैर्ज्ञातिजै सकल हृतम् ॥२९॥
प्रथम लम्बक ७७
प्रथम लम्बक ७७
यह सुनकर धूतार्था ने एकान्त में उस नागकुमार का स्मरण किया। नागकुमार स्मरण
करते ही आया और वत्स एवं गुल्म से बोला ॥१६॥
इस शापभ्रष्टा अप्सरा को मैंने पत्नी बनाया है जो तुम दोनों की बहन है। तुम दोनों भी
शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हो ॥१७॥
तुम्हारी बहन के इस गर्भ से अवश्य पुत्र उत्पन्न होगा। इसके उत्पन्न होने पर इसकी
और तुम दोनों की शाप-मुक्ति होगी ॥१८॥
ऐसा कहकर वह नागकुमार अन्तर्धान हो गया और कुछ ही दिनों बाद धूतार्था का पुत्र
उत्पन्न हुआ। हे सखे वह धूतार्था का पुत्र मुझे ही समझो ॥१९॥
मेरे उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि यह गुणाढ्य नामक ब्राह्मण शिवजी के गण
का अवतार है ॥२०॥
मेरे उत्पन्न होने पर वे—मेरी माता और मामा—भी शापहीन होने के कारण मर गये और
एकाकी मैं अधीर हो गया ॥२१॥
कुछ दिनों के अनन्तर धाय का परित्याग करके मैं बालक होने पर भी अपने ही सहारे
विद्याओं की प्राप्ति के लिए दक्षिणापथ चला गया ॥२२॥
मैं कुछ समय में दक्षिण देश में समस्त विद्याओं को प्राप्त करके प्रसिद्ध विद्वान् हुआ और
अपने गुणों को दिखाने की इच्छा से स्वदेश आया ॥२३॥
बहुत दिनों के अनन्तर शिष्यों के साथ उस सुप्रतिष्ठित नगर में प्रवेश करते हुए मैंने
नगर की अपूर्व शोभा देखी ॥२४॥
मैंने उस नगर में देखा कि कहीं सामवेदी विद्वान् विधिपूर्वक साम-गान कर रहे हैं और
कहीं वेदों के अर्थ-निर्णय पर विद्वानों का शास्त्रार्थ हो रहा है ॥२५॥
कहीं जुआरी अपनी डींग हांक रहे थे कि जो जुए की कला जानता है, उसके हाथ में
खजाना है ॥२६॥
अपनी-अपनी व्यापार-कला का चातुर्य बतलाते हुए कुछ बनियों की मंडली में एक
बनिया इस प्रकार बोला ॥२७॥
चूहे से धनी बने सेठ की कथा
'पैसों के विषय में संयम रखनेवाला ही पैसा कमाता है' यह कितने आश्चर्य की बात है।
मैं जब गर्भ में था तभी मेरे पिता मर गये। मेरी माता के पास जो कुछ भी धन था वह दुष्ट
संबंधियों ने उसे फुसलाकर ले लिया ॥२८ १ ॥
७८ कथासरित्सागर
७८ कथासरित्सागर
ततः सा तद्भयाद् गत्वा रक्षन्ती गर्भमात्मनः।
तस्थौ कुमारदत्तस्य पितुर्मित्रस्य वेश्मनि ॥३०॥
तत्र तस्याश्च जातोऽहं साध्व्या वृत्तिमिव धनम्।
ततश्चावर्धयत्सा मां कृच्छ्रकर्माणि कुर्वती ॥३१॥
उपाध्यायमथाम्यर्थ्य तयाकिञ्चन्यदीनया।
क्रमेण शिक्षितश्चाहं लिपिं गणितमेव च ॥३२॥
वणिक्पुत्रोऽसि तत्पुत्र ! वाणिज्यं कुरु साम्प्रतम्।
विशाखिलाख्यो देशेऽस्मिन् वणिक्चास्ति महाधनः ॥३३॥
दरिद्राणां कुलीनानां भाण्डमूल्यं ददाति सः।
गच्छ याचस्व तं मूल्यमिति माताब्रवीच्च माम् ॥३४॥
ततोऽहमगमं तस्य सकाशं सोऽपि तत्क्षणम्।
इत्यवोचत् रुषा कञ्चिद् वणिक्पुत्रं विशाखिलः ॥३५॥
मूषको दृश्यते योऽयं गतप्राणोऽत्र भूतले।
एतेनापि हि पण्येन कुशलो धनमर्जयेत् ॥३६॥
दत्तास्तव पुनः पाप दीनारा बहवो मया।
दूरे तिष्ठतु तद्वृद्धिस्त्वया तेऽपि न रक्षिताः ॥३७॥
तच्छ्रुत्वा सहसैवाहं तमवोचं विशाखिलम्।
गृहीतोऽयं मया त्वत्तो भाण्डमूल्याय मूषकः ॥३८॥
इत्युक्त्वा मूषकं हस्ते गृहीत्वा सम्पुटे च तम्।
लिखित्वास्य गतोऽभूवमहं सोऽप्यहसद् वणिक् ॥३९॥
चणकाञ्जलिमुग्मं मूल्येन स च मूषकः।
मार्जारस्य कृते दत्तः कस्यचिद् वणिजो मया ॥४०॥
कृत्वा तोयवणशक्तून्तान्गृहीत्वा जलकुम्भिकाम्।
मतिष्ठं परतरं गत्वा छायायां नगराद् बहिः ॥४१॥
तत्र श्रान्तागतायाम्भः शीतलं चणकांश्च तान्।
काष्ठभारिकसङ्घाय सप्रश्रयमदामहम् ॥४२॥
एकैकः काष्ठिकः प्रीत्या काष्ठे द्वे द्वे ददौ मम।
विक्रीतवानहं तानि नीत्वा काष्ठानि चापणं ॥४३॥
ततः स्तोकेन मूल्येन क्रीत्वा तांश्चणकांस्ततः।
