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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पञ्चगरुक ] ८१
इस प्रकार उस सूत्र को अन्त तक कहने के समय धर्म-सभा में एकत्र हुए
भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो, सम्यक् सम्बुद्ध के पास मारकन्याएँ
सैंकड़ों प्रकार के दिव्य रूप बनाकर लुभाने के लिए आईं। लेकिन उन्होंने
आँख खोलकर भी नहीं देखा। अहो ! बुद्ध-बल अद्भुत है। शास्ता ने आकर
पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर
शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, इस समय मेरे सभी आश्रवों को नष्ट कर सर्वज्ञता
प्राप्त किए रहने पर मार कन्याओं के न देखने में कुछ भी आश्चर्य नहीं है।
पूर्व समय में बुद्धत्व प्राप्ति की खोज में लगे हुए रहने पर चित्त मैल के
रहते हुए भी निर्मित दिव्य रूप को आँख उघाड़कर कामुक भाव से न
देख, जाकर महाराज्य प्राप्त किया था। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सौ
भाइयों में सबसे छोटे थे। सारी कथा उपरोक्त तक्कसिला जातक¹ के अनुसार
विस्तारपूर्वक कहनी चाहिए।
उस समय तक्षशिला नगर निवासियो ने नगर के बाहर शाला में (बैठे
हुए) बोधिसत्त्व के पास जा, स्वीकृति ले उन्हें राज्य का भार सौंप अभिषेक
किया। फिर उन्होंने नगर को देवनगर की तरह तथा राजभवन को इन्द्रभवन
की तरह अलंकृत किया।
उस समय बोधिसत्त्व नगर में प्रविष्ट हो राजभवन के महल के ऊँचे तल
पर श्वेत छत्र के नीचे श्रेष्ठ रतन सिंहासन पर चढ़ देवेन्द्र की तरह बैठे।
अमात्य, ब्राह्मण गृहपति आदि तथा सभी अलंकारों से अलंकृत क्षत्रियकुमार
उसे घेर कर खड़े थे। देव अप्सराओं के समान नृत्य-गीत तथा वाद्य में
कुशल, उत्तम हाव भाव वाली सोलह हजार नर्तकियों ने गाना बजाना किया।
¹ तक्कसिला=तेलपत्त जातक (९६)
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