जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
✓ १८६. दधिवाहन जातक
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✓ १८६. दधिवाहन जातक
“वण्णगन्धरसूपेतो...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
विरोधी पक्ष का साथ देने वाले के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जो कथा पहले आ चुकी है, १ वैसी ही कथा है। शास्ता ने कहा-
“भिक्षुओ ! बुरे की संगत बुरी होती है, अनर्थकारी होती है। मनुष्यों के
लिए कुसंगति के दुष्परिणाम का क्या कहना ? पूर्व समय में अस्वादिष्ट, अमधुरै
नीम के वृक्ष की संगति के कारण मधुर-रस वाला, दिव्य-रस वाला, जड, आम
का वृक्ष भी अमधुर, कडुआ हो गया ।” इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय काशी राष्ट्र
में चार ब्राह्मण भाई ऋषियो के प्रव्रज्या क्रम से प्रव्रजित हो, हिमवन्त प्रदेश में
क्रम से पर्णशालाएँ बना रहने लगे। उनमें से जो ज्येष्ठ था वह मर कर शक्र
देवता हुआ।
इस बात को जान वह बीच बीच में सातवें आठवे दिन अपने उन भाइयो
की सेवा में आता। एक दिन उसने ज्येष्ठ तपस्वी को प्रणाम कर एक ओर
बैठ पूछा- “भन्ते ! आपको किस चीज की जरूरत है ?”
पाण्डु-रोग से पीडित तपस्वी ने कहा- “मुझे आग की जरूरत है।”
उसने उसे छुरी-कुल्हाडी दी। यह छुरी-कुल्हाडी दस्ते के हिसाब से जैसे दस्ता
• 'देखो गिरिदत्त जातक (१८४)
दधिवाहन ] २६३
डाला जाता छुरी भी बन जाती, कुल्हाडी भी बन जाती। तपस्वी ने पूछा—
"इसे लेकर कौन मेरे लिए लकडियां लाएगा ?"
शक्र ने कहा—"भन्ते ! जब आपको लकडी की जरूरत हो, इस कुल्हाडी
को हाथ से रगड़ कर कहें, जाओ मेरे लिए लकडियां ला कर आग बना दो।
यह लकडियां लाकर आग बना देगी।"
उसे छुरी-कुल्हाडी दे दूसरे से भी जाकर पूछा—"भन्ते ! तुम्हें क्या
चाहिए ?" उसकी पर्णशाला के पास से हाथियो के आने जाने का रास्ता था।
उसे हाथियो का उपद्रव था। इसलिए उसने कहा—"मुझे हाथियो के कारण
दुख होता है। उन्हे भगा दें।"
शक्र ने उसे एक ढोल लाकर दिया और कहा कि इस ओर बजाने से
तुम्हारे शत्रु भाग जाएंगे, और इस ओर बजाने से मैत्री भाव युक्त हो चारो
प्रकार की सेना सहित तुम्हारे पास आ जाएंगे। इतना कह और वह ढोल दे
छोटे भाई के पास जा पूछा—"भन्ते ! तुम्हे क्या चाहिए ?"
उसकी भी पाण्डुरोग की प्रवृत्ति थी। इसलिए उसने कहा कि मुझे
दही चाहिए। शक्र ने उसे एक दही का घड़ा दिया और कहा—"यदि तुम्हारी
इच्छा हो तो इसे उलटना। उलटने पर यह महानदी बहाकर, बाढ़ लाकर
तुम्हें राज्य भी लेकर दे सकेगा" इतना कह कर इन्द्र चला गया।
उस समय से छुरी-कुल्हाडी ज्येष्ठ भाई के लिए आग बना देती। दूसरा
जब ढोल बजाता तो हाथी भाग जाते। छोटा दही खाता।
उस समय किसी उजडे हुए गाँव की जगह पर घूमते हुए एक सूअर ने
एक दिव्य मणि-खण्ड देखा। उसने उस मणि-खण्ड को मुंह से उठा लिया।
उसके प्रताप से वह आकाश में ऊँचे उड़ा। वहाँ से उसने समुद्र के बीच में
एक द्वीप पर पहुँच सोचा—मुझे यहाँ रहना चाहिए। इसलिए वहाँ उतर एक
गूलर के वृक्ष के नीचे सुख पूर्वक रहने लगा। एक दिन वह उस वृक्ष के नीचे
उस मणि-खण्ड को अपने सामने रख सो गया।
काशी राष्ट्र का एक आदमी, जिसे उसके माता पिता ने निकम्मा समझ
घर से निकाल दिया था, एक पत्तन गाँव पर पहुँचा। वहाँ उसने नाविको के
पास नौकरी की। नौका पर चढ कर जा रहा था कि समुद्र के बीच में नौका
टूट गई। वह एक लकडी के तख्ते पर बैठा उस द्वीप में पहुँचा। वहाँ फलमूल
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खोजते हुए उसने उस सूअर को सोते हुए देख आहिस्ता से समीप जा मणि-
