सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

प्रथम लम्बक ४१
ब्राह्मण अर्धचन्द्र को बाण समझकर सिर कटने के भय से मैंने डाकयात्रा (चतुष्पद) गुप्त
सीख ली'—ऐसा कहता हुआ भय से शीघ्र बाहर भाग गया॥६१ ॥
वैदिक ब्राह्मण वेश्या के घर से भागकर फिर उसी के पास गया जिसने उसे भेजा
था और उससे सारा वृत्तान्त भी बताया। उसने कहा कि मैंने तुमसे कहा था कि वहाँ साम
(शान्ति) का प्रयोग करना। सामवेद पढ़ने की कौन-सी तुक थी। सचमुच वेदपाठी मूर्ख
ब्राह्मणों में मूर्खता कूट-कूट कर भरी गई है॥६१ ६२॥
इस प्रकार हँसकर और उस वेश्या के पास जाकर उस धूर्त ने कहा कि 'इस दो पैर
के पशु को वह सुवर्ण-रूपी घास दे दो अर्थात् इसका सोना लौटा दो'॥६३॥
वेश्या ने हँसते हुए उस ब्राह्मण का आठ माशा सोना लौटा दिया और वह भी मानों अपना
पुनर्जन्म समझता हुआ घर वापस आया॥६४॥
गुणाढ्य ने काणभूति से कहा कि मैं उस सुप्रतिष्ठित नगर में पग-पग पर इस प्रकार के
तमाशे देखता हुआ सहस्र भवन के समान राजभवन में पहुँचा॥६५॥
वहाँ पर मैंने शर्ववर्मा आदि मन्त्रियों से घिरे हुए तथा दरबार में बैठे हुए राजा सातवाहन
को देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के समान देखा॥६६॥
आशीर्वाद देकर आसन पर बैठे हुए और राजा के द्वारा सत्कार किये गये शर्ववर्मा
आदि मन्त्री मेरी प्रशंसा करने लगे॥६७॥
हे महाराज यह सारे भुवन में विख्यात और सभी विद्याओं में पारंगत गुणाढ्य
नाम का विद्वान् है। सभी गुणों से पूर्ण होने के कारण गुण-आढ्य इसका नाम यथार्थ
है॥६९॥
मन्त्रियों द्वारा मेरी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न राजा सातवाहन ने मुझे भी एक मन्त्री का
पद प्रदान किया॥७०॥
मन्त्री नियुक्त होने पर सर्व विद्या रूपक और विद्या का पड़ौस हुए आनन्द के साथ
रहने लगा॥७१॥
देवी उद्यान की कथा
किसी समय ग्रीष्मऋतु समाप्त होने के समय बहते हुए दिनों में पर मानरूपी बेला
पर देवी के बनाए हुए उद्यान को देखा॥७२॥
पृथ्वी पर बने हुए मलय देश के समान उस अनन्त रमणीय उद्यान को देखकर मैंने
'पाताल (पानी) के रसादि उत्पत्ति का कारण पूछा॥७३॥'