जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१४२. सिगाल जातक
१०८ [ १.१५.१४२
१४२. सिगाल जातक
“एत हि ते दुराजानं...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के (तथागत को) मारने का प्रयत्न करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
धर्म-सभा में भिक्षुओ की बातचीत सुनकर तथागत ने कहा—भिक्षुओ !
देवदत्त ने केवल अभी मेरे वध की कोशिश नहीं की। पहले भी की ही है।
लेकिन मुझे मार नहीं सका। स्वयं ही दुखी हुआ। यह कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गीदड होकर पैदा हुए। वह शृगाल-राजा बन शृगाल गण सहित श्मशान में
रहने लगे।
उस समय राजगृह में उत्सव था। अधिकांश मनुष्य सुरा पीते थे, वह
था ही सुरा-उत्सव। अनेक धूर्त बहुत सी सुरा और मांस ले आए, और मस्त
होकर सुरा पीने तथा मांस खाने लगे। रात्रि के पहले पहर मे ही उनका मांस
समाप्त हो गया, सुरा तो बहुत थी।
एक बोला—“मांस का टुकडा दो।”
दूसरे ने कहा—“मांस तो समाप्त हो गया।” "मेरे खडे रहते कही मांस
समाप्त हो सकता है ?" 'यह उसने सोचा कि कच्चे श्मशान में मृत मनुष्यो को
खाने के लिए आए हुए शृगालो को मारकर मांस लाऊँगा। वह एक मोगरी ले
नाली के रास्ते शहर से निकल श्मशान म जा मोगरी सहित मृतक की तरह
सीधा ही लेट रहा।
१४३. विरोचन जातक
११० [ १.१५.१४३
१४३. विरोचन जातक
“लसी च ते निष्फलता...” इसे शास्ता ने वेळुवन में रहते समय
देवदत्त के गयाशीर्ष¹ पर सुगत (तथागत) की नकल करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जब देवदत्त का ध्यान (-बल) जाता रहा और उसको लोगों से जो प्राप्ति
होती थी वह बन्द हो गई तथा लोगों ने उसका सत्कार करना छोड़ दिया तो
उसने सोचकर एक उपाय निकाला। उसने बुद्ध से पाँच बातों² की याचना
की, जिन्हें शास्ता ने अस्वीकार किया। तब उसने दोनों अग्रश्रावकों³ के
पाँच सौ शिष्यो को जो अभी प्रव्रजित हुए तथा धर्म विनय से सुपरिचित न थे
बहकाया और उन्हें गयाशीर्ष पर ले जाकर संघ मे भेद पैदा कर एक सीमा⁴ में
पृथक विनय-कर्म⁵ करने लगा।
शास्ता ने उन भिक्षुओं के आने का समय देख दोनो अग्रश्रावको को
भेजा। उन्हें देख देवदत्त प्रसन्न हुआ। रात को धर्मोपदेश देते समय उसने
सोचा कि मैं बुद्ध की नकल करूँगा। वह बोला—सारिपुत्र ! भिक्षु-संघ
¹ गया का ब्रह्मयोनि पर्वत ।
² पाच बातें यह हं—(१) जिन्दगी भर वन में ही रहा करें (२) जिन्दगी
भर भिक्षा मांग कर ही खाएं (३) जिन्दगी भर फेंके चीथड़ों के ही चीवर
पहनें (४) जिन्दगी भर पेड़ के नीचे ही रहें (५) जिन्दगी भर मछली मास
न खाएं (चुल्लवग्ग, द्वितीय भाणवार)।
³ सारिपुत्र और मौद्गल्यायन ।
⁴ सीमित-प्रवेश ।
⁵ साधिक कर्म ।
विरोचन ] १११
आलस्य रहित हैं। तुम भिक्षु-गण को कुछ धर्मोपदेश करो। मेरी पीठ में
दर्द होता है। मैं इसे जरा तानूँगा।
इतना कह देवदत्त सो गया।
दोनो अग्रश्रावक उन भिक्षुओं को धर्मोपदेश दे (आर्य-) मार्ग और फल¹
के प्रति उनका ध्यान जागृत कर सभी को वेणुवन साथ ले गए।
कोकालिक ने जब देखा कि विहार खाली हो गया तब वह देवदत्त के पास
गया और बोला—"आयुष्मान् देवदत्त ! तेरे अनुयायियों में भेद पैदा कर
अग्रश्रावक तेरा विहार खाली कर चले गए। तू पड़ा सो ही रहा है।" उसने
उसकी चादर हटा दीवार में कील ठोकने की तरह उसकी छाती में एड़ी से
एक ठोकर लगाई। उसी समय उसके मुंह से खून गिर पड़ा। उसके बाद से
वह रोगी हो गया।
शास्ता ने स्थविर से पूछा—सारिपुत्र ! तुम्हारे जाने के समय देवदत्त
ने क्या किया ?
"भन्ते ! हमें देखकर देवदत्त ने सोचा कि बुद्ध की तरह व्यवहार करूँगा।
बुद्ध की नकल करता हुआ वह विनाश को प्राप्त हुआ।"
"सारिपुत्र ! देवदत्त केवल अभी मेरी नकल करने जाकर विनाश को
प्राप्त नहीं हुआ, पहले भी हुआ है।" इतना कह पूर्व-जन्म की
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
केसरी (सिंह) होकर पैदा हुए और हिमालय की कञ्चनगुफा में रहने लगे।
एक दिन वे कञ्चनगुफा से निकल जम्भाई ले, चारो दिशाओं की ओर
नजर उठा, सिंहनाद कर शिकार के लिए निकले। उन्होंने एक बड़े भारी भैंसे
को मारा। उसका मांस खाया। फिर एक तालाब में उतर मणि-वर्ण जल
की डोल पूर्ण करते हुए की तरह गुफा की ओर प्रस्थान किया।
¹ श्रोतापत्ति मार्ग आदि चार आर्य-मार्गों के चार फल।
११२ [ १-१५ १४३ ।
शिकार के लिए निकले एक गीदड ने उन्ह एकाएक देखा । जब वह भाग
न सका तो यह केसरी के पैरो में जाकर गिर पडा ।
"जम्बुक ! क्या बात है ?"
