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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१६५. पब्बतूपत्थर जातक

पब्बतूपत्थर ] २८६
१६५. पब्बतूपत्थर जातक
' "पब्बतूपत्थरे रम्मे. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कोशल राजा के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कोशल राजा के एक अमात्य ने रनिवास को दूषित किया। राजा ने
खोज करके उसे ठीक ठीक जान शास्ता को निवेदन करने की इच्छा से जेतवन
जा, शास्ता को प्रणाम कर पूछा- भन्ते ! हमारे रनिवास को एक अमात्य
ने दूषित किया है। उसको क्या करना चाहिए ?" शास्ता ने पूछा-"महा-
राज ! वह अमात्य उपकारी है ? वह स्त्री प्रिया है ?"
"हाँ भन्ते ! बहुत उपकारी है। सारे राजकुल को सँभालता है। वह
स्त्री भी मेरी प्रिया है।
"महाराज ! अपने उपकारी सेवकों के प्रति तथा प्रिया स्त्री के प्रति
बुरा व्यवहार नही किया जा सकता। पूर्व समय में भी राजा लोग पण्डितो
की बात सुन उपेक्षावान् हो गए थे।"
उनके याचना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही-
ख. अतीत कथा
: पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
अमात्यकुल में पैदा हो बड होने पर उस राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए।
उस राजा के एक अमात्य ने रनिवास दूषित किया। राजा ने उसका ठीक ठीक
पता लगा सोचा-अमात्य भी मेरा बहुत उपकारी है। वह स्त्री भी प्रिया
है। मैं इन दोनो को नष्ट नहीं कर सकता। पण्डित-अमात्य से प्रश्न पूछकर
१६

२६० [ २.५.१६५
यदि सहन करने योग्य होगा तो सहन कर लूंगा; नही सहन करने योग्य होगा
तो नही सहन करूँगा।" उसने बोधिसत्त्व को बुला, आसन दे पूछा—
"पण्डित ! प्रश्न पूछता हूँ।"
"महाराज ! पूछें, उत्तर दूँगा।"
राजा ने प्रश्न पूछते हुए यह पहली गाथा कही—
पब्बतूपत्थरे रम्मे जाता पोक्खरणी सिवा
तं सिगालो अपापासि जानं सीहेन रक्खितं ॥
[ पर्वत के रम्य दामन में सुन्दर पुष्करिणी रही। यह जानते हुए भी कि
इसे सिंह ने अपने लिए सुरक्षित रखा है, उसमें शृगाल ने पानी पिया। ]
पब्बतूपत्थरे हिमालय पर्वत के दामन में फैले हुए आँगन में जाता पोक्ख-
रणी सिवा, शीतल, मधुर जल वाली पुष्करिणी पैदा हुई। कमल से ढकी
हुई नदी भी पुष्करिणी ही। अपापासि, अप उपसर्ग है अपासि अर्थ है। जानं
सीहेन रक्खितं यह पुष्करिणी सिंह के परिभोग की है, सिंह के द्वारा रक्षित
है; उस शृगाल ने यह जानने हुए ही कि यह सिंह द्वारा रक्षित है जल पिया !
तू क्या समझता है ? शृगाल सिंह का भय न मान कर इस प्रकार की पुष्करिणी
से जल पिए ?
बोधिसत्त्व ने यह समझ कर कि निश्चय से इसके रनिवास को किसी
अमात्य ने दूषित किया होगा, दूसरी गाथा कही—
पिपन्ति वे महाराज ! सापदानि महानदिं
न तेन अनदी होति खमस्सु यदि ते पिया ॥
[ महाराज ! महानदी पर सभी प्राणी जल पीते हैं। उससे नदी अनदी
नही होती। यदि वह प्रिया है, तो क्षमा करें। ]
सापदानि न केवल गीदड ही किन्तु चीते, कुत्ते, खरगोश, बिल्ले, हिरन
आदि सभी प्राणी कमल से ढकी हुई होने के कारण पुष्करिणी कहलाने वाली

