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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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इसलिए तुम इस महाबलवान् बालक को लो। यह बात पहले के ही शाप देनेवाले
मुनिजी ने कही थी" ॥१ २-१ ३॥
ऐसा कहकर उस सात नामक यक्ष के अन्तर्धान हो जाने पर वह राजा उस बालक को
लेकर लौट आया ॥१ ४॥
सात नामक यक्ष ने उसे उठा रखा था। अतः उस बालक का नाम सातवाहन रखा
और समय आने पर उसे राज्य-सिंहासन पर बैठा दिया ॥१ ५॥
कुछ समय के बाद राजा दीपकणि के वन में चले जाने पर वह सातवाहन राजा सार्वभौम
बन गया ॥१ ६॥
इस प्रकार कथा कहकर गालभूति के अनुरोध से बुद्धिमान् गुणाढ्य ने प्रसन्न सा पुनः
स्मरण करके कहा ॥१ ७॥
कुछ समय के अनन्तर, वसन्तोत्सव के समय राजा सातवाहन उस देवी के बनाये
हुए उद्यान में गया ॥१ ८॥
नन्दन-वन में महेन्द्र के समान बहुत काल तक उस उद्यान में अपनी रानियों के साथ
विहार करता हुआ राजा सातवाहन बावली के जल में रानियों के साथ जलक्रीड़ा के लिए
उतरा ॥१ ९॥
जल में वह रानियों को हाथ से फेंके हुए छींटों से सींचने लगा और रानियाँ भी उसे इस
प्रकार सींचने लगीं जैसे हथिनियाँ हाथी को सींचती हैं ॥११ ॥
काजल के घुल जाने पर लाल नेत्रों से और पानी से वस्त्रों के अंगों में चिपक
जाने के कारण स्पष्ट दीखते हुए शरीर-भिन्न अवयवों से वे राजा का मन-हरण करने
लगीं ॥१११॥
वायु के समान राजा ने उन प्रियतमाओं को वन में लताओं के समान कर
दिया। वन में वायु, लताओं के पत्र-रूपी तिलक को हटा देता है और पुष्यरूपी आभरणों
से रहित कर देता है। उसी प्रकार राजा ने रानियों के पत्रावली-रूपी तिलक को पानी
के छींटों की बौछार से धो डाला और पुष्पों के समान शोभित उनके आभरणों को उतरवा
डाला ॥११२॥
जलक्रीड़ा करते-करते उस राजा की शिरीष पुष्प के समान एक सुकुमार रानी स्तन-भार
से क्लान्त होकर खेलती-खेलती थक गयी ॥११३॥
वह रानी पानी के छींटों की बौछार करती हुई राजा से बोली— 'स्वामिन् ! मुझे पानी से
मत मारो।' (मोदकैं — मा—मत उदकै —पानी से) ॥११५॥
यह सुनकर राजा ने जल्द ही बहुत-से लड्डू मँगवाये। तब रानी ने हँसकर फिर कहा—
राजन्, पानी के अन्दर लड्डुओं की कौन तुक है? मैंने तो तुमसे कहा कि जल से मुझे मत
सींचो ॥११६॥