जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
- उच्चिट्ठभत्त ] ३४१
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने
एक ऐसे दरिद्र नट के कुल में जन्म ग्रहण किया जो भीख मांगकर जीविका
चलाता था। बडे होने पर वह दरिद्र अवस्था को प्राप्त हो भीख माँग कर
जीविका चलाने लगे।
उस समय काशी देश के एक गाँव में एक ब्राह्मण की ब्राह्मणी दुश्शीला
थी, पापिन थी, व्यभिचार करती थी। एक दिन किसी काम से जब ब्राह्मण
बाहर गया तो उसका जार मौका देख घर मे घुस आया। उसने उसके साथ
अनाचार कर चुकने पर कहा—"कुछ अच्छा खा कर ही जाओगे ?” उसने
भात तैयार कर दाल (= सूप) व्यञ्जन से युक्त भात परोस कर दिया कि तू
खा। स्वय ब्राह्मण के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई द्वार पर खडी हुई।
उस समय बोधिसत्त्व ब्राह्मणी के जार के खाने की जगह पर भीख की
प्रतीक्षा में खडे थे। तभी ब्राह्मण घर की तरफ आया। ब्राह्मणी-ने उसे आते
देख जल्दी से घर मे जाकर जार को कहा—'उठ, ब्राह्मण आ रहा हैं' और उसे
कोठे में उतार दिया। ब्राह्मण के घर में दाखिल हो बैठने के समय पीढा तथा
हाथ धोने को पानी दे जार के जूठे छोडे ठंडे भात के ऊपर गरम भात परोस
दिया। उसने जब भात में हाथ डाला तो ऊपर का भात गरम और नीचे
का ठंडा पाया। वह सोचने लगा कि यह दूसरे का खाकर बचा हुआ जूठा भात
होगा। उसने ब्राह्मणी से पूछते हुए पहली गाथा कही—
अञ्ञो उपरिमॊ वण्णो अञ्ञो वण्णोय हेट्ठिमो,
ब्राह्मणित्वेव पुच्छामि किं हेट्ठा कि च उपरि ॥
[ऊपर (के भात) का रूप ढग दूसरा हैं, नीचे (के भात) का दूसरा।
ब्राह्मणी ! तुझे ही पूछता हूँ कि यह क्या ऊपर है और क्या नीचे ?]
———
वण्णो आकार। यह ऊपर वाले के गरम होने की और नीचे वाले के
ठंडे होने की बात पूछते हुए कहा। किं हेट्ठा किञ्च उपरि परोसा हुआ भात
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ऊपर ठंडा और नीचे गरम होना चाहिए। यह वैसा नहीं है। इसलिए तुझे
पूछता हूँ। किस कारण से ऊपर का भात गरम और नीचे का ठंडा है?
ब्राह्मणी अपनी करतूत के प्रकट हो जाने के भय से ब्राह्मण के बार बार
कहने पर भी चुप ही रही। उस समय बोधिसत्त्व को यह सूझा कि कोठे में
बिठाया हुआ आदमी जार होगा और यह घर का स्वामी। ब्राह्मणी अपनी
करतूत के प्रकट होने के भय से कुछ नहीं बोलती। हन्त ! मैं इसकी करतूत
प्रकट कर जार के कोठे में बिठाए होने की बात कह दूँ।
उसने ब्राह्मण के घर से निकलने से जार के घर में प्रवेश करने, अनाचार
करने, श्रेष्ठ भात खाने, ब्राह्मणी का दरवाजे पर खड़े हो रास्ता देखने और
जार को कोठे में उतारने तक का सब हाल कह दूसरी गाथा कही—
अहं नटोस्मि भदन्ते भिक्खकोस्मि इधागतो,
अयं हि फोट्ठमोतिण्णो अयं सो यं गवेससि ॥
[स्वामी ! मैं नट हूँ। भीख मांगने के लिए यहाँ आया हूँ। यह है कोठे
सें उतरा हुआ और यह ही है जिसे तू खोजता है।]
अहं नटोस्मि भदन्ते, स्वामी ! मैं नट जाति का हूँ। भिक्खकोस्मि
इधागतो मैं भिखमंगा यहाँ भीख माँगता हुआ आया हूँ। अयं हि कोट्ठमोतिण्णो
यह इसका जार इस भात को खाता हुआ तेरे भय से कोठे में उतरा है। अयं
सो यं गवेससि, जिसे तू खोज रहा है कि यह किसका जूठा भात होगा, वह यही
है। 'इसे बालो से पकड़, कोठे से निकाल ऐसा कर जिसमें इसे होश रहे और
फिर यह ऐसा पाप-कर्म न करे' कह चला गया।
ब्राह्मण उन दोनों को डरा, पीट कर ऐसी शिक्षा दे जिसमें वे फिर ऐसा
पाप-कर्म न करें, कर्मानुसार गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मणी पूर्व-भार्या थी। ब्राह्मण उत्कण्ठित। नट-पुत्र मैं
ही था।