जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
११६ [ १.१५ १४५
यं तं वालधिनाभिपूजयाम, आज हम तुझे जो अपनी पास की चीज भी सु-
रक्षित नहीं रख सकता उसकी पूंछ से पूजा कर रहे हैं। यही प्रकट करता है
कि यह भी तेरे लिए बहुत कर रहे हैं। मसारहस्स, तुझे मांस चाहिए था।
आज तेरे लिए मांस यही है। सङ्गुट्ठम्पि भव परिग्गहातु, अपनी चीज को रख
सकने में असमर्थ आप यह खुरसहित जांघ का चर्म और पोंछ भी ग्रहण
कर।
इस प्रकार कह बोधिसत्व आग को पानी से बुझा ऋषि-प्रव्रज्या के अनु-
सार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर ब्रह्मलोक-परायण
हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
आग को बुझानेवाला तपस्वी उस समय मैं ही था।
१४५. राध जातक
“न त्वं राध ! विजानासि...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
हुए पूर्व-भार्या के प्रति आसक्ति के बारे में कही। वर्तमान-कथा इन्द्रिय-जातक¹
में आएगी।
शास्ता ने उस भिक्षु को बुलाकर कहा—भिक्षु स्त्रिया को बचाया नहीं
जा सकता। पहरेदार रखने से भी उनकी देखभाल नहीं हो सकती। तू भी
पहले पहरेदार रखकर भी नहीं बचा सका। अब कैसे बचा सकेगा ? इतना
कह पूर्वजन्म की कथा कही--
¹ इन्द्रिय जातक (४२३)
ख. अतीत कथा
राध ] ११७
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
तोते की योनि में पैदा हुए। काशी देश के एक ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व और उसके
छोटे भाई को पुत्र की तरह पाला। उन दोनो में से बोधिसत्त्व का नाम
हुआ पोट्ठपाद, दूसरे का राध।
हाँ, उस ब्राह्मण की ब्राह्मणी अनाचारिणी थी, दुःशीला। वह व्यापार
के लिए जाने लगा तो दोनो भाइयो से बोला—तात ! यदि माता ब्राह्मणी
अनाचार करे, तो उसे रोकना। बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—तात !
अच्छा ! यदि रोक सकेगे रोकेगे नही रोक सकेगे तो चुप रहेंगे।
इस प्रकार ब्राह्मण ब्राह्मणी को तोतों को सौंपकर व्यापार करने गया।
उसके जाने के दिन से ब्राह्मणी ने अनाचार करना आरम्भ किया।
(घर में) प्रवेश करनेवालो की और बाहर निकलने वालो की गिनती नहीं रही।
उसकी करतूत देख राध ने बोधिसत्त्व से कहा—"भाई ! हमारा पिता हमें
कह गया था कि यदि माता अनाचार करे तो उसे रोकना। अब वह अनाचार
कर रही है। हम उसे रोकें।" बोधिसत्त्व ने कहा—तात ! तू अपनी बे-
समझी के कारण, मूर्खता के कारण, ऐसा कह रहा है। स्त्रियो को उठाए लेकर
फिरा जाए, तब भी उनकी देखभाल नही हो सकती। जो काम किया नहीं जा
सकता, उसे न करना चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—
न त्व राध ! विजानासि अड्ढरत्ते अनागते,
अव्यायतं विलपसि विरत्ता कोसियायने ॥
[राध ! तू नहीं जानता। अभी आधी रात भी नहीं हुई। न जानने
के कारण ही तू बकवास करता है। उसका (अपने पति की ओर से) मुँह
मुड़ा है।]
न त्व राध ! विजानासि अड्ढरत्ते अनागते, तात ! राध ! तू नहीं
जानता, आधी रात न होने पर ही पहले पहर में ही इतने आदमी आए। अब
कौन जानता है कि और कितने आदमी आएँगे ? अव्यायतं विलपसि, तू व्यर्थ
बकवास करता है। विरत्ता कोसियायने, माता कोसियायनि ब्राह्मणी का दिल
विरक्त है। हमारे पिता के प्रति प्रेम नहीं है। यदि उसका उसमें प्रेम या स्नेह
होता तो इस प्रकार अनाचार न करती। इन शब्दो से इस बात को प्रकट
किया।
इस प्रकार कह राध को ब्राह्मणी के साथ बोलने नहीं दिया।
यह भी जब तक ब्राह्मण नहीं आया तब तक यथारुचि अनाचार करती रही।
ब्राह्मण ने लौटकर पोट्ठपाद से पूछा—तात ! तेरी माँ कैसी है ? बोधिसत्त्व
ने ब्राह्मण को जो जो हुआ सब कह दिया। फिर कहा—"तात ! इस प्रकार
की दुश्चरिता से तुम्हें क्या प्रयोजन ? माता का दोष प्रकट करने के बाद से
अब हम यहाँ नहीं रह सकते।" वह ब्राह्मण के पाँव में गिरकर राध के सहित
उड़कर जगल चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्य प्रकाशित किए। सत्यों
का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न भिक्षु श्रोतापत्ति फल म प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मण और ब्राह्मणी यही दो जने थे। राध आनन्द था। पोट्ठपाद
मैं ही था।
१४६. काक जातक
"अपि नु हनूका सन्ता..." यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय
बहुत से वृद्ध भिक्षुओं के बारे म कही।
क. वर्तमान कथा
वे गृहस्थ होने के समय श्रावस्ती के धनी परिवार के थे। एक दूसरे के
मित्र थे। परस्पर मिलकर पुण्य करते थे। बुद्ध का उपदेश सुनकर उन्होंने
काक ] ११६
सोचा कि हम बूढे हुए। हमें गृहस्थी से क्या लाभ ? शास्ता के पास रमणीय
बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो हम दुख का अन्त करें ।
वे अपनी सारी जायदाद लडके लडकियो को दे, रोते हुए रिश्तेदारो को
छोड शास्ता से प्रव्रज्या की याचना कर प्रव्रजित हुए। लेकिन प्रव्रजित होने
पर प्रव्रज्या के अनुकूल श्रमण धर्म की पूर्ति नही की। बूढे होने से धर्म भी नही
सीख सके। गृहस्थ रहने के समय की तरह प्रव्रजित होने पर भी विहार के
एक कोने मे पर्ण-शाला बनवाकर उसमें इकट्ठे ही रहते थे। भिक्षा माँगने के
लिए भी प्राय और कही न जाकर अपने लडके लडकियो के घर जाकर
वही खाते थे।
उनमे से एक की पहली भार्या सभी वृद्ध भिक्षुओ का उपकार करनेवाली
थी। इसलिए बाकी जनो को जो भिक्षा मिलती उसे लेकर भी उसी के
घर जा बैठकर खाते। वह भी उनको जो सूप व्यञ्जन तैयार होता देती ।
किसी बीमारी से वह मर गई।
वह वृद्ध स्थविर विहार जाकर एक दूसरे के गले मिल विहार के आसपास
यह कहते हुए रोने लगे—"जिसके हाथो मे मधुर-रस था, वह उपासिका
मर गई।" उनकी आवाज सुनकर इधर-उधर से भिक्षुओ ने आकर
पूछा—"आयुष्मानो ! क्यो रो रहे हो ?" वे बोले—"हमारे मित्र की पहली
भार्या मर गई है। उसके हाथ में मधुर रस था। वह हमारा बहुत उप-
कार करने वाली थी। अब वैसी स्त्री कहाँ मिलेगी ? इसी वजह से रो
रहे है।"
उनको विलाप करते देख भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—
"आयुष्मानो ! इस कारण से वृद्ध स्थविर एक दूसरे के गले में हाथ डाल
रोते हुए घूम रहे हैं।"
शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—' भिक्षुओ, यह केवल अभी उसके
मरने पर रोते हुए नही घूम रहे हैं। पहले भी इन्होने इसके कौए की योनि में
पैदा हो समुद्र में मरने पर सोचा कि समुद्र का पानी उलीचकर इसे निकाल
लाएंगे । ये परिश्रम करते हुए (कठिनाई से) पण्डितो द्वारा जीवित बचाए
गए।"—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
[ १.१५.१४६
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
दृ-देवता होकर पैदा हुए।
एक कौवा अपनी कौवी को लेकर चोगा खोजता हुआ समुद्र के किनारे
। उस समय मनुष्य समुद्र तट पर दूध की खीर, मत्स्य-मांस तथा सुरा
द से नाग को बलि चढ़ा चले गए थे। कौवे ने बलि की जगह पहुँच, खीर
द देख कौवी के साथ दूध-खीर, मत्स्य-मांस आदि खाकर बहुत सी सुरा
ली। सुरापान से वे दोनो नशे में मस्त हो गए। उन्होने सोचा कि समुद्र-
डा करें। इस उद्देश्य से वह किनारे पर बैठकर स्नान करने लगे। एक लहर
ई और कौवी को समुद्र में बहा ले गई। उसे एक मच्छ मांस खाकर निगल
ा। कौवा रोने पीटने लगा—मेरी भार्या मर गई।
उसके रोने पीटने की आवाज सुन बहुत से कौवे इकट्ठे होकर पूछने लगे—
रोते हो ? किनारे पर नहाती हुई मेरी भार्या को लहर ले गई। वे
एक स्वर से रोने लग गए।
उनको यह ख्याल हुआ कि हमारे सामने इस समुद्र-जल की क्या सामर्थ्य
? हम पानी को उलीचकर समुद्र को खाली कर अपनी सहायिका को निकाल
। वे मुँह भर भरकर पानी बाहर छोड़ने लगे। निमक के पानी से गला
वने पर वह स्थल पर जाकर विश्राम लेते।
जब उनकी दाढें थक गईं, मुख सूख गए, आँखें लाल पड गईं तो उन्होने
न दुखी होकर एक दूसरे को सम्बोधन कर कहा—“भो ! हम तो समुद्र से
नी लाकर बाहर गिराते हैं; लेकिन जिस जिस जगह से पानी लाते हैं वह
र पानी से भर जाती है। हम समुद्र को खाली न कर सकेंगे।” इतना कह,
ह गाया यही—
अपि नु हनुका सन्ता मुखञ्च परिशुस्सति,
घोरमाम न पारेम पूरतेव महोदधि ॥
[हमारी दाढ़ें थक गई और मुंह सूखता है। हम प्रयत्न करते हैं, लेकिन
र नहीं पाते। महासमुद्र भरता ही जाता है।]
पुप्फरत्त ] १२१
अपि नु हनुका सन्ता, हमारी दाढ़ थक गई। ओरमाम न पारेम, हम अपना
बल लगाकर समुद्र का पानी निकाल बाहर करना चाहते हैं, लेकिन हम खाली
नहीं कर सकते, यह पूरतेव महोदधि ।
इस प्रकार कहते हुए वे सभी कौए रोने लगे—उस कौवी की ऐसी चोच
थी ! ऐसी गोल गोल आँखें थीं ! ऐसा सुन्दर आकार-प्रकार था ! ऐसा
मधुर शब्द था ! वह इस घोर समुद्र के कारण नष्ट हो गई ।
उन्हे इस प्रकार विलाप करते देख समुद्र-देवता ने भयानक रूप दिखाकर
भगाया । इस प्रकार उनका कल्याण हुआ ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कौवी
यह पूर्व की भार्या थी । कौवा बूढा स्थविर था । बाकी कौवे अन्य बूढे स्थविर
थे । समुद्र-देवता तो मैं ही था ।
१४७. पुप्फरत्त जातक
“नयिद दुक्खं अदु दुक्खं...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक उद्विग्न-चित्त भिक्षु के बारे में कही ।
क. वर्तमान कथा
भगवान् ने उससे पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उद्विग्न चित्त है ?
