जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
१८२ [ २.१.१६०
राजा भी बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर
कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु अर्हत्व में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय राजा आनन्द था। सुनहरी रंग का मोर तो मैं ही था।
१६०. विनीलक जातक
“एवमेव मून राजान...” यह शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त
के बुद्ध की नकल करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जब देवदत्त गया-शीर्ष पर गए हुए दोनो प्रधान श्रावको के सामने बुद्ध
का रंग-ढंग बनाकर लेट रहा, तो दोनो स्थविर धर्मोपदेश दे अपने शिष्यो को
लेकर वेळुवन चले आए।
शास्ता ने पूछा-“सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ?”
“भन्ते ! सुगत का रंग-ढंग दिखाकर महाविनाश को प्राप्त हुआ।”
“सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त
हुआ है, पहले भी प्राप्त हुआ है”। इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में विदेह राष्ट्र में मिथिला में विदेहराज के राज्य करने के समय
बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला
विनीलक ] १८३
जाकर सब विद्याए सीखी । पिता के मरने पर राज्य गद्दी पर बैठे।
उस समय एक स्वर्ण हंसराज का चुगने की जगह पर एक कौवी से सहवास
हो गया । उसे पुत्र हुआ । वह न माता के सदृश था, न पिता के सदृश ।
उसका रूप रंग भद्दा नीला होने से उसका नाम विनीलक ही हो गया ।
हंसराजा सदैव पुत्र को देखने जाता । उसके दो दूसरे हंस-बच्चे पुत्र थे।
उन्होंने पिता को हमेशा बस्ती की ओर जाते हुए देखकर पूछा—"तात !
तुम हमेशा बस्ती की ओर क्यो जाते हो ?"
"तात ! एक कौंवी से सहवास होकर मुझे एक पुत्र हुआ । उसका नाम
विनीलक है । मैं उसे देखने जाता हूँ।"
"वह कहाँ रहते है ?"
'विदेह राष्ट्र में मिथिला के पास अमुक जगह पर एक ताड के वृक्ष पर रहते
हैं।"
"तात ! बस्ती सशंकित जगह है । वहाँ खतरा होता है । तुम न जाओ ।
हम जाकर उसे ले आएगे।"
दोनो हंस-बच्चे पिता के बताए हुए निशान से वहाँ पहुँच उस विनीलक को
एक डण्डे पर बिठा चोच से डण्डे के सिरो को पकड मिथिला नगर के ऊपर से
चले ।
उस समय विदेह राज सर्वश्वेत चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर
की परिक्रमा कर रहे थे । विनीलक ने उसे देख मन में कहा—"मुझ में विदेह-
राज में क्या अन्तर हैं ? यह चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर में
घूमता है । मै हंस जुते रथ में बैठकर जा रहा हूँ।" उसने आकाश से जाते
हुए यह गाथा कही—
एवमेव नून राजान वेदेह मिचिलग्गहं,
अस्सा वहन्ति आजञ्जा यथा हंसा विनीलकं ॥
[ जैसे हंस विनीलक को ढो रहे हैं उसी तरह से श्रेष्ठ घोडे मिथिला के
विदेहराजा (के रथ) को खीचते हैं ।]
एवमेव, इसी तरह, नून, सर्वल्प विकल्प विषयक निपात है । 'निश्चय से'
भी ठीक अर्थ है । वेदेह, विदेह राष्ट्र के स्वामी को । मिथिलग्गह, मिथिलागेह
१८४ [ २.१.१६०
मिथिला में घर लेकर रहने वाला। आज्ञञ्जा, कारण, अकारण जानने वाले,
यथा हंसा विनीलकं, जैसे यह हंस मुझ विनीलक को ढो रहे हैं, उसी प्रकार
खींच रहे हैं।
हंस-बच्चों ने उसकी बात सुनी तो उन्हें क्रोध आया। उन्होंने सोचा
इसे यही गिरा जायें। लेकिन फिर सोचा ऐसा करने से हमारा पिता हमें क्या
कहेगा ? उसकी निन्दा के डर से वे उसे पिता के पास ले गए और उसकी
करतूत पिता से कही।
पिता को क्रोध आया। वह बोला—'क्या तू मेरे पुत्रों से बढ़कर है जो
उनको नीचा दिखा रथ में जुतने वाले घोडो के समान बनाता है ? अपनी