खण्ड उठा लिया। उसके प्रताप से आकाश में उड गूलर के वृक्ष पर बैठ सोचने
लगा-यह सूअर इसी के प्रताप से आकाश में घूमता हुआ यहाँ रहता है।
मुझे पहले ही इसे मार कर मास खाकर पीछे जाना चाहिए।
उसने एक डण्डा तोड कर उसके सिर पर गिराया। सूअर ने जागकर
जब मणि को न देखा तो वह कांपता हुआ इधर उधर दौडने लगा। वृक्ष पर
बैठा हुआ आदमी हँसा। सूअर ने उसे देखा तो वृक्ष से सिर दे मारा, और वहीं
मर गया।
उस आदमी ने उतर कर आग बनाई और उसका मास पका कर खाया।
फिर आकाश में उडकर हिमालय के ऊपर से जाते हुए उस आश्रम को देख
ज्येष्ठ तपस्वी के आश्रम पर उतरा। दो तीन दिन रह कर तपस्वी की सेवा
की। वहाँ उसने छुरी-कुल्हाडी की महिमा देखी। 'इसे मुझे लेना चाहिए'
सोच उसने तपस्वी को मणि-खण्ड की महिमा बता कर कहा- भन्ते ! यह
मणि-खण्ड लेकर मुझे यह छुरी-कुल्हाडी दें। आकाश मे घूमने की इच्छा से
उस तपस्वी ने मणि-खण्ड लेकर यह छुरी-कुल्हाडी दे दी।
उसने थोडी दूर जा छुरी-कुल्हाडी को हाथ से रगड कर कहा-"छुरी-
कुल्हाडी ! तपस्वी के सिर को काटकर मेरा मणि-खण्ड ले आ।" वह जाकर
तपस्वी का सिर काट मणि-खण्ड ले आई।
उस आदमी ने छुरी-कुल्हाडी को एक जगह छिपा कर मँझले तपस्वी के
पास जा, कुछ दिन रह, ढोल की महिमा देख मणि-खण्ड दे, भेरी ली। फिर
पूर्वोक्त प्रकार से उसका भी सिर कटवा छोटे तपस्वी के पास जा, दही के घट
की महिमा देख पूर्वोक्त प्रकार से ही उसका भी सिर कटवा, मणि-खण्ड, छुरी-
कुल्हाडी, ढोल तथा दही का घडा ले, आकाश में उड कर वाराणसी के पास
पहुँचा। वहाँ से उसने वाराणसी के राजा के पास एक आदमी के हाथ पत्र
भेजा-युद्ध करें अथवा राज्य दें।
राजा सन्देश सुनते ही विद्रोही को पकडने के लिए निकल पडा। उसने
ढोल के एक तल को बजाया। चारो प्रकार की सेना पहुँच गई। जब उसने
देखा कि राजा ने अपनी सेना पंक्ति-बद्ध कर ली, उसने दही के घडे को छोडा।
बडी भारी नदी बह निकली। जनसमूह दही में डूब गया और निकल न सका।
दधिवाहन ] २६५
छुरी-कुल्हाड़ी पर हाथ फेर उसे आज्ञा दी कि जाकर राजा का सिर ले आए।
छुरी-कुल्हाड़ी ने जाकर राजा का सिर ला पैरो पर रख दिया। एक भी आदमी
हथियार न उठा सका।
उसने बड़ी सेना के साथ नगर में प्रवेश कर, अभिषेक करवा, दधिवाहन
नाम से धर्मपूर्वक राज्य किया।
एक दिन यह महानदी में जाल की टोकरी फेंक कर खेल रहा था। कण्ण-
मुण्ड सरोवर से देवताओ के उपभोग में आने वाला एक पका आम आकर जाल
में लगा। जाल उठाने वालो ने उसे देख कर राजा को दिया। वह बड़ा
था, घड़े के प्रमाण का था, गोलाकार था, सुनहरी रंग का था। राजा ने बनचरो
से पूछा—"यह किसका फल है ?" उन्होने बताया—आम्रफल। राजा ने
उसे खाकर उसकी गुठली अपने उद्यान में लगवा, उसे दूध-पानी से सिंचवाया।
पेड़ लगकर उसने तीसरे वर्ष फल दिया। आम के पेड़ का बहुत सत्कार होने
लगा। दूध-पानी से उसे सींचते, सुगन्धित द्रव्यो के पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाते,
और मालाओ के जाल पवते। सुगन्धित तेल के दीपक जलाते। यह कीमती
कपडे की कनातो से घिरा रहता। इसके फल मधुर तथा सुनहरी रंग के होते।
जब दधिवाहन राजा दूसरे राजाओ के पास आम के फल भेजता तो
इस डर से कि कही गुठली से पेड न लग जाए वह अंकुर निकलने की जगह को
कांटे से बींध देता। वे आम खाकर गुठली को रोपते। पेड़ न लगता। उन्होने
पूछा तो पता लगा कि क्या कारण है ?
एक राजा ने अपने माली को बुलाकर पूछा कि क्या वह दधिवाहन राजा
के आमो के रस को नष्ट कर उन्हें कडुवा बना सकेगा ? उसने कहा—देव !