वह बोला—हाँ, सचमुच । “तुझे किसने उत्तजित किया ?” पूछने पर उसने
कहा—“मेरी पहली भार्या ने । भन्ते ! उस स्त्री के हाथ में मधुर रस है।
मैं उसके बिना नही रह सकता ।”
शास्ता ने कहा—‘भिक्षु ! यह तेरा अनर्थ करनेवाली है। तू इसके
कारण पहले भी सूली पर चढ़ाया गया। इसी के कारण रोता हुआ मरकर
पूर्व-जन्म की कथा कही ।
१२२ [ १.१५ १४७
तू नरक मे पैदा हुआ । अब फिर तू उसे ही क्यो चाहता है ?” इतना कह
पूर्व-जन्म की कथा कही ।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
आकाश-स्थित देवता हुए ।
वाराणसी में कार्तिक मास की रात्रि का उत्सव हुआ । नगर देवनगर की
तरह सजाया गया । सब लोग उत्सव मनाने में मस्त थे ।
एक दरिद्र आदमी के पास केवल एक ही मोटे कपड़े का जोड़ा था । उसने
उसे अच्छी तरह धुलवाकर स्त्री कराके उसमें सैकडो, हजारो चुनन देकर
रक्खा था ।
उसकी भार्या बोली—“स्वामी ! मेरी इच्छा है कि केसर के रंग का
एक वस्त्र पहन तेरे गले से लग कार्तिक रात्रि के उत्सव में विचरूँ ।”
स्वामी बोला—“भद्रे ! हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ से आएगा ?
शुद्ध वस्त्र पहन कर खेल ।”
“केसर रंग न मिलने पर उत्सव न खेलूँगी । तू दूसरी स्त्री लेकर खेल ।”
“भद्रे ! मुझे क्यो कष्ट देती है ? हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ ?”
“स्वामी ! पुरुष की इच्छा हो तो क्या नही है ? क्या राजा के केसर-
बाग में बहुत केसर नही है ?”
“भद्रे ! वह स्थान राक्षसो से सुरक्षित तालाब की तरह बहुत बलवान
आदमियो से सुरक्षित है । वहाँ नही जा सकता । तू उसकी इच्छा मत कर ।
जो है उसी से सन्तुष्ट रह ।”
“स्वामी ! रात को अन्धकार होने पर क्या कोई ऐसी जगह है जहाँ आदमी
नही जा सकता ।”
उसके बार बार कहने से आसक्ति होने के कारण उसने उसकी बात स्वीकार
कर कहा—“अच्छा, भद्रे ! चिन्ता मत कर ।”
इस प्रकार उसे आश्वासन दे, रात को, जीवन का मोह छोड़ नगर से निकल
राजा के केसर-बाग पर जा वहाँ बाड को तोड़ बाग में दाखिल हुआ । पहरे-
दारो ने बाड के शब्द को सुन ‘चोर है’ समझ घेर कर पकड़ लिया । फिर गसी
पुप्फरत्त ] १२३
दे, पीट, बांधकर दिन होने पर राजा के पास ले गए । राजा ने आज्ञा दी—
जाओ इसे सूली पर चढ़ा दो ।
वे उसकी बाहो को पीछे बांध बध्य-भेरी के बजते हुए उसे नगर से बाहर
ले गए और वहाँ सूली पर चढ़ा दिया । बड़ी वेदना हुई । कौवे सिर पर बैठ
कर बर्छी की नोक सदृश चोंच से उसकी आँखें निकालने लगे । वैसे कष्ट को भी
भूलकर वह यही सोचता रहा—'ओह ! मैं घने पुष्प के रंग से रंगे वस्त्र पहने,
गले मे दोनो हाथ डाले उस स्त्री के साथ कार्तिक रात्रि के उत्सव में न घूम सका ।"
इस प्रकार चिन्ता करते हुए यह गाथा कही—
नयिदं दुक्खं अदु दुक्खं यं मं तुदति वायसो,
यं सामा पुप्फरत्तेन कत्तिकं नानुभोस्सति ॥
[ न मैं इसे ही दुःख समझता हूँ, न उसे ही जो कि कौआ मुझे ठोगे मारता
है । मुझे दुःख है तो यह है कि मेरी श्यामा फूल के रंगे वस्त्र से कार्तिक के उत्सव
का आनन्द न ले सकेगी । ]
नयिद दुक्खं अदु दुक्खं य मं तुदति वायसो, यह जो सूली पर चढ़ने का
शारीरिक और मानसिक दुःख है और यह जो लोहे जैसी चोंच से कौआ मुझे
ठोगे मारता है, यह सब मेरे लिए दुःख नहीं है । केवल वही दुःख मेरे लिए
दुःख है । कौनसा ? यं सामा पुप्फ रत्तेन कत्तिक नानुभोस्सति, जो वह प्रियङ्गु
श्यामा मेरी भार्य्या एक केसरी वस्त्र पहन, एक ओढ, इस प्रकार घने रंगीन लाल
वस्त्र जोड़े को धारण कर मुझे गल लगा कार्तिक रात्रि के उत्सव का आनन्द
न ले सकेगी । यही मेरा दुःख है । यही मुझे कष्ट देता है ।
यह इस प्रकार उस स्त्री के बारे में विलाप करता हुआ ही मरकर नरक में
पैदा हुआ ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के
पति पत्नी इस समय के पति-पत्नी । उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला आकाश-
देवता मै ही था ।
१४८. सिगाल जातक
१२४ [ १.१५ १४८
१४८. सिगाल जातक
“नाह पुन न च पुन...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कामुकता का निग्रह करने के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में पाँच सौ महाधनवान्, सेठो के पुत्र, जिनकी परस्पर मित्रता
थी शास्ता का धर्मोपदेश सुन शासन में दिल से प्रव्रजित हो जेतवन के उस हिस्से
में रहने लगे जिसमें अनाथपिण्डिक ने कार्षापण बिछवाए थे।
एक दिन आधी रात के समय उनके मन मे कामुकता का भाव पैदा हुआ।
उन्होने उद्विग्न होकर एक बार छोडे हुए कामुकता के विचार को फिर अपनाने
की सोची।
शास्ता ने आधी रात के समय अपने सर्वज्ञता रूपी ज्ञान-दण्ड-प्रदीप को
उठाकर देखा कि इस समय जेतवन के भिक्षुओ के मन में क्या विचार उत्पन्न
हो रहे हे। उन्हें पता लगा कि उन भिक्षुओ के मन में कामुकता का भाव
पैदा हुआ है।
बुद्ध अपने शिष्यो की उसी तरह रक्षा करते है जैसे एक ही पुत्रवाली स्त्री
अपने पुत्र की अथवा एक ही आँखवाला अपनी आँख की। पूर्वाह्न आदि जिस
किसी समय मे भी उनके मन में बुरे विचार आते है, वे उन्हें अधिक न बढ़ने
देकर तुरन्त निग्रह करते है। इसलिए उनके मन में ऐसा हुआ कि यह तो चक्र-
वर्ती राजा के नगर के अन्दर ही चोरो के दाखिल हो जाने जैसी बात है।
में अभी उन्हें धर्मोपदेश कर, उनके बुरे सकल्पो का निग्रह कर उन्हें अर्हत्व दूंगा।
उन्होंने सुगन्धित गन्धकुटी से निकल आयुष्मन् आनन्द स्थविर को जो कि
धर्म के खजानची थे, मधुर स्वर से बुलाया- "आनन्द !"