बिसात नही जानता ? यह स्थान तेरे योग्य नही है। जहाँ तेरी माँ रहती है,
वहीं जा।' इस प्रकार धमका कर दूसरी गाथा कही—
विनील ! दुग्गं भजसि अभूमिं तात ! सेवसि,
गामन्तिकानि सेवस्सु एतं मातालयं तव ॥
[विनील ! तू दुर्ग में रहता है ) तात ! तू अयोग्य स्थान में रहता है।
तू ग्राम के आसपास रह। वह तेरा मातृ-गृह है।]
विनील उसे नाम से बुलाता है। दुग्गं भजसि, इनके साथ गिरि-दुर्ग
में रहता है। अभूमिं तात ! सेवसि तात ! गिरि विषम स्थान, तेरे लिए
अयोग्य स्थान है। तू अभूमि में वास करता है। एतं मातालयं तव, यह
ग्राम के सिरे पर जो कूड़ा फेंकने की जगह है तथा कच्चा श्मशान है वही तेरी
माता का निवास-स्थान है। तू वहीं जा।
इस प्रकार उसे धमका कर पुत्रों को आज्ञा दी—जाओ, इसे मिथिला
नगर की कूड़ा डालने की जगह पर ही उतार आओ। उन्होने वैसा ही किया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय विनीलक देवदत्त था। दो हंस-बच्चे दो अग्र-श्रावक थे।
पिता आनन्द था। विदेहराज तो मैं ही था।
१६१. इन्दसमानगोत्त जातक
दूसरा परिच्छेद
२. सन्थव वर्ग
१६१. इन्दसमानगोत्त जातक
“न सन्थयं कापुरिसेन कयिरा ००” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक ऐसे भिक्षु के बारे में कही जो किसी की बात न मानता था।
क. वर्तमान कथा
उसकी कथा नौवें परिच्छेद में गिज्झ जातक¹ में आएगी। शास्ता ने
उस भिक्षु को कहा—हे भिक्षु ! तूने पहले भी किसी की बात न मानने वाला
होने से पण्डितों का कहना न माना और मस्त हाथी के पैरो से रौंदा जाकर
चूर चूर हुआ। इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मणकुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बार छोड़ ऋषियों के ढंग की प्रव्रज्या
ग्रहण कर पाँच सौ ऋषियों के दल का नेता बन हिमालय प्रदेश में रहने लगे।
उन तपस्वियों में एक इन्दसगोत्त नाम का तपस्वी था—किसी की बात न
मानता था, किसी का कहना न करता था।
उसने एक हाथी-बच्चा पाल रक्खा था। बोधिसत्त्व ने सुना तो उसे
बुलाकर पूछा—‘सचमुच ! तू हाथी-बच्चे को पाल-पोस रहा है ?’
¹ गिज्झ जातक (४२७)
१८६ [ २.२.१६१
'सचमुच आचार्य ! एक हाथी-बच्चा है, जिसकी माँ मर गई है, उसे '
पोस रहा हूँ।'
'हाथी बड़े होने पर पालन-पोषण करने वाले को ही मारते हैं, तू उसे
मत पोस।'
'आचार्य ! उसके बिना नहीं रह सकता।'
'अच्छा ! तो पता लगेगा।'
उससे पोसा जाकर वह हाथी-बच्चा आगे चलकर बड़े भारी शरीर वाला
हो गया।
एक समय वे ऋषिगण जंगल से फल-मूल लाने के लिए दूर चले गए
और कुछ दिन वहीं रहे। हाथी को श्रेष्ठ दक्षिण हवा लगी तो उसका मद
फूट पड़ा। उसने उस तपस्वी की पर्णकुटी नष्ट कर डाली। पानी का घड़ा
फोड़ दिया। पत्थर का तख्ता फेंक दिया। आलम्बन-तख्ता' नोच डाला।
फिर उस तापस्वी को मार डालकर ही जाने के विचार से एक घनी जगह में
छिपकर उसके आने के रास्ते की ओर देखता हुआ खड़ा रहा।
इन्दसगोत्त अपना फल-मूल ले, सबके आगे आगे आ रहा था। उसे देख
वह साधारण स्वभाव से ही उसके पास गया।
हाथी ने घनी जगह से निकल, उसे सूण्ड से पकड़, जमीन पर गिरा, सिर
पैर से दबा मार डाला। फिर उसे मसलता हुआ क्रौञ्चनाद करके जंगल में
चला गया। शेष तपस्वियो ने बोधिसत्व से यह समाचार कहा। बोधिसत्त्व
ने यह कहते हुए कि बुरे आदमी से दोस्ती नहीं करनी चाहिए, यह गाथा कही—
न सन्थवं पापपुरिसेन कयिरा
अरियो अनरियेन पजानमत्थं
चिरानुवुत्थो पि करोति पापं
गजो यथा इन्दसमानगोत्तं ॥
यं ह्येव जञ्जा सदिसो मर्म
सीलेन पञ्ञाय सुतेन चापि
' जिसके सहारे से बैठ सकें।
इन्दसमानगोत्त ] १८७
तेनेव मेत्तिं कयिराथ सद्धिं
सुखावहो सप्पुरिसेन सङ्गमो ॥
[ श्रेष्ठ आदमी अर्थ-अनर्थ को जानता हुआ बुरे आदमी से दोस्ती न करे।
