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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रतधारी अतिथि बन कर उस समय आए, जब अग्नियां
प्रदीप्त हो गई हों और अग्निहोम चल रहा हो तो गृहस्थ स्वयं उस के सामने जा कर कहे कि
हे व्रती! तुम आज्ञा दो, मैं हवन करूंगा. (१-२)
स चातिसृजेज्जुहुयान्न चातिसृजेन्न जुहुयात्.. (३)
अतिथि विद्वान् आज्ञा दे, तभी हवन करे. यदि वह आज्ञा न दे तो हवन न करे. (३)
स य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति.. (४)
प्र पितृयाणं पन्थां जानाति प्र देवयानम्.. (५)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, वह पितृयान और
देवयान मार्ग पर जाता है. (४-५)
न देवेष्वा वृश्चते हुतमस्य भवति.. (६)
पर्यस्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति..
(७)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, उस का अग्नि होम
सफल होता है तथा देवों इस का कोई दोष नहीं होता. इस लोक के उस गृहस्थ का आश्रम
सुरक्षित रहता है. (६-७)
अथ य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो जुहोति.. (८)
न पितृयाणं पन्थां जानाति न देवयानम्.. (९)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा के बिना हवन करता है, वह न पितृयान
मार्ग को जानता है और न देवयान मार्ग का उसे ज्ञान होता है. (८-९)
आ देवेषु वृश्चते अहुतमस्य भवति.. (१०)
उस का हवन विफल होता है और वह देवों का अपराधी होता है. (१०)
नास्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो
जुहोति.. (११)
इस लोक में उस का आधार नहीं रहता, जो ऐसे विद्वान् की आज्ञा के बिना हवन करता
है. (११)
सूक्त-१३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (१)
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ये पृथिव्यां पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (२)
जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य रात्रि में अतिथि होता है, वह उस के आने के फल से
पृथ्वी के सभी पुण्य लोकों पर विजय प्राप्त करता है. (१-२)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो द्वितीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (३)
ये३न्तरिक्षे पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (४)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य रात्रि में निवास करता है, वह गृहस्थ उस के
फल के रूप में अंत में स्थित सभी पुण्य लोकों को जीत लेता है. (३-४)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यस्तृतीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (५)
ये दिवि पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (६)
यदि ऐसा विद्वान् व्रात्य अतिथि के रूप में गृहस्थ के घर में तीसरी रात्रि में भी निवास
करता है तो उस के फल से वह गृहस्थ आकाश में स्थित समस्त पुण्य लोकों को अपने लिए
मुक्त कर लेता है. (५-६)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यश्चतुर्थीं रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (७)
ये पुण्यानां पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे. (८)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा व्रात्य चौथी रात निवास करता है तो उस के फल के रूप में
वह गृहस्थ पुण्यात्माओं के सभी लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (७-८)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो ऽ परिमिता रात्रीरतिथिर्गृहे वसति.. (९)
य एवापरिमिताः पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (१०)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य अनेक रातों तक निवास करता है तो उस के
फल के रूप में वह गृहस्थ अनेक पुण्य लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (९-१०)
अथ यस्याव्रात्यो व्रात्यब्रुवो नामबिभ्रत्यतिथिर्गृहानागच्छेत्.. (११)
कर्षेदेनं न चैनं कर्षेत्.. (१२)
जिस के घर अपनेआप को व्रात्य बताने वाला कोई अव्रात्य आए तो क्या गृहस्थ उसे
अपने घर से भगा दे. नहीं, उस को भी भगाना नहीं चाहिए. (११-१२)
अस्यै देवताया उदकं याचामीमां देवतां वासय इमामिमां
देवतां परि वेवेष्मीत्येनं परि वेविष्यात्.. (१३)
मैं इस देवता को अपने घर में निवास देता हूं. मैं इस से जल ग्रहण करने की प्रार्थना
करता हूं. मैं इस देवता के लिए भोजन परोसता हूं. ऐसा स्वीकार करता हुआ उस के लिए
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सूक्त-१४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

भोजन परोसना आदि कार्य करे. (१३)
तस्यामेवास्य तद् देवतायां हुतं भवति य एवं वेद.. (१४)
जो इस बात को जानता है, उस की आहुति देवताओं के लिए दी जाने पर उत्तम आहुति
बन जाती है. (१४)
सूक्त-१४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स यत् प्राचीं दिशमनु व्यचलन्मारुतं शर्धो भूत्वानुव्य चलन्मनो ऽ न्नादं
कृत्वा.. (१)
जब वह पूर्व दिशा की ओर चला, तब उस ने बलशाली हो कर अपनी आयु के अनुकूल
आचरण करते हुए अपने मन को अन्नाद अर्थात् अन्न खाने वाला बनाया. (१)
मनसान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२)
जो मनुष्य इस बात को जानता है, वह अन्नाद मन से अन्न को खाता है. (२)
स यद् दक्षिणां दिशमनु व्यचलदिन्द्रो भूत्वानुव्य चलद् बलमन्नादं कृत्वा..