"स्वामी ! मै आपके चरणो की सेवा करना चाहता हूँ।"
"अच्छा, आ मेरी सेवा कर । में तुझे अच्छे अच्छे मास खिलाऊँगा ।"
वह जम्बुक को कञ्चनगुफा में ले गया ।
गीदड तब से सिंह का मारा हुआ मास ही खाता रहा । कुछ ही दिन में
वह मोटा हो गया ।
एक दिन गुफा मे पडे ही पडे उसे केसरी ने कहा-"जम्बुक ! जा, पर्वत
की चोटी पर चढकर पर्वत के नीचे घूमनेवाले हाथी, घोडे तथा भैंसे आदि में से
जिस किसी का मास खाना चाहे, आकर मुझसे कह कि मै अमुक पशु का मास
खाना चाहता हूँ । ओर मुझे प्रणाम कर यह भी कह कि 'हे स्वामी ! अपना
पराक्रम दिखाएँ ।' में उसे मार, उसका मास खा, तुझे भी दूँगा ।"
गीदड पर्वत की चोटी पर चढ नाना प्रकार के पशुओ को देख जिसका
भी मास खाना चाहता कञ्चनगुफा में आकर सिंह से निवेदन कर उसके पाँव
में गिरकर कहता-स्वामी ! अपना पराक्रम प्रकट करें । सिंह जल्दी से
छलांग मारकर चाहे मस्त हाथी ही होता उसकी हत्या कर उसका मास स्वय
खाता ओर शृगाल को भी देता । गीदड पेट भर कर मास खा, गुफा में जा
सो रहता ।
इस प्रकार ज्यो ज्यो समय व्यतीत हुआ उसके दिल में अभिमान पैदा हो
गया । मेरे भी तो चार पैर है । मै क्यो रोज रोज दूसरे पर निर्भर रहता
हूँ । अब से मै भी हाथी आदि को मारकर मास खाऊँगा । सिंह भी 'हे मृगराज !
स्वामी ! अपना पराक्रम दिखाएँ' कहने पर ही हाथियो को मारता है, मै भी
सिंह से यह कहलवाऊँगा कि 'हे जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा' और एक
बडिया हाथी को मार उसका मास खाऊँगा ।
उसने शेर से कहा-स्वामी ! मैने बहुत देर तक आपके मारे हुए हाथियो
का मास खाया । मै भी एक हाथी को मारकर उसका मास खाना चाहता हूँ ।
जिस जगह आप कञ्चनगुफा में लेटते है, मै वहाँ लेट रहूँगा । आप पर्वत के
नीचे घूमनेवाले हाथी को देख मेरे पास आकर कहें 'जम्बुक ! अपना पराक्रम
विरोचन ] ११३
दिया।' इतनी सी बात के लिए अनुदार न हो।
सिंह ने कहा—जम्बुक ! तेरी सामर्थ्य हाथी मारने की नहीं है।
गीदड-कुल में पैदा होकर कोई गीदड हाथी को मारकर उसका मास खा सके,
ऐसा गीदड दुनिया में नहीं है। तू ऐसी इच्छा मत कर। मेरे द्वारा मारे जाने
वाले हाथियो का मास खाकर ही रह।
ऐसा कहने पर भी वह नहीं माना। बार बार कहता ही रहा।
सिंह ने जब देखा कि वह नहीं मानता तो स्वीकार कर कहा—अच्छा !
तो मेरी रहने की जगह पर जाकर लेट रह। जम्बुक को कञ्चनगुफा में लिटा
पर्वत की चोटी पर चढ मस्त हाथी को देख गुफा के द्वार पर जाकर कहा—
जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा।
श्रृगाल कञ्चनगुफा से निकला, जम्हाई ली, चारो ओर देखकर तीन
बार आवाज की। फिर मस्त हाथी के सिर पर आक्रमण करने जाकर उसके
पाँव में गिरा। हाथी ने दाहिना पाँव उठाकर उसके सिरपर रख दिया।
सिर की हड्डियाँ चूर चूर हो गईं।
उसके शरीर को हाथी ने पाँव से इकट्ठा किया, और उस पर लीद करके
चिंघाड़ता हुआ जगल मे चला गया।
बोधिसत्त्व ने यह हाल देख, 'जम्बुक ! अब अपना पराक्रम दिखा'
कह, यह गाथा कही—
लसी च ते निष्फलिता मत्थको च विदाळितो,
सब्बा ते फासुका भग्गा अज्ज खो त्वं विरोचसि ॥
[तेरे सिर का भेजा निकल गया है। मस्तक फट गया है। तेरी सभी
हड्डियाँ टूट गई हैं। आज तू अपना पराक्रम दिखा रहा है।]
लसी का मतलब है माथे का भेजा। निष्फलिता, निकल आई।
बोधिसत्त्व ने यह गाथा कही। जब तक जीवन था तब तक जीवित रह •
कर्मानुसार (परलोक) सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय गीदड देवदत्त था। सिंह मैं ही था।
८
१४४. नङ्गुट्ठ जातक
११४
१४४. नङ्गुट्ठ जातक
"बहुम्पेत घसद्धि जातवेद..." इसे शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय आजीवको¹ के मिथ्या-व्रत के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा
उस समय जेतवन की पिछली तरफ आजीवक नाना प्रकार की मिथ्या-
तपस्याएँ करते थे । बहुत से भिक्षुओ ने उनके उकडूं-बैठना, चिमगादड़-व्रत,
काँटो पर सोना, तथा पञ्चाग्नि ताप आदि मिथ्या तपो के भेदो को देखकर भग-
वान से पूछा—भन्ते ! इस मिथ्या तप से कुछ भी उन्नति होती है ?