हाँ। "तो जा" कह, उसे हजार देकर विदा किया।
उसने वाराणसी पहुँच राजा के पास खबर भिजवाई कि एक माली
आया है। राजा न उसे बुलवाया। उसने जा राजा को प्रणाम कर "तू माली
है ?" पूछने पर कहा—"देव ! हाँ" और अपनी योग्यता का बखान किया।
राजा ने आज्ञा दी—जा हमारे माली के साथ रह।
उस समय से वह दोनो जने बाग की सार संभाल रखते। नए माली ने
अकाल-फूल फुला कर और अकाल-फल लगाकर उद्यान को रमणीय बना
दिया।
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राजा ने उस पर प्रसन्न हो पुराने माली को निकाल उसीको उद्यान सौंप
दिया। उसने उद्यान को अपने हाथ में जान, आम के वृक्ष के चारो ओर नीम
और कडवी लताएँ लगा दीं। क्रम से नीम के वृक्ष बढे। जडो से जडें तथा
शाखाओ से शाखाएँ इकट्ठी हो एक दूसरे में मिल गईं। उनके अस्वादिष्ट
अमधुर रस के ससर्ग से वैसा मधुर फल वाला आम कडुवा हो गया। उसका
रस नीम के पत्ते जैसा हो गाय। यह देख कि आम के फल कडुवे हो गए, माली
भाग गया। दधिवाहन ने उद्यान में जाकर आम का फल खाँया, तो मुँह में
डाला हुआ आम का रस उसे नीम की तरह कसैला लगा। उसे सहन न कर
सकने के कारण, उसने खखार कर थूक दिया।
उस समय बोधिसत्त्व उस राज के अर्थधर्मानुशासक थे। राजा ने बोधि-
सत्त्व को बुलाकर पूछा—
"पण्डित ! इस वृक्ष की जो सेवा पहले होती थी, वह अब भी होती है।
ऐसा होने पर भी इसका फल कडवा हो गया है। क्या कारण है ?" ऐसा
कहते हुए राजा ने पहली गाथा कही—
वण्णगन्धरसूपेतो अम्बाय अहूदा पुरे,
तमेव पूज लभमानो केनम्बो कटुकप्फलो ॥
[यह आम पहले वर्ण और रस से युक्त था। इसकी वही सेवा होती है,
तो भी इसका फल कैसे कडुवा हो गया।]
इसका कारण बताते हुए बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
पुचिमन्दपरिवारो अम्बो ते दधिवाहन !
मूल मूलेन ससट्ठ साखा साखा निसेवरे
असातसन्निवासेन तेनम्बो कटुकप्फलो ॥
[हे दधिवाहन ! तेरा आम्र-वृक्ष नीम से घिरा है। उसकी जड जड से
तथा शाखाएँ शाखाओं से सटी हैं। कडुवे के साथ होने से आम का फल कडुवा
हो गया।]
पुचिमन्दपरिवारो, नीम के वृक्ष से घिरा हुआ साखा साखा निसेवरे,
पुचिमन्द की शाखाएँ आम की शाखाओं को घेर हैं। असातसन्निवासेन अमधुर
चतुमट्ठ ] २६७
नीम के साथ रहने से, तेन उस कारण से यह अम्बो कटुकप्फलो, अस्वादिष्ट-
फल, कडुवे फल वाला हो गया।
राजा ने उसकी बात सुन सभी नीम तथा कड़वी लताएँ कटवा कर,
जड़े उखड़वा कर, चारो ओर से अमधुर बालू हटवा कर, उसकी जगह मधुर
बालू डलवा कर, दुग्ध-जल से, शक्कर-जल से तथा सुगन्धित जल से आम की
सेवा कराई।
मधुर रस के संसर्ग से यह फिर मधुर हो गया। राजा ने जो पहला माली
था, उसीको उद्यान सौंप दिया। आयु भर जी कर वह कर्मानुसार परलोक
सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
मै ही पण्डित अमात्य था।
१८७. चतुमट्ठ जातक
“उच्चे विटभिमारुह...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक बूढ़े भिक्षु के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन जब दोनो प्रधान शिष्य बैठे एक दूसरे से प्रश्नोत्तर कर रहे थे,
एक बूढा उनके पास गया और उन दोनो में स्वयं तीसरा बन धंट कर बोला—
भन्ते ! हम भी आपसे प्रश्न पूछेंगे। आप भी हमसे अपनी शंकाएँ निवारण
करें।
स्थविर उसके प्रति घृणा प्रकट करते हुए उठ कर चले गए। स्थविरो
पूर्व-जन्म की कथा कही—
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से धर्म सुनने के लिए इकट्ठी हुई परिषद, सभा के टूटने पर, उठ कर शास्ता के
पास गई। बुद्ध ने पूछा—असमय कैसे आए ? उन्होने वह बात कही।
शास्ता ने कहा—“भिक्षुओ, न केवल अभी सारिपुत्र मौद्गल्यायन इनके प्रति
जुगुप्सा दिखा बिना कुछ कहे चल देते हैं, पहले भी चल दिए थे ।” इतना कह
पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व जगत
में वृक्ष-देवता हुए। दो हस-बच्चे चित्तकूट पर्वत से निकल, उस वृक्ष पर बैठ
चुगने जाते। फिर लौटते हुए भी वही विश्राम लेकर, चित्तकूट पर्वत पर
जाते। समय बीतते बीतते उनकी बोधिसत्त्व के साथ मैत्री हो गई। आते जाते
एक दूसरे से कुशलक्षेम पूछ धार्मिक कथा कह जाते।
