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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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[ १.१५.१४६
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
दृ-देवता होकर पैदा हुए।
एक कौवा अपनी कौवी को लेकर चोगा खोजता हुआ समुद्र के किनारे
। उस समय मनुष्य समुद्र तट पर दूध की खीर, मत्स्य-मांस तथा सुरा
द से नाग को बलि चढ़ा चले गए थे। कौवे ने बलि की जगह पहुँच, खीर
द देख कौवी के साथ दूध-खीर, मत्स्य-मांस आदि खाकर बहुत सी सुरा
ली। सुरापान से वे दोनो नशे में मस्त हो गए। उन्होने सोचा कि समुद्र-
डा करें। इस उद्देश्य से वह किनारे पर बैठकर स्नान करने लगे। एक लहर
ई और कौवी को समुद्र में बहा ले गई। उसे एक मच्छ मांस खाकर निगल
ा। कौवा रोने पीटने लगा—मेरी भार्या मर गई।
उसके रोने पीटने की आवाज सुन बहुत से कौवे इकट्ठे होकर पूछने लगे—
रोते हो ? किनारे पर नहाती हुई मेरी भार्या को लहर ले गई। वे
एक स्वर से रोने लग गए।
उनको यह ख्याल हुआ कि हमारे सामने इस समुद्र-जल की क्या सामर्थ्य
? हम पानी को उलीचकर समुद्र को खाली कर अपनी सहायिका को निकाल
। वे मुँह भर भरकर पानी बाहर छोड़ने लगे। निमक के पानी से गला
वने पर वह स्थल पर जाकर विश्राम लेते।
जब उनकी दाढें थक गईं, मुख सूख गए, आँखें लाल पड गईं तो उन्होने
न दुखी होकर एक दूसरे को सम्बोधन कर कहा—“भो ! हम तो समुद्र से
नी लाकर बाहर गिराते हैं; लेकिन जिस जिस जगह से पानी लाते हैं वह
र पानी से भर जाती है। हम समुद्र को खाली न कर सकेंगे।” इतना कह,
ह गाया यही—
अपि नु हनुका सन्ता मुखञ्च परिशुस्सति,
घोरमाम न पारेम पूरतेव महोदधि ॥
[हमारी दाढ़ें थक गई और मुंह सूखता है। हम प्रयत्न करते हैं, लेकिन
र नहीं पाते। महासमुद्र भरता ही जाता है।]