तथैव काष्ठिकेभ्योऽहमन्येद्युः काष्ठमाहरम् ॥४४॥
प्रथम लम्बक ७९
प्रथम लम्बक ७९
तब मेरी माता उन सम्बन्धियों की लूट-खसोट के भय से गर्भ की रक्षा करती हुई अपने
पिता के मित्र कुमारदत्त के घर जाकर रहने लगी ॥३०॥
कुमारदत्त के घर में उस पतिव्रता के जीवन का आधार मैं उत्पन्न हुआ। मेरी माता
कष्टसाध्य कार्य करती हुई, मुझे जिलाने लगी ॥३१॥
मेरे कुछ बड़े होने पर उस अकिंचन और दीन माता ने गुरु से प्रार्थना करके मुझे अक्षर
लिखना और कुछ गणित (हिसाब-किताब) सिखा दिया ॥३२॥
कुछ पढ़ लेने पर माता ने कहा—'बेटा! बनिये के बालक हो व्यापार करो। इस
नगर में विशाखिल नाम का एक धनी व्यापारी बनिया है। कुलीन घर के दरिद्र लोगों को वह
व्यापार का सामान देता है। अतः तुम उसी के पास जाओ और माँगो' ॥३३-३४॥
माता की आज्ञा से मैं उस बनिये के पास गया। उस समय विशाखिल बनिया क्रोध में
किसी बनिये के लड़के से कह रहा था कि यहाँ भूमि पर एक मरा हुआ चूहा पड़ा है। यदि चतुर
बनिया हो तो इस सौदे से भी धन कमा सकता है ॥३५-३६॥
हे दुष्ट, मैंने तुझे बहुत-सी स्वर्ण-मुद्राएँ दीं उनकी वृद्धि तो दूर रही तूने उनकी रक्षा भी
नहीं की ॥३७॥
बनिये की बातें सुनकर मैंने विशाखिल से कहा—मैंने बेचने के सामान में तुझसे इस
चूहे को लिया ॥३८॥
ऐसा कहकर मैंने मरे हुए चूहे को हाथ से उठाकर एक डिब्बे में रख लिया और बनिये की
बही में लिखकर चला। मेरे इस कार्य पर वह बनिया भी हँसने लगा ॥३९॥
मैंने दो अँजुली चने के बदले उस चूहे को किसी बनिये की बिल्ली को ग्रास के लिए
दे दिया ॥४०॥
उस चने को भाड़ में भुनाकर और एक घड़ा पानी लेकर मैं शहर के बाहर एक चौराहे
पर पेड़ की छाया में जा बैठा ॥४१॥
लकड़ी का बोझ लेकर जानेवाले थके मजदूरों को मैं नम्रता के साथ चना खिलाने और
ठंडा पानी पिलाने लगा ॥४२॥
प्रत्येक लकड़हारा अपने-अपने बोझ से दो-दो लकड़ियाँ मुझे प्रेमपूर्वक देने लगा। इस
प्रकार कुछ समय में मेरे पास लकड़ी का एक खासा एकत्र हो गया और मैंने उसे बाजार में जाकर
बेच दिया ॥४३॥
लकड़ी बेचकर प्राप्त हुए मूल्य में से कुछ मूल्य से चने खरीदकर मैंने दूसरे दिन फिर
उसी प्रकार चौराहे पर पानी पिलाना प्रारम्भ किया। इस प्रकार मेरे पास पर्याप्त मात्रा में लकड़ियाँ
इकट्ठी हो गईं ॥४४॥
८० कथामरित्सागरै
८० कथामरित्सागरै
एवं प्रतिदिनं कृत्वा प्राप्य मूल्यं क्रमान्मया।
काष्ठिकेभ्योऽखिलं दारु क्रीतं तेभ्यो विनिश्चयम् ॥४५॥
अकस्मादथ सञ्जाते काष्ठच्छेदातिवृष्टिभिः ।
मया तद्दारु विक्रीतं पणानां बहुभिः शतैः ॥४६॥
तेनैव विपणिं कृत्वा धनेन निजकौशलात्।
कुर्वन्वणिज्यां क्रमशः सम्पन्नोऽस्मि महाधनः ॥४७॥
सौवर्णो मूषकः कृत्वा मया तस्मै समर्पितः ।
विशाखिलाय सोऽपि स्वां कन्यां मह्यमदात्ततः ॥४८॥
अतएव च लोकेऽस्मिन् प्रसिद्धो मूषकराख्यया।
एव लक्ष्मीरियं प्राप्ता निर्धनेन सता मया ॥४९॥
सञ्श्रुत्वा तत्र तेऽभूवन्वणिजोऽन्ये सविस्मयाः ।
धीरैर्न चित्रीयते कस्मादमित्तो चित्रकर्मणा ॥५०॥
मूर्खद्विजवेश्याकथा
क्वचित्प्रतिग्रहप्राप्तहेममाषाष्टको द्विजः।
छन्दोगः कश्चिदित्युक्तो विटप्रायेण केनचित् ॥५१॥
ब्राह्मण्याद् भोजनं तावदस्ति ते सत्त्रयामुना।
लोकयात्रा सुवर्णेन वैदग्ध्यायैह शिक्ष्यताम् ॥५२॥
को मां शिक्षयतीत्युक्तो तं मुग्धं सोऽब्रवीत् ।
यैषा चतुरिका नाम वेश्या तस्या गृहं व्रज ॥५३॥
तत्र किं करवाणीति द्विजेनोक्तो विटोऽब्रवीत् ।
स्वर्णं दत्वा प्रयुञ्जीथा रञ्जयन्ताम् किञ्चन ॥५४॥
धूर्तेनेवम्प्रच्छन्दोगो द्रुतं चतुरिकागृहम् ।
उपाविशत्प्रविश्याथ कृतप्रत्युद्गतिस्तया ॥५५॥
मामद्य लोकयात्रां त्वं शिक्षयैतेन साम्प्रतम् ।