चिरकाल तक साथ रह कर भी बुरा आदमी बुराई करता है, जैसे हाथी ने
इन्द्रसमान गोत्र की बुराई की।
जिसके सदाचार, प्रज्ञा तथा ज्ञान को अपने बराबर का समझे, उसीके
साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के साथ की गई मैत्री सुख को देने वाली होती है।]
न मन्थय कापुरिसेन कयिरा, घृणित क्रोधी आदमी के साथ आसक्ति
वा मैत्री न करे। अरियो अनरियेन पजानमत्थ; आर्य चार प्रकार के होते
हे (१) आचार आर्य, (२) लिङ्ग-आर्य, (३) दर्शन आर्य, (४) प्रतिवेध-
आर्य। इनमें यहाँ आचार्यार्य आर्य से मतलब है। जो अर्थ को जानता है
अर्थ को पहचानता है, आचार में स्थित है—ऐसा आर्य-पुद्गल, अनार्य,
निर्लज्ज, दुश्शील के साथ मैत्री न कर। क्या ? चिरानुवुत्थोपि करोति पापं,
क्योंकि अनार्य चिरकाल तक एक साथ रहकर भी, उस एक साथ रहने का
ख्याल न कर पाप, पाप-कर्म, बुरा-कर्म करता है। जैसे क्या ? गजो यथा
इन्दसमामगोत्त जैसे उस हाथी ने इन्द्रसमानगोत्र को मार कर पाप किया।
यं त्वेव जञ्जा सदिसो मम, इत्यादि में जिस आदमी को जाने कि यह
आदमी शील आदि में मेरे समान है, उसीके साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के
साथ मेल जोल सुखदायी होता है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने उपदेश दिया कि बात न मानने वाला नही होना
चाहिए, कहना मानने वाला होना चाहिए। यूँ ऋषिगण को उपदेश दे इन्द्र
समान गोत्र का शरीर-कृत्य करवा ब्रह्म विहारों की भावना करते हुए वह
ब्रह्म लोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय इन्दसमानगोत्त यह बात न मानने वाला भिक्षु था। ऋषि-
गण का शास्ता मे ही था।
१६२. सन्थव जातक
१८८
[ २.२.१६२
१६२. सन्थव जातक
“न सन्थवस्मा परमत्थि पापियो. .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते
समय अग्नि-हवन करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
इसकी कथा वैसी ही है जैसी नङ्गुट्ठ जातक¹ में है। भिक्षुओ न उन्ह
अग्नि-हवन करते देख भगवान् से पूछा—"भन्ते ! जटिल-साधु नाना प्रकार
के मिथ्या-तप करते हैं। इनसे कुछ उन्नति होती है ?" शास्ता ने उत्तर दिया—
“भिक्षुओ, इससे कुछ लाभ नहीं। पुराने पण्डितों ने अग्नि-हवन करने से
उन्नति होगी समझ चिरकाल तक अग्नि-हवन किया। लेकिन जब उससे
हानि ही होनी देखी, तो उन्होंने उसे पानी डालकर बुझा दिया और शाखा
आदि से पीटकर चले गए। फिर मुड़कर उस तरफ देखा तक नहीं।" इतना
कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। माता पिता ने उसके पैदा होने के दिन से अग्नि
सभाल कर रख, उसके सोलह वर्ष का होने पर पूछा—'तात ! जन्म दिन
से रखी हुई अग्नि लेकर जंगल में जा अग्नि की परिचर्या करोगे ? अथवा
तीनों वेद सीखकर कुटुम्ब का पालन करते हुए घर पर रहोगे ?’
¹ नङ्गुट्ठ जातक (१४४)
सन्थव ] १८९
. उसे घर रहने की इच्छा नही थी। इसलिए वह जंगल में जा अग्नि की
पूजा कर ब्रह्मलोक गामी होने की इच्छा से जन्म-दिन से रक्खी हुई आग ले,
माता पिता को प्रणाम कर जगल चला गया। वहाँ पर्ण-कुटी में रहता हुआ
अग्नि की पूजा करने लगा।
एक दिन वह किसी निमन्त्रित स्थान पर गया। वहाँ उसे घी के साथ
खीर मिली। उसने सोचा इस खीर से महा-ब्रह्मा का यज्ञ करूँगा। उसने
खीर ला आग जलाई। फिर सोचा घी मिश्रित खीर भगवान् अग्नि को पिलाऊँ
और खीर को आग मे फेंका। बहुत चिकनाई वाली खीर के आग में पड़ते ही
आग जोर से जली और उसकी जोर से उठी लपट ने पर्ण-कुटी जला डाली।
ब्राह्मण डरकर, घबरा कर भाग गया। बाहर खड़े होकर उसने सोचा
कि बुरे से दोस्ती नहीं करनी चाहिए। अब इसने बड़ी कठिनाई से बनाई मेरी
कुटिया जला डाली। इतना कह यह गाथा कही—