स्थविर “क्या आज्ञा है भन्ते !” कह प्रणाम करके खड़े हुए।
सिगाल ] १२५
"आनन्द ! करोड़ो कार्षापण फैलाए जाने की सीमा के अन्दर जितने
भिक्षु हे, उन सब को गन्धकुटी के आँगन में एकत्र कर ।"
बुद्ध ने सोचा कि यदि में केवल उन पाँच सौ भिक्षुओ को बुलवाऊँगा,
तो उनके मन में होगा कि शास्ता ने हमारे मन के बुरे विचारो को जान लिया ।
वे उद्विग्न हो जाएँगे और धर्मोपदेश ग्रहण न कर सकेंगे । इसलिए कहा कि
सभी को इकट्ठा कर ।
"अच्छा भन्ते !" कह स्थविर ने चाबी¹ ले, एक आँगन से दूसरे आँगन
घूम, सभी भिक्षुओ को गन्धकुटी के आँगन में इकट्ठा कर बुद्ध के लिए आसन
बिछाया । शास्ता बिछे हुए आसन पर पालथी मार, शरीर को सीधा रख
वैसे ही बैठे मानो शिला रूपी पृथ्वी पर सुमेरु पर्वत प्रतिष्ठित हुआ हो । बारी
बारी करके छह वर्ण की घनी बुद्ध रश्मिएँ निकल रही थी । वह रश्मियाँ भी
हाथ जितनी ऊँची हो, छत जितनी ऊँची हो, कंगूरे जितनी ऊँची हो छीज छीज
कर आकाश म बिजली की तरह फैली । ऐसा हुआ जैसे समुद्र की कोख को
क्षुब्ध करके उसमें से बाल-सूर्य्य निकला हो ।
भिक्षुसंघ भी शास्ता को प्रणाम करके बडे आदर के साथ उन्हें घेरकर इस
प्रकार बैठा जैसे शास्ता लाल कम्बल की कनात से घिरे हुए हो । बुद्ध ने
भिक्षुओ को ब्रह्मस्वर से सम्बोधन कर कहा—
'भिक्षुओ, भिक्षु को काम-भोग सम्बन्धी वितर्क, क्रोध सम्बन्धी वितर्क,
विहिंसा सम्बन्धी वितर्क—इन तीन बुरे सकल्पो को मन में जगह नही देनी
चाहिए। यदि मन में कोई बुरा विचार आ जाए तो उसे छोटा न समझना चाहिए।
बुरा विचार शत्रु की तरह होता है । शत्रु कभी छोटा नही होता । मौका मिलन
से वह नाश ही कर डालता है । इसी प्रकार थोडा सा भी बुरा विचार यदि
उसे बढने का मौका मिले तो महाविनाश कर डालता है । बुरा विचार हलाहल
विष की तरह होता है, ऐसे फोडे की तरह होता है, जिसने चमडी और रोएँ
उखाड लिए हा, विषैले साँप की तरह होता है, बिजली और आग की तरह होता
है । इससे चिमटना ठीक नही । डरते रहना चाहिए । जिस समय पैदा हो
¹ अथापुरन—दरवाजा खोलने का लकडी का कोई औजार ।
ख. अतीत कथा
१२६ [ १ १५.१४८
उसी समय ज्ञानबल से अथवा भावनाबल से उसे इस तरह त्याग देना चाहिए
जिस तरह कमल के पत्ते पर पड़ी हुई बूंद उसे छोड़ देती है। पुराने पण्डितो
ने थोड़े से भी बुरे विचार को असह्य कर उसका इस प्रकार निग्रह कर दिया कि
वह फिर पैदा न हो।" इतना कह बुद्ध ने पूर्वजन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पुराने समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
सियार की योनि में पैदा हो जगल मे नदी के किनारे बसने लगे।
एक बूढा हाथी गङ्गा के किनारे मर गया। शिकार की खोज में घूमते
हुए सियार ने हाथी के शरीर को देखकर सोचा कि मुझे बड़ा शिकार मिला है।
उसने सूंड पर जाकर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो हल की फाल पर मुंह लगा।
यहाँ कुछ खाने योग्य नहीं है, समझ उसने दाँत पर मुँह मारा। ऐसा लगा मानो
खम्भे पर मुंह लगा हो। कान पर मुँह मारा। ऐसा लगा मानो छाज के
कोने पर मुंह लगा हो। पेट पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो धान की कोठी
पर मुंह लगा हो। पैरो पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो ऊखल पर मुंह लगा हो।
पूंछ पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो मूसल पर मुंह लगा हो। यहाँ भी कुछ
खाने योग्य नहीं है, सोच कही भी कुछ मजा न आने पर उसने गुदा-मार्ग में
मुँह मारा। ऐसा लगा मानो नरम नरम पूए हो।
उसने सोचा कि अब मुझे इस शरीर में खाने योग्य कोमल जगह हाथ लग
गई। उसके बाद से वह खाता हुआ पेट के अन्दर घुस, वहाँ वृक्का, हृदय आदि
को खाकर प्यास के समय रक्त पी, लेटने की इच्छा होने पर पेट में ही फैलकर
लेटा। यह सोचने लगा कि यह हाथी का शरीर मुझे रहने का सुख देता है
इसलिए घर की तरह है, खाने की इच्छा होने पर मास की कमी नही, मुझे
किसी दूसरी जगह जाने की क्या आवश्यकता ? वह किसी दूसरी जगह न जा
हाथी के पेट में ही मास खाता हुआ रहने लगा।
जैसे जैसे समय गुजरता गया ग्रीष्म ऋतु की वायु के तथा सूर्य की किरणो
