जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुसीम ] १६५
ते ते वदामीति वदामि माणव ।
अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥
[ माणव ! हाँ अपने और तुम्हारे पूर्वजों को याद करके भी यह कहता
हूँ कि यह अपने स्वर्ण-जाल से ढके हुए सौ से अधिक हाथी, जिनके सफेद दाँत
हैं, तुमको देता हूँ । ]
ते ते वदामि, ये यह हाथी दूसरे ब्राह्मणों को देता हूँ । माणव ! यह मैं
सत्य ही कहता हूँ । अथवा तेरे हाथी ब्राह्मणों को देता हूँ, यह भी अर्थ है ।
अनुस्सर, पिता पितामह की कृति भी याद है, नहीं याद है सो नहीं । हमारे
पिता पितामह के हस्ती मङ्गल को तुम्हारे पिता पितामह करते थे, इसे याद
करता हुआ भी यह कहता हूँ ।
बोधिसत्त्व ने कहा—"महाराज ! हमारे और अपने यश को याद रखते
हुए आप क्यों मुझे छोड़ दूसरो से हस्ती मङ्गल करवाते हैं ?"
"तात ! मुझे कहा गया है कि तू तीन वेद और हस्ती-सूत्र नहीं जानता
है । इसीलिए मैं दूसरे ब्राह्मणो से करवाता हूँ ।
बोधिसत्त्व सिंह की तरह गरज कर बोला—"तो महाराज ! इतन
ब्राह्मणो म जो एक भी ब्राह्मण मेरे साथ तीनो वेद तथा हस्ती-सूत्र का कुछ
हिस्सा भी कह सकता हो, वह उठे । तीन वेदो और हस्ती-सूत्र के साथ हस्ती-
मङ्गल करनेवाला मुझे छोड कोई दूसरा सारे जम्बूद्वीप में नहीं।"
एक ब्राह्मण भी प्रतिपक्षी बनकर खड़ा नहीं हो सका । बोधिसत्त्व ने
अपने कुल-वश को प्रतिष्ठित कर हस्ती-मङ्गल किया और बहुत धन ले अपने
घर गए ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य (सत्यों) को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया । कोई श्रोतापन्न हुए। कोई सकृदागामी, कोई अनागामी और
कोई अर्हत् ।
तब माँ महामाया थी । पिता शुद्धोदन महाराज थे । सुसीम राजा आनन्द
था । चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य सारिपुत्र था । माणव ता मैं ही था ।