इति जल्पन्स तत्तस्यै स्वर्णमर्पितवान् द्विजः ॥५६॥
प्रहसत्यथ तत्रस्थे जने किञ्चिद्वद् विचिन्त्य सः ।
गोवज्रसदृशौ कृत्वा करावायतसारणौ ॥५७॥
तारस्वरं तया साम गायति स्म जडाशयः ।
यथा तत्र मिषन्ति स्म विटा हास्यविदूषकः ॥५८॥
ते चावोचञ्शृगालोऽयं प्रविष्टोऽत्र कुतोऽन्यथा।
तच्छीघ्रमर्धचन्द्रोऽस्य मस्तकेऽस्मिन्दीयतामिति ॥५९॥
प्रथम लम्बक ८१
प्रथम लम्बक ८१
इस प्रकार प्रतिदिन करते-करते मैंने धन-संग्रह करके तीन दिनों तक लकड़हारों से सारी
लकड़ियाँ खरीद लीं ॥४५॥
एक बार भयंकर वृष्टि के कारण लकड़ियों का जंगल से आना बन्द हो गया।
तब मैंने अपनी इकट्ठी की हुई लकड़ियों को महंगे दाम पर बेचकर पर्याप्त धन कमा
लिया ॥४६॥
उस धन से एक दूकान करके व्यापार की चतुराई से मैं बहुत धनवान् हो गया। मैंने
सोने का चूहा बनाकर अपने महाजन विशाखिल को मृत चूहे के मूल्य-स्वरूप भेंट में
दिया ॥४७॥
वह भी मेरी व्यापार-बुद्धि से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी कन्या मुझे
दे दी ॥४८॥
एक मरे हुए चूहे के आधार पर व्यापार करने के कारण मैं नगर में 'मूषक' के नाम से
विख्यात हो गया। इस प्रकार निर्धन होकर मैंने लक्ष्मी प्राप्त की ॥४९॥
यह सुनकर वहाँ एकत्र सभी बनिये आश्चर्य-चकित हो गये। बिना भीत की चित्र-रचना
करने पर किसकी बुद्धि आश्चर्य-चकित नहीं होगी ॥५०॥
मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण की कथा
वहीं पर कहीं मशान में आग मांगता-मांगता जाता हुआ पञ्चाली ब्राह्मण खड़ा था। उस विशी
वाचालों के दलाल ने कहा—'ब्राह्मण ज्ञान के राज्य तुम्हें भोजन भी मिलता था ? सही या तुम
इस आग मांग-मांग कर क्यों जाकर औरत-मर्दों के ... चतुरता सीखो ॥५१-५२॥
मुझे चतुरता कौन सिखायेगा? —ब्राह्मण के ऐसा पूछने पर उसने कहा—'यहीं जो
बगुसिका नाम की वेश्या है उसके घर जाकर सीखो ॥५३॥
वेश्या के घर जाकर क्या करूं? —ऐसा पूछने पर ... ने कहा—'मंशाला देकर
चतुराई सिखाने को कहना तथा मांस और मद्य (मदिरा) की बात करना' ॥५४॥
यह सुनकर वह भोला ब्राह्मण तुरंत बगुसिका के घर गया और उसके द्वारा प्रमदाजन
व्यहार करने पर भीतर जाकर बैठ गया ॥५५॥
मुझे आज इस मूर्ख का ... महा मूर्खतापूर्ण स्वरूप दिखायेंगे— ...
का हाथ मांगता-मांगता उस ब्राह्मण का अभिनन्दन किया ॥५६॥
उसके ऐसा कहने पर वहाँ बैठे हुए द्यूतप्रिय हँस पड़े। तब हँसता देखकर उस कर्म के इस
प्रकार रोता गया कि जो भी बात वे लोग कहा करते उसका वह उल्टा उत्तर देता
बड़ी सरलता से व्यंग्य करते हुए कि ब्राह्मण के प्रति ऐसा व्यंग्य-उपहास होता रहा
वे लोग बहुत हँसते रहे।
वेश्या ने उस दूती द्वारा ब्राह्मण के सम्मुख उपहासपूर्वक एक सोने का सिक्का (मद्यपान हेतु) देकर
बाहर निकाल दिया ॥५७॥
११
यमचन्द्र धरं मत्वा शिरश्छेदभयाद्द्रुतम् ।
शिक्षिता लोकयात्रेति गर्जन्स निरगात्ततः ॥६०॥
तत्सकाशं ततोऽगच्छदनासो प्रेषितोऽभवत् ।
वृत्तान्तं यावदस्तस्मै सोऽपि क्षतमयापत ॥६१॥
साम सान्त्व मयोक्तं तं वेदस्यावसरोऽत्र कः ।
किं वा धाराधिरूढे हि जाड्यं वदजडे जने ॥६२॥
एव विहस्य गत्वा च तनोक्ता सा विलासिनी ।
द्विपवस्य पशोरस्य तत्सुवर्णतृणं त्यज ॥ ६३ ॥
हसन्त्या च तया त्यक्तं सुवर्णं प्राप्य स द्विजः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानो गृहमागत ॥६४॥
एवंप्रायाण्यहं पश्यन् कौतुकानि पदे पदे ।
प्राप्तवान् राजभवनं महेन्द्रसदनोपमम् ॥६५॥
धतश्चान्तः प्रविष्टोऽहं शिष्यैरथ निवेदितः ।
भास्वान्स्थितमद्राक्षं राजानं सातवाहनम् ॥६६॥
शर्ववर्मप्रभृतिभिर्मन्त्रिभिः परिवारितम् ।
रत्नसिंहासनासीनममरैरिव वासवम् ॥६७॥
विहितस्वस्तिकारं मामुपविष्टमथासने ।