(३)
जब वह दक्षिण दिशा की ओर गया, तब वह अपने बल को अन्नाद बताता हुआ इंद्र बन
कर गमनशील हुआ. (३)
बलेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (४)
इस बात को जानने वाला अन्नाद बल से अन्न का सेवन करता है. (४)
स यत् प्रतीचीं दिशमनु व्यचलद् वरुणो राजा भूत्वानुव्य चलदपो ऽ न्नादी:
कृत्वा.. (५)
जब वह पश्चिम दिशा की ओर चला, तब वह जल को अन्नाद बताता हुआ वरुण बन
कर गतिशील हुआ. (५)
अद्भिरन्नादिभिरन्नमत्ति य एवं वेद.. (६)
इस बात को जानने वाला अन्नाद जल से अन्न का भक्षण करता है. (६)
स यदुदीचीं दिशमनु व्यचलत् सोमो राजा भूत्वानुव्य चलत् सप्तर्षिभिर्हुत आहुतिमन्नादीं
कृत्वा.. (७)
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जब वह उत्तर दिशा की ओर चला, तब वह सप्तर्षियों द्वारा दी गई आहुति को अन्नाद
बना कर तथा सोम हो कर चला. (७)
आहुत्यान्नाद्यान्नमत्ति य एवं वेद.. (८)
इस बात को जानने वाला अन्नाद आहुति से अन्न का भक्षण करता है. (८)
स यद् ध्रुवां दिशमनु व्यचलद् विष्णुर्भूत्वानुव्यचलद् विराजमन्नादीं कृत्वा..
(९)
जब वह ध्रुव दिशा की ओर चला, तब विराट् को अन्नाद बता कर स्वयं विष्णु रूप में
चला. (९)
विराजान्नाद्यान्नमत्ति य एवं वेद.. (१०)
इस बात को जानने वाला अन्नाद विराट के द्वारा अन्न का भक्षण करता है. (१०)
स यत् पशूननु व्यचलद् रुद्रो भूत्वानुव्य चलदोषधीरन्नादीः कृत्वा.. (११)
जब वह पशुओं की ओर चला तब ओषधियों को अन्नाद बनाते हुए उस ने रुद्र के रूप
में गमन किया. (११)
ओषधीभिरन्नादीभिरन्नमत्ति य एवं वेद.. (१२)
इस बात को जानने वाला अन्नाद ओषधियों से अन्न को खाता है. (१२)
स यत् पितॄननु व्यचलद् यमो राजा भूत्वानुव्य चलत् स्वधाकारमन्नादं
कृत्वा.. (१३)
जब वह पितरों की ओर चला, तब उस ने स्वधा को अन्नाद बनाया और वह हो स्वयं
यमराजा बन कर चला. (१३)
स्वधाकरेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (१४)
इस बात को जानने वाला स्वधाकार अन्नाद से अन्न को खाता है. (१४)
यन्मनुष्या ३ ननु व्यचलदग्निर्भूत्वानुव्य चलत् स्वाहाकारमन्नादं कृत्वा..
(१५)
जब वह मनुष्यों की ओर चला, तब स्वाहा को अन्नाद बना कर अग्नि होता हुआ चला.
