जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसीहकोत्थुक ] २६१
यं सुपण्णो सुपण्णेन देवो देवेन मन्तये
किं तेत्थ चतुमट्ठस्स बिलं पविस जन्तुक ॥
[ पक्षी पक्षी के साथ, देवता देवता के साथ मन्त्रणा करे तो हे चारो
दोषो से युक्त गीदड तुझे क्या ? तू बिल में जा । ]
———
सुपण्णो सुन्दर पङ्ख, सुपण्णेन दूसरे हस-बच्चे के साथ । देवो देवेन
उन दोनो को ही देवता करके कहता है। चतुमट्ठस्स शरीर से, जाति से,
स्वर से तथा गुण से—इन चारो से मृष्ट वा शुद्ध यही शब्दार्थ है; किन्तु भावार्थ
है अशुद्ध। लेकिन उसे प्रशंसा के बहाने निन्दा करते हुए यह कहा—चारो
बुराइयो वाले तुझ गीदड़ को यहाँ क्या ? यही मतलब है। बिलं पविस
बोधिसत्त्व ने डर दिखा उसे भगाते हुए यह कहा ।
———
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। बूढ़ा उस समय
का शृगाल था। दो हस-बच्चे सारिपुत्र-मौद्गल्यायन थे। वृक्षदेवता तो मैं
ही था।
१८८. सीहकोत्थुक जातक
“सीहङ्गुली सीहनखो....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कोकालिक (भिक्षु) के बारे में कही !
क. वर्तमान कथा
एक दिन दूसरे बहुश्रुत भिक्षुओ के धर्म बांचते समय कोकालिक की भी
धर्म वाँचने की इच्छा हुई—इस प्रकार सारी कथा उक्त प्रकार से ही विस्तार