राजा कृतादरं चैव शर्ववर्मादयोऽस्तुवन् ॥६८॥
अयं ह्य भुवि ख्यातः सर्वविद्याविशारदः ।
गुणाढ्य इति नामास्य यथार्थमतएव हि ॥६९॥
इत्यादि तत्स्तुतिं श्रुत्वा मन्त्रिभिः सातवाहनः ।
प्रीतः क्षपवि सत्कृत्य मन्त्रित्वे मां न्ययोजयत् ॥७०॥
अथाहुं राजकार्याणि चिन्तयन्नवस सुखम् ।
शिष्यानध्यापयंस्तत्र कृतदारपरिग्रहः ॥७१॥
कदाचित्कौतुकाद् भ्राम्यन्स्वरं गोदावरीतटे ।
देवीकृतिरितिख्यातामुद्यानं दृष्टवानहम् ॥७२॥
तच्चातिरम्यमालोक्य क्षितिस्यमिव मन्दनम् ।
उद्यानपालः पृष्टोऽभून्मया तत्र तदागमम् ॥७३॥
१ पृष्ठे बाङ्घट = सम्पन्नः समृद्ध इत्यर्थः ।
प्रथम लम्बक ४१
प्रथम लम्बक ४१
ब्राह्मण अर्धचन्द्र को बाण समझकर सिर कटने के भय से मैंने डाकयात्रा (चतुष्पद) गुप्त
सीख ली'—ऐसा कहता हुआ भय से शीघ्र बाहर भाग गया॥६१ ॥
वैदिक ब्राह्मण वेश्या के घर से भागकर फिर उसी के पास गया जिसने उसे भेजा
था और उससे सारा वृत्तान्त भी बताया। उसने कहा कि मैंने तुमसे कहा था कि वहाँ साम
(शान्ति) का प्रयोग करना। सामवेद पढ़ने की कौन-सी तुक थी। सचमुच वेदपाठी मूर्ख
ब्राह्मणों में मूर्खता कूट-कूट कर भरी गई है॥६१ ६२॥
इस प्रकार हँसकर और उस वेश्या के पास जाकर उस धूर्त ने कहा कि 'इस दो पैर
के पशु को वह सुवर्ण-रूपी घास दे दो अर्थात् इसका सोना लौटा दो'॥६३॥
वेश्या ने हँसते हुए उस ब्राह्मण का आठ माशा सोना लौटा दिया और वह भी मानों अपना
पुनर्जन्म समझता हुआ घर वापस आया॥६४॥
गुणाढ्य ने काणभूति से कहा कि मैं उस सुप्रतिष्ठित नगर में पग-पग पर इस प्रकार के
तमाशे देखता हुआ सहस्र भवन के समान राजभवन में पहुँचा॥६५॥
वहाँ पर मैंने शर्ववर्मा आदि मन्त्रियों से घिरे हुए तथा दरबार में बैठे हुए राजा सातवाहन
को देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के समान देखा॥६६॥
आशीर्वाद देकर आसन पर बैठे हुए और राजा के द्वारा सत्कार किये गये शर्ववर्मा
आदि मन्त्री मेरी प्रशंसा करने लगे॥६७॥
हे महाराज यह सारे भुवन में विख्यात और सभी विद्याओं में पारंगत गुणाढ्य
नाम का विद्वान् है। सभी गुणों से पूर्ण होने के कारण गुण-आढ्य इसका नाम यथार्थ
है॥६९॥
मन्त्रियों द्वारा मेरी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न राजा सातवाहन ने मुझे भी एक मन्त्री का
पद प्रदान किया॥७०॥
मन्त्री नियुक्त होने पर सर्व विद्या रूपक और विद्या का पड़ौस हुए आनन्द के साथ
रहने लगा॥७१॥
देवी उद्यान की कथा
किसी समय ग्रीष्मऋतु समाप्त होने के समय बहते हुए दिनों में पर मानरूपी बेला
पर देवी के बनाए हुए उद्यान को देखा॥७२॥
पृथ्वी पर बने हुए मलय देश के समान उस अनन्त रमणीय उद्यान को देखकर मैंने
'पाताल (पानी) के रसादि उत्पत्ति का कारण पूछा॥७३॥'
८४ कथासरित्सागर
८४ कथासरित्सागर
स च मामब्रवीत् स्वामिन्वृद्धेभ्यः श्रूयते यथा।
पूर्वं मौनी निराहारो द्विजः कश्चित्समाययौ ॥७४॥
स दिव्यमिदमुद्यानं सदेवभवनं व्यधात्।
ततोऽत्र ब्राह्मणाः सर्वे मिलन्ति स्म सकौतुकाः ॥७५॥
निवासास स पृष्टः स्वं वृत्तान्तमवदद्विजः।
अस्तीह मरुकच्छाख्यो¹ विषयो नर्मदातटे ॥७६॥
तस्मिन्नहं समुत्पन्नो विप्रस्तस्य च मे पुरा।
न भिक्षामप्यदात् कश्चिद्दरिद्रस्यालसस्य च ॥७७॥
अथ खेदाद् गृहं त्यक्त्वा विरक्तो जीवितं प्रति।
भ्रान्त्वा तीर्थान्यहं द्रष्टुमगच्छं विन्ध्यवासिनीम् ॥७८॥
दृष्ट्वा ततश्च तां देवीमिति सञ्चिन्तितं मया।
लोकः पशूपहारेण प्रीणाति वरदामिमाम् ॥७९॥
अहं त्वात्मानमेवेह हन्मि मूर्खमिमं पशुम्।
निश्चित्येति शिरश्छेत्तुं मया शस्त्रमगृह्यत ॥८०॥
तत्क्षणं सा प्रसन्ना मां देवी स्वयमभाषत।
पुत्र सिद्धोऽसि मात्मानं वधीस्तिष्ठ ममान्तिके ॥८१॥
इति देवीवरं लब्ध्वा सम्प्राप्ता दिव्यता मया।