. न सन्थवस्मा परमत्थि पापियो
यो सन्थवो कापुरिसेन होति,
सन्तप्पतो सप्पिना पायसेन
किच्छा कतं पण्णकुर्टि अदड्ढहि ॥
[बुरे आदमी की मैत्री से बढ़कर बुरा कुछ नही। आग को घी वाली
खीर से सन्तर्पित किया। उसने कठिनाई से बनी पर्ण-कुटी जला दी।]
न सन्थवस्मा, आसक्ति और मैत्री, यह जो दोनो प्रकार की दोस्ती है,
इससे बढ़कर दूसरी बुरी बात नहीं है। यो सन्थवो कापुरिसेन, जो पापी
बुरे आदमी के साथ दोनो तरह की दोस्ती है, इस दोस्ती से बढ़कर और बुरा
कुछ नही। किस लिए ? सन्तप्पतो....अदड्ढहि, क्योकि घी और घी से
सन्तर्पित की गई इस आग ने भी बडी कठिनाई से बनाई हुई मेरी पर्ण-कुटी
जला दी।
इतना कह, 'उस मित्र-द्रोही से मुझे कुछ मतलब नही' सोच उसे पानी से
बुझा, शाखाओ से पीट हिमालय में चला गया। वहाँ उसने जब एक श्यामा
१६० [ २.२.१६३
मृगी को सिंह, व्याघ्र और चीते का मुंह चाटते देखा, तो 'सत्पुरुष से मित्रता
करने से बढ़कर सुख नहीं है' सोच दूसरी गाथा कही—
न सन्थवस्मा परमत्थि सेय्यो
यो सन्धवो सप्पुरिसेन होति
सीहस्स ब्यग्घस्स च दीपिनो च
सामा मुखं लेहति सन्धयेन ॥
[ सत्पुरुष से जो स्नेह होता है, उस स्नेह से बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
श्यामा मृगी स्नेह से सिंह, व्याघ्र और चीते का मुंह चाटती है। ]
सामा मुखं लेहति सन्धयेन, श्यामा मृगी इन तीनों जनो का मैत्री से,
स्नेह से मुंह चाटती है।
इस प्रकार वह बोधिसत्व हिमालय में चले गए। वहाँ ऋषियों की प्रव्रज्या
ग्रहण कर अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर, मरने पर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय तपस्वी में ही था।
१६३. सुसीम जातक
“काळामिगा सेतदन्ता तव इमे···” यह शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय छन्दकदान¹ के बारे में कही।
¹ वह दान जिसके देने में छन्द (vote) दिया गया हो।
क. वर्तमान कथा .
सुसीम ] १६१
क. वर्तमान कथा .
श्रावस्ती में कभी एक ही परिवार भिक्षुसघ को जिसमें बुद्ध मुख्य रहते
थे दान देता था, कभी बहुत से लोग एक साथ इकट्ठे हो दल बना कर दान
देते थे, कभी एक एक गली के लोग मिलकर देते थे और कभी सारे नगर के
लोग सबसे इकट्ठा करने के दान देते थे।
इस समय सारे नगर निवासियो से दान इकट्ठा किया गया। सारा
सामान तैयार हो गया। दाताओ में दो पक्ष थे। कुछ ने कहा यह सामान
अन्य-तीथिको को दे। कुछ ने कहा सघ को, जिसके प्रमुख बुद्ध हैं। इस प्रकार
बार बार बात होने पर भी दोनों पक्षो का अपना अपना आग्रह रहा—अन्य-
तीथिको के शिष्य उन्हें दान दिए जाने के पक्षपाती रहे और बुद्ध के शिष्य बुद्ध-
प्रमुख भिक्षुसघ को। तब यह हुआ कि बहुमत देखा जाए। बहुमत लिए
जाने पर अधिक लोग यही कहने वाले हुए कि बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-सघ को ही
दिया जाए। उन्हीं की बात स्थिर रही। अन्य-तीथिको के शिष्य बुद्ध को
दिए जाने वाले दान में बाधा नहीं डाल सके।
नगर के लोगो ने बुद्ध की प्रमुखता में भिक्षुसघ को निमन्त्रित कर महा-
दान दिया और सातवें दिन सब वस्तुओ का दान किया।
शास्ता अनुमोदन कर जनता को मार्ग तथा फल का बोध करा जेतवन
विहार में चले गए। वहाँ भिक्षुसघ द्वारा आदर प्रदर्शित किए जाने पर गन्ध-
कुटी के सामने खडे हो उपदेश दे गन्धकुटी में प्रवेश किया।
शाम को धर्मसभा में एकत्रित हुए भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—
आयुष् मानो! दूसरे तीर्थिक श्रावको ने बुद्ध को मिलने वाले दान में विघ्न डालने
की कोशिश की, किन्तु वे सफल नही हुए। सभी वस्तुओ का दान बुद्धो के
ही चरणो पर आ पहुँचा। ओह ! बुद्धो की महानता !
- शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, यह दूसरे मतो
के अनुयाई न केवल अभी मुझे मिलने वाले दान में विघ्न डालने का प्रयत्न
करते हैं, पहले भी किया है। लेकिन दान की वह वस्तुएं हमेशा मेरे ही चरणों
में आ जाती रही हैं'—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
१६४ [ २.२.१६३
सोने की ध्वजाओं के साथ सुनहरी जालों से ढक कर खड़ा किया गया । राजा-
ङ्गण अलङ्कृत हुआ । ब्राह्मण लोग प्रसन्नचित्त सजधज कर खड़े थे कि
हम हस्ती-मङ्गल वरेंगे, हम करेंगे । सुसीम राजा भी गहने और भाण्डे लिवा
जाकर मङ्गल-स्थान पर खड़ा हुआ ।
बोधिसत्त्व ने भी एक कुमार के लिए जिस ढंग से अलङ्कृत होना उचित
है, उस तरह अलङ्कृत हो, अपनी परिषद का नेता बन राजा के पास जाकर
पूछा—"महाराज ! क्या आपने सचमुच ऐसी बात कही है कि हमारे यश
को नाश करके, दूसरे ब्राह्मणों से हस्ती-मङ्गल करवा, हाथियों के अलङ्कार
तथा दूसरे सामान उनको देंगे ?" इतना कह, पहली गाथा कही—
काळा मिगा सेतदन्ता तव इमे
परोसतं हेमजालाभिसञ्छन्ना
ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि
अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥
[ सुसीम ! क्या तुम अपने और हमारे पूर्वजों को याद करके भी यह
कहते हो कि सोने के जाल से ढके हुए सौ से अधिक काले हाथी, जिनके दांत
सफ़ेद हैं, तुमको देंगे, तुमको देंगे ? ]
ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि, वंह यह अथवा तुम्हारे पास के, काळा
मिगा सेत दन्ता, ऐसे नाम वाले सौ से अधिक सब अलङ्कारों से सजे हाथी दूसरे
ब्राह्मणों को देता हूँ, हे सुसीम ! क्या तू यह सचमुच कहता है । अनुस्सरं
पेत्ति पितामहानं, हमारे और अपने यश के पिता-पितामह आदि को याद करते
हुए । महाराज ! सात पीढ़ियों से हमारे पिता-पितामह हस्ती-मङ्गल करते
रहे हैं । सो आप इसे याद करके भी क्या सचमुच हमारे और अपने वंश (के
सम्बन्ध) को नष्ट करके ऐसा कहते हैं ?
सुसीम ने बोधिसत्त्व की बात सुन दूसरी गाथा कही—
काळा मिगा सेतदन्ता मम इमे
परोसतं हेमजालाभि सञ्छन्ना
सुसीम ] १६५
ते ते वदामीति वदामि माणव ।
अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥
[ माणव ! हाँ अपने और तुम्हारे पूर्वजों को याद करके भी यह कहता
हूँ कि यह अपने स्वर्ण-जाल से ढके हुए सौ से अधिक हाथी, जिनके सफेद दाँत
हैं, तुमको देता हूँ । ]
ते ते वदामि, ये यह हाथी दूसरे ब्राह्मणों को देता हूँ । माणव ! यह मैं
सत्य ही कहता हूँ । अथवा तेरे हाथी ब्राह्मणों को देता हूँ, यह भी अर्थ है ।
अनुस्सर, पिता पितामह की कृति भी याद है, नहीं याद है सो नहीं । हमारे
पिता पितामह के हस्ती मङ्गल को तुम्हारे पिता पितामह करते थे, इसे याद
करता हुआ भी यह कहता हूँ ।
बोधिसत्त्व ने कहा—"महाराज ! हमारे और अपने यश को याद रखते
हुए आप क्यों मुझे छोड़ दूसरो से हस्ती मङ्गल करवाते हैं ?"
"तात ! मुझे कहा गया है कि तू तीन वेद और हस्ती-सूत्र नहीं जानता
है । इसीलिए मैं दूसरे ब्राह्मणो से करवाता हूँ ।
बोधिसत्त्व सिंह की तरह गरज कर बोला—"तो महाराज ! इतन
ब्राह्मणो म जो एक भी ब्राह्मण मेरे साथ तीनो वेद तथा हस्ती-सूत्र का कुछ
हिस्सा भी कह सकता हो, वह उठे । तीन वेदो और हस्ती-सूत्र के साथ हस्ती-
मङ्गल करनेवाला मुझे छोड कोई दूसरा सारे जम्बूद्वीप में नहीं।"
एक ब्राह्मण भी प्रतिपक्षी बनकर खड़ा नहीं हो सका । बोधिसत्त्व ने
अपने कुल-वश को प्रतिष्ठित कर हस्ती-मङ्गल किया और बहुत धन ले अपने
घर गए ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य (सत्यों) को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया । कोई श्रोतापन्न हुए। कोई सकृदागामी, कोई अनागामी और
कोई अर्हत् ।
तब माँ महामाया थी । पिता शुद्धोदन महाराज थे । सुसीम राजा आनन्द
था । चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य सारिपुत्र था । माणव ता मैं ही था ।
१६४. गिज्झ जातक
१६६ [ २२।६४
१६४. गिज्झ जातक
"यं ननु गिज्झो योजनसतं···" यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय माता पिता का पोषण करने वाले एक भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
इसकी कथा साम जातक¹ मे आएगी। शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा—
'भिक्षु ! क्या तू सचमुच गृहस्थो का पोषण करता है ?' 'हाँ ! सचमुच'
कहने पर पूछा—'वह तेरे क्या लगते हैं ?