शास्ता ने उत्तर दिया—"भिक्षुओ, इस प्रकार के मिथ्या तप से न कल्याण
ही होता है, न उन्नति ही होती है। पूर्व समय मे पण्डितो ने यह समझा कि
इस प्रकार के तप से कल्याण होगा या उन्नति होगी। वे जन्म दिन पर रखी
हुई अग्नि लेकर जगल गए। यहां अग्नि-पूजा आदि से कुछ भी लाभ न देख,
आग को पानी से बुझा वे कसिण अभ्यास कर अभिज्ञा तथा समापत्तियां
प्राप्त कर ब्रह्मलोक गामी हुए।" इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। उनके पैदा होने के दिन माता पिता ने जन्म-
अग्नि लेकर रक्खी। सोलह वर्ष की आयु होने पर वे बोले—
'पुत्र ! तेरे जन्म के दिन हमने आग रक्खी है। यदि गृहस्थ होना चाहता
¹ नग्न-साधुओ का एक सम्प्रदाय।
नङ्गुट्ठ] ११५
है तो तीनो वेद सीख। यदि ब्रह्मलोक जाना चाहता है तो आग लेकर जगल
चला जा, वहाँ अग्नि की पूजा करते हुए महाब्रह्मा को प्रसन्न कर ब्रह्मलोक गामी
होना।"
उसने कहा, मुझे गृहस्थी से काम नहीं। यह आग ले जगल में प्रवेश कर,
वहाँ आश्रम बना अग्नि-पूजा करता हुआ अरण्य में रहने लगा।
उसे एक दिन किसी प्रत्यन्त-ग्राम से दक्षिणा में एक बैल मिला। उस बैल..
को आश्रम पर लेजाकर उसने सोचा—अग्नि-भगवान को गो-मास खिलाऊँगा।
तभी उसे ख्याल आया—यहाँ नमक नहीं है। अग्नि भगवान् बिना नमक के
खा न सकेंगे। गाँव से नमक लाकर अग्नि-भगवान को नमक सहित खिलाऊँगा।
वह बैल को वैसे ही बांध नमक लेने के लिए गाँव गया। उसके जाने पर,
बहुत से शिकारी वहाँ आए। उन्होंने बैल को देख उसे मार डाला और उसका
मास पका खाकर उसकी पोछ, जाँघ तथा चर्म वही छोड़कर शेष मास लेकर
चले गए।
ब्राह्मण ने लौटकर जब केवल पूँछ आदि को देखा तो सोचने लगा—यह
अग्नि भगवान् अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी तो क्या रक्षा
करेंगे ? यह अग्नि-पूजा निरर्थक है। इससे कल्याण या उन्नति नहीं है।
'उसका मन अग्नि-पूजा की ओर से उदासीन हो गया। वह बोला—'भो '
अग्नि-भगवान् ! तुम अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी क्या.
रक्षा करोगे ? मास तो नही है, इतने से ही सन्तुष्ट होओ।' यह कह पूँछ
आदि को आग में फेंकते हुए यह गाथा कही—
बहुम्पेतं असब्भि ! जातवेद ! यं तं वालधिनाभिपूजयाम,
मंसारहस्स नत्थञ्ज मंसं नङ्गुट्ठम्पि भवं पटिग्गहातु ॥
[ हे असत्पुरुष ! अग्निदेव ! यह भी बहुत समझें कि हम पूँछ से तेरी
पूजा कर रहे हैं। तुझे मास मिलना योग्य था, लेकिन मास नही है। इसलिए
आप जनाब पोछ ग्रहण करे । ]
बहुम्पेतं, इतना भी बहुत है, असब्भि, असत्पुरुष ! असाधुजानिक ।
जातवेद, अग्नि को सम्बोधन करता है। अग्नि जात होने ही पैदा होते ही अनु-
भव होती है, ज्ञात होती है, प्रकट होती है—इसलिए जातवेद कहलाती है।
११६ [ १.१५ १४५
यं तं वालधिनाभिपूजयाम, आज हम तुझे जो अपनी पास की चीज भी सु-
रक्षित नहीं रख सकता उसकी पूंछ से पूजा कर रहे हैं। यही प्रकट करता है
कि यह भी तेरे लिए बहुत कर रहे हैं। मसारहस्स, तुझे मांस चाहिए था।
आज तेरे लिए मांस यही है। सङ्गुट्ठम्पि भव परिग्गहातु, अपनी चीज को रख
सकने में असमर्थ आप यह खुरसहित जांघ का चर्म और पोंछ भी ग्रहण
कर।
इस प्रकार कह बोधिसत्व आग को पानी से बुझा ऋषि-प्रव्रज्या के अनु-
सार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर ब्रह्मलोक-परायण
हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
आग को बुझानेवाला तपस्वी उस समय मैं ही था।
१४५. राध जातक
“न त्वं राध ! विजानासि...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
हुए पूर्व-भार्या के प्रति आसक्ति के बारे में कही। वर्तमान-कथा इन्द्रिय-जातक¹
में आएगी।
शास्ता ने उस भिक्षु को बुलाकर कहा—भिक्षु स्त्रिया को बचाया नहीं
जा सकता। पहरेदार रखने से भी उनकी देखभाल नहीं हो सकती। तू भी
पहले पहरेदार रखकर भी नहीं बचा सका। अब कैसे बचा सकेगा ? इतना
कह पूर्वजन्म की कथा कही--
¹ इन्द्रिय जातक (४२३)
ख. अतीत कथा
राध ] ११७
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
तोते की योनि में पैदा हुए। काशी देश के एक ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व और उसके
छोटे भाई को पुत्र की तरह पाला। उन दोनो में से बोधिसत्त्व का नाम
हुआ पोट्ठपाद, दूसरे का राध।
हाँ, उस ब्राह्मण की ब्राह्मणी अनाचारिणी थी, दुःशीला। वह व्यापार
के लिए जाने लगा तो दोनो भाइयो से बोला—तात ! यदि माता ब्राह्मणी
अनाचार करे, तो उसे रोकना। बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—तात !