सद्यःप्रभृति नष्टा मे बुभुक्षा च तृषा सह ॥८२॥
कदाचिदथ देवी मां ततश्च स्वयमादिशत्।
गत्वा पुत्र प्रतिष्ठाने रचयोद्यानमुत्तमम् ॥८३॥
इत्युक्त्वा सद्य मे बीजं दिव्यं प्रादात्ततो मया।
इहागत्य कृतं कान्तमुद्यानं तत्प्रभावतः ॥८४॥
पाल्यमेतच्च युष्माभिरित्युक्त्वा स तिरोदधे।
इति निर्मितमुद्यानमिदं देव्या पुरा प्रभो ॥८५॥
उद्यानपालकादित्थमवदेशं देव्यनुग्रहम्।
आकर्ण्य विस्मयाविष्टो गृहाय गतवानहम् ॥८६॥
एवमुक्ते गुणाढ्येन काणभूतिरभाषत।
सातवाहन इत्यस्य कस्मान्नामाभवत् प्रभो ॥८७॥
१ मरुकच्छः—साम्प्रतं गुर्जरदेशे 'भड़ोच' इति प्रसिद्धः ।
प्रथम लम्बक ८५
प्रथम लम्बक ८५
माली ने मुझसे कहा—यान्त्रिक ! वृद्धों से ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन समय में
मौनी और निराहारी एक ब्राह्मण यहाँ आया और उसने देव-मन्दिर के साथ इस बाग को
बनाया। इसलिए इसमें ब्राह्मणगण बड़े उत्साह के साथ यहाँ एकत्र होते हैं परस्पर
मिलते हैं॥७५॥
अति आग्रह के साथ उनसे पूछ आने पर उस ब्राह्मण ने कहा कि इस भारतभूमि में
नर्मदा के तट पर भृगुकच्छ नाम का प्रसिद्ध देश है॥७६॥
मैं उसी भृगुकच्छ देश में उत्पन्न एक ब्राह्मण हूँ। मुझ आलसी और दरिद्र को कोई
भिक्षा भी नहीं देता था॥७७॥
इस कारण अत्यन्त दुःख से मैं जीवन के प्रति विरक्त होकर अनेक तीर्थों का भ्रमण करता
हुआ विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए गया॥७८॥
देवी का दर्शन करके मैंने सोचा कि यहाँ लोग वरदानी देवी को पशुबलि देकर प्रसन्न
करते हैं तो मैं मूर्ख और पशु-स्वरूप अपने को ही मारकर बलि क्यों न दे दूँ—ऐसा सोचकर मैंने
अपना गला काटने के लिए शस्त्र उठाया ॥७८॥
उसी क्षण प्रसन्न होकर देवी ने मुझे स्वप्न दिया—'पुत्र तू सिद्ध हो गया है। मरने का मत
धार! मेरे पास रह' ॥८१॥
इस प्रकार देवी का वर प्राप्त करके मैंने दिव्यता प्राप्त की। उसी से प्यास के साथ मेरी
भूख भी नष्ट हो गई॥८२॥
किसी समय वहीं निवास करती हुई देवी ने मुझसे स्वयं कहा—'हे पुत्र, तुम प्रतिष्ठान
नगर में जाकर एक अच्छा उद्यान बनाओ ॥८३॥
ऐसा कहकर देवी ने यह दिव्य बीज दिया और उसीके प्रभाव से मैंने यह रमणीय
उद्यान बनाया॥८४॥
[L23: बार-बार तुम उद्यान की रक्षा करो तथा कहकर वह अन्तर्धान हो गया। हे
राजमित्र ! इस प्रकार प्राचीन समय से देवी ने यह उद्यान को बनाया' ॥८५॥
तदनन्तर (माली) से इस प्रकार उस देश में देवी की कृपा का समाचार सुनकर मैं
आश्चर्यचकित होकर घर के लिए लौटा॥८६॥
द्यूताध्यक्ष के द्वारा बन्धन हुए कान्तसेन ने कहा कि राजा यशःकेतु का नाम बली
[३] ॥ ७॥
८६ कथासरित्सागर
८६ कथासरित्सागर
सातवाहनकथा
ततोऽब्रवीद्गुणाढ्योऽपि शृण्वत्कथयामि ते।
दीपकणिरिति ख्यातो राजाभूत्प्राग्यविक्रमः॥८८॥
तस्य शक्तिमती नाम भार्या प्राणाधिकाऽभवत्।
रतान्तसुप्तामुद्याने सर्पस्तां जातु दष्टवान्॥८९॥
गतायामथ पञ्चत्वं तस्यां तद्गतमानसः।
अपुत्रोऽपि स जग्राह ब्रह्मचर्यव्रतं नृपः॥९०॥
ततं कदाचिद्रात्र्याहपुत्राऽसद्भावदुःखितम्।
इत्यादिदेश तं स्वप्ने भगवानिन्दुशेखरः॥९१॥
अटव्यां द्रक्ष्यसि भ्राम्यन्सिंहरूढं कुमारकम्।
तं गृहीत्वा गृहं गच्छेः स ते पुत्रो भविष्यति॥९२॥
अथ प्रबुद्धस्तं स्वप्नं स्मरन्गत्वा जहर्ष सः।
कदाचिच्च ययौ दूरमटवीं मृगयारसात् ॥९३॥
ददर्श तत्र मध्याह्ने सिंहरूढं स भूपतिः।
बालकं पद्मसरसस्तीरे तपनतेजसम् ॥९४॥
अथ राजा स्मरन् स्वप्नमवतारितबालकम्।
जलाभिलाषिणं सिंहं जघानेकं शरेण तम्॥९५॥
स सिंहस्तद्वपुस्त्यक्त्वा सद्योऽभूत्पुरुषाकृतिः।
कष्टं किमेतद् ब्रूहीति राज्ञा पृष्टो जगाद च॥९६॥
धनदस्य सखा यक्षः सातो नामास्मि भूपते!