"भन्ते ! वे मेरे माता पिता हैं।"
"बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा !" कह अन्य भिक्षुओं को शास्ता ने मना
किया—"भिक्षुओ ! इस भिक्षु पर क्रोध न करें। पुराने समय में पण्डित-
जन गुणों का ख्याल करके भी रिश्तेदारो का उपकार करते रहे हैं। इसका तो
कर्तव्य है कि यह माता पिता की सेवा करे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पुराने समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गृद्ध-पर्वत पर गृध्र होकर पैदा हो माता पिता का पोषण करते थे।
एक बार बडा आंधी-पानी आया। गृध्र आंधी-पानी न सह सकने के
कारण शीत से डर कर वाराणसी जा वहाँ चारदीवारी के पास, खाई के निकट
सर्दी से कांपते हुए बैठे। वाराणसी-सेठ नगर से निकल कर नहाने जा रहा
¹ साम जातक (५४०)
गिद्ध ] १६७
था । उसने उन गृध्रों को कष्ट में देखकर एक ऐसी जगह पहुँचा दिया जहाँ
वर्षा नहीं हो रही थी। फिर वहाँ आग जलवाई। मुर्दा गौ फेंकने के स्थान
से गो-मांस मँगवा कर उन्ह दिलवाया। उनकी रक्षा का प्रबन्ध किया।
आँधी-पानी के बन्द होने पर गृध्र स्वस्थ शरीर हो पर्वत को ही लौट
गए। उन्होने वहाँ इकट्ठे हो, इस प्रकार मन्त्रणा की। 'वाराणसी सेठ ने
हमारा उपकार किया। उपकार करने वाले का प्रत्युपकार करना चाहिए।
इसलिए अब से तुम म से जिस किसी का जो वस्त्र वा आभरण मिले, उसे
चाहिए कि वह वाराणसी-सेठ के घर में खुले आँगन में गिरा दे।'
उस समय से गृध्र, आदमियो के धूप में सुखाने के लिए डाले हुए वस्त्रा-
भरणों को, उन्हें लापरवाह देख, जिस तरह से चील मांस के टुकड़े को एक
दम उठा ले जाती हैं, उसी तरह उठा ले जाकर वाराणसी-सेठ के खुले आँगन
में गिरा देते । सेठ ने यह मालूम करके कि यह वस्त्राभूषण गृध्र ला लाकर
डालते हैं, उन्हें पृथक एक ओर रक्खा ।
राजा के पास खबर पहुँची कि गृध्र नगर उजाड़ रहे हैं। उसने कहा कि
किसी एक गृध्र को पकड़ लो। सब माल मँगवा लूँगा। राजा ने जहाँ तहाँ
जाल और पाश फैलवाए । माता पिता का पोषण करने वाला गृध्र जाल में .
फँस गया। उसे पकड़कर राजा को दिखाने के लिए ले चले।
वाराणसी-सेठ ने राजा की सेवा में जाते समय उन मनुष्यो को गृध्र
पकड़ कर ले जाते हुए देखा। उसने सोचा कि यह इस गृध्र को कष्ट न दें,
इसलिए साथ हो लिया। गृध्र को राजा के पास ले गए। राजा ने पूछा—
"तुम नगर पर छापा डालकर वस्त्र आदि ले जाते हो ?"
"महाराज ! हाँ ।"
"वह किसे दिए है ?"
"वाराणसी-सेठ को ।"
"क्यो ?"