अच्छा ! यदि रोक सकेगे रोकेगे नही रोक सकेगे तो चुप रहेंगे।
इस प्रकार ब्राह्मण ब्राह्मणी को तोतों को सौंपकर व्यापार करने गया।
उसके जाने के दिन से ब्राह्मणी ने अनाचार करना आरम्भ किया।
(घर में) प्रवेश करनेवालो की और बाहर निकलने वालो की गिनती नहीं रही।
उसकी करतूत देख राध ने बोधिसत्त्व से कहा—"भाई ! हमारा पिता हमें
कह गया था कि यदि माता अनाचार करे तो उसे रोकना। अब वह अनाचार
कर रही है। हम उसे रोकें।" बोधिसत्त्व ने कहा—तात ! तू अपनी बे-
समझी के कारण, मूर्खता के कारण, ऐसा कह रहा है। स्त्रियो को उठाए लेकर
फिरा जाए, तब भी उनकी देखभाल नही हो सकती। जो काम किया नहीं जा
सकता, उसे न करना चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—
न त्व राध ! विजानासि अड्ढरत्ते अनागते,
अव्यायतं विलपसि विरत्ता कोसियायने ॥
[राध ! तू नहीं जानता। अभी आधी रात भी नहीं हुई। न जानने
के कारण ही तू बकवास करता है। उसका (अपने पति की ओर से) मुँह
मुड़ा है।]
न त्व राध ! विजानासि अड्ढरत्ते अनागते, तात ! राध ! तू नहीं
जानता, आधी रात न होने पर ही पहले पहर में ही इतने आदमी आए। अब
कौन जानता है कि और कितने आदमी आएँगे ? अव्यायतं विलपसि, तू व्यर्थ
बकवास करता है। विरत्ता कोसियायने, माता कोसियायनि ब्राह्मणी का दिल
विरक्त है। हमारे पिता के प्रति प्रेम नहीं है। यदि उसका उसमें प्रेम या स्नेह
होता तो इस प्रकार अनाचार न करती। इन शब्दो से इस बात को प्रकट
किया।
इस प्रकार कह राध को ब्राह्मणी के साथ बोलने नहीं दिया।
यह भी जब तक ब्राह्मण नहीं आया तब तक यथारुचि अनाचार करती रही।
ब्राह्मण ने लौटकर पोट्ठपाद से पूछा—तात ! तेरी माँ कैसी है ? बोधिसत्त्व
ने ब्राह्मण को जो जो हुआ सब कह दिया। फिर कहा—"तात ! इस प्रकार
की दुश्चरिता से तुम्हें क्या प्रयोजन ? माता का दोष प्रकट करने के बाद से
अब हम यहाँ नहीं रह सकते।" वह ब्राह्मण के पाँव में गिरकर राध के सहित
उड़कर जगल चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्य प्रकाशित किए। सत्यों
का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न भिक्षु श्रोतापत्ति फल म प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मण और ब्राह्मणी यही दो जने थे। राध आनन्द था। पोट्ठपाद
मैं ही था।
१४६. काक जातक
"अपि नु हनूका सन्ता..." यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय
बहुत से वृद्ध भिक्षुओं के बारे म कही।
क. वर्तमान कथा
वे गृहस्थ होने के समय श्रावस्ती के धनी परिवार के थे। एक दूसरे के
मित्र थे। परस्पर मिलकर पुण्य करते थे। बुद्ध का उपदेश सुनकर उन्होंने
काक ] ११६
सोचा कि हम बूढे हुए। हमें गृहस्थी से क्या लाभ ? शास्ता के पास रमणीय
बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो हम दुख का अन्त करें ।
वे अपनी सारी जायदाद लडके लडकियो को दे, रोते हुए रिश्तेदारो को
छोड शास्ता से प्रव्रज्या की याचना कर प्रव्रजित हुए। लेकिन प्रव्रजित होने
पर प्रव्रज्या के अनुकूल श्रमण धर्म की पूर्ति नही की। बूढे होने से धर्म भी नही
सीख सके। गृहस्थ रहने के समय की तरह प्रव्रजित होने पर भी विहार के
एक कोने मे पर्ण-शाला बनवाकर उसमें इकट्ठे ही रहते थे। भिक्षा माँगने के
लिए भी प्राय और कही न जाकर अपने लडके लडकियो के घर जाकर
वही खाते थे।
उनमे से एक की पहली भार्या सभी वृद्ध भिक्षुओ का उपकार करनेवाली
थी। इसलिए बाकी जनो को जो भिक्षा मिलती उसे लेकर भी उसी के
घर जा बैठकर खाते। वह भी उनको जो सूप व्यञ्जन तैयार होता देती ।
किसी बीमारी से वह मर गई।
वह वृद्ध स्थविर विहार जाकर एक दूसरे के गले मिल विहार के आसपास
यह कहते हुए रोने लगे—"जिसके हाथो मे मधुर-रस था, वह उपासिका
मर गई।" उनकी आवाज सुनकर इधर-उधर से भिक्षुओ ने आकर
पूछा—"आयुष्मानो ! क्यो रो रहे हो ?" वे बोले—"हमारे मित्र की पहली
भार्या मर गई है। उसके हाथ में मधुर रस था। वह हमारा बहुत उप-
कार करने वाली थी। अब वैसी स्त्री कहाँ मिलेगी ? इसी वजह से रो
रहे है।"
उनको विलाप करते देख भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—
"आयुष्मानो ! इस कारण से वृद्ध स्थविर एक दूसरे के गले में हाथ डाल
रोते हुए घूम रहे हैं।"
शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—' भिक्षुओ, यह केवल अभी उसके
मरने पर रोते हुए नही घूम रहे हैं। पहले भी इन्होने इसके कौए की योनि में
पैदा हो समुद्र में मरने पर सोचा कि समुद्र का पानी उलीचकर इसे निकाल
लाएंगे । ये परिश्रम करते हुए (कठिनाई से) पण्डितो द्वारा जीवित बचाए
गए।"—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
[ १.१५.१४६
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
दृ-देवता होकर पैदा हुए।
एक कौवा अपनी कौवी को लेकर चोगा खोजता हुआ समुद्र के किनारे
। उस समय मनुष्य समुद्र तट पर दूध की खीर, मत्स्य-मांस तथा सुरा
द से नाग को बलि चढ़ा चले गए थे। कौवे ने बलि की जगह पहुँच, खीर
द देख कौवी के साथ दूध-खीर, मत्स्य-मांस आदि खाकर बहुत सी सुरा
ली। सुरापान से वे दोनो नशे में मस्त हो गए। उन्होने सोचा कि समुद्र-
डा करें। इस उद्देश्य से वह किनारे पर बैठकर स्नान करने लगे। एक लहर
ई और कौवी को समुद्र में बहा ले गई। उसे एक मच्छ मांस खाकर निगल
ा। कौवा रोने पीटने लगा—मेरी भार्या मर गई।
उसके रोने पीटने की आवाज सुन बहुत से कौवे इकट्ठे होकर पूछने लगे—
रोते हो ? किनारे पर नहाती हुई मेरी भार्या को लहर ले गई। वे
एक स्वर से रोने लग गए।
उनको यह ख्याल हुआ कि हमारे सामने इस समुद्र-जल की क्या सामर्थ्य
? हम पानी को उलीचकर समुद्र को खाली कर अपनी सहायिका को निकाल
। वे मुँह भर भरकर पानी बाहर छोड़ने लगे। निमक के पानी से गला
वने पर वह स्थल पर जाकर विश्राम लेते।
जब उनकी दाढें थक गईं, मुख सूख गए, आँखें लाल पड गईं तो उन्होने
न दुखी होकर एक दूसरे को सम्बोधन कर कहा—“भो ! हम तो समुद्र से
नी लाकर बाहर गिराते हैं; लेकिन जिस जिस जगह से पानी लाते हैं वह
र पानी से भर जाती है। हम समुद्र को खाली न कर सकेंगे।” इतना कह,
ह गाया यही—
अपि नु हनुका सन्ता मुखञ्च परिशुस्सति,
घोरमाम न पारेम पूरतेव महोदधि ॥
[हमारी दाढ़ें थक गई और मुंह सूखता है। हम प्रयत्न करते हैं, लेकिन
र नहीं पाते। महासमुद्र भरता ही जाता है।]
पुप्फरत्त ] १२१
अपि नु हनुका सन्ता, हमारी दाढ़ थक गई। ओरमाम न पारेम, हम अपना
बल लगाकर समुद्र का पानी निकाल बाहर करना चाहते हैं, लेकिन हम खाली
नहीं कर सकते, यह पूरतेव महोदधि ।
इस प्रकार कहते हुए वे सभी कौए रोने लगे—उस कौवी की ऐसी चोच
थी ! ऐसी गोल गोल आँखें थीं ! ऐसा सुन्दर आकार-प्रकार था ! ऐसा
मधुर शब्द था ! वह इस घोर समुद्र के कारण नष्ट हो गई ।
उन्हे इस प्रकार विलाप करते देख समुद्र-देवता ने भयानक रूप दिखाकर
भगाया । इस प्रकार उनका कल्याण हुआ ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कौवी
यह पूर्व की भार्या थी । कौवा बूढा स्थविर था । बाकी कौवे अन्य बूढे स्थविर
थे । समुद्र-देवता तो मैं ही था ।
१४७. पुप्फरत्त जातक
“नयिद दुक्खं अदु दुक्खं...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक उद्विग्न-चित्त भिक्षु के बारे में कही ।
क. वर्तमान कथा
भगवान् ने उससे पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उद्विग्न चित्त है ?
वह बोला—हाँ, सचमुच । “तुझे किसने उत्तजित किया ?” पूछने पर उसने
कहा—“मेरी पहली भार्या ने । भन्ते ! उस स्त्री के हाथ में मधुर रस है।
मैं उसके बिना नही रह सकता ।”
शास्ता ने कहा—‘भिक्षु ! यह तेरा अनर्थ करनेवाली है। तू इसके
कारण पहले भी सूली पर चढ़ाया गया। इसी के कारण रोता हुआ मरकर
पूर्व-जन्म की कथा कही ।
१२२ [ १.१५ १४७
तू नरक मे पैदा हुआ । अब फिर तू उसे ही क्यो चाहता है ?” इतना कह
पूर्व-जन्म की कथा कही ।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
आकाश-स्थित देवता हुए ।
वाराणसी में कार्तिक मास की रात्रि का उत्सव हुआ । नगर देवनगर की
तरह सजाया गया । सब लोग उत्सव मनाने में मस्त थे ।
एक दरिद्र आदमी के पास केवल एक ही मोटे कपड़े का जोड़ा था । उसने
उसे अच्छी तरह धुलवाकर स्त्री कराके उसमें सैकडो, हजारो चुनन देकर
रक्खा था ।
उसकी भार्या बोली—“स्वामी ! मेरी इच्छा है कि केसर के रंग का
एक वस्त्र पहन तेरे गले से लग कार्तिक रात्रि के उत्सव में विचरूँ ।”
स्वामी बोला—“भद्रे ! हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ से आएगा ?
