सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

२३६. बक जातक

४२० [ २६.२३६
२३६. बक जातक
“भद्दको वतयं पक्खी..” ” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते हुए एक
ढोगी के बारे मे कही।
उसे लाए जाने पर शास्ता ने देखकर कहा-भिक्षुओ, यह न केवल
अभी ढोगी है, यह पहले भी ढोगी रहा है। और पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय प्रदेश के एक तालाब मे बडे परिवार सहित मच्छ होकर रहते थे।
मच्छो को खाने की इच्छा से एक बगुला तालाब के पास सिर गिरा कर तथा
पंखो को पसार कर मछलियो की प्रमादावस्था को धीरे धीरे देखता हुआ
खडा था। उसी समय मच्छो के समूह से घिरे हुए बोधिसत्त्व शिकार पकडते
पकडते वहाँ पहुँचे। मच्छो के गण ने उस बगुले को देख पहली गाया कही-
भद्दको वतय पक्खी द्विजो कुमुदसन्निभो,
वूपसन्तेहि पक्खेहि मन्द ऽमन्दोव झायति ॥
[ कुमुद सदृश यह पक्षी बहुत अच्छा है। शान्त परो से यह शनै. शनै
ध्यान करता है।]
मन्दमन्दोव झायति असक्त की तरह से, कुछ न जानता हुआ सा अकेला
ही ध्यान करता है।
उसे देख बोधिसत्त्व ने दूसरी गाया कही-

साकेत ] ४२१
नास्स सीलं विजानाय अनञ्ञाय पसंसय,
अम्हे द्विजो न पालेति तेन पक्खी न फन्दति ॥
[इसके स्वभाव को नहीं जानते। बिना जाने प्रशंसा करते हो। यह
पक्षी हमारी रक्षा नहीं करता। इसीलिए पर नहीं फड़फड़ाता।]
अनञ्ञाय—न जानकर। अम्हे द्विजो न पालेति यह पक्षी हमारी
रक्षा नहीं करता, हमें नहीं सँभालता। यह सोचता है कि मैं इनमें से किसे
खाऊँगा। तेन पक्खी न फन्दति इसीसे पक्षी न फड़फड़ाता है, न चलता है।
ऐसा कहने पर मच्छों के समूह ने पानी में क्षोभ पैदा करके बगुले को
भगा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बगुला
(यह) ढोंगी था। मच्छराज तो मैं ही था।
२३७. साकेत जातक
"को नु खो भगवा हेतु . '" यह शास्ता ने साकेत के समीप विहार
करते समय साकेत ब्राह्मण के बारे म कही।
अतीत कथा और वर्तमान कथा भी एकक निपात (पहले परिच्छेद)
की पूर्वोक्त साकेत जातक¹ में आ ही चुकी है। हाँ, तथागत के विहार जाने पर
भिक्षुओं ने पूछा—भन्ते ! यह स्नेह कैसे स्थापित हो जाता है ? यह पूछते
हुए उन्होंने पहली गाथा कही—
¹साकेत जातक (१.७ ६८)

४२२ [ २.६.२३७
को नु खो भगवा हेतु एकच्चं इध पुग्गले,
अतीव हृदयं निब्बाति चित्तञ्चापि पसीदति ॥
[ भगवान् ! इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी के प्रति हृदय
अति ठण्डा हो जाता है और चित्त प्रसन्न हो जाता है । ]
अर्थ—इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी को देखते ही हृदय
अति ठण्डा हो जाता है, सुगन्धित शीतल जल के हजारो घड़ो से सींचे हुए
की तरह शीतल हो जाता है; किसी के प्रति नही होता ? किसी को देखते ही
चित्त प्रसन्न हो जाता है, कोमल पड जाता है, प्रेम से जुड जाता है, किसीसे
नही जुडता ?
शास्ता ने उन्हें प्रेम का कारण बताते हुए दूसरी गाथा कही—
पुब्बेव सन्निवासेन पच्चुप्पन्नहितेन वा,
एव तं जायते पेमं उप्पलंव यथोदके ॥
[ पूर्व जन्म के सम्बन्ध से वा इस जन्म के उपकार से प्रेम पैदा होता है
जैसे जल में कमल । ]
भिक्षुओ, प्रेम इन दो कारणो से ही पैदा होता है। पूर्व जन्म में चाहे
माता, चाहे पिता, चाहे पुत्री, चाहे पुत्र, चाहे भाई, चाहे बहिन, चाहे पति, चाहे
भार्या, चाहे सहायक, चाहे मित्र होकर जो कोई जिस किसी के साथ एक
स्थान मे रहता है उससे इस पुब्बेव सन्निवासेन वा दूसरे जन्म में भी वह स्नेह
नही छूटता । इस जन्म मे किए गए पच्चुप्पन्नहितेन वा एवं तं जायते पेमं ।
इन दो कारणो से प्रेम पैदा होता है। जैसे क्या ? उप्पलंव यथोदके 'व' का
ह्रस्व कर दिया। समुच्चय अर्थ मे ही इस का प्रयोग है। इसलिए उत्पल
तथा जल मे पैदा होने वाले शेष जितने भी पुष्प है ये दो ही कारणो से पैदा
होते हैं—जल से और गारे से। उसी प्रकार इन दो ही कारणो से प्रेम पैदा
होता है।