के स्पर्श से वह लाश सूखकर उसम कस कट गए । जिस द्वार से सियार ने प्रवेश
किया था, वह दरवाजा बन्द हो गया। पेट में अन्धेरा छा गया। सियार को
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
१२८ [ १.१५.१४६
तथा हि भय तज्जितो, मैं इसी बार प्रवेश करने से भी भयभीत हो गया; मरण
भय से त्रास को तथा उद्विग्नता को प्राप्त हुआ।
इतना कह और वहाँ से भाग फिर उस अथवा अन्य किसी भी हाथी के
शरीर को खड़े होकर देखा तक नहीं। उस के बाद से लोभ के वशीभूत नहीं हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला कर कहा—भिक्षुओ, अन्दर जो मैल पैदा
हो जाए उस चित्त के मैल को बढ़ने न देकर वही निग्रह करना चाहिए। इतना
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
प्रकाशन समाप्त होने पर वह पाँच सौ भिक्षु अर्हत् हो गए। शेष में से कुछ
श्रोतापन्न, कुछ सकृदागामी तथा कुछ अनागामी हुए।
उस समय सियार तो मैं ही था।
१४६. एकपण्ण जातक
“एक पण्णो अयं रुक्खो...” यह शास्ता ने वैशाली के पास महावन की
कूटागार शाला में रहते हुए वैशाली के एक दुष्ट-स्वभाव लिच्छवि-कुमार के
बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय वैशाली में गावुत गावुत¹ की दूरी पर तीन प्राकारें बनी थीं।
तीनो जगहों पर गोपुर थे, अट्टालिकाएँ थीं तथा कोठे थे। इस प्रकार अत्यन्त
शोभायमान था।
¹ गव्यूति=२ मील।
एकपण्ण ] १२६
वहां सदैव राज्य करवाते हुए रहनेवाले राजाओ की संख्या सात हजार
सात सौ सात होती थी। उतने ही उपराजा होते थे। उतने ही सेनापति।
उतने ही भण्डारी।
उन राजकुमारो में एक कुमार दुष्ट लिच्छवि कुमार कहलाता था। वह
क्रोधी था, प्रचण्ड था, कठोर था। डण्डे से छेड़े गए जहरीले सांप की तरह
क्रोध से सदैव जलता रहता था। कोई भी उसके सामने दो तीन शब्द भी
नहीं बोल सकता था। उसे न उसके माता पिता, न रिश्तेदार और न यार-दोस्त
ही समझा सके। तब उसके माता पिता ने सोचा- "यह कुमार अत्यन्त कठोर
स्वभाव का है दुस्साहसी है। सम्यक् सम्बुद्ध को छोड और कोई इसे विनयी नही
बना सकता। हो सकता है कि यह उन्ही लोगो में से हो जो बुद्ध के विनीत बनाने
से ही विनीत बनते है।" वे उसे शास्ता के पास ले गए और प्रणाम करके बोले-
भन्ते ! यह कुमार प्रचण्ड है, कठोर है, क्रोध से जलता है। इसे उपदेश दे।
शास्ता ने उस कुमार को उपदेश दिया- "कुमार ! प्राणियो के प्रति
प्रचण्ड नही होना चाहिए, दुस्साहसी नही होना चाहिए, कष्ट देने वाला नही
होना चाहिए। कठोर वाणी जिस माता ने जन्म दिया है उसको भी, पिता
को भी, पुत्र को भी, भाई वहन को भी, भार्य्या को भी, मित्र बन्धुओ को
भी अप्रिय होती है, अच्छी नही लगती। जो आदमी डसन के लिए आए
सर्प की तरह, जगल म लूटमार करने के लिए तैयार चोर की तरह, खाने
के लिए आए यक्ष की तरह उद्विग्न होता है, वह दूसरे जन्म म नरक आदि
मे पैदा होता है। इस जन्म म क्रोधी आदमी सजा धजा रहन पर भी
दुर्वर्ण ही होता है। इसका पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला भी चेहरा आग से
जल कमल के सदृश अथवा मैले कञ्चन के शीशे की तरह भोंडा हो जाता
है, देखने में बुरा लगता है। क्रोध के कारण ही प्राणी शस्त्र लेकर स्वयं अपने
को मार डालते हैं। विष खा लेते हैं। रस्सी से फांसी लटक जाते है।
प्रपात से गिर पडते हैं। इस प्रकार क्रोध के वशीभूत हो मरकर वह नरक आदि
में पैदा होते हैं। दूसरो को कष्ट देनेवाले भी इस जन्म में निन्दा को प्राप्त हो
मरन पर नरक आदि म उत्पन्न होते है। फिर जब मनुष्य होकर पैदा होते
हैं तो फोडा फोड के ही रूपद से रुककर प्राय रोगी रहते हैं। आँख की बीमारी
तथा कान की बीमारी आदि रोगो में एक से उठने पर दूसरी बीमारी में फँस
६
१३० [ १.१५ १४६
जाते हैं। रोग से मुक्त न हो सकने के कारण नित्य दुखी रहते हैं। इसलिए
सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना रखनी चाहिए। सभी का हित चिन्तक
होना चाहिए। सभी के प्रति कोमल चित्त वाला होना चाहिए। क्योकि इस
प्रकार का (क्रोधी) आदमी नरक आदि के भय से मुक्त नहीं होता।
वह कुमार शास्ता का एक ही उपदेश सुनकर मान-रहित हो गया, शान्त
इन्द्रिय हो गया, क्रोध-रहित हो गया, मैत्री-चित्त वाला हो गया तथा कोमल
