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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

बब्बु ] ६१
य लद्ध तेन तुट्ठव्व अतिलोभो हि पापको,
हंसराज गहेत्वान सुवण्णा परिहायथ ॥
[ जो मिले उससे संतुष्ट रहना चाहिए। अतिलोभ करना पाप है।
हंसराज को पकड़कर स्वर्ण से हाथ धोया । ]
तुट्ठव्वं का मतलब है संतोष करना चाहिए।
इतना कह शास्ता ने अनेक प्रकार से निन्दा कर नियम बना दिया कि
जो भिक्षुणी लहसुन खाए उसे पाचित्तिय (-दोष) लगे ।¹
फिर जातक का मेल बैठाया। उस समय की ब्राह्मणी यह थुल्लनन्दा
हुई। तीन लड़कियाँ इस समय की तीन बहनें। स्वर्ण-राजहंस तो मैं ही था।
१३७. बब्बु जातक
“प्रत्येको लभते बब्बु...”, शास्ता ने इसे जेतवन में विहार करते समय
काणमाता के शिक्षा-पद² के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में अपनी कानी लड़की के कारण काण माता कहलाने वाली
एक श्रोतापन्न आर्य-श्राविका थी। उसने अपनी कानी लड़की को एक गामड़े
¹ भिक्खुणी-पातिमोक्ख ।
² पाचित्तिय के भोजन-वर्ग का चौथा शिक्षापद ।