(१५)
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स्वाहाकारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (१६)
इस बात को जानने वाला स्वाहाकार अन्नाद के द्वारा अन्न का सेवन करता है. (१६)
स यदूर्ध्वां दिशमनु व्यचलद् बृहस्पतिर्भूत्वानुव्य चलद् वषट्कारमन्नादं
कृत्वा.. (१७)
जब वह ऊर्ध्व दिशा की ओर चला, तब वषट्कार को अन्नाद बना कर बृहस्पति बनता
हुआ चला. (१७)
वषट्कारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (१८)
इस बात को जानने वाला वषट्कार रूप अन्नाद के द्वारा अन्न का भक्षण करता है.
(१८)
स यद् देवाननु व्यचलदीशानों भूत्वानुव्य चलन्मन्युमन्नादं कृत्वा.. (१९)
जब वह देवता की ओर चला, तब यज्ञ को अन्नाद बना कर ईशान बनता हुआ चला.
(१९)
मन्युनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२०)
इस बात को जानने वाला अन्नाद यज्ञ के द्वारा अन्न को खाता है. (२०)
स यत् प्रजा अनु व्यचलत् प्रजापतिर्भूत्वानुव्य चलत् प्राणमन्नादं कृत्वा..
(२१)
जब वह प्रजाओं की ओर चला, तब प्राण को अन्नाद बना कर प्रजापति के रूप में
चला. (२१)
प्राणेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२२)
इस बात को जानने वाला अन्नाद प्राण के द्वारा अन्न का भोजन करता है. (२२)
स यत् सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत् परमेष्ठी भूत्वानुव्य चलद् ब्रह्मान्नादं
कृत्वा.. (२३)
जब वह सब अंतर्देशों की ओर चला, तब ब्रह्म को अन्नाद बना कर प्रजापति बनाता
हुआ चला. (२३)
ब्रह्मणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२४)
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सूक्त-१५ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

इस बात को जानने वाला पुरुष अन्नाद ब्रह्म के द्वारा अन्न का भोजन करता है. (२४)
सूक्त-१५ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तस्य व्रात्यस्य.. (१)
सप्त प्राणाः सप्तापानाः सप्त व्यानाः.. (२)
इस व्रात्य के सात प्राण, सात अपान तथा सात ही व्यान हैं. (१-२)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्य प्रथमः प्राण ऊर्ध्वो नामायं सो अग्निः.. (३)
इस वात्य का पहला ऊर्ध्व प्राण अग्नि है. (३)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः.. (४)
इस व्रात्य का द्वितीय प्रौढ़ प्राण आदित्य है. (४)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्व तृतीयाः प्राणो ३ व्यू ढो नामासौ स चन्द्रमाः.. (५)
इस का जो तृतीय प्राण है, वह अव्यूढ़ नाम का चंद्रमा है. (५)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्व चतुर्थः प्राणो विभूर्नामायं स पवमानः.. (६)
इस का चतुर्थ प्राण विभु पवमान है. (६)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्य पञ्चमः प्राणो योनिनार्म ता इमा आपः.. (७)
इस व्रात्य का पांचवां प्राण योनि जल है. (७)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्य षष्ठः प्राणः प्रियो नाम त इमे पशवः.. (८)
इस का छठा प्राण प्रिय नाम वाला पशु है (८)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्य सप्तमः प्राणो ऽपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः..