धासाहस्स ] २६१
नदी पर पानी पीते ही हैं। न तेन अनदी होति नदी पर दो पैरो वाले, चार
पैरो वाले, साँप-मत्स्य आदि सभी प्यासे पानी पीते हैं। उससे वह न अनदी
होती है, न जूठी। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। जिस प्रकार नदी
जिस किसी के पानी पीने से दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्री भी कामुकता के
वशीभूत हो अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे से सहवास करने से अनिस्त्री
नहीं होती। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। न हि स्त्री जूठी होता
है। क्यों? जल-स्नान से शुद्ध हो सकने के कारण। खमस्सु यदि ते पिया, यदि
वह स्त्री तुझे प्रिया है तथा वह अमात्य बहुत उपकारी है; उन दोनों को क्षमा
कर। उपेक्षावान् हो।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया। राजा ने उसका उप-
देश मान 'फिर ऐसा पापकर्म न करना' कह दोनों को क्षमा किया। उसके
बाद से वह विरत रहे।
राजा भी दानादि पुण्य कर्म करते हुए मरने पर स्वर्ग सिधारे। कागल
नरेश भी यह धर्मदेशना सुन उन दोनों को क्षमा कर उपेक्षावान् हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था।
१६६. वालाहस्स जातक
"ये न काहन्ति ओवाद..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय.एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा- "क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?" "सच-
मुच" कहने पर पूछा-किस कारण से उत्कण्ठित है ? उसने उत्तर दिया-

२६२
“एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता का भाव उत्पन्न हो जाने के कारण
शास्ता ने कहा—“भिक्षु ! स्त्रियां अपने रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श र
हासविलास से पुरुषो को आसक्त कर, जब उन्हें अपने वश में हुआ सम
हैं, तो उनका शील और धन नष्ट कर डालती हैं। इसीसे यह यक्षिणियां
लाती हैं। पहले भी यक्षिणियो ने स्त्रियो के हासविलास से एक काफले के
जा, व्यापारियो को आकृष्ट कर, अपने वशीभूत कर, फिर दूसरे आदमियो
देख पहले के सब आदमियो को मार डाला। और दोनो दाढो से रक्त बः
हुए, उन्हें मुरमुरे की तरह खा डाला।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में ताम्रपर्णी द्वीप में सिरीसवत्थु नाम का यक्षो का नगर थ
जहाँ यक्षिणियां रहती थी । जिन व्यापारियो की नौकाएँ टूट जाती, उ
आने पर वे सजसजा कर खाद्य भोज्य लिवा, दासियो से घिरी हुई तथा
में बच्चो को उठाए व्यापारियो के पास जाती । उन पर यह प्रगट करने
लिए कि वे मनुष्य-निवास से आए है, जहाँ तहाँ कृषि, गोरक्षा आदि क
हुए आदमी, गौएँ कुत्ते आदि दिखाती। व्यापारियो के पास जाकर कहती-
यह यवागू पीएँ । भोजन करें । खाद्य खाएँ। व्यापारी न जानने के का
उनका दिया खा लेते ।
उनके खा-पीकर विश्राम करने के समय उनसे कुशल क्षेम पूछती—“
कहाँ के रहने वाले हे ? कहाँ से आए हैं ? कहाँ जाएँगे ? यहाँ किस का
से आए ?” वे कहते कि नौका टूट जाने के कारण इधर आये। तब वे कहती-
“आर्यो ! अच्छा ! हमारे स्वामियो को भी नौका पर चढ कर गए
वर्ष हो गए। वे मर गए होगे। आप लोग भी व्यापारी ही है। हम आप
चरण-सेविकाएँ होकर रहेगी।”
इस प्रकार वे उन व्यापारियो को स्त्रियो के हासविलास से आसक्त
यक्ष-नगर ले जाती। यदि पहले से पकडे हुए आदमी (अभी जीवित) हो
तो उन्हें जादू की जंजीर से बाँध कारा-गृह में डाल देती। जब उन्हें अ
निवास-स्थान पर ऐसे आदमी जिनकी नौकाएँ टूट गई हो, न मिलते तो उ

