जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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बोधिसत्त्व ने, "आयुष्मन्तो ! श्रद्धा होने पर दान कभी थोडा नहीं
होता" वह दानानुमोदन करते हुए यह गाथा कही—
दुद्ददं ददमानानं दुक्करं कम्मकुव्वतं
असन्तो नानुकुव्वन्ति सतं धम्मो दुरन्वयो ॥
तस्मा सतञ्च असतञ्च नाना होति इतो गति
असन्तो निरयं यन्ति सन्तो सग्गपरायणा ॥
[कठिनाई से जो दिया जा सके देने वाले, कठिनाई से जो किया जा सके
करने वाले सत्पुरुषो का धर्म दुर्ज्ञेय है, असत्पुरुष इसे नही करते । इसीलिए
सत्पुरुषो और असत्पुरुषो की गति भिन्न भिन्न होती है । सत्पुरुष स्वर्ग जाने
वाले होते हैं और असत्पुरुष नरक में ।]
दुद्ददं लोभ आदि से युक्त अपण्डित-जन दान नहीं दे सकते। इसलिए
दान को कठिनाई से दिया जा सकने योग्य कहा। उसे ददमानानं। दुक्करं
कम्मकुव्वतं उसी दान कर्म को सब नहीं कर सकते, इसलिए उस दुष्कर कर्म
को करने वाले। दुरन्वयो फल-सम्बन्ध की दृष्टि से दुर्ज्ञेय—इस प्रकार के
दान का इस प्रकार का फल होता है, यह जानना कठिन है, और भी दुरन्वयो
कठिनाई से प्राप्य, मूर्ख जन दान देकर भी दान का फल नहीं प्राप्त कर सकते।
नाना होति इतो गति यहाँ से च्युत होकर परलोक जाने वालो को नाना प्रकार
से जन्म ग्रहण करने होते हैं। असन्तो निरयं यन्ति, मूर्ख, दुश्शील लोग दान न
दे, तथा सदाचार की रक्षा न कर नरक को जाते हैं। सन्तो सग्गपरायणा,
पण्डित लोग दान देकर, शील की रक्षा कर, उपोसथ-व्रत रख, तीनो प्रकार
के सुचरित्र¹ पूरे कर स्वर्गगामी होते हैं। महान् स्वर्ग-सुख सम्पत्ति का आनन्द
लूटते हैं।
¹काय, वाक् तथा वाणी के शुभ कर्म।