(९)
इस के सप्तम प्राण का नाम अपरिमित है. यह प्रजा है. (९)
सूक्त-१६ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽस्य प्रथमो ऽपानः सा पौर्णमासी.. (१)

इस व्रात्य का प्रथम अपान पूर्णमासी है. (१)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य द्वितीयो ऽ पानः साष्टका (२)
इस का द्वितीय अपान अष्टकार है. (२)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य तृतीयो ऽ पानः सामावास्या.. (३)
इस का तृतीय अपान अमावस्या है. (३)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य चतुर्थो ऽ पानः सा श्रद्धा.. (४)
इस का चतुर्थ अपान श्रद्धा है. (४)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य पञ्चमो ऽ पानः सा दीक्षा.. (५)
इस का पांचवां अपान दीक्षा है. (५)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य षष्ठो ऽ पानः स यज्ञः.. (६)
इस का छठा अपान यज्ञ है. (६)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य सप्तमो ऽ पानस्ता इमा दक्षिणाः.. (७)
इस का सप्तम अपान दक्षिणा है. (७)
सूक्त-१७ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य प्रथमो व्यानः सेयं भूमिः.. (१)
इस व्रात्य का प्रथम व्यान भूमि है. (१)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य द्वितीयो व्यानस्तदन्तरिक्षम्.. (२)
इस का द्वितीय व्यान अंतरिक्ष है. (२)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य तृतीयो व्यानः सा द्यौः.. (३)
इस का तृतीय व्यान द्यौ है. (३)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य चतुर्थो व्यानस्तानि नक्षत्राणि.. (४)
इस का चतुर्थ व्यान नक्षत्र है. (४)
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तस्य व्रात्यस्य. योऽस्य पञ्चमो व्यानस्त ऋतवः.. (५)
इस का पांचवां व्यान ऋतु हैं. (५)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य षष्ठो व्यानस्त आर्तवाः.. (६)
इस का छठा व्यान आर्तव है. (६)
तस्य व्रात्यस्य. यो ऽ स्य सप्तमो व्यानः स संवत्सरः.. (७)
इस का सातवां व्यान संवत्सर है. (७)
तस्य व्रात्यस्य. समानमर्थं परि यन्ति देवाः संवत्सरं वा
एतदृतवो ऽ नुपरियन्ति व्रात्यं च.. (८)
देवगण इस के समान अर्थ को प्राप्त होते तथा संवत्सर और ऋतुएं भी इस का अनुमान
करते हैं. (८)
तस्य व्रात्यस्य. यदादित्यमभिसंविशन्त्यमावास्यां चैव तत् पौर्णमासीं च..
(९)
तस्य व्रात्यस्य. एकं तदेषाममृतमित्याहुतिरेव.. (१०)
अमावस्या और पूर्णिमा आदित्य में प्रवेश करती हैं. आहुति ही इन का अविनाशी होना
है. (९-१०)
सूक्त-१८ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तस्य व्रात्यस्य.. (१)
इस व्रात्य का दक्षिण चक्षु आदित्य है. (१)
यदस्य दक्षिणमक्ष्यसौ स आदित्यो यदस्य सव्यमक्ष्यसौ स चन्द्रमाः.. (२)
इस का वाम चक्षु चंद्रमा है. (२)
यो ऽ स्य दक्षिणः कर्णो ऽ यं सो अग्निर्यो ऽ स्य सव्यः कर्णो ऽ यं स
पवमानः.. (३)
इस का दाहिना कान अग्नि और बायां कान पवमान है. (३)
अहोरात्रे नासिके दितिश्चदितिश्च शीर्षकपाले संवत्सरः शिरः.. (४)

इस की नासिका दिन और रात हैं. इस का शीर्ष दिति और कपाल अदिति है. इस का
शीश संवत्सर है. (४)
अह्ना प्रत्यङ् व्रात्यो रात्र्या प्राङ्नमो व्रात्याय.. (५)
यह व्रात्य दिन में सबके लिए पूज्य है. इस प्रकार के व्रात्य को नमस्कार है. (५)
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सूक्त-१ देवता—प्रजापति

सोलहवां कांड

सूक्त-१ देवता—प्रजापति
अतिसृष्टो अपां वृषभो ऽ तिसृष्टा अग्नयो दिव्याः.. (१)
जलों में जो वृषभ के समान जल है वह मुक्त हुआ है और दिव्य अग्नियां मुक्त हुई हैं.
(१)
रुजन् परिरुजन् मृणन् प्रमृणन्.. (२)
म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः.. (३)
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि.. (४)
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (५)
भंग करने वाला, विनाशक, पलायन करने वाला, मन को दबाने वाला, दाह उत्पन्न करने
वाला, खोदने से प्राप्त होने वाला और देह को दूषित करने वाला जो जल है, उस से अपने
शत्रुओं को युक्त करता हुआ मैं उस का त्याग करता हूं. मैं स्वयं उस का स्पर्श नहीं करूंगा.