"हमें उसने जीवन-दान दिया था। उपकार करने वाले का प्रत्युपकार
करना चाहिए। इसलिए दिए।"
राजा ने उसे यह कहते हुए कि गृध्र तो सौ योजन की दूरी से लाश को
१६८ [ २.२.१६४
देख लेते हैं, तूने अपने लिए फैलाए फंदे को क्यो नहीं देखा, (यह) पहली गाथा
कही—
यं ननु गिज्झो योजनसतं कुणपानि अवेक्खति,
कस्मा जालं च पासं च आसज्जापि न बुज्झसि ॥
[ गृध्र तो सौ योजन दूरी पर से भी लाश को देख लेता है। तू पास से
भी जाल और फंदे को क्यो नहीं देख सका ? ]
यं निपात मात्र है। नु, निपात ही है। गिज्झो योजनसतं (गृध्र सौ
योजन) दूर पर पड़ी हुई कुणपानि अवेक्खति देखता है। आसज्जापि, पास
आकर भी, पहुँच कर भी, तू अपने लिए फैलाए जाल और फंदे के पास पहुँच
कर भी उसे क्यो न बुज्झसि (यह) पूछा।
गृध्र ने उसकी बात सुन दूसरी गाथा कही—
यदा पराभवो होति पोसो जीवितसङ्खये,
अथ जालं च पासं च आसन्नापि न बुज्झति ॥
[ जब विनाश का समय आता है, जब जीवन पर सङ्कट आता है, तब
प्राणी पास में पड़े हुए जाल और फंदे को भी नहीं देखता ।]
पराभवो, विनाश। पोसो, प्राणी।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक
नकुल ] १६५
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया ।
सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर माता पिता का पोषण करने वाला
भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय राजा आनन्द था। वाराणसी सेठ सारिपुत्र था। माता पिता
का पोषण करने वाला गृध्र तो मैं ही था।
१६५. नकुल जातक
"सन्धि कत्वा अमित्तेन..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
दो श्रेणियों के कलह के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
इसकी कथा उपरोक्त उरग जातक' की तरह ही है। इसमें शास्ता ने
कहा—'भिक्षुओ ! इन दो महा-मन्त्रियों का न केवल अभी मैने मेल कराया
है। पहले भी मैने इन दोनो का मेल कराया है।" यह कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जाकर सब विद्याएँ
सीखी। फिर गृहस्थी छोड ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रज्या ली। अभिज्ञा
'उरग जातक (१५४)
२०० [ २.२.१६५
तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर फल-मूल चुग चुग कर खाते हुए हिमालय-प्रदेश
में रहने लगे।
उनके चङ्क्रमण करने के स्थान के एक सिरे पर धाम्बी में एक नेवला
और उसीके पास वृक्ष की खोह मे एक सर्प रहता था। वह दोनो नेवला और
साँप हमेशा आपस में झगडते रहते थे।
बोधिसत्त्व ने उनको झगड़ने का दुष्परिणाम और मैत्री-भावना का लाभ
समझा कर कहा कि कलह न करके मिलकर रहना चाहिए। इस प्रकार उन
दोनो का मेल करा दिया।
साँप के बाहर निकलने के समय नेवला चङ्क्रमण-भूमि के सिरे पर बांबी
के द्वार में से सिर निकाल मुंह खोल श्वास-प्रश्वास लेता हुआ लेट कर सो रहा।
बोधिसत्त्व ने उसे इस प्रकार सोते हुए देख 'तुझे किस कारण से भय लगा है ?'
पूछते हुए यह पहली गाथा कही—
सन्धिं कत्वा अमित्तेन अण्डजेन जलाबुज !
विवरिय दाढं सयसि कुतो तं भयमागतं ॥
[ हे नकुल ! तू सांप से दोस्ती करके भी मुंह खोले पड़ा है। तेरे भयभीत
होने का क्या कारण है ? ]
—————
सन्धि कत्वा मैत्री करके, अण्डजेन, अण्डे से पैदा हुए नाग से, जलाबुज¹ !
नकुल को पुकारता है। वह गर्भ से पैदा होने के कारण जलाबुज कहलाया।
विवरिय, खोलकर।
—————
इस प्रकार बोधिसत्त्व के कहने पर नेवला बोला—आर्य्य ! शत्रु की
ओर से असावधान नही होना चाहिए। सशंकित ही रहना चाहिए। यह
कहते हुए नेवले ने दूसरी गाथा कही—
सङ्केथेव अमित्तस्मिं मित्तस्मिं पि न विस्ससे
अभया भयमुप्पन्नं अपि मूलं निकन्तति ॥
—————
¹ ज्राबुज (=जरायुज)
उपसाळ्हक ] २०१
[ शत्रु से सशङ्कित रहे। मित्र पर भी विश्वास न करे। अभय से जो
भय पैदा होता है वह जड़ भी खोद देता है।]
अभया भयमुप्पन्न यहाँ से तुझे भय नहीं है, ऐसा अभय (देने वाला)
कौन है ? मित्र ! मित्र मे भी विश्वास करने पर उससे जो भय उत्पन्न होता
है, वह जड़ भी खोद देता है। मित्र को सब छिद्र मालूम होते हैं, इसलिए वह
जड़ खोदने का काम करता है।
बोधिसत्त्व ने कहा—"डर मत। मैने ऐसा वर दिया है कि सर्प अब
तुझसे द्वेष नहीं करेगा। तू अब से उससे सशङ्कित मत रह।" इस प्रकार
उपदेश दे, चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर बोधिसत्त्व ब्रह्मलोकगामी हुए।
वे भी कर्मानुसार (परलोक) सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया। उस समय सर्प और
नेवला यह दोनो प्रधान थे। तपस्वी तो मैं ही था।
१६६. उपसाळ्हक जातक
उपसाळ्हक नामानं, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उप-
साळ्हक नाम के एक ब्राह्मण के बारे में जिसे श्मशान की शुद्धि का बहुत
ख्याल था कही।
क. वर्तमान कथा
वह ब्राह्मण बड़ा धनवान् था। लेकिन क्योंकि वह एक मिथ्या-मत का
शिकार था, इसलिए वह पास के विहार में रहने वाले बुद्धो की भी सेवा नहीं
करता था। हाँ, उसका पुत्र पण्डित था, ज्ञानी था।
२०२ [ २-२ १६६
उस ब्राह्मण ने बूढा होने पर पुत्र को कहा—'तात ! मुझे किसी ऐसे
श्मशान में मत जलाना जहाँ कोई चाण्डाल जलाया गया हो। मुझे किसी ऐसे
ही श्मशान में जलाना जहाँ पहले कभी कोई न जलाया गया हो।”
“तात ! मैं नही जानता कि आपको मुझे वहाँ जलाना चाहिए। बहुत
अच्छा हो, मुझे साथ ले जाकर आप बता दें कि मुझे तुम इस जगह जलाना।”
ब्राह्मण ने 'तात ! अच्छा' कह, और उसे ले जा नगर से निकल गृध्र-
कूट पर्वत पर चढ कहा—'तात ! यहाँ पहले कोई चाण्डाल नहीं जलाया
गया है। मुझे यहाँ जलाना।”
फिर वह पुत्र के साथ पर्वत से उतरने लगा।
शास्ता ने प्रात काल ही ऐसे लोगो का विचार करते हुए जिनकी उस दिन
ज्ञानप्राप्ति की सम्भावना थी उन पिता-पुत्र की श्रोतापत्ति-मार्गारूढ होने की
सम्भावना को देखा।
इसलिए मार्ग पकड एक शिकारी की तरह पर्वत की तराई में पहुँच उनके
पर्वत से उतरते समय उनकी प्रतीक्षा करते हुए बैठे। उन्होने उतरते समय
शास्ता को देखा। शास्ता ने कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा—"ब्राह्मण ! कहाँ
गए थे ?”