चित्त का हो गया। उसे कोई गाली देता, मारता तो भी वह उसकी ओर रुख कर
न देखता। वह ऐसा सांप हो गया जिसके दांत उखाड़ दिए गए हों, ऐसा केकड़ा
हो गया जिसके डंक जाते रहे हों, ऐसा बैल हो गया जिसके सींग न हों।
उसका समाचार जानकर भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बातचीत चलाई—
आयुष्मानो ! दुष्ट लिच्छवि कुमार को चिर काल तक उपदेश देते रहकर भी
न माता पिता न रिश्तेदार-मित्र आदि ही उसे विनीत बना सके। सम्यक्
सम्बुद्ध ने उसे एक ही उपदेश से ऐसा कर दिया जैसे किसी मस्त हाथी को शान्त
कर दिया हो। यह ठीक ही कहा गया है—भिक्षुओ ! हाथी-दमन करने
वाला खूब हाथी को दमन करता है तो दमन किया हुआ हाथी एक ही दिशा में
दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम दिशा में, चाहे उत्तर दिशा में अथवा
दक्षिण में। भिक्षुओ, घोड़ा-दमन करनेवाला जब घोड़े को दमन करता है
तो दमन किया हुआ घोड़ा एक ही दिशा में दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे
पश्चिम में, चाहे उत्तर में, अथवा दक्षिण में। भिक्षुओ, बैल को दमन करने
वाला जब उसे दमन करता है, तो दमन किया हुआ बैल एक ही दिशा में दौड़ता
है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम में, चाह उत्तर में अथवा दक्षिण में। लेकिन
भिक्षुओ, जिसे तथागत अर्हत्सम्यक् सम्बुद्ध शिक्षित करते हैं वह आठ दिशाओं
में जाता है रूपवान् रूपों को देखता है, यह एक दिशा है • सञ्ज्ञा तथा संज्ञा
का जो निरोध है उसे प्राप्त कर विचरता है, यह आठवीं दिशा है। वह दिशाओं
में अनुपम पुरुष-दम्य-सारथि कहलाते हैं।¹ आयुष्मानो ! सम्यक् सम्बुद्ध
के समान पुरुषों का दमन करनेवाला सारथि नहीं है।
¹ मज्झिम निकाय (३)
शिक्षित किया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
एकपण्ण ] १३१
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?
'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ ! मैने इसे केवल अब
ही एक ही उपदेश से शिक्षित नही किया है, पहले भी एक ही उपदेश से
शिक्षित किया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय म वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने
उदीच्य ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर तक्षशिला मे तीनो वेद और सभी
शिल्प सीखे । फिर कुछ समय घर म रहकर माता पिता के मरने पर ऋषियो
की प्रव्रज्या के ढंग से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय
में प्रवेश किया । चिरकाल तक वहाँ रहन के बाद नमक और खटाई खाने
के लिए जनपद म आकर वाराणसी पहुँच राजा के उद्यान म रहा । फिर एक
दिन अच्छी तरह से वस्त्र पहन, आच्छादित हो, तपस्वी के रूपरग मे भिक्षा
माँगने के लिए नगर में प्रविष्ट हो राजा के आँगन में पहुँचा ।
राजा ने झरोखे से देखा तो उसकी चाल-ढाल से मन प्रसन्न हुआ । उसने
देखा कि यह तपस्वी शान्त इन्द्रिय तथा धान्त मनवाला है । चलता है तो नीची
नजर करके युग मात्र१ देखता हुआ चलता है । मालूम होता है कि कदम कदम
पर एक एक हजार की थैली रखता हुआ सिंह की तरह चला आ रहा है।
'यदि कही पर शान्त धर्म नाम की कोई चीज है तो वह इसके अन्दर अवश्य होगी'
सोच एक आमात्य की ओर देखा ।
'देव ! क्या आज्ञा है ?'
'इस तपस्वी को ले आयो ।'
वह 'देव ! अच्छा' कह बोधिसत्व के पास गया । वहाँ पहुँचकर बोधि-
सत्त्व को प्रणाम कर उनके हाथ से भिक्षा-पात्र लिया । बोधिसत्त्व ने पूछा—
“महापुण्यवान् ! क्या बात है ?”
“भन्ते ! महाराज आपको याद कर रहे हैं।”
१युग, दो हाथ तक ।
१३२ [ १.१५.१४६
“हम राजकुल में आने जाने वाले नहीं हैं, हम हिमवन्त निवासी हैं।”
आमात्य ने जाकर राजा से यह बात कही। राजा बोला—हमारे यहाँ
आने जाने वाला कोई भिक्षु नहीं है। उन्हें जाकर ले आओ।
आमात्य ने जा बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, प्रार्थना कर, साथ लिवा राज-
भवन में पहुँचाया।
राजा ने बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, श्वेत छत्र लगे हुए सोने के सिंहासन
पर बिठा, अपने लिए तैयार किए गए नाना प्रकार के भोजन खिलाकर
पूछा—'भन्ते ! कहाँ रहते हैं?'