एक दिन उनके वृक्ष के सिरे पर बैठ बोधिसत्त्व के साथ बातचीत करते
हुए एक गीदड ने उस वृक्ष के नीचे खडे हो उन हस-बच्चों के साथ मन्त्रणा
करते हुए पहली गाथा कही—
उच्चे विटभिमारुह्य मन्तयव्हो रहोगता
नीचे ओरुम्ह मन्तव्हो मिगराजापि सोस्सति ॥
[ ऊँचे वृक्ष पर चढ कर एकान्त में मन्त्रणा करते हो। नीचे उतर कर बात-
चीत करो, जिससे मृगराज भी सुने ।]
उच्चे विटभिमारुह्य, स्वभाव से ही ऊँच वृक्ष की एक ऊँची टहनी पर
चढ कर । मन्तयव्हो मन्त्रणा करते हो, बातचीत करते हो। नीचे ओरुम्ह
उतर कर नीचे स्थान पर खडे होकर मन्त्रणा करो। मिगराजापि सोस्सति,
अपने को मृगराज करके कहता है।
हस-बच्चे घृणा कर उठ कर चित्तकूट ही चले गए। उनके चले जाने पर
बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
सीहकोत्थुक ] २६१
यं सुपण्णो सुपण्णेन देवो देवेन मन्तये
किं तेत्थ चतुमट्ठस्स बिलं पविस जन्तुक ॥
[ पक्षी पक्षी के साथ, देवता देवता के साथ मन्त्रणा करे तो हे चारो
दोषो से युक्त गीदड तुझे क्या ? तू बिल में जा । ]
———
सुपण्णो सुन्दर पङ्ख, सुपण्णेन दूसरे हस-बच्चे के साथ । देवो देवेन
उन दोनो को ही देवता करके कहता है। चतुमट्ठस्स शरीर से, जाति से,
स्वर से तथा गुण से—इन चारो से मृष्ट वा शुद्ध यही शब्दार्थ है; किन्तु भावार्थ
है अशुद्ध। लेकिन उसे प्रशंसा के बहाने निन्दा करते हुए यह कहा—चारो
बुराइयो वाले तुझ गीदड़ को यहाँ क्या ? यही मतलब है। बिलं पविस
बोधिसत्त्व ने डर दिखा उसे भगाते हुए यह कहा ।
———
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। बूढ़ा उस समय
का शृगाल था। दो हस-बच्चे सारिपुत्र-मौद्गल्यायन थे। वृक्षदेवता तो मैं
ही था।
१८८. सीहकोत्थुक जातक
“सीहङ्गुली सीहनखो....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कोकालिक (भिक्षु) के बारे में कही !
क. वर्तमान कथा
एक दिन दूसरे बहुश्रुत भिक्षुओ के धर्म बांचते समय कोकालिक की भी
धर्म वाँचने की इच्छा हुई—इस प्रकार सारी कथा उक्त प्रकार से ही विस्तार
जाहिर हो गया था।" इतना कह शास्ता ने अतीत की कथा कही—
२७० [ २४१८८
पूर्वक कहनो चाहिए। उस समाचार को जान शास्ता ने कहा-'भिक्षुओ,
न केवल अभी कोकालिय अपनी वाणी के कारण प्रकट हो गया, वह पहले भी
जाहिर हो गया था।" इतना कह शास्ता ने अतीत की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हिमालय प्रदेश में पैदा हुए। वहाँ उन्हें एक शृगाली के साथ सहवास करने
के फलस्वरूप एक पुत्र हुआ। उसकी अंगुलियाँ, उसके नख, उसके केसर,
उसका रग, उसका आकार प्रकार पिता की तरह का था। स्वर माता की
तरह का।
एक दिन वर्षा हो चुकने पर सिंहो के दहाड दहाड कर सिंह क्रीडा करते
समय, उसने भी उनके बीच म दहाडने की इच्छा से शृगाल की तरह आवाज
की। उसकी बोली सुनकर सब सिंह चुप हो गए। सिंह का अपना एक स्वजातीय
पुत्र था। उसने उसकी आवाज सुनकर पूछा-'तात ! यह सिंह वर्ण आदि
से तो हमारे ही जैसा है, लेकिन इसका स्वर दूसरी तरह का है। यह कौन
है ?" ऐसा प्रश्न करते हुए उसने यह गाथा कही—
सीहङ्गुली सीहनखो सीहपादपतिद्वितो
सो सीहो सीहसङ्घम्हि एको नदति अञ्ञथा ॥
[सिंह की सी अँगुलियाँ, सिंह के से नाखून और सिंह के से पैरा वाला
वह सिंह सिंहो की जमात में दूसरी तरह की आवाज करता है।]
सीहपादपतिट्ठितो, सिंह के पैरो ही पर प्रतिष्ठित । एको नदति अञ्ञथा,
अकेला दूसरे सिंहो से भिन्न शृगाल-स्वर से बोलता हुआ अन्यथा बोलता है।
इसे सुन बोधिसत्व ने कहा-'तात ! यह तेरा भाई शृगाली का लडका
है। इसका रूप मेर जैसा है, आवाज माता जैसी।" फिर शृगाल-पुत्र को
, बुलाकर कहा-'तात ! अब से तू जब तक यहाँ रहे अधिक मत बोलना।
सीहचम्म ] २७१
यदि फिर ऊँचे बोलेगा, तो तेरा शृगाल होना जान लेंगे।" इस प्रकार उपदेश
देते हुए दूसरी गाथा कही—
मा रवं नदि राजपुत्त ! अप्पसद्दो वने वस,
सरेन खो तं जानेय्युं न हि ते पेत्तिको सरो ॥
[ राजपुत्र ! तू ऊँचे स्वर मे मत बोल । धीरे बोलता हुआ बन मे रह । तेरे
स्वर से जान लेंगे, (कि तू गीदड है) क्योकि तेरा स्वर पिता का स्वर नहीं । ]
राजपुत्त, मृगराज सिंह का पुत्र । इस उपदेश को सुनकर उसने फिर जोर