सोऽहं स्नान्तीमपश्यं प्राग्गङ्गायामुनिकन्यकाम् ॥९७॥
सापि मां वीक्ष्य सञ्जातमन्मथामूद्वह वशा।
गान्धर्वेण विवाहेन ततो भार्या कृता मया॥९८॥
तच्च तद्बान्धवा बुद्ध्वा तां च मां चाक्षपन् क्रुधा।
सिंहौ भविष्यतः पापौ स्वच्छन्दाचारौ युवामिति॥९९॥
पुत्रजन्मावधिं तस्याः शापान्तं मुनयो व्यधुः।
मम तु स्वच्छरापातपर्यन्तं भवदन्तरम्॥१००॥
अथवा सिंहमिथुनं सञ्जातौ सापि कालतः।
गर्भिण्यभवतो जाते द्यानेऽस्मिन्व्यपद्यत॥१०१॥
प्रथम लम्बक ८७
प्रथम लम्बक ८७
राजा सातवाहन की कथा
तब गुणाढ्य ने कहा कि यह भी सुनो ! प्राचीन समय में दीपकणि नामक प्रसिद्ध पराक्रमी
राजा हुआ ॥८८॥
उसकी प्राणों से भी प्यारी शक्तिमती नाम की रानी थी। किसी समय रतिकाल के
अन्त में उद्यान में सोई हुई रानी को साँप ने काट लिया ॥८९॥
उससे अत्यधिक प्यार करनेवाले राजा ने उसके मर जाने पर, सन्तान-रहित होने पर
भी ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने का निश्चय किया ॥९०॥
किसी समय राज्य के योग्य पुत्र के न होने से अत्यन्त दुःखी राजा को भगवान् चन्द्रशेखर
ने स्वप्न में आदेश दिया—॥९१॥
'किसी समय जंगल में घूमते हुए सिंह पर चढ़े हुए बालक को तुम देखोगे, उस सवार घर
लाना वह तुम्हारा पुत्र होगा' ॥९२॥
जागकर उठे हुए राजा ने स्वप्न का स्मरण करते हुए प्रसन्नता प्रकट की। किसी दिन राजा
शिकार के सिलसिले में जंगल में दूर तक निकल गया ॥९३॥
जंगल में भ्रमण करते हुए राजा ने मध्याह्न के समय एक पद्म-सरोवर के किनारे शेर
पर चढ़े हुए सूर्य के समान तेजस्वी एक बालक को देखा ॥९४॥
इसके अनन्तर राजा ने स्वप्न का स्मरण करते हुए बालक को उतारकर पानी पीते
हुए सिंह को एक बाण मारा ॥९५॥
बाण लगते ही सिंह अपना शरीर छोड़कर तुरन्त पुरुष बन गया। उसे देखकर राजा ने
पूछा कि 'तुम्हें यह कष्ट कैसे हुआ' ॥९६॥
सिंह बोला—"मैं कुबेर का मित्र सात नामक यक्ष हूँ ! मैंने एक बार स्नान करती हुई
एक ऋषि-कन्या को देखा। देखते ही वह और मैं दोनों परस्पर आसक्त हो गये। उसे गान्धर्व
विवाह द्वारा मैंने पत्नी बना लिया ॥९७॥
ऋषिकन्या के बन्धुओं ने यह जानकर उसे और मुझे दोनों को शाप दिया कि तुम दोनों
पापी स्वेच्छाचारी सिंह बनोगे ॥९८॥
ऋषियों ने उस कन्या को पुत्र उत्पन्न होने तक शाप की अवधि दी और मुझे तुम्हारे बाण
का आघात लगने तक की ॥९९॥
तदनन्तर हम दोनों सिंह की जोड़ी बन गये। कुछ समय बाद वह (सिंहनी)
गर्भवती हुई और इस बालक के उत्पन्न होने पर मर गई। मैंने इस बालक को अन्यान्य
सिंहनियों के दूध से पाला है। आज तुम्हारे बाण के आघात से मैं भी शाप से छूट
गया हूँ ॥१००॥
८८ कथासरित्सागर
८८ कथासरित्सागर
अयञ्च वर्धितोऽन्यासां सिंहीनां पयसा मया।
अद्य चाहं विमुक्तोऽस्मि शापाद् बाणाहतस्त्वया ॥१०२॥
तद् गृहाण महासत्त्व मया दत्तममुं सुतम्।
अयं ह्यर्थं समादिष्टस्तैरेव मुनिभि पुरा ॥१०३॥
इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्सातनामनि गुह्यके।
स राजा तं समादाय बालं प्रत्याययौ गृहम् ॥१०४॥
सातेन यस्मादूढोऽभूत्तस्मात् सातवाहनम्।
नाम्ना चकार कालेन राज्ये चैनं न्यवेशयत् ॥१०५॥
ततस्तस्मिन्नातदण्ड्ये दीपकणौ क्षितीश्वरे।
संवृत्त सार्वभौमोऽसौ भूपति सातवाहन ॥१०६॥
एवमुक्त्वा कथां मह्यं काणभूत्यनुयोगतः।
गुणाढ्य प्रकृतं धीमाननुस्मृत्याब्रवीत्पुनः ॥१०७॥
सत कदाचिदभ्यागाद् वसन्तसमयोत्सवः।
दर्पीकृत तमुद्यानं स राजा सातवाहनः ॥१०८॥
विहरन् सुचिरं तत्र महेन्द्र इव नन्दने।
वापीजलेऽवतीर्णोऽभूत्क्रीडितुं कामिनीसखः ॥१०९॥
असिञ्चत्तत्र दयिताः सहेलं करवारिभिः।
असिञ्चत स ताभिश्च वशाभिरिव वारणः ॥११०॥
मुक्तधौताञ्जनाताम्रनेत्रजङ्गर्जलाप्लुतैः ।
अङ्गैः सक्ताम्बरव्यक्तविभागैश्च तमाङ्गनाः ॥१११॥
विद्रुतपत्रतिलकाः स चक्र वनमध्यगाः।
च्युताभरणपुष्पास्ताः मत्ता वायुरिव प्रियाः ॥११२॥
अथैका तस्य महिषी राज्ञः स्तनभराल्लसा।