(२-५)
अपामग्रमसि समुद्रं वो ऽ भ्यवसृजामि.. (६)
हे जलों के श्रेष्ठ भाग! मैं तुम्हें सागर की ओर प्रेरित करता हूं. (६)
यो ३ प्स्व १ग्निरति तं सृजामि म्रोकं खनिं तनूदूषिम्.. (७)
शरीर के बल का अपहरण कर के जलों के भीतर ले जाने वाले अग्नि का भी मैं त्याग
करता हूं. (७)
यो व आपो ऽ ग्निराविवेश स एष यद् वो घोरं तदेतत्.. (८)
हे जल! जो अग्नि तुम में प्रविष्ट हुई है वह तुम्हारा भयानक भाग है. (८)
इन्द्रस्य व इन्द्रियेणाभि षिञ्चेत्.. (९)
हे जल! जो तुम्हारा अत्यधिक ऐश्वर्य वाला भाग है, उसे हम इंद्रियों से सींचें. (९)
अरिप्रा आपो अप रिप्रमस्मत्.. (१०)
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जल हमारे पाप को हमसे दूर करे. पाप हमे अलग हों. (१०)
प्रास्मदेनो वहन्तु प्र दुःष्वप्न्यं वहन्तु.. (११)
यह जल हमारे पाप और बुरे स्वप्न को बहा कर ले जाए. (११)
शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे.. (१२)
हे जल! तुम मुझे कृपा की दृष्टि से देखो और अपने कल्याणकारक भाग से मेरी त्वचा
का स्पर्श करो. (१२)
शिवानग्नीनप्सुषदो हवामहे मयि क्षत्रं वर्च आ धत्त देवी:.. (१३)
हम जल में व्याप्त और मंगलकारिणी अग्नियों को बुलाते हैं. यह जल मुझे क्षमाबल
वाली शक्ति से संपन्न करे. (१३)
सूक्त-२ देवता—प्रजापति
निर्दुर्मण्य ऊर्जा मधुमती वाक्.. (१)
मैं दूषित चर्मरोग से मुक्त रहूं. मेरी वाणी शक्तिशालिनी तथा मधुयुक्त हो. (१)
मधुमती स्थ मधुमतीं वाचमुदेयम्.. (२)
हे ओषधियो! तुम मधुरस से पूर्ण रहो. मेरी वाणी भी मधुररस से पूर्ण हो. (२)
उपहूतो मे गोपा उपहूतो गोपीथ:.. (३)
मेरे कान कल्याण करने वाली बातें सुनें. मैं मंगलपूर्ण एवं प्रशंसाभरी बातें सुनूं. (३)
सुश्रुतौ कर्णौ भद्रश्रुतौ कर्णौ भद्रं श्लोकं श्रूयासम्.. (४)
मेरे कान भलीभांति तथा निकट से सुनना कभी न छोड़ें. मेरे नेत्र गरुड़ के समान हों
तथा सदैव देखने की शक्ति से सम्पन्न रहें. (४)
सुश्रुतिश्च मोपश्रुतिश्च मा हासिष्टां सौपर्णं चक्षुरजस्रं ज्योति:.. (५)
मेरे कान ठीक से सुनना और पास से सुनना न छोड़ें. मेरी आंखें गरुड़ की देखने की
शक्ति से पूर्ण रहें. (५)
ऋषीणां प्रस्तरो ऽ सि नमो ऽ स्तु दैवाय प्रस्तराय.. (६)
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सूक्त-३ देवता—आदित्य

तू ऋषियों का पाषाण है. तुझ देवरूप पाषाण को मैं नमस्कार करता हूं. (६)
सूक्त-३ देवता—आदित्य
मूर्धाहं रयीणां मूर्धा समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों का शीर्ष रूप रहूं. जो व्यक्ति मेरे समान हैं, उन में मैं मस्तक के समान उच्च रहूं.
(१)
रुजश्च मा वेनश्च मा हासिष्टां मूर्धा च मा विधर्मा च मा हासिष्टाम्.. (२)
रज, यज्ञ, मूर्धा अर्थात् शीश और विशेष धर्म मेरा त्याग न करें. (२)
उर्वश्च मा चमसश्च मा हासिष्टां धर्ता च मा धरुणश्च मा हासिष्टाम्.. (३)
उर्व अर्थात् पकाने वाला पात्र, चमस अर्थात् चमचा धारण करने वाले और आधार मुझ
से अलग न हों. (३)
विमोकश्च मार्द्रपविश्च मा हासिष्टामार्द्रदानुश्च मा मातरिश्वा च मा
हासिष्टाम्.. (४)
मुक्त करने वाला तथा गीला आयुध, आर्द्रदानु और मातरिश्वा अर्थात् पवन मुझ से
अलग न हो. (४)
बृहस्पतिर्म आत्मा नृमणा नाम हृद्यः.. (५)
हर्ष देने वाले, अनुग्रह करने वाले तथा मन को लगाने वाले बृहस्पति मेरी आत्मा हैं. (५)
असंतापं मे हृदयमुत्रीं गव्यूतिः समुद्रो अस्मि विधर्मणा.. (६)
दो कोस तक की भूमि मेरे अधिकार में हो. मेरा हृदय कभी संतप्त न रहे. मैं धारण
करने की शक्ति के द्वारा सागर के समान गंभीर बनूं. (६)
सूक्त-४ देवता—आदित्य
नाभिरहं रयीणां नाभिः समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों की नाभि के समान बनूं. जो पुरुष मेरे समान हैं, उन में भी मैं नाभि रूप बनूं.
