जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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ऐसा है यह मूर्ख। इससे क्या होगा ? अपने शिष्यो को गाथा कह, उसे खर्चा
दे विदा किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का सारांश निकाला। उस समय
मूर्ख विद्यार्थी लाळुदायि था। चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।
१२४. अम्ब जातक
“वायमेयेव पुरिसो” यह धर्मोपदेश बुद्ध ने जेतवन मे रहते समय एक
कर्त्तव्य-निष्ठ ब्राह्मण के सम्बन्ध में दिया।
क. वर्तमान कथा
वह श्रावस्ती निवासी तरुण बुद्ध शासन में बडी श्रद्धा से प्रव्रजित हो
बहुत कर्तव्य-परायण था। आचार्य्य, उपाध्याय की सेवा का कार्य्य; पीने
का पानी तथा खाद्य सामग्री आदि तैयार रखने का कार्य्य, उपोसथ घर¹ तथा
जन्ताघर² आदि साफ रखने का कार्य्य—सभी अच्छी तरह से करता। चौदह
बडे कर्तव्यो और अस्सी छोटे छोटे कर्तव्यो—सभी को पूरा करता। विहार में
झाडू लगाता। परिवेण मे झाडू लगाता। घूमने फिरने की जगह³ में झाडू
लगाता। विहार जाने के रास्ते को साफ रखता। मनुष्यों को पानी देता।
¹ जहां भिक्षु एकत्र होकर उपोसथ करते हैं।
² अग्नि-शाला, जिसमें आग तापकर पसीना बहाया जाता है।
³ सिंहल प्रति में 'जिक्कम-मालक' का 'वित्कममालक' है; जो अशुद्ध
प्रतीत होता है।