शुद्ध वस्त्र पहन कर खेल ।”
“केसर रंग न मिलने पर उत्सव न खेलूँगी । तू दूसरी स्त्री लेकर खेल ।”
“भद्रे ! मुझे क्यो कष्ट देती है ? हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ ?”
“स्वामी ! पुरुष की इच्छा हो तो क्या नही है ? क्या राजा के केसर-
बाग में बहुत केसर नही है ?”
“भद्रे ! वह स्थान राक्षसो से सुरक्षित तालाब की तरह बहुत बलवान
आदमियो से सुरक्षित है । वहाँ नही जा सकता । तू उसकी इच्छा मत कर ।
जो है उसी से सन्तुष्ट रह ।”
“स्वामी ! रात को अन्धकार होने पर क्या कोई ऐसी जगह है जहाँ आदमी
नही जा सकता ।”
उसके बार बार कहने से आसक्ति होने के कारण उसने उसकी बात स्वीकार
कर कहा—“अच्छा, भद्रे ! चिन्ता मत कर ।”
इस प्रकार उसे आश्वासन दे, रात को, जीवन का मोह छोड़ नगर से निकल
राजा के केसर-बाग पर जा वहाँ बाड को तोड़ बाग में दाखिल हुआ । पहरे-
दारो ने बाड के शब्द को सुन ‘चोर है’ समझ घेर कर पकड़ लिया । फिर गसी
पुप्फरत्त ] १२३
दे, पीट, बांधकर दिन होने पर राजा के पास ले गए । राजा ने आज्ञा दी—
जाओ इसे सूली पर चढ़ा दो ।
वे उसकी बाहो को पीछे बांध बध्य-भेरी के बजते हुए उसे नगर से बाहर
ले गए और वहाँ सूली पर चढ़ा दिया । बड़ी वेदना हुई । कौवे सिर पर बैठ
कर बर्छी की नोक सदृश चोंच से उसकी आँखें निकालने लगे । वैसे कष्ट को भी
भूलकर वह यही सोचता रहा—'ओह ! मैं घने पुष्प के रंग से रंगे वस्त्र पहने,
गले मे दोनो हाथ डाले उस स्त्री के साथ कार्तिक रात्रि के उत्सव में न घूम सका ।"
इस प्रकार चिन्ता करते हुए यह गाथा कही—
नयिदं दुक्खं अदु दुक्खं यं मं तुदति वायसो,
यं सामा पुप्फरत्तेन कत्तिकं नानुभोस्सति ॥
[ न मैं इसे ही दुःख समझता हूँ, न उसे ही जो कि कौआ मुझे ठोगे मारता
है । मुझे दुःख है तो यह है कि मेरी श्यामा फूल के रंगे वस्त्र से कार्तिक के उत्सव
का आनन्द न ले सकेगी । ]
नयिद दुक्खं अदु दुक्खं य मं तुदति वायसो, यह जो सूली पर चढ़ने का
शारीरिक और मानसिक दुःख है और यह जो लोहे जैसी चोंच से कौआ मुझे
ठोगे मारता है, यह सब मेरे लिए दुःख नहीं है । केवल वही दुःख मेरे लिए
दुःख है । कौनसा ? यं सामा पुप्फ रत्तेन कत्तिक नानुभोस्सति, जो वह प्रियङ्गु
श्यामा मेरी भार्य्या एक केसरी वस्त्र पहन, एक ओढ, इस प्रकार घने रंगीन लाल
वस्त्र जोड़े को धारण कर मुझे गल लगा कार्तिक रात्रि के उत्सव का आनन्द
न ले सकेगी । यही मेरा दुःख है । यही मुझे कष्ट देता है ।
यह इस प्रकार उस स्त्री के बारे में विलाप करता हुआ ही मरकर नरक में
पैदा हुआ ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के
पति पत्नी इस समय के पति-पत्नी । उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला आकाश-
देवता मै ही था ।
१४८. सिगाल जातक
१२४ [ १.१५ १४८
१४८. सिगाल जातक
“नाह पुन न च पुन...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कामुकता का निग्रह करने के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में पाँच सौ महाधनवान्, सेठो के पुत्र, जिनकी परस्पर मित्रता
थी शास्ता का धर्मोपदेश सुन शासन में दिल से प्रव्रजित हो जेतवन के उस हिस्से
में रहने लगे जिसमें अनाथपिण्डिक ने कार्षापण बिछवाए थे।
एक दिन आधी रात के समय उनके मन मे कामुकता का भाव पैदा हुआ।
उन्होने उद्विग्न होकर एक बार छोडे हुए कामुकता के विचार को फिर अपनाने
की सोची।
शास्ता ने आधी रात के समय अपने सर्वज्ञता रूपी ज्ञान-दण्ड-प्रदीप को
उठाकर देखा कि इस समय जेतवन के भिक्षुओ के मन में क्या विचार उत्पन्न
हो रहे हे। उन्हें पता लगा कि उन भिक्षुओ के मन में कामुकता का भाव
पैदा हुआ है।
बुद्ध अपने शिष्यो की उसी तरह रक्षा करते है जैसे एक ही पुत्रवाली स्त्री
अपने पुत्र की अथवा एक ही आँखवाला अपनी आँख की। पूर्वाह्न आदि जिस
किसी समय मे भी उनके मन में बुरे विचार आते है, वे उन्हें अधिक न बढ़ने
देकर तुरन्त निग्रह करते है। इसलिए उनके मन में ऐसा हुआ कि यह तो चक्र-
वर्ती राजा के नगर के अन्दर ही चोरो के दाखिल हो जाने जैसी बात है।
में अभी उन्हें धर्मोपदेश कर, उनके बुरे सकल्पो का निग्रह कर उन्हें अर्हत्व दूंगा।
उन्होंने सुगन्धित गन्धकुटी से निकल आयुष्मन् आनन्द स्थविर को जो कि
धर्म के खजानची थे, मधुर स्वर से बुलाया- "आनन्द !"