से बोलने की हिम्मत नहीं की।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
शृगाल कोकालिक था। स्वजातीय पुत्र राहुल । मृगराज तो मै ही था।
१८६ सीहचम्म जातक
“नेत सीहस्स नदित .” यह भी शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय कोकालिक (भिक्षु) के ही बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह (भिक्षु) उस समय स्वर से सूत्र पाठ करना चाहता था। शास्ता ने
वह समाचार सुन पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
कृषक कुल में पैदा हो बडे होने पर खेती करके जीविका चलाते थे।
˙ २७२ [ २.४.१८६
उस समय एक बनिया गधे पर बोझा लाद कर व्यापार करता हुआ घूमता
था। वह जहाँ जहाँ जाता वहाँ वहाँ गधे की पीठ पर से सामान उतार, गधे
को सिंह की खाल पहना, धान तथा जौ के खेत में छोड़ देता। खेत की
रखवाली करने वाले उसे देख, शेर समझ, पास न जा सकते थे।
एक दिन उस बनिए ने एक ग्राम-द्वार पर ठहर प्रात काल का भोजन
पकाते समय गधे को सिंह की खाल पहना जौ के खेत में छोड़ दिया। खेत की
रखवाली करने वालो ने उसे शेर समझ पास न जा सकने के कारण घर जाकर
खबर दी। सारे ग्रामवासी आयुध ले, शङ्ख फूंकते तथा ढोल बजाते हुए खेत
के समीप पहुँच चिल्लाने लगे। गधे ने मृत्युभय से डर गधे की तरह आवाज
की। वह गधा है जान बोधिसत्व ने पहली गाथा कही—
नेतं सीहस्स नदित न व्याग्घस्स न दीपिनो,
पारुतो सीहचम्मेन जम्मो नदति गद्दभो ॥
[ न यह शेर की आवाज है, न व्याघ्र की, न चीते की, शेर की खाल पहन
कर दुष्ट गधा चिल्लाता है।]
जम्मो, नीच।
ग्रामवासयो ने भी यह जान कि यह गधा है, उसकी हड्डियाँ तोड़ते हुए
उसे पीटा और सिंह की खाल लेकर चले गए। उस बनिए ने आकर जब विपत्ति
में पड़े उस गधे को देखा तो दूसरी गाथा कही—
चिरम्पि खो तं खादेय्य गद्दभो हरितं यवं,
पारुतो सीहचम्मेन रवमानोव दूसयि ॥
[सिंह की खाल पहन कर तू चिरकाल तक हरे जौ खाता। हे गधे तूने
बोल कर ही अपने को नष्ट किया।]
तं निपात मात्र है। यह गद्दभो अपने गधेपन को छिपा सीहचम्मेन पारुतो
चिरम्पि देर तक हरितं यवं खादेय्य अर्थ है। रवमानोव दूसयि अपने गधे की
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
सीलानिसंस ] २७३
आवाज करके ही अपने को विपत्ति में डाला। इसमें सिंह की खाल का दोष
नहीं।
उसके ऐसा कहते ही गधा वहीं गिर कर मर गया। बनिया भी उसे
छोड़कर चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
गधा कोकालिक था। पण्डित काश्यप तो मैं ही था।
१६०. सीलानिसंस जातक
"पस्स सद्धाय सीलस्स...." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय
एक श्रद्धावान् उपासक के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह श्रद्धावान् प्रसन्नचित्त आर्य-श्रावक था। एक दिन जेतवन जाते
समय उसने शाम को अचिरवती नदी के किनारे पर जाकर देखा कि नाविक
नौकाओं को किनारे पर छोड़ धर्म सुनने के लिए चले गए। वह घाट पर
नौका न देख, बुद्ध की याद से मन को प्रसन्न कर नदी में उतर पड़ा। पाँव पानी
में नहीं भीगे। पृथ्वीतल पर चलते हुए की तरह बीच में पहुँचने पर उसने
लहर को देखा। उसकी बुद्ध-भक्ति मन्द पड़ गई थी; इससे उसके पैर डूबने
लगे।
उसने बुद्ध-भक्ति को दृढ़ कर पानी पर ही चल, जेतवन में प्रवेश कर
शास्ता को प्रणाम किया। वह एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बात-
चीत करते हुए पूछा—"उपासक ! क्या रास्ते में आते हुए अधिक कष्ट तो
१८
की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही-
२७४
नहीं हुआ ?" "भन्ते ! बुद्ध की याद से मन को प्रीति-युक्त कर, पानी के
प्रतिष्ठित हो मैं पृथ्वी को मर्दन करते हुए की तरह आया हूँ।" "उ:
न केवल तूने ही बुद्ध के गुणों का स्मरण कर रक्षा प्राप्त की है। प
समुद्र में नौका के टूटने पर उपासकों ने बुद्ध के गुणों की याद कर रक्ष
की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही-
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में काश्यप सम्यक् सम्बुद्ध के समय में एक स्रोतापन्न
श्रावक, एक नाई गृहस्थ के साथ नौका पर चढ़ा। उस नाई की भार्य्या