'महाराज ! हम हिमवन्त-निवासी हैं।'
'अब कहाँ जा रहे हैं।'
'महाराज ! वर्षा-ऋतु के अनुकूल निवास स्थान की खोज है।'
'तो भन्ते ! हमारे ही उद्यान में रहें।'
उनसे स्वीकृति ले अपना भी भोजन समाप्त कर राजा बोधिसत्त्व के साथ
उद्यान गया। वहाँ पर्णशाला बनवा, उसमें रात के रहने योग्य तथा दिन में रहने
योग्य स्थान तैयार करवा, प्रव्रजितों की आवश्यकताएँ दे, उनकी सेवा आदि के
लिए उद्यानपाल को भार सौंप स्वयं नगर को लौटा। उस समय से बोधिसत्त्व
उद्यान में रहने लगे। राजा भी दिन में दो तीन बार उनकी सेवा में जाता।
उस राजा का दुष्ट कुमार नाम का पुत्र था। वह क्रोधी था, कठोर था।
न उसे राजा ही विनीत बना सका, न बाकी रिश्तेदार। आमात्यों और ब्राह्मण
गृहपतियों ने क्रुद्ध होकर इतना कहा कि 'हे स्वामी ! ऐसा न करें। ऐसा न कर
सकेंगे।' इतने से भी वह उसे कुछ न समझा सके।
राजा ने सोचा मेरे शीलवान् तपस्वी के अतिरिक्त कोई दूसरा इस कुमार
को विनीत नहीं बना सकता।
वह कुमार को बोधिसत्त्व के पास ले गया और उन्हें सौंपते हुए कहने लगा
—भन्ते ! यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव का है। हम इसे विनीत नहीं
कर सकते। आप इसे किसी ढंग से शिक्षा दें। इतना कह चला गया।
बोधिसत्त्व ने कुमार के साथ उद्यान में घूमते हुए नीम का एक पौधा देखा
जिसके एक ओर एक पत्ता, दूसरी ओर दूसरा पत्ता—इस प्रकार कुल दो पत्ते
थे। बोधिसत्त्व ने कुमार से कहा—कुमार ! इस पौधे के पत्ते खाकर इसका
एकपण्ण ] १३३
रस चखो। उसने उसका एक पत्ता मुंह में रखने ही उसका रस चख "थू"
करके जमीन पर थूका। "कुमार यह क्या ?" "भन्ते ! यह पौधा अभी
हलाहल विष के समान है, बड़े होने पर तो यह बहुत मनुष्यों की जान लेगा।"
इतना कहते हुए उसने नीम के पौधे को उखाड़कर हाथों से मल डाला और यह
गाथा कही—
एकपण्णो अय रुक्खो न भुम्या चतुरङ्गलो,
फलेन विस कप्पेन महाय किं भविस्सति ॥
[ इस पौधे का केवल एक पत्ता है और यह भूमि से चार अंगुल ऊँचा नहीं।
विष जैसे पत्तेवाला यह बड़ा होकर क्या होगा । ]
एक पण्णो, दोनों ओर एक एक पत्ता है। न भुम्या चतुरङ्गुलो, भूमि से
चार अंगुल भी ऊँचा नहीं बढ़ा है। फलेन, अर्थात् पत्ते से। विसकप्पेन, हलाहल
विष जैसे से। इतना छोटा होता हुआ भी ऐसे कड़वे फल वाला है। महायं
किं भविस्सति, जब यह वृद्धि पाकर बड़ा होगा तब कैसा होगा ? निश्चय से
मनुष्य की जान लेने वाला होगा। इसी से उखाड़ कर हाथ से मलकर फेंक
दिया—यह कहा।
तब बोधिसत्त्व ने उसे कहा—'कुमार ! तूने इस पौधे को यह सोचकर कि
यह अभी से इतना तीता है, बड़े होने पर इससे किसी की क्या उन्नति होगी,
तोड़ कर, मरोड़ कर फेंक दिया। जैसे तूने इसके प्रति बरताव किया, ठीक इसी
तरह तेरे राष्ट्र के बासी भी यह सोचेंगे कि यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव
का है, बड़ा होने पर राज्य प्राप्त करके क्या करेगा ? इससे हमारी उन्नति कहाँ
होगी ? वह तुझे राज्य न दे, नीम के पौधे की तरह उखाड़कर तुझे राष्ट्र से
निकाल देंगे। इसलिए नीम के पौधे के स्वभाव को छोड़ अब से शान्ति, मैत्री
तथा दया से युक्त हो।
उस समय से उसने अभिमान छोड़ दिया। नम्र हो गया। शान्ति, मैत्री
और दया से युक्त हो बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार आचरण कर पिता के मरने पर
राज्य प्राप्त किया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करता हुआ यथाकर्म (परलोक)
सिधारा।
लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का
१३४ [ १.१५ १५०
शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना "भिक्षुओ ! मैंने केवल अभी इस दुष्ट
लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का
मेल बैठाया ।
उस समय दुष्ट कुमार यह लिच्छवि कुमार था। राजा आनन्द था।
उपदेश देनेवाला तपस्वी मैं ही था ।
१५०. सञ्जीव जातक
“असन्तं यो पग्गण्हाति ” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
अजातशत्रु राजा द्वारा किए गए दुर्गुणी के आदर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसने बुद्धो के विरोधी, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त के प्रति श्रद्धावान् हो,
उस दुष्ट असत्पुरुष को ऊँचा स्थान दे उसका आदर करने की इच्छा से बहुत सा
धन खर्च करके गया-सीस पर एक विहार बनवा दिया। उसी की बात मान
अपने पिता को जो कि श्रोतापन्न आर्य-श्रावक था मरवा डाला । इस प्रकार
अपने श्रोतापन्न होने की सम्भावना में बाधा डाल विनाश को प्राप्त हुआ।
जब उसने सुना कि देवदत्त को जमीन निगल गई तो उसे डर हुआ कि