(१)
स्वासदसि सूषा अमृतो मर्त्येष्विा.. (२)
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श्रेष्ठ उषा मरण धर्मा मनुष्यों में अमृत से युक्त है तथा सुंदरता के साथ प्रतिष्ठित होती है.
(२)
मा मां प्राणो हासीन्मो अपानो ऽ वहाय परा गात्.. (३)
प्राण वायु मेरा त्याग न करे. अपान वायु भी मुझे छोड़ कर न जाए. (३)
सूर्यो माह्नः पात्वग्निः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षाद् यमो मनुष्येभ्यः सरस्वती
पार्थिवेभ्यः.. (४)
सूर्य दिन में मेरी रक्षा करें. अग्नि पृथ्वी पर मेरी रक्षा करे. वायु अंतरिक्ष में, यम मनुष्यों
से तथा सरस्वती पार्थिव पदार्थों से मेरी रक्षा करने वाली हैं. (४)
प्राणापानौ मा मा हासिष्टं मा जने प्र मेषि.. (५)
प्राण और अपान वायु मेरा त्याग न करें. मैं सदा प्रसन्न रहूं. (५)
स्वस्त्य १ द्योषसो दोषसश्च सर्व आपः सर्वगणो अशीय. (६)
उषा काल और रात्रि के द्वारा मंगल हो. मैं सभी गणों और जलों का उपयोग करने वाला
बनूं. (६)
शक्वरी स्थ पशवो मोप स्थेषुर्मित्रावरुणौ मे प्राणापानावग्निर्मे दक्षं
दधातु.. (७)
हे पशुओ! तुम भुजाओं वाले बनो तथा मेरे पास स्थित रहो. वरुण देव मेरी प्राण और
अपान वायु को पोषित करें. अग्नि देव मेरे बल को दृढ़ करें. (७)
सूक्त-५ देवता—दुःस्वप्ननाशन
विद्म ते स्वप्न जनित्रं ग्राह्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (१)
हे स्वप्न! तू ग्राह्य पिशाचों से उत्पन्न हुआ है तथा यम को प्राप्त करने वाला है. मैं तेरी
उत्पत्ति जानता हूं. (१)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (२)
हे स्वप्न! तू जीवन का अंत करने वाली मृत्यु है. (२)
तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्षप्न्यात् पाहि.. (३)
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हे प्रश्न! हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (३)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्ऋत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (४)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम निर्ऋति अर्थात् पाप देवता के पुत्र हो तथा
यम देव के साधन हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हारे इस रूप को
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ. (४)
विद्म ते स्वप्न जनित्रमभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (५)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम मृत्यु और अभूति अर्थात् दरिद्रता के पुत्र
हो. हे स्वप्न! हम तुम्हें भलिभांति जानते हैं. तुम हमारी बुरे स्वप्नों से रक्षा करो. (५)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्भूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (६)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम निर्भूति अर्थात् निर्धनता के पुत्र और
यमराज के साधन हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं, इसलिए तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ.