शिरीषसुकुमाराङ्गी क्रीडन्ती क्लममभ्यगात् ॥११३॥
सा जलैरभिषिञ्चन्तं राजानमसहा सती।
अब्रवीन्मोदकैर्देव परिताडय मामिति ॥११४॥
तच्छ्रुत्वा मोदकान् राजा द्रुतमानाययद् बहून्।
ततो विहस्य सा राज्ञी पुनरेवमभाषत ॥११५॥
राजन्नवसरः कोऽत्र मोदकानां जलान्तरे।
उदकैः सिञ्च मा त्वं मामित्युक्तं हि मया तव ॥११६॥
इसलिए तुम इस महाबलवान् बालक को लो। यह बात पहले के ही शाप देनेवाले
मुनिजी ने कही थी" ॥१ २-१ ३॥
ऐसा कहकर उस सात नामक यक्ष के अन्तर्धान हो जाने पर वह राजा उस बालक को
लेकर लौट आया ॥१ ४॥
सात नामक यक्ष ने उसे उठा रखा था। अतः उस बालक का नाम सातवाहन रखा
और समय आने पर उसे राज्य-सिंहासन पर बैठा दिया ॥१ ५॥
कुछ समय के बाद राजा दीपकणि के वन में चले जाने पर वह सातवाहन राजा सार्वभौम
बन गया ॥१ ६॥
इस प्रकार कथा कहकर गालभूति के अनुरोध से बुद्धिमान् गुणाढ्य ने प्रसन्न सा पुनः
स्मरण करके कहा ॥१ ७॥
कुछ समय के अनन्तर, वसन्तोत्सव के समय राजा सातवाहन उस देवी के बनाये
हुए उद्यान में गया ॥१ ८॥
नन्दन-वन में महेन्द्र के समान बहुत काल तक उस उद्यान में अपनी रानियों के साथ
विहार करता हुआ राजा सातवाहन बावली के जल में रानियों के साथ जलक्रीड़ा के लिए
उतरा ॥१ ९॥
जल में वह रानियों को हाथ से फेंके हुए छींटों से सींचने लगा और रानियाँ भी उसे इस
प्रकार सींचने लगीं जैसे हथिनियाँ हाथी को सींचती हैं ॥११ ॥
काजल के घुल जाने पर लाल नेत्रों से और पानी से वस्त्रों के अंगों में चिपक
जाने के कारण स्पष्ट दीखते हुए शरीर-भिन्न अवयवों से वे राजा का मन-हरण करने
लगीं ॥१११॥
वायु के समान राजा ने उन प्रियतमाओं को वन में लताओं के समान कर
दिया। वन में वायु, लताओं के पत्र-रूपी तिलक को हटा देता है और पुष्यरूपी आभरणों
से रहित कर देता है। उसी प्रकार राजा ने रानियों के पत्रावली-रूपी तिलक को पानी
के छींटों की बौछार से धो डाला और पुष्पों के समान शोभित उनके आभरणों को उतरवा
डाला ॥११२॥
जलक्रीड़ा करते-करते उस राजा की शिरीष पुष्प के समान एक सुकुमार रानी स्तन-भार
से क्लान्त होकर खेलती-खेलती थक गयी ॥११३॥
वह रानी पानी के छींटों की बौछार करती हुई राजा से बोली— 'स्वामिन् ! मुझे पानी से
मत मारो।' (मोदकैं — मा—मत उदकै —पानी से) ॥११५॥
यह सुनकर राजा ने जल्द ही बहुत-से लड्डू मँगवाये। तब रानी ने हँसकर फिर कहा—
राजन्, पानी के अन्दर लड्डुओं की कौन तुक है? मैंने तो तुमसे कहा कि जल से मुझे मत
सींचो ॥११६॥
९० कथासरित्सागर
९० कथासरित्सागर
सन्धिमात्रं न जानासि माशब्दोदकशब्दयोः ।
न च प्रकरणं वेत्सि मूर्खस्त्वं कथमीदृशः ॥११७॥
इत्युक्तः स तया राज्ञा शब्दशास्त्रविदा नृपः ।
परिवारे हसत्यन्तर्लज्जाक्रान्तो झगित्युभूत् ॥११८॥
परित्यक्तजलक्रीडो वीतदर्पश्च तत्क्षणम् ।
जातावमानो निर्लक्षः प्राविशन्निजमन्दिरम् ॥११९॥
ततश्चिन्तापरो मुक्ताहारादिपराङ्मुखः ।
चित्रस्थ इव पृष्टोऽपि नैव किञ्चिदभाषत ॥१२०॥
पाण्डित्यं शरणं वा मे मृत्युर्वेति विचिन्तयन् ।
शयनीयपरित्यक्तगात्रः सन्तापवानभूत् ॥१२१॥
अकस्मादथ राज्ञस्तां दृष्ट्वावस्थां तथाविधाम् ।
किमेतदिति सम्भ्रान्तः सर्व परिजनोऽभवत् ॥१२२॥
ततोऽहं शर्ववर्मा च ज्ञातवन्तौ क्रमेण ताम् ।
अत्रान्तरं स च प्रायः पर्यहीयत वासरः ॥१२३॥
अस्मिन्काले न च स्वस्थो राजेत्यालोच्य तत्क्षणम् ।
आवाभ्यां राजहंसाख्य आहूतो राजचेटकः ॥१२४॥
शरीरवार्त्ता भूपस्य स च पृष्टोऽब्रवीदिदम् ।
नेदृशो दुर्मनाः पूर्वं दृष्टो देवः कदाचन ॥१२५॥
विष्णुशक्तिदुहित्रा च मिथ्यापण्डितया तया ।
विलक्षीकृत इत्याहुर्देव्योऽन्याः कोपनिर्भरम् ॥१२६॥
एतत्तस्य मुखाच्छ्रुत्वा राजचेटस्य दुर्मनाः ।
शर्ववर्मद्वितीयोऽहं तदादित्यचिन्तयम् ॥१२७॥
व्याधिर्यदि भवेद्राज्ञः प्रविशेयुश्चिकित्सकाः ।
आधिर्वा यदि तत्रास्य कारणं नोपलक्ष्यते ॥१२८॥
नास्त्यथ हि विपक्षोऽस्य राज्ये निहतकण्टके ।