यालाहस्स ] २६३
कल्याणि (नदी) और इधर नाग द्वीप—इन दोनो के बीच में समुद्र तट पर
घूमती। यही उनका स्वभाव था।
एक दिन पाँच सौ ऐसे व्यापारी जिनकी नौकाएँ टूट गई थी, उनके नगर
के पास उतरे। वे उनके पास गईं और उन्हें लुभा कर यक्ष-नगर ला पहले
जिन आदमियो को पकड़ा था, उन्हे जादू की ज़जीर में बांध कारा-गृह में
डाल दिया। ज्येष्ठ यक्षिणी ने ज्येष्ठ व्यापारी को शेष यक्षिणियो ने शेष
व्यापारियो को, इस प्रकार उन पाँच सौ यक्षिणियो ने पाँच सौ व्यापारियो को
अपना पति बनाया।
वह ज्येष्ठ यक्षिणी रात को जिस समय व्यापारी सोए रहते उठ कर जा
कारा-गृह मे आदमियो को मार उनका मास खाकर आती। बाकी भी उसी
तरह करती। ज्येष्ठ यक्षिणी जिस समय मनुष्य-मास खाकर लौटती उसका
शरीर ठंडा होता। ज्येष्ठ व्यापारी ने उसका स्पर्श किया तो उसे पता लगा
'कि यह यक्षिणी है। उसने सोचा यह पाँच सौ भी यक्षिणियां ही होगी। हमें
भागना चाहिए।
अगले दिन प्रात काल ही मुंह धोने जाकर उसने बाकी व्यापारियो को
कहा—"यह मानवी नही है। यह यक्षिणियां है। दूसरे नौका-टूटे व्यापारियो
के आने पर उन्हें स्वामी बना हमें खा डालेंगी। हम यहाँ से भागें।"
उनमें से ढाई सौ बोले—"हम इन्हे नही छोड़ सकते। तुम जाओ।
'हम नही भागगे।"
ज्येष्ठ व्यापारी अपनी बात मानने वाले ढाई सौ जनो को ले उनसे डर
कर भाग गया।
उस समय बोधिसत्त्व बादल-अश्व की योनि में पैदा हुए थे। सारा रग
श्वेत । सिर कौए जैस। बाल मूंज के से। ऋद्धिमान। आकाशचारी।
वह हिमालय से आकाश में चढ कर ताम्रपर्णी द्वीप जा वहाँ ताम्रपर्णी तालाव
के कीचड मे अपने से उगे हुए धान खाकर लौटता। इस प्रकार जाते हुए वह
दया से प्रेरित हो तीन बार मानुषी-वाणी बोलता—"कोई जनपद जाने वाला
है ? कोई जनपद जाते वाला है?"
उन्होने उसकी बात सुन, पास जा हाथ जोड कर कहा—"स्वामी ! हम
नपद जाएँग।'
४

२६४ [ २.५.१६६

"तो मेरी पीठ पर चढो।"
कुछ चढे। कुछ ने पूँछ पकड़ी। कुछ हाथ जोडे खडे ही रहे। बोधिसत्व
अपने प्रताप से सभी ढाई सौ व्यापारियो को, जो हाथ जोडे खडे थे उन तक को
जनपद ले गए। वहाँ उन्हे उन उनके स्थान पर पहुँचा स्वय अपने निवास-
स्थान को गए। वह यक्षिणियाँ भी औरो के आने पर उन ढाई सौ व्यापारियो
को जो पीछे रह गए थे मार कर खा गईं।
शास्ता ने भिक्षुओ को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, जैसे उन यक्षि-
णियो के वशीभूत हुए व्यापारी विनाश को प्राप्त हुए। बादल अश्व-राज
का कहना मानने वाले अपने अपने स्थान पर पहुँच गए। इसी प्रकार बुद्धों
के उपदेश के अनुसार न चलने वाले भिक्षु, भिक्षुणियों तथा उपासक और
उपासिकाएँ भी चारों नरको तथा पाँच प्रकार के बन्धन, दण्ड आदि से महान्
दुःख को प्राप्त होते हैं। उपदेश मानने वाले तीन कुल-सम्पत्तियों,¹ छ काम-
स्वर्ग तथा बीस ब्रह्मलोको को प्राप्त हो, अमृत महानिर्वाण को साक्षात कर
महान् सुख का अनुभव करते हैं।" अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही—
ये न काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित,
व्यसन ते गमिस्सन्ति रक्खसीहिव वाणिजा ॥१॥
ये च काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित,
सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति वालाहेनेव वाणिजा ॥२॥
[ जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार आचरण नही करते थे उसी तरह दुःख
को प्राप्त होते हैं जैसे राक्षसियो द्वारा व्यापारी। जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार
चलते हैं वे उसी तरह सकुशल पार पहुँच जाते हैं जैसे बादल (के अश्व) की
सहायता से व्यापारी।]
ये न काहन्ति जो नहीं करेगे। व्यसन ते गमिस्सन्ति, वे महान् दुःख को
प्राप्त होगे। रक्खसीहीव वाणिजा राक्षसिंयो द्वारा लुभाए गए व्यापारियो
की तरह। सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति बिना किसी विघ्न के निर्वाण को प्राप्त


¹ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य।