कहीं उसे भी जमीन न निगल जाए। भयभीत होने से उसका राज्य-सुख जाता
रहा। शय्या पर सोता तो उसे सोने में मजा न आता। तीव्र वेदना से पीडित
हाथी के बच्चे के समान वह इधर उधर विचरता । उसे ऐसा दिखाई देने लगा
जैसे पृथ्वी फट गई हो, उसमें से अवीचि-ज्वाला¹ निकल रही हो, और पृथ्वी
¹ अवीचि नरक से निकलने वाली ज्वाला ।
सञ्जीव ] १३५
उसे निगले जा रही हो, तप्त लोह शय्या पर लिटाकर लोहे की कीलें ठोकी जा
रही हो। इससे उस राजा को चोट खाए मुर्ग की तरह क्षण भर के लिए भी
शान्ति न थी, कांपता ही रहता था।
उसने सम्यक् सम्बुद्ध के दर्शन कर उनसे क्षमा माँगने की तथा शंका मिटाने
की इच्छा थी। लेकिन अपने अपराध के भार के कारण उसकी जाने की हिम्मत
न हुई।
राजगृह नगर में कात्तिकोत्सव था। नगर देवनगर की तरह अलङ्कृत था।
महल पर अमात्यगणों से घिरा राजा स्वर्ण सिंहासन पर बैठा था। उसने
देखा कि कौमारभृत्य जीवक पास ही बैठा है। उसके मन मे आया कि मै जीवक
को लेकर सम्यक् सम्बुद्ध के पास जाऊँ। लेकिन उसने साथ ही सोचा कि मैं
जीवक को सीधा तो यह नही कह सकता कि हे जीवक ! मै सम्यक् सम्बुद्ध
के पास जाना चाहता हूँ। अकेला नही जा सकता। मुझे बुद्ध के पास ले चल।
मै उसे एक ढग से कहूँगा—रात्रि के सौन्दर्य की प्रशंसा करके पूछूँगा कि आज
हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका सत्संग करने से मन प्रसन्न हो।
इसे सुन कर आमात्य अपने अपने शास्ता की प्रशंसा करेंगे। जीवक भी सम्यक्
सम्बुद्ध की प्रशंसा करेगा। तब उसे लेकर बुद्ध के पास जाऊँगा।
उसने पाँच पदो से रात्रि की प्रशंसा की—"भो ! चांदनी रात्रि लक्षण-
सम्पन्न है। भो ! चांदनी रात्रि सुन्दर है। भो ! चांदनी रात्रि दर्शनीय
है। भो ! चांदनी रात्रि मन को प्रसन्न करने वाली है। भो ! चांदनी रात्रि
रमणीय है। आज की रात हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका
सत्संग करने से चित्त प्रसन्न हो ?"
एक आमात्य ने पूरण कश्यप की प्रशंसा की। एक ने मक्खलि गोशाल
की। एक ने अजित केश कम्बल की। एक ने प्रबुध कात्यायन की। एक ने
बेलट्ठिपुत्र सञ्जय की। एक ने निर्ग्रन्थनाथपुत्र की।
राजा उनकी बातचीत सुन चुप रहा। वह महामात्य जीवक के कहने
का ही विश्वास करता था। जीवक ने भी यह सोचकर कि जब राजा मेरे प्रति
कुछ कहेगा, तभी देखूँगा मौन ही रक्खा। राजा ने पूछा—"जीवक ! तू क्यो
चुप है ?" तब जीवक ने आसन से उठ जिधर भगवान् थे उधर हाथ जोडकर
कहा—देव ! यह भगवान् अर्हंत सम्यक् सम्बुद्ध हमारे आम्रवन में रहते हैं।
१३६ [ १ १५ १५०
उनके साथ साढे बारह सौ भिक्षु हैं। उन भगवान् की इस प्रकार की कीर्ति है
कि यह अरहंत हैं ...इस प्रकार नौ तरह¹ के गुण हैं, वह और उनके जन्म के
समय से पूर्व निमित्त आदि भेद तथा भगवान् के प्रताप को प्रकाशित कर कहा
कि देव ! उन भगवान् बुद्ध का संसर्ग करें, धर्म सुनें तथा शंकाएँ मिटाएँ।
राजा का मनोरथ पूरा हुआ। वह बोला—सौम्य ! जीवक !
हाथियों को सजवाओ। हाथियो को सजवा वह राजसी ठाट-बाट से जीवक के
आम्रवन में पहुँच राजा ने देखा सुगन्धित बडे भवन में तथागत भिक्षु संघ से
घिरे बैठे है। जैसे महान् सरोवर हो, किन्तु उसकी लहरें शान्त हो, वैसे ही भिक्षु-
संघ को इधर उधर से देखकर राजा ने सोचा—ऐसी शान्त परिषद् तो मैने इससे
पहले कभी देखी ही नही। उसने भिक्षु-परिषद् के उठने-बैठने के तरीके से ही प्रसन्न
हो संघ को प्रणाम किया। फिर संघ की स्तुति करते हुए उसने भगवान् को
प्रणाम किया और एक ओर बैठकर श्रमणत्व के फल के बारे में प्रश्न किया।
भगवान् ने उसे दो भाणवारो में विस्तार करके सामञ्जफल सूत्र² का उपदेश
दिया। सूत्र का उपदेश हो चुकने पर वह प्रसन्न हो भगवान् से क्षमा माँग
आसन से उठकर चला गया।
राजा के चले जाने के थोडी ही देर बाद बुद्ध न भिक्षुओ को बुलाकर कहा—
भिक्षुओ, यह राजा जख्मी होगया समझो। भिक्षुओ, राजा को आहत हो गया
समझो। यदि यह ऐश्वर्य्य के लोभ मे पडकर अपने धार्मिक, धर्म से राज्य करने
वाले पिता को जान से न मरवाता, तो इसे इसी आसन पर रज रहित, मल-
रहित धर्म-चक्षु, उत्पन्न हो जाता। देवदत्त के कारण, दुष्ट को वडा स्थान देने
से वह श्रोतापत्ति फल को न प्राप्त कर सका।
किसी दूसरे दिन भिक्षुयो ने धर्म-सभा म बातचीत चलाई—'आयुष्मानो !
अजातशत्रु ने दुष्ट का आदर करके, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त की प्रेरणा से पितृ-
¹ इति पि सो भगवा¹, अरहं², सम्मासम्बुद्धो³, विज्जाचरणसम्पन्नो⁴, सुगतो⁵,
लोकविदू⁶, अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि⁷, सत्था देवमनुस्सान⁸, बुद्धो भगवाति॥९
² दीघ निकाय, (दूसरा सूत्र) ।