अनुरक्ताः प्रजाश्चात्र न हानिः परिदृश्यते ॥१२९॥
तत्कस्मादेष सन्तापीदृशः सहसा प्रभो ।
एवं विचिन्तिते धीमाञ्छर्ववर्मेदमब्रवीत् ॥१३०॥
अहं जानामि राज्ञोऽस्य मन्युर्मोकानुतापजः ।
मूर्खोऽहमिति पाण्डित्यं तदेवाय हि वाञ्छति ॥१३१॥
१ आधिः = मानसो रोगः ।
प्रथम लम्बक ९१
प्रथम लम्बक ९१
तुम इतने मूर्ख हो कि 'मा' शब्द और उदक' शब्द की सन्धि भी नहीं जानते और
न बातों का प्रसंग ही समझते हो। तुम कैसे मूर्ख हो?"॥११७॥
शब्दशास्त्र को जाननेवाली रानी से इस प्रकार धत्कारा गया राजा अन्यान्य रानियों
के मन-ही-मन हँसने पर लज्जा से थक हो गया॥११८॥
ऐसी स्थिति में राजा हृतप्रभ होकर जलक्रीड़ा को छोड़कर अपमानित और मलिन-मुख
होकर अपने भवन में चला गया॥११९॥
तब चिन्ताओं से चूर, भोजन आदि को छोड़कर राजा चित्र में खिंचा-सा पड़ गया। कुछ
भी बोलता नहीं था॥१२०॥
पांडित्य की शरण में जाऊँ या मृत्यु की? ऐसा सोचता हुआ शय्या पर पड़ा हुआ राजा
अत्यन्त सन्तप्त होने लगा॥१२१॥
राजा की अकस्मात् ऐसी अवस्था देखकर यह क्या हुआ ? —ऐसा सोचते हुए सभी
सेवक-जन व्याकुल हो गये॥१२२॥
तब मैंने तथा शर्ववर्मा ने क्रमशः परिस्थिति को जाना। इतने में ही दिन समाप्त
हो गया॥१२३॥
'अब रात के समय अस्वस्थ राजा के पास जाना उचित नहीं —ऐसा विचारकर हम लोगों
ने राजहंस नामक राजा के निजी सेवक को बुलवाया॥१२४॥
उससे राजा की शारीरिक अवस्था पूछने पर उसने कहा कि 'महाराज को इतना अस्वस्थ
कभी नहीं देखा। अन्यान्य रानियों ने कहा कि 'झूठी पंडिता बनी हुई विष्णुशक्ति राजा की
पुत्री ने महाराज को इतना अस्वस्थ कर दिया है' ॥१२५ १२६॥
राजा के निजी सेवक से यह सुनकर सर्ववर्मा के साथ मैंने यह सोचा॥१२७॥
यदि शारीरिक व्याधि होती तो वैद्यों का प्रवेश होता। यदि मानसिक व्याधि है, तो
उसका कोई कारण मालूम नहीं होता॥१२८॥
कंटकों (विरोधियों) के शुद्ध कर देने के कारण उस राजा का शत्रु कोई नहीं है और
प्रजा भी राजा के प्रति प्रेम रखती है। अतः राजा को कौन-सी मानसिक चिन्ता हो
गई॥१२९॥
अतः 'अकस्मात् स्वामी को कौन-सा खेद उत्पन्न हुआ'—ऐसा सोचने पर बुद्धिमान्
सर्ववर्मा बोला॥१३०॥
'मैं जानता हूँ। इस राजा को मूर्खता के कारण पश्चात्ताप हुआ है, उसी के शोक से
पीड़ित हैं। मैंने इसके इस आशय को पहले ही जान लिया है। 'मैं मूर्ख हूँ' यह समझकर राजा
सदा पांडित्य चाहता है॥१३१॥
९२ कथासरित्सागर
९२ कथासरित्सागर
उत्तरोत्थो मया दृष्टः पूर्वमेव सदाशयः।
राज्ञाप्यमानितश्चाद्य सन्निमित्तमिति ध्रुवम् ॥१३२॥
एवमन्योन्यमालोक्य तौ रात्रिमतिवाह्य च।
प्रातरावामगच्छाव वामदत्तं महीपते ॥१३३॥
तत्र गत्वस्य पृष्ठेऽपि प्रविशन् कथमप्यहम्।
प्राविशं मम पश्चाच्च दासवर्मा रघूत्तमम् ॥१३४॥
उपविश्याथ निकटे क्षिप्रं पृष्टो मया नृप।
अकारणं वधो दत्तो यस्मै विमना इति ॥१३५॥
मङ्क्त्वापि तपश्चामरं मूर्ध्नो मान्याहृत।
दासवर्मा ततस्तेन मद्भूतं दास्यमब्रवीत् ॥१३६॥
धनं मम म्यागवादीति प्रागुक्तं यद् वे त्वया।
तेनाहं कृतवानद्य व्यप्यमानवरा जिनि ॥१३७॥
स्वप्ने हतो मया दृष्टो नभोगन्यामम्बजम्।
मदन च्छिन्दन् शराणि कुमारत विरानितम् ॥१३८॥
ततश्च निर्गता तस्माद्दिव्या स्त्री पद्यडाम्बरा।
रूप देवं मृगं गां च प्रविष्टा गगनध्वजम् ॥१३९॥
इयद्दृष्ट्वा प्रबुद्धोऽस्मि मन्ये गां च गरण्डसी।
दक्षस्य यत्न भावात् गच्छद्धिनं न मन्य ॥१४०॥
तच्च निशम्यैतत् शरद्मनि गच्छताम्।
मामत्तमोन... गात्रान्... ॥१४१॥
शिखामत् प्रवरनं कान्तं विद्या गुमान्।
अधिशेतनि तान्येताय वध्वा दया ॥१४२॥
मम मन विता द्यूता कमोन प्रतिमातः।
विचर दि नू ममाद्य कायव्यथास्त्वि ॥१४३॥
ततोऽवदत् गच्छामीत्याभि गता।
प्राप्तं सर्वविदानां मम दैवम् मां ॥१४४॥
सा तु निन्दामि त्वां पाखण्डिनं सहस्रिधा।
... गच्छं त्यक्त्वा विहायस्याम् ॥१४५॥
ततश्चिन्तां गतः सोऽथ तच्च वृत्तान्तमब्रवीत्।
... ॥१४६॥