स्थविर “क्या आज्ञा है भन्ते !” कह प्रणाम करके खड़े हुए।
सिगाल ] १२५
"आनन्द ! करोड़ो कार्षापण फैलाए जाने की सीमा के अन्दर जितने
भिक्षु हे, उन सब को गन्धकुटी के आँगन में एकत्र कर ।"
बुद्ध ने सोचा कि यदि में केवल उन पाँच सौ भिक्षुओ को बुलवाऊँगा,
तो उनके मन में होगा कि शास्ता ने हमारे मन के बुरे विचारो को जान लिया ।
वे उद्विग्न हो जाएँगे और धर्मोपदेश ग्रहण न कर सकेंगे । इसलिए कहा कि
सभी को इकट्ठा कर ।
"अच्छा भन्ते !" कह स्थविर ने चाबी¹ ले, एक आँगन से दूसरे आँगन
घूम, सभी भिक्षुओ को गन्धकुटी के आँगन में इकट्ठा कर बुद्ध के लिए आसन
बिछाया । शास्ता बिछे हुए आसन पर पालथी मार, शरीर को सीधा रख
वैसे ही बैठे मानो शिला रूपी पृथ्वी पर सुमेरु पर्वत प्रतिष्ठित हुआ हो । बारी
बारी करके छह वर्ण की घनी बुद्ध रश्मिएँ निकल रही थी । वह रश्मियाँ भी
हाथ जितनी ऊँची हो, छत जितनी ऊँची हो, कंगूरे जितनी ऊँची हो छीज छीज
कर आकाश म बिजली की तरह फैली । ऐसा हुआ जैसे समुद्र की कोख को
क्षुब्ध करके उसमें से बाल-सूर्य्य निकला हो ।
भिक्षुसंघ भी शास्ता को प्रणाम करके बडे आदर के साथ उन्हें घेरकर इस
प्रकार बैठा जैसे शास्ता लाल कम्बल की कनात से घिरे हुए हो । बुद्ध ने
भिक्षुओ को ब्रह्मस्वर से सम्बोधन कर कहा—
'भिक्षुओ, भिक्षु को काम-भोग सम्बन्धी वितर्क, क्रोध सम्बन्धी वितर्क,
विहिंसा सम्बन्धी वितर्क—इन तीन बुरे सकल्पो को मन में जगह नही देनी
चाहिए। यदि मन में कोई बुरा विचार आ जाए तो उसे छोटा न समझना चाहिए।
बुरा विचार शत्रु की तरह होता है । शत्रु कभी छोटा नही होता । मौका मिलन
से वह नाश ही कर डालता है । इसी प्रकार थोडा सा भी बुरा विचार यदि
उसे बढने का मौका मिले तो महाविनाश कर डालता है । बुरा विचार हलाहल
विष की तरह होता है, ऐसे फोडे की तरह होता है, जिसने चमडी और रोएँ
उखाड लिए हा, विषैले साँप की तरह होता है, बिजली और आग की तरह होता
है । इससे चिमटना ठीक नही । डरते रहना चाहिए । जिस समय पैदा हो
¹ अथापुरन—दरवाजा खोलने का लकडी का कोई औजार ।
ख. अतीत कथा
१२६ [ १ १५.१४८
उसी समय ज्ञानबल से अथवा भावनाबल से उसे इस तरह त्याग देना चाहिए
जिस तरह कमल के पत्ते पर पड़ी हुई बूंद उसे छोड़ देती है। पुराने पण्डितो
ने थोड़े से भी बुरे विचार को असह्य कर उसका इस प्रकार निग्रह कर दिया कि
वह फिर पैदा न हो।" इतना कह बुद्ध ने पूर्वजन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पुराने समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
सियार की योनि में पैदा हो जगल मे नदी के किनारे बसने लगे।
एक बूढा हाथी गङ्गा के किनारे मर गया। शिकार की खोज में घूमते
हुए सियार ने हाथी के शरीर को देखकर सोचा कि मुझे बड़ा शिकार मिला है।
उसने सूंड पर जाकर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो हल की फाल पर मुंह लगा।
यहाँ कुछ खाने योग्य नहीं है, समझ उसने दाँत पर मुँह मारा। ऐसा लगा मानो
खम्भे पर मुंह लगा हो। कान पर मुँह मारा। ऐसा लगा मानो छाज के
कोने पर मुंह लगा हो। पेट पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो धान की कोठी
पर मुंह लगा हो। पैरो पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो ऊखल पर मुंह लगा हो।
पूंछ पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो मूसल पर मुंह लगा हो। यहाँ भी कुछ
खाने योग्य नहीं है, सोच कही भी कुछ मजा न आने पर उसने गुदा-मार्ग में
मुँह मारा। ऐसा लगा मानो नरम नरम पूए हो।
उसने सोचा कि अब मुझे इस शरीर में खाने योग्य कोमल जगह हाथ लग
गई। उसके बाद से वह खाता हुआ पेट के अन्दर घुस, वहाँ वृक्का, हृदय आदि
को खाकर प्यास के समय रक्त पी, लेटने की इच्छा होने पर पेट में ही फैलकर
लेटा। यह सोचने लगा कि यह हाथी का शरीर मुझे रहने का सुख देता है
इसलिए घर की तरह है, खाने की इच्छा होने पर मास की कमी नही, मुझे
