सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१४१. गोध जातक (२)

पहला परिच्छेद
१५. कक्कटक वर्ग
१४१. गोध जातक (२)
"न पापजनससेवी..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
विपक्षी भिक्षु की संगत करने वाले भिक्षु के बारे में कही। वर्तमान कथा
महिलामुख जातक¹ की कथा के ही समान है।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व गोह
के रूप में पैदा हुए। बडे होने पर वह नदी के किनारे एक बडे बिल में सैकडो
गोहो के साथ रहने लगे।
उनके पुत्र गोह-पिल्ले की एक गिरगिट के साथ दोस्ती हो गई। वह उसके
साथ आनन्द मनाता और गले लगाने के लिए उस पर आ पडता।
उस गिरगिट के साथ उसकी दोस्ती की बात गोहराज से कही गई।
गोहराज ने पुत्र को बुलाकर कहा—
"तात ! तू अनुचित स्थान में विश्वास कर रहा है। गिरगिट की जाति
नीच होती है। उनका विश्वास नही करना चाहिए। यदि तू उसका विश्वास
करेगा, तो तेरे और गिरगिट के कारण यह सारा गोह-कुल विनाश को प्राप्त
होगा। अब से इसके साथ दोस्ती मत रख।" उसने दोस्ती नही ही
छोडी।
¹महिलामुख जातक (२६)

१०६ [ १.१५ १४१
जब बोधिसत्त्व के बार बार कहने से भी उनकी मित्रता जैसी की तैसी रही,
तब बोधिसत्त्व ने सोचा कि इस गिरगिट के कारण हमको अवश्य खतरा होगा ।
खतरे के समय के लिए भागने का मार्ग तैयार होना चाहिए । उसने एक तरफ
हवा आने का रास्ता बनवा लिया ।
बोधिसत्त्व का पुत्र भी शनै शनै बडे शरीर वाला हुआ, गिरगिट पहले
ही जितना रहा । वह समय समय पर उसका आलिङ्गन करने के लिए गिरगिट
पर आ पडता । गिरगिट को ऐसा मालूम देता कि मानो उस पर पर्वत आ
पडा है । उसने कष्ट पाते हुए सोचा कि यदि यह और कुछ दिन इस प्रकार मेरा
आलिङ्गन करता रहा तो मैं जीवित नही रहूँगा । इसलिए किसी शिकारी
के साथ मिलकर इस गोह-कुल को ही नष्ट करवाऊँ ।
एक दिन ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने पर बांबी से मक्खियाँ निकलीं । जहाँ
तहाँ से गोह निकलकर मक्खियो को खाने लगे । एक गोह-शिकारी गोह के
बिल को फाडने के लिए कुदाल और कुत्ते साथ में ले जगल में घूम रहा था ।
गिरगिट ने उसे देखकर सोचा कि आज अपना मनोरथ पूरा करूँगा ? उसने
पास आ, थोडी दूर पर ठहर पूछा—हे ! पुरुष ! जगल में क्यो घूम रहे हो ?"
उसन कहा—गोहो के लिए । गिरगिट बोला—"मै कई सौ गोहो का निवास-
स्थान जानता हूँ । आप आग और पुआल लेकर आएँ ।" उसे वहाँ ले जाकर
कहा, "यहाँ पुआल रख, आग लगाकर धुआँ करें। चारो तरफ कुत्तों को बिठाएँ।
अपने आप मुद्गर लेकर बैठें । जो जो गोह निकले उन्हें मार मारकर ढेर लगाएँ
फिर स्वय एक जगह पर सिर उठाकर पड रहा—आज शत्रु की पीठ¹ देखने
को मिलेगी ।
शिकारी ने पुआल का धुआँ किया । धुआँ बिल में घुसा । गोह जब
धुएँ से अधे हुए तब मृत्यु भय से भयभीत हो भागने लगे । शिकारी ने जो जो
गोह निकले उन्हें मारा । उसके हाथ से बच्चो को कुत्तो ने लिया । गोहो के
लिए महाविनाश उपस्थित हुआ ।
¹शत्रु की पीठ देखना मिलने का भावार्थ है पलायन; यहा विनाश
से तात्पर्य्य है ।

गोध ] १०७

बोधिसत्त्व को मालूम हुआ कि गिरगिट के कारण महान् खतरा पैदा हो
गया । वह सोचने लगे कि पापी का साथ नहीं ही करना चाहिए । पापी की
संगत से सुख नहीं हो सकता । एक पापी गिरगिट के कारण इतने गोह नाश
को प्राप्त हुए । इस प्रकार सोचते हुए हवा आने के बिल से भागते हुए यह बात
कही—
न पापजनससेवी अच्छन्तसुखमेधति,
गोधाकुलं कक्कटाव कलिं पापेति अत्तान ॥
[ पापी की संगत करने वाले को निरन्तर सुख कभी नही मिलता । जैसे
गिरगिट के कारण गोह-कुल नष्ट हुआ, इसी प्रकार वह अपना विनाश करता
है । ]

पापजनससेवी, (पापी की संगत करनेवाला) आदमी अच्छन्तसुख, केवल
सुख ही सुख वा निरन्तर सुख न एधति, नहीं प्राप्त करता, जैसे क्या ? गोधा
कुल ककण्टाव, जैसे गिरगिट से गोह-कुल को सुख नहीं मिला । इसी प्रकार
पापी जन की संगत करनेवाले को सुख नहीं मिलता । पापी जन की संगत करने
वाला निश्चय से कलिं पापेति अत्तान, कलि कहते हैं विनाश को, पापी जन की
संगत करने वाला निश्चयपूर्वक अपने को और अपने साथ रहने वालो को नष्ट
करता है ।
पालि में फल पापेति पाठ है । वह पाठ अट्ठकथा में नहीं है । उस अर्थ
का भी यहाँ मेल नहीं बैठता । इसलिए जैसे यहाँ कहा गया, वैसे ही ग्रहण
करना चाहिए ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
गिरगिट देवदत्त था । बोधिसत्त्व का पुत्र उपदेश न माननेवाला गोह पिल्ला
विपक्ष-सेवी भिक्षु था । गोह-राज तो मैं ही था ।