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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

क. वर्तमान कथा

३५० [ २७ २१५
क. वर्तमान कथा
यह कथा महातक्कारि¹ जातक में आएगी। उस समय शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, कोकालिक केवल अभी अपनी वाणी से नही मारा गया, पहले भी
मारा गया। यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
'पूर्व काल, में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व अमात्य-
कुल में पैदा हो, बडे होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए। वह राजा बहुत
बोलने वाला था। वह बोलता तो दूसरो को बोलने का मौका न मिलता।
बोधिसत्त्व उसकी वाचालता हटाने का कोई उपाय सोचते हुए घूमते थे।
उस समय हिमालय-प्रदेश के किसी तालाब में एक कछुआ रहता था।
दो हस-बच्चो ने शिकार के लिए घूमते हुए उससे दोस्ती कर ली। उसके
प्रति दृढ-विश्वासी हो एक दिन हस-बच्चो ने कछुवे से कहा—दोस्त कछुवे !
हमारे हिमवन्त में चित्रकूट पर्वत के नीचे कञ्चन गुफा में रहने का रमणीक
स्थान है। हमारे साथ चलेगा ?
"मै कैसे चलूंगा ?"
"हम तुझे लेकर चलेंगे, यदि तू अपने मुंह पर काबू रख सकेगा, किसी को
कुछ न कहेगा।"
"स्वामी ! काबू रखूंगा। मुझे लेकर चलें।'
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। एक लकडी को कछुवे के मुंह म
दे, उसके दोनो सिरो को अपने मुंह में ले वे आकाश में उडे। उसे इस प्रकार
हसो द्वारा लिए जाते देख गांव के लडको ने कहा—दो हस कछुवे को डडे पर
लिए जाते हैं।
हसो की गति तेज होने के कारण वे बाराणसी नगर के राजमहल के
ऊपर आ पहुँचे थे। कछुवे ने "दुष्ट चेटको ! यदि मेरे मित्र मुझे ले जाते है
¹ महातक्कारि जातक (४८१)

[Header] कच्छप ] ३५१

तो इसमें तुम्हारा क्या ?'' कहने की इच्छा से उस लकड़ी को जहाँ से
पकड़ा था छोड़ दिया। वह खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया। एक
शोर हुआ—कछुवा खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया।
अमात्यों से घिरे हुए राजा ने बोधिसत्त्व को साथ ले उस जगह पहुँच,
कछुवे को देख पूछा—पण्डित ! यह कैसे गिरा ?
बोधिसत्त्व ने सोचा—मै बड़ी देर से राजा को उपदेश देने की इच्छा से
किसी उपाय की खोज में घूमता हूँ। इस कछुवे की हंसों के साथ दोस्ती हुई
होगी। वे 'इसे हिमवन्त ले चलेंगे' सोच लकड़ी मुंह में दे आकाश में उड़े होंगे।
इसने किसी की बात सुन जबान पर काबू न होने से कुछ कहने की इच्छा से
डण्डा छोड़ दिया होगा। इस प्रकार आकाश से गिर कर मरा होगा। यह
बोला—"हाँ ! महाराज ! जो वाचाल होते हैं, जिनके वचन की सीमा नही
होती वे इस प्रकार दुःख को प्राप्त होते हैं।" इतना कह यह गाथाएँ कही—
अवधी वत अत्तान कच्छपो व्याहरं गिरं,
सुग्गहीतस्मि कट्ठस्मि वाचाय सकिया वधि ॥
एतम्पि दिस्वा नरविरिय सेट्ठ !
वाच पमुञ्चे कुसलं नातिवेलं;
पस्ससि बहुभाणेन कच्छप व्यसनं गतं ॥
[कछुवे ने वाणी का प्रयोग करके अपने को मार डाला। अच्छी तरह
लकड़ी को पकड़े हुए अपनी वाणी के कारण (उसे छोड़ कर) अपने को मारा।
नरवीर्य श्रेष्ठ ! इसे भी देख कर (आदमी को) कुशल वाणी ही बोलनी
चाहिए और वह भी समय (की सीमा) लांघ कर नही। देखते ही हो, अधिक
बोलने से कछुआ मर गया।]
अवधी वत घात किया। व्याहर व्यवहार करते हुए। सुग्गहीतस्मि
कट्ठस्मि मुख से अच्छी तरह लकड़ी को पकड़े हुए। वाचाय सकिया वधि
वाचाल होने से अनुचित समय पर बोल कर पकड़ी हुई जगह को छोड़ अपनी
उस वाणी के कारण अपने को मार डाला। इस प्रकार यह मरा। किसी दूसरे
कारण से नही।

३५२ [ २७.२१६

एतम्पि दिस्वा यह बात भी देखकर मरुविरिय रोद्ध नरो में श्रेष्ठ-वीर्य्यं ।
उत्तसवीर्य्यं राजवर ! वाचं पमुञ्चे कुसलं नातियेतं सत्यादि से युक्त कुशल
वाणी ही पण्डित आदमी बोले; वह भी हियाकर समयानुकूल । समय (की
सीमा) लांघ कर असीम वाणी न बोले। पस्ससि प्रत्यक्ष देखना है बहुभानेन
अधिक बोलने से कच्छपं व्यसनं गतं, यह कछुआ मर गया ।


'राजा ने 'मेरे लिए यह कहा है' सोच पूछा—पण्डित ! मेरे बारे में कह
रहा है ?
बोधिसत्त्व—महाराज ! चाहे आप हो, चाहे कोई और हो, जो कोई
सीमा लांघ कर बोलता है वह इसी प्रकार दु ख भोगता है। यह स्पष्ट करके
कहा ।
उस समय से राजा संयम कर मितभाषी हो गया । शास्ता ने यह धर्म-
देशना ला जातक का मेल बैठाया ।
उस समय कछुवा कोकालिक था। दो हंस-बच्चे दो महास्थविर ।
राजा आनन्द । अमात्य पण्डित तो मैं ही था।

२१६. मच्छ जातक¹
"न मायमग्गि तपित " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
पूर्व-भार्या के आकर्षण के बारे में कही।


¹देखो मच्छ जातक (१. ४. ३४)