नाई को उपासक को सौंपा-आर्य ! इसके सुख दुःख का भार आप र
सातवें दिन वह नौका समुद्र के बीच में टूट गई। वे दोनो जने एक
से चिमटे, एक द्वीप पर पहुँचे। यह नाई पक्षियों को मार कर, पका कर
के समय उपासक को भी देता। यह उपासक 'मुझे नहीं चाहिए" क
न खाता। वह सोचता त्रिरत्न की शरण को छोड़ कर हमारे लिए यह
दूसरा सहारा नहीं। उसने त्रिरत्न के गुणों का स्मरण किया।
उसके स्मरण करते करते उस द्वीप के नागराज ने अपने शरीर की
नौका बनाई। समुद्र-देवता नौका चलाने वाला बना। नौका सात र
भरी गई। तीन मस्तूल थे। इन्द्रनीलमणि की जोतें। सोने के चप्पू।
देवता ने नौका में खड़े होकर घोषणा की—क्या कोई जम्बूद्वीप जाने
है ? उपासक बोला-हम जाएँगे ? तो आ नौका पर चढ़। उसने
पर चढ़ नाई को आवाज दी। समुद्रदेवता ने कहा-तुझे ही जाना मिल
इसे नहीं। क्या कारण है ? कारण यही है कि यह शीलवान् नहीं है
नौका तेरे लिए लाया हूँ। इसके लिए नहीं।
"रहो ! मैं अपने दिए दान का, रक्षा किए गए शील का, तथा भावन
गई भावना का इसे हिस्सेदार बनाता हूँ।"
"स्वामी ! मैं अनुमोदन करता हूँ।"
"अब ले चलूँगा" कह देवता ने उसे भी चढ़ा, दोनों जनों को समुद्र
निकाल, नदी से वाराणसी पहुँचा अपने प्रभाव से उन दोनों के घर पर धन प
¸ सीलानिसंस ] २७५
दिया। फिर, 'पण्डित की ही संगति करनी चाहिए। यदि इस नाई की इस
उपासक के साथ संगति नहीं होती, तो यह समुद्र के बीच म ही नष्ट हो जाता,
कहते हुए देवता न पण्डित की संगति की महिमा बखानते हुए यह दो गाथाएँ
कहीं—
पस्स सद्धाय सीलस्स चागस्स च अय फल
नागो नावाव वण्णेन सद्ध वहति उपासक ॥
सद्धिरेव समासेय सन्भि कुब्बेथ सय्यव
सत हि सन्निवासेन सोत्थि गच्छति नहापितो ॥
[ श्रद्धा, शील और त्याग के इस फल को देखो । नाग नौका की शक्ल बना
कर श्रद्धावान् उपासक का वहन करता है। सत्पुरुष के साथ रहे, सत्पुरुष के
ही साथ दोस्ती कर । सत्पुरुष के साथ रहन से नाई कल्याण को प्राप्त होता है । ]
पस्स किसी विशष को सम्बोधा न कर केवल देखने को कहता है।
सद्धाय लौकिक तथा लोकोत्तर श्रद्धा स । शील में भी इसी प्रकार । चगस्स
दान का त्याग तथा चित्तमैल का त्याग। अय फल यह फल। गुण या परि-
णाम अर्थ है। अथवा त्याग के फल को देखो। यह नाग नौका की शक्ल में,
यह अर्थ भी समझना चाहिए। नावाव वण्णेन नौका के आकार से। सद्ध
तीन रत्नो में प्रतिष्ठित श्रद्धा । सन्भिरेव पण्डितो के ही साथ। समासेय
एक साथ रह निवास कर यही अर्थ है। कुब्बेथ, कर। सन्थव मित्रता,
तृष्णा-पूर्ण दोस्ती तो किसी से न करनी चाहिए। नहापितो—नाई गृहस्थ।
न्हापितो यह भी पाठ है।
इस प्रकार समुद्र देवता आकाश में ठहर, धर्मोपदेश दे तथा नसीहत कर,
नागराजा को साथ ल अपने विमान को ही चला गया।
शास्ता न यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया। आर्य-सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उपासक सकृदा-
गामीफल म प्रतिष्ठित हुआ । तब स्त्रोतापन्न उपासक परिनिर्वाण को प्राप्त
हुआ। नागराजा सारिपुत्त ! समुद्रदेवता तो मैं ही था।
१६१. रूहक जातक
दूसरा परिच्छेद
५. रूहक वर्ग
१६१. रूहक जातक
"अम्भो रूहक ! छिन्नापि .." यह शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय पहली स्त्री से लुभाए जाने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा आठवें परिच्छेद की इन्द्रिय जातक¹ में आएगी। शास्ता ने उस
भिक्षु को कहा— "भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अनर्थ करने वाली है। पहले भी
इसने तुझे राजा सहित परिषद के बीच में लज्जित कर घर से बाहर निकलने
के योग्य नहीं रक्खा।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। बड़े होने पर, पिता के मरने के बाद
राजा बन धर्म से राज्य करने लगे। उसका रूहक नाम का पुरोहित था। रूहक
की पुराणी नाम की भार्या थी।
राजा ने ब्राह्मण को, साज से सजाकर एक घोड़ा दिया। वह उस घोड़े
पर चढ़ कर राजा की सेवा में आता था। उसे अलङ्कृत घोड़े की पीठ पर
आते जाते देखकर जहाँ तहाँ खड़े आदमी घोड़े की प्रशंसा करते थे—अहो !
¹ इन्द्रिय जातक (४२३)
रुहक ] २७७
अश्व का रूप कैसा है ! ओह ! अश्व कितना सुन्दर है !