किसी दूसरी जगह जाने की क्या आवश्यकता ? वह किसी दूसरी जगह न जा
हाथी के पेट में ही मास खाता हुआ रहने लगा।
जैसे जैसे समय गुजरता गया ग्रीष्म ऋतु की वायु के तथा सूर्य की किरणो
के स्पर्श से वह लाश सूखकर उसम कस कट गए । जिस द्वार से सियार ने प्रवेश
किया था, वह दरवाजा बन्द हो गया। पेट में अन्धेरा छा गया। सियार को
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
१२८ [ १.१५.१४६
तथा हि भय तज्जितो, मैं इसी बार प्रवेश करने से भी भयभीत हो गया; मरण
भय से त्रास को तथा उद्विग्नता को प्राप्त हुआ।
इतना कह और वहाँ से भाग फिर उस अथवा अन्य किसी भी हाथी के
शरीर को खड़े होकर देखा तक नहीं। उस के बाद से लोभ के वशीभूत नहीं हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला कर कहा—भिक्षुओ, अन्दर जो मैल पैदा
हो जाए उस चित्त के मैल को बढ़ने न देकर वही निग्रह करना चाहिए। इतना
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
प्रकाशन समाप्त होने पर वह पाँच सौ भिक्षु अर्हत् हो गए। शेष में से कुछ
श्रोतापन्न, कुछ सकृदागामी तथा कुछ अनागामी हुए।
उस समय सियार तो मैं ही था।
१४६. एकपण्ण जातक
“एक पण्णो अयं रुक्खो...” यह शास्ता ने वैशाली के पास महावन की
कूटागार शाला में रहते हुए वैशाली के एक दुष्ट-स्वभाव लिच्छवि-कुमार के
बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय वैशाली में गावुत गावुत¹ की दूरी पर तीन प्राकारें बनी थीं।
तीनो जगहों पर गोपुर थे, अट्टालिकाएँ थीं तथा कोठे थे। इस प्रकार अत्यन्त
शोभायमान था।
¹ गव्यूति=२ मील।
एकपण्ण ] १२६
वहां सदैव राज्य करवाते हुए रहनेवाले राजाओ की संख्या सात हजार
सात सौ सात होती थी। उतने ही उपराजा होते थे। उतने ही सेनापति।
उतने ही भण्डारी।
उन राजकुमारो में एक कुमार दुष्ट लिच्छवि कुमार कहलाता था। वह
क्रोधी था, प्रचण्ड था, कठोर था। डण्डे से छेड़े गए जहरीले सांप की तरह
क्रोध से सदैव जलता रहता था। कोई भी उसके सामने दो तीन शब्द भी
नहीं बोल सकता था। उसे न उसके माता पिता, न रिश्तेदार और न यार-दोस्त
ही समझा सके। तब उसके माता पिता ने सोचा- "यह कुमार अत्यन्त कठोर
स्वभाव का है दुस्साहसी है। सम्यक् सम्बुद्ध को छोड और कोई इसे विनयी नही
बना सकता। हो सकता है कि यह उन्ही लोगो में से हो जो बुद्ध के विनीत बनाने
से ही विनीत बनते है।" वे उसे शास्ता के पास ले गए और प्रणाम करके बोले-
भन्ते ! यह कुमार प्रचण्ड है, कठोर है, क्रोध से जलता है। इसे उपदेश दे।
शास्ता ने उस कुमार को उपदेश दिया- "कुमार ! प्राणियो के प्रति
प्रचण्ड नही होना चाहिए, दुस्साहसी नही होना चाहिए, कष्ट देने वाला नही
होना चाहिए। कठोर वाणी जिस माता ने जन्म दिया है उसको भी, पिता
को भी, पुत्र को भी, भाई वहन को भी, भार्य्या को भी, मित्र बन्धुओ को
भी अप्रिय होती है, अच्छी नही लगती। जो आदमी डसन के लिए आए
सर्प की तरह, जगल म लूटमार करने के लिए तैयार चोर की तरह, खाने
के लिए आए यक्ष की तरह उद्विग्न होता है, वह दूसरे जन्म म नरक आदि
मे पैदा होता है। इस जन्म म क्रोधी आदमी सजा धजा रहन पर भी
दुर्वर्ण ही होता है। इसका पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला भी चेहरा आग से
जल कमल के सदृश अथवा मैले कञ्चन के शीशे की तरह भोंडा हो जाता
है, देखने में बुरा लगता है। क्रोध के कारण ही प्राणी शस्त्र लेकर स्वयं अपने
को मार डालते हैं। विष खा लेते हैं। रस्सी से फांसी लटक जाते है।
प्रपात से गिर पडते हैं। इस प्रकार क्रोध के वशीभूत हो मरकर वह नरक आदि
में पैदा होते हैं। दूसरो को कष्ट देनेवाले भी इस जन्म में निन्दा को प्राप्त हो
मरन पर नरक आदि म उत्पन्न होते है। फिर जब मनुष्य होकर पैदा होते
हैं तो फोडा फोड के ही रूपद से रुककर प्राय रोगी रहते हैं। आँख की बीमारी
तथा कान की बीमारी आदि रोगो में एक से उठने पर दूसरी बीमारी में फँस
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