(६)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं पराभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (७)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम पराभूति अर्थात् पराजय के पुत्र और
यमराज के साधन हो. तुम यमराज के साधन और मृत्यु हो. हम तुम्हारे स्वरूप को भलीभांति
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (७)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (८)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम इंद्रिय विकारों के पुत्र और यम के साधन
हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न
से बचाओ. (८)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (९)
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सूक्त-६ देवता—दुःस्वप्ननाशन

हे स्वप्न! तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. (९)
तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात् पाहि.. (१०)
हे स्वप्न! मैं तुम्हें भलीभांति जानता हूं. तुम मुझे बुरे स्वप्नों से बचाओ. (१०)
सूक्त-६ देवता—दुःस्वप्ननाशन
अजैष्माद्यासनामाग्याभूमानागसो वयम्.. (१)
हम आज विजय प्राप्त करें. हम आज खाद्य पदार्थ प्राप्त करें. आज हम पाप रहित हो
जाएं. (१)
उषो यस्माद् दुष्ष्वप्न्याद्भैष्माप तदुच्छतु.. (२)
हे उषा देवी! जिस बुरे स्वप्न से हम डरते हैं, वह बुरा स्वप्न समाप्त हो जाए. (२)
द्विषते तत् परा वह शपते तत् परा वह.. (३)
हे देव! आप उसे भय को प्राप्त कराएं जो हमसे द्वेष करता है तथा हमारी निन्दा करता
है. (३)
यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तस्मा एनद् गमयामः.. (४)
हम जिससे द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करता है, हम इस भय को उस के पास
भेजते हैं. (४)
उषा देवी वाचा संविदाना वाग् देव्यु १ षसा संविदाना.. (५)
उषा देवी वाणी के साथ और वाणी की देवी उषा के साथ एकमत स्थापित करें. (५)
उषस्पतिर्वाचस्पतिना संविदानो वाचस्पतिरुषस्पतिना संविदानः.. (६)
उषा के पति वाचस्पति अर्थात् वाणी के स्वामी के साथ तथा वाचस्पति उषा देवी के
पति के साथ एकमत स्थापित करें. (६)
ते ३ मुष्मै परा वहन्त्वरायान् दुर्नाम्नः सदान्वाः.. (७)
कुम्भीका दूषीकाः पीयकान्.. (८)
वे इस दुष्ट शत्रु के लिए दूषित नाम वाले दुःखों को, आपत्तियों को घड़े के समान बढ़ने
वाले उदर रोगों को, शरीर के दूषित रोगों को तथा प्राणघातक रोगों को प्राप्त कराएं. (७-८)
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जाग्रद्दुःष्वप्न्यं स्वप्नेदुःष्वप्न्यम्.. (९)
अनागमिषमतो वरानवित्तेः संकल्पान्मुच्या द्रुहः पाशान्.. (१०)
हम जाग्रत अवस्था में जो दुःस्वप्न देखते हैं और सोते हुए जो दुःस्वप्न देखते हैं, उनके बुरे
फलों से तथा धनहीनता के अतीतकाल के संकल्पों से, न प्राप्त होने वाले उत्तम पदार्थों से
और न छूटने वाले द्रोहजनित पाशों से मुक्त हों. (९-१०)
तदमुष्मा अग्ने देवाः परा वहन्तु वध्रिर्यथासद विथुरो न साधुः.. (११)
हे अग्नि देव! सभी देव सभी प्रकार की उन आपत्तियों को हमारे शत्रुओं की ओर ले
जाएं, जिनके कारण हमारे शत्रु पौरुषहीन व्याधि और सज्जनों को प्राप्त होने वाले यज्ञ को न
पाकर अपयश भोगें. (११)
सूक्त-७ देवता—दुःस्वप्ननाशन
तेनैनं विध्याम्यभूत्यैनं विध्यामि निर्भूत्यैनं विध्यामि पराभूत्यैनं
विध्यामि ग्राह्यैनं विध्यामि तमसैनं विध्यामि.. (१)
मैं इस अर्थात् बुरे स्वप्न को अभिचार कर्म अर्थात् जादू Node/टोने से, दुर्गति से, दरिद्रता से
तथा रोग से विद्ध करता हूं. (१)
देवानामैनं घोरैः क्रूरैः प्रैषैरभिप्रेष्यामि.. (२)
मैं इस बुरे स्वप्न को देवताओं की भयंकर आज्ञाओं के सामने उपस्थित करता हूं. (२)
वैश्वानरस्यैनं दंष्ट्रयोरपि दधामि.. (३)
मैं इस बुरे स्वप्न को वैश्वानर अर्थात् अग्नि की दाढ़ों में डालता हूं. (३)
एवानेवाव सा गरत्.. (४)
वैश्वानर इस बुरे स्वप्न को निगल जाएं. (४)
यो ३ स्मान् द्वेष्टि तमात्मा द्वेष्टु यं वयं द्विष्मः स आत्मानं द्वेष्टु.. (५)
जो हम से द्वेष करता हो, उस से आत्मा द्वेष करे. जिस से हम द्वेष करते हैं, वह आत्मा
से द्वेष करे. (५)
निर्द्विषन्तं दिवो निः पृथिव्या निरन्तरिक्षाद् भजाम.. (६)
जो हम से द्वेष करता है, उसे हम आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष से दूर भगाते हैं. (६)
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सुयामंश्वाक्षुष.. (७)
इदमह मामुष्यायणे ३ मुष्याः पुत्रे दुष्षप्न्यं मृजे.. (८)
हे उत्तम नियामक और निरीक्षक! मैं बुरे स्वप्न से होने वाले फल को अमुक गोत्र वाले
तथा अमुक स्त्री के पुत्र के पास भेजता हूं. (७-८)
यददो अदो अभ्यगच्छन् यद् दोषा यत् पूर्वा रात्रिम्.. (९)
यज्जाग्रद यत् सुप्तो यद् दिवा यन्नक्तम्.. (१०)