उसने घर आ प्रासाद पर चढ भार्य्या को बुलाया—'भद्रे ! हमारा घोडा
बडा सुन्दर लगता है। दोनो ओर खडे आदमी हमारे घोडे की ही प्रशंसा करते
हैं।
वह ब्राह्मणी थोडी धूर्त थी। उसने उसे कहा—'आर्य ! तू घोडे के
सौन्दर्य के कारण को नही जानता। यह घोडा अपने साज के कारण शोभा
देता है। यदि तू भी अश्व की तरह सुन्दर लगना चाहता है, तो घोडे का
साज पहन, बाजार में उतर, अश्व की तरह पैरो की टाप देते हुए, जाकर
राजा को देख । राजा भी तेरी प्रशंसा करेगा । आदमी भी तेरी ही प्रशंसा
करेगे।
उस पगले ब्राह्मण ने उसकी बात सुन, अमुक कारण से यह ऐसा कहती
है न समझ, उसकी बात में विश्वास कर वैसा किया। जो जो देखते वे वे
मजाक करते हुए कहते—'आचार्य्य ! खूब शोभा देते है।
राजा न उससे पूछा—"आचार्य्य ! क्या पित्त प्रकोप हुआ है ? क्या
तू पगला हो गया है ?” इस प्रकार लज्जित किया।
उस समय ब्राह्मण ने सोचा 'मैने अनुचित किया।' यह लज्जित हुआ।
ब्राह्मणी से क्रुद्ध हो, 'उसने मुझे राजा सहित सेना के बीच में लज्जित किया'
सोच उसे पीट कर घर से निकालने दे लिए घर गया। धूर्त ब्राह्मणी को जब
मालूम हुआ कि वह उस पर क्रोधित होकर आया है, तो वह पहले ही छोटे
दरवाजे से निकल राज-महल में जा पहुँची। वह चार पाँच दिन वही रही।
राजा ने वह समाचार जान पुरोहित को बुला कर कहा—
“आचार्य्य ! स्त्री से दोष होता ही है। ब्राह्मणी को क्षमा करना चाहिए।”
उसे क्षमा दिलाने के लिए पहली गाथा कही—
अम्भॊ रुहक छिन्नापि जिया सन्धीयते पुन,
सन्धीयस्सु पुराणिया मा क्रोधस्स वस गमि ॥
[ भो रुहक ! धनुष की डोरी टूट कर फिर भी जुड जाती है। पुराणि
के साथ मेल कर लो। क्रोध के वशीभूत मत हो । ]
२७८ [ २५।१६२
संक्षेपार्थ—भो रुहक ! छिन्नापि धनुष की डोरी जुड ही जाती है।
इसी प्रकार तू भी पुराणी के साथ सन्धीयस्सु कोधस्स वस मा गमि।
उसे सुनकर रुहक ने दूसरी गाथा कही—
विज्जमानासु मरुवासु विज्जमानेसु कारिसु
अञ्ञं जियं करिस्साम अलञ्चेव पुराणिया ॥
[ मरुव नाम की छाल के रहते और बनाने वालो के रहते में दूसरी डोरी
बनवा लूंगा । मुझे पुरानी की जरूरत नही । ]
महाराज ! मरुव छाल और डोरी बनाने वाले मनुष्यों के रहते दूसरी
डोरी बनवा लूंगा । इस टूटी हुई पुरानी डोरी की मुझे जरूरत नही । ऐसा
कह उसे निकाल दूसरी ब्राह्मणी को ले आया ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न चित्त भिक्षु
स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ ।
उस समय पुराणि पूर्व-भार्या थी । रुहक उद्विग्न-चित्त भिक्षु था ।
बाराणसी राजा तो मै ही था ।
१६२. सिरिकालकण्णि जातक
“इत्थी सिया रूपवती ” यह सिरिकालकण्णि जातक महाउम्मग्ग
जातक¹ में आएगी ।
¹ महाउम्मग्ग जातक (५४६)
१९३. चुल्लपदुम जातक
चुल्लपदुम ] २७१
१९३. चुल्लपदुम जातक
"अयमेव सा अहमपि सो अनञ्जो...." यह शास्ता ने जेतवन में
विहार करते हुए, उद्विग्नचित्त भिक्षु के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा उम्मद्दन्ति जातक¹ में आयेगी। शास्ता ने पूछा-"भिक्षु ! क्या
तू सचमुच उद्विग्न-चित्त है ?"
"भगवान् ! सचमुच ।"
"तुझे किसने उद्विग्न किया है ?"
"भन्ते ! मै एक अलङ्कृत सजीधजी स्त्री को देख कर आसक्त होने
के कारण उद्विग्न हुआ हूँ।"
"भिक्षु ! स्त्री अकृतज्ञ होती है, मित्रद्रोही होती है, कठोर हृदया होती
हैं। पुराने पण्डित दाहिनी जांघ का लहू पिलाकर भी, जीवनदान देकर स्त्री का
चित्त न जीत सके।"
शास्ता ने यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही-
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। नामकरण के दिन उसका नाम पदुम-
कुमार रक्खा गया। उसके और छ भाई थे। यह सातो जने क्रम से बडे हो,
विवाह कर राजा के मित्रो की तरह रहने लगे।
¹ उम्मद्दन्ति जातक (५२७)
२८० [ २.५ १६१
एक दिन राजा ने राजागण में खड़े होकर उन्हें बड़े ठाट बाट से राजा
की सेवा में आते देख, सोचा—यह मुझे मारकर राज्य भी ले सकते हैं। इस
शङ्का से सदाद्विग्न हो उसने उन्हें बुलाकर कहा—तात ! तुम इस नगर में
नहीं रह सकते। दूसरी जगह जाओ। मेरे मरने पर आकर कुल-प्राप्त राज्य