माणवक ने वह बात कही। शास्ता ने कहा—'तो आओ, तुम्हारे पिता
ने जो स्थान बताया है, वहाँ चलें।' उन दोनो को साथ लेकर पर्वत के शिखर
पर चढ पूछा—'कौनसी जगह है?'
माणवक ने कहा—"भन्ते ! इन तीनो चोटियो के बीच में बताया है।”
शास्ता बोले—'माणवक ! तेरे पिता केवल अभी श्मशान की शुद्धि
मानने वाले नही है, पहले भी श्मशान की शुद्धि मानने वाले रहे हैं। न केवल
अभी इसने तुझे कहा है कि मुझे इस स्थान पर जलाना, पहले भी इसने इसी
स्थान पर जलाने के लिए कहा है।” इतना कह, माणवक के प्रार्थना करने पर
शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में इसी राजगृह में यही उपसाल्हक ब्राह्मण था, यही इसका
पुत्र था।
उपसाळ्हक ] २०३
उस समय बोधिसत्व मगध देश में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, सब विद्याएँ
सीख, ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त
कर ध्यान-क्रीडा करते हुए हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे । फिर नमक-
खटाई खाने के लिए गृध्रकूट पर पर्ण-कुटी में रहने लगे ।
उस समय उस ब्राह्मण ने इसी तरह से पुत्र को कह, पुत्र के यह कहने पर
• कि 'तुम्ही मुझे उस तरह का स्थान बता दो' यही स्थान बताया । फिर पत्र
के साथ उतरते हुए ब्राह्मण बोधिसत्त्व को देख उनके पास पहुँचा ।
बोधिसत्त्व ने इसी तरह पूछ माणवक की बात सुन, कहा—'आ, तेरे
पिता द्वारा बताए गए स्थान की परीक्षा करें कि वहाँ पहले कोई जलाया गया
है, वा नहीं ?' फिर उनके साथ पर्वत-शिखर पर चढ़, जब माणवक ने कहा
कि यह तीनो चोटियो के बीच का स्थान ऐसा है जहाँ कोई नहीं जलाया गया,
कहा—"माणवक ! इसी स्थान पर जलाए गयो का हिसाब नहीं है। तेरा
पिता इसी राजगृह में ब्राह्मण कुल में ही पैदा होकर, उपसाळ्हक नाम से ही
इन्ही चोटियो के बीच में चौदह हजार बार जलाया गया है। पृथ्वी में ऐसी
कोई जगह नहीं है, जहाँ कोई न कोई जलाया न गया हो, जहाँ श्मशान न
बना हो, जहाँ सिर न कटे हो। पूर्व-जन्मो का ज्ञान होने से, उघाड कर यह
दो गाथाएँ कही—
उपसाळ्हक नामान सहस्सानि चतुद्दस
अस्मिं पदेसे दट्ठानि नत्थि लोके अनामंतं ॥
यम्हि सच्चं च धम्मो च अहिंसा सयमो दमो
एतदरिया सेवन्ति एतं लोके अनामंतं ।
[ उपसाळ्हक नाम से ही चौदह हजार व्यक्ति इसी स्थान में जलाए गए।
लोक में ऐसी जगह नहीं है जहाँ कोई न कोई मरा न हो।
जिसमे सत्य है, धर्म है, अहिंसा है, सयम है उसे आर्य्य-जन सेवन करते हैं।
यही लोक में नहीं मरता है ।]
———
अनामंतं, मृत-स्थान को ही व्यवहार से अमृत-स्थान कहा गया है।
उसका प्रतिषेध करते हुए अनामंत कहा है। अनमतं, भी पाठ है। लोक में