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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

क. वर्तमान कथा

दुद्दद ] २४१
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में कुटुम्ब-पुत्र परस्पर मित्रो ने चन्दा इकट्ठा करके सभी आव-
श्यक वस्तुओ से युक्त दान की तैयारी कर भिक्षुसघ को जिसके प्रमुख बुद्ध
थे, निमन्त्रित कर एक सप्ताह तक महादान दिया। १ सातवें दिन सब आव-
श्यक वस्तुएं दी।
उनमें जो मण्डली का प्रधान था उसने शास्ता को प्रणाम कर एक ओर
बैठ कर कहा—'भन्ते ! इस दान में अधिक देने वाले भी सम्मिलित हैं,
थोडा देने वाले भी सम्मिलित हैं। यह दान सभी के लिए महान् फलदायी
हो।' यह कह उसने दान दिया।
शास्ता बोले—'उपासको ! भिक्षुसघ को, जिसके प्रमुख बुद्ध हैं दान देते
हुए जो तुमने इस प्रकार दान दिया, यह महान् कर्म है। पुराने समय में
पण्डितो ने भी दान देते हुए इसी प्रकार दिया।'
उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी देश में ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा वहाँ सब
विद्याएं सीखी। फिर घर छोड, ऋपियो के ढंग से प्रव्रज्या ग्रहण कर, मण्डली
का नेता बन हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे। नमक-खटाई के लिए
वस्ती में घूमते हुए, आकर वाराणसी पहुँचे। वहाँ राजोद्यान में रह कर अगले
दिन परिषद सहित दरवाजे पर के गांव मे भिक्षाटन किया। मनुष्यो ने भिक्षा
दी। अगले दिन वाराणसी में भिक्षाटन किया। आदमियो ने श्रद्धावान् हो
भिक्षा दे, टोली बना कर चन्दा इकट्ठा कर दान की तैयारी की और ऋषिगण
को महादान दिया। दान की समाप्ति पर टोली के नेता ने इसी प्रकार कह
कर दातव्य-वस्तुओ का परित्याग किया।
१ सात दिन तक नियमित भोजन कराया।
१६

२४२ [ २.३ १८०
बोधिसत्त्व ने, "आयुष्मन्तो ! श्रद्धा होने पर दान कभी थोडा नहीं
होता" वह दानानुमोदन करते हुए यह गाथा कही—
दुद्ददं ददमानानं दुक्करं कम्मकुव्वतं
असन्तो नानुकुव्वन्ति सतं धम्मो दुरन्वयो ॥
तस्मा सतञ्च असतञ्च नाना होति इतो गति
असन्तो निरयं यन्ति सन्तो सग्गपरायणा ॥
[कठिनाई से जो दिया जा सके देने वाले, कठिनाई से जो किया जा सके
करने वाले सत्पुरुषो का धर्म दुर्ज्ञेय है, असत्पुरुष इसे नही करते । इसीलिए
सत्पुरुषो और असत्पुरुषो की गति भिन्न भिन्न होती है । सत्पुरुष स्वर्ग जाने
वाले होते हैं और असत्पुरुष नरक में ।]
दुद्ददं लोभ आदि से युक्त अपण्डित-जन दान नहीं दे सकते। इसलिए
दान को कठिनाई से दिया जा सकने योग्य कहा। उसे ददमानानं। दुक्करं
कम्मकुव्वतं उसी दान कर्म को सब नहीं कर सकते, इसलिए उस दुष्कर कर्म
को करने वाले। दुरन्वयो फल-सम्बन्ध की दृष्टि से दुर्ज्ञेय—इस प्रकार के
दान का इस प्रकार का फल होता है, यह जानना कठिन है, और भी दुरन्वयो
कठिनाई से प्राप्य, मूर्ख जन दान देकर भी दान का फल नहीं प्राप्त कर सकते।
नाना होति इतो गति यहाँ से च्युत होकर परलोक जाने वालो को नाना प्रकार
से जन्म ग्रहण करने होते हैं। असन्तो निरयं यन्ति, मूर्ख, दुश्शील लोग दान न
दे, तथा सदाचार की रक्षा न कर नरक को जाते हैं। सन्तो सग्गपरायणा,
पण्डित लोग दान देकर, शील की रक्षा कर, उपोसथ-व्रत रख, तीनो प्रकार
के सुचरित्र¹ पूरे कर स्वर्गगामी होते हैं। महान् स्वर्ग-सुख सम्पत्ति का आनन्द
लूटते हैं।
¹काय, वाक् तथा वाणी के शुभ कर्म।