यदहरहरभिगच्छामि तस्मादेनमव दये.. (११)
मैं पहली रात में अमुकअमुक कर्म कर चुका हूं. जाग्रतावस्था में, सुषुप्तावस्था में, दिन
में अथवा रात्रि में मैं नित्यप्रति जिस पाप और दोष को प्राप्त करता हूं, उन्हीं के द्वारा मैं उस
बुरे स्वप्न को नष्ट करता हूं. (९-११)
तं जहि तेन मन्दस्व तस्य पृष्टीरपि शृणीहि.. (१२)
हे देव! उस शत्रु की हिंसा करो, उस के साथ चलो तथा उस की पसलियों को तोड़ दो.
(१२)
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (१३)
वह प्राणहीन हो जाए, वह जीवित न रहे. (१३)
सूक्त-८ देवता—बुरे स्वप्न का नाश
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.. (१)
हमारा उदय हो. हम सत्य को प्राप्त करें, हमारा तेज बढ़े. हमारा ज्ञान बढ़े तथा हमारे
उत्तम प्रकाश में वृद्धि हो. हमारे यज्ञ सफल हों, हमारे अधिकार में पशु हों, हमारी संतान की
वृद्धि हो. हमारे लोग वीर हों. (१)
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.. (२)
इस अपराध के कारण हम शत्रु पर आक्रमण करते हैं. इस गोत्र वाला तथा इस का पुत्र
हमारा शत्रु है. (२)
स ग्राह्याः पाशान्मा मोचि.. (३)
वह रोग के पाशों से न छूट सके. (३)
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तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (४)
उस के तेज, बल, प्राण और आयु को मैं घेरता हूं. मैं इसे नीचे गिराता हूं. (४)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स निर्र्ऋत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (५)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह दुर्गति के
पाशों से न छूट सके. (५)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ भूत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (६)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह दरिद्रता के
पाशों से न छूटने पाए. (६)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स निर्भूत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (७)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह बुरी अवस्था

के पाशों से न छूट सके. (७)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः
स पराभूत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (८)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह पराजय के
पाशों से न छूटने पाए. (८)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं
निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स देवजामीनां पाशान्मा
मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (९)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह इंद्रिय संबंधी
दोषों से छूटने न पाए. (९)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स बृहस्पतेः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (१०)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. वह बृहस्पति के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और
आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (१०)

जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स प्रजापतेः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (११)
शत्रुओं को मार कर और जीत कर लाए हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को हम
इस लोक से दूर करते हैं, वह प्रजापति के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और
आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (११)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवोऽस्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स ऋषीणां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१२)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीते हुए सब पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
पशु, प्रजा तथा सब वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को हम इस लोक
से दूर करते हैं. वह ऋषियों के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और आयु को
लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराना चाहता हूं. (१२)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स आर्षेयाणां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१३)
शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक स्त्री के पुत्र
को इस लोक से दूर भेजते हैं. वह ऋषियों से उत्पन्न पाशों से कभी छूटने न पाए. मैं उस के
तेज, वर्च, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (१३)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
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