ग्रहण करना।
ये पिता का कहना मान रोते पीटते घर गए। अपनी अपनी स्त्रियो को ले,
जहाँ कही जाकर जीवन बिताने के लिए नगर से निकले। रास्ते चलते हुए
वे एक कान्तार में पहुँचे। वहाँ खाना पीना न मिला। भूख न सह सकने के
कारण उन्होने सोचा, जीते रहेंगे तो स्त्रियां मिलेंगी। सबसे छोटे भाई की
स्त्री को मारकर उसके तेरह टुकड़े कर उसका मास खाया।
बोधिसत्त्व ने अपने और भार्या के लिए मिले दो हिस्सो में से एक रख
छोड़ा, एक को दोनो ने खाया। इस प्रकार छ दिनो में छ स्त्रियो का मास
खाया गया। बोधिसत्त्व ने एक एक करके छ दिनो में छ टुकड़े रख छोड़े।
सातवें दिन 'बोधिसत्त्व की भार्या को मारेंगे' कहने पर बोधिसत्त्व ने वे छ
टुकड़े उन्हें देकर कहा कि आज यह खाओ। कल देखेंगे।
जिस समय वह मास खाकर सो रहे थे, बोधिसत्त्व अपनी भार्या को लेकर
भाग निकले। उसने थोडी दूर चलकर कहा स्वामी ! चल नही सकती हूँ।
बोधिसत्त्व उसे कन्धे पर लेकर सूर्योदय के समय कान्तार से निकले। सूर्यो-
दय होने पर उसने कहा—स्वामी ! प्यास लगी है। बोधिसत्त्व ने कहा—
भद्रे ! पानी नही है। लेकिन बार बार माँगने पर बोधिसत्त्व ने अपनी दाहिनी
जाँघ में तलवार का प्रहार कर कहा—भद्रे ! पानी नही है। यह मेरी दाहिनी
जाँघ का लहू पी ले। उसने वैसा किया।
वे क्रम से महानदी पर आए। पानी पी, नहा कर फलमूल खाते हुए,
आराम करने की एक जगह पर विश्राम किया। फिर गङ्गा के मोड की जगह
पर आश्रम बनाकर रहने लगे।
गङ्गा के ऊपर के हिस्से में किसी राज्यापराधी चोर को हाथ पाँव तथा
नाक काट कर बोरे में बिठा गङ्गा में बहा दिया गया था। वह बहुत चिल्लाता
हुआ उस जगह आ लगा। बोधिसत्त्व ने उसकी करुणापूर्ण रोने पीटने की
आवाज सुन 'मेरे रहते कोई दुख प्राप्त प्राणी नष्ट न हो' सोच गङ्गा किनारे
चुल्लपदुम ] [Page Header Left]
२८१ [Page Header Right]
जा, उसे उठा आश्रम पर ला, काषाय से धो लेप कर उसके जखमो की चिकित्सा
की। उसकी भार्य्या घृणा से उस पर थूकती हुई फिरती थी—इस प्रकार
के लुञ्जे को गङ्गा से लाकर उसकी सेवा करते हैं ।।।
उसके जखम ठीक होने पर बोधिसत्त्व उसे और अपनी भार्य्या को आश्रम
पर छोड़, जगल से फलमूल लाकर उसका तथा भार्य्या का पालन करने लगे।
उनके इस प्रकार रहते हुए वह स्त्री उस लुञ्जे से आकृष्ट हो गई। उसने
उसके साथ अनाचार किया। फिर किसी उपाय से बोधिसत्त्व को मार डालना
चाहिए, सोच बोली—"स्वामी ! मैने, तुम्हारे कन्धे पर बैठे हुए जिस समय
कान्तार से निकल रही थी इस पर्वत को देख कर एक मिन्नत मानी थी—
हे पर्वतनिवासी देवता ! यदि मैं और मेरा स्वामी सकुशल जीते निकल जाएंगे
तो मैं तुम्हारी बलि चढाऊँगी। सो, वह देवता जिसकी मिन्नत मानी थी तग
करता है। उसकी बलि दे।"
बोधिसत्त्व उसकी माया नही जानते थे। उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार
किया, और बलिकर्म तैयार कर उससे बलि-पात्र उठवा पर्वत पर चढे।
उस स्त्री ने बोधिसत्व से कहा—"स्वामी ! देवता से भी बढकर तुम ही
उत्तम देवता हो। इसलिए पहले तुम्हें ही वन-पुष्पों से पूज, प्रदक्षिणा कर,
वन्दना कर पीछे देवता की बलि दूँगी।" उसने बोधिसत्त्व को प्रपात की ओर
कर वन-पुष्पों से पूजा की। फिर प्रदक्षिणा कर, प्रणाम करने वाली की तरह
हो, पीछे जा, पीठ में धक्का दे, प्रपात से गिरा दिया। 'शत्रु की पीठ देख ली'
सोच सन्तुष्ट हो, वह पर्वत से उतर लुञ्जे के पास गई। बोधिसत्त्व भी प्रपात
के किनारे से पर्वत से गिरते हुए, एक गूलर के वृक्ष पर पत्तो से ढके कष्टकररहित
गुच्छ में जा लग। पर्वत से नीचे उतरने में असमर्थ थे। वह गूलर खाकर
शाखाओ के बीच में बैठे रहे।
एक गोह, जिसका शरीर बडा था पर्वत के नीचे से उस गूलर के पेड़ पर
चढ फल खाता था। वह उस दिन बोधिसत्त्व को देखकर भाग गया। अगल
दिन आया और एक ओर से फल खाकर चला गया। इस प्रकार बार बार
आने से जब वह बोधिसत्त्व का विश्वासी हो गया तो उसने पूछा—"तं इस
जगह कैसे आया ?" "इस कारण से" बताने पर उसने कहा—"तो मत डर।"
उसने बोधिसत्त्व को अपनी पीठ पर लिटा, उतार कर जगल से निकल, महामार्ग