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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

साकेत ] ४२१
नास्स सीलं विजानाय अनञ्ञाय पसंसय,
अम्हे द्विजो न पालेति तेन पक्खी न फन्दति ॥
[इसके स्वभाव को नहीं जानते। बिना जाने प्रशंसा करते हो। यह
पक्षी हमारी रक्षा नहीं करता। इसीलिए पर नहीं फड़फड़ाता।]
अनञ्ञाय—न जानकर। अम्हे द्विजो न पालेति यह पक्षी हमारी
रक्षा नहीं करता, हमें नहीं सँभालता। यह सोचता है कि मैं इनमें से किसे
खाऊँगा। तेन पक्खी न फन्दति इसीसे पक्षी न फड़फड़ाता है, न चलता है।
ऐसा कहने पर मच्छों के समूह ने पानी में क्षोभ पैदा करके बगुले को
भगा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बगुला
(यह) ढोंगी था। मच्छराज तो मैं ही था।
२३७. साकेत जातक
"को नु खो भगवा हेतु . '" यह शास्ता ने साकेत के समीप विहार
करते समय साकेत ब्राह्मण के बारे म कही।
अतीत कथा और वर्तमान कथा भी एकक निपात (पहले परिच्छेद)
की पूर्वोक्त साकेत जातक¹ में आ ही चुकी है। हाँ, तथागत के विहार जाने पर
भिक्षुओं ने पूछा—भन्ते ! यह स्नेह कैसे स्थापित हो जाता है ? यह पूछते
हुए उन्होंने पहली गाथा कही—
¹साकेत जातक (१.७ ६८)