अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्.
सौभाग्य प्राप्त करने के लिए जल राजा को शक्तिपूर्ण बनाते हैं. जल में वर्तमान गैंडे के समान
अपराजेय राजा को सेवक जन अभिषेक के द्वारा और वस्त्राभूषणों से अलंकृत करें. (७)
सूक्त-९ देवता—त्रैककुदांजन
एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्.
विश्वेभिर्देवैर्दत्तं परिधिर्जीवनाय कम्.. (१)
हे अंजन मणि! तू त्रिककुद नामक पर्वत से जीवित प्राणियों की रक्षा के लिए आ. तू
त्रिककुद पर्वत की आंख है. इंद्र आदि सभी देवों ने रोग रहित रहने के लिए तुझे चहारदीवारी
के रूप में प्रदान किया है. (१)
परिपाणं पुरुषाणां परिपाणं गवामसि.
अश्वानामर्वतां परिपाणाय तस्थिषे.. (२)
हे त्रिककुद् पर्वत पर उत्पन्न अंजन मणि! तू पुरुषों, गायों, घोड़ों और घोड़ियों की रक्षा
के लिए स्थित है. (२)
उतासि परिपाणं यातुजम्भनमाञ्जन.
उतामृतस्य त्वं वेत्थाथो असि जीवभोजनमथो हरितभेषजम्.. (३)
हे अंजन! तू राक्षस, पिशाच आदि से उत्पन्न पीड़ा का नाश करने वाला है. तू अमृत का
सार जानता है. तू अनिष्ट निवारण करने के कारण जीवों का पालक है. तू पांडु रोग से उत्पन्न
कालेपन को दूर करने वाला है. (३)
यस्याञ्जन प्रसर्पस्यङ्गमङ्गं परुष्परुः.
ततो यक्ष्मं वि बाधस उग्रो मध्यमशीरिव.. (४)
हे अंजन! तू जिस पुरुष के शरीर के सभी अंगों और अंगों की संधियों में प्रवेश कर के
व्याप्त होता है, उस के शरीर से तू यक्ष्मा रोग को इस प्रकार दूर करता है, जिस प्रकार
शक्तिशाली वायु मेघों के जल को क्षणमात्र में दूर ले जाती है. (४)
नैनं प्राप्नोति शपथो न कृत्या नाभिशोचनम्.
नैनं विष्कन्धमश्नुते यस्त्वा बिभर्त्याञ्जन.. (५)
हे अंजन! जो पुरुष तुझे धारण करता है, उस तक दूसरे के द्वारा प्राप्त किया हुआ पाप
नहीं पहुंचता तथा दूसरे व्यक्तियों द्वारा किए गए अभिचार से उत्पन्न कृत्या नाम की राक्षसी
भी उस तक न पहुंचे. कृत्या से उत्पन्न शोक भी तुझे प्राप्त न हो तथा विघ्न भी उस तक न
पहुंचे. (५)
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असन्मन्त्राद् दुष्ष्वप्न्याद् दुष्कृताच्छमलादुत.
दुर्हर्दश्चक्षुषो घोरात् तस्मान्नः पाह्याञ्जन.. (६)
हे अंजन मणि! अभिचार संबंधी बुरे मंत्रों से उत्पन्न दुःख से, बुरे स्वप्नों से प्राप्त दुःख से,
पूर्वजन्म में किए हुए पाप से, दूसरे के द्वारा किए हुए पाप से, दूषित मन से तथा दूसरों के
क्रूर नेत्र से हमारी रक्षा करो. (६)
इदं विद्वानाञ्जन सत्यं वक्ष्यामि नानृतम्.
सनेयमश्वं गामहमात्मानं तव पूरुष.. (७)
हे अंजन! तेरी महिमा को जानता हुआ मैं यथार्थ ही कहूंगा, असत्य नहीं बोलूंगा.
तुम्हारा दास बन कर मैं घोड़ा, गाय एवं जीवन को प्राप्त करूं. (७)
त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः.
वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता.. (८)
कठिनता से जीवित रखने वाला ज्वर, सन्निपात और सर्प का विष—ये तीन दास के
समान अंजन मणि के वश में हैं. अर्थात् अंजनमणि इन के विकार को दूर कर देती है. पर्वतों
में सब से प्राचीन त्रिककुद तुम्हारा पिता है. (८)
यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि.
यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः.. (९)
हिमालय पर्वत के ऊपर के भाग में त्रिककुद नाम का पर्वत है. वहां उत्पन्न अंजन वृक्ष
सभी राक्षसों और सभी राक्षसियों को नष्ट करे. (९)
यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे.
उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन.. (१०)
हे अंजन! तू मनुष्यों द्वारा चाहे त्रिककुद पर्वत से संबंधित कहा जाता है अथवा यमुना
से संबंधित. तेरे त्रैककुद और यामुन दोनों ही नाम कल्याणकारी हैं. तू अपने दोनों नामों के
द्वारा हमारी रक्षा कर. (१०)
सूक्त-१० देवता—शंखमणि, तृशन
वाताज्जातो अन्तरिक्षाद् विद्युतो ज्योतिषस्परि.
स नो हिरण्यजाः शङ्खः कृशनः पात्वंहसः.. (१)
वायु से उत्पन्न, अंतरिक्ष से उत्पन्न, बिजली से उत्पन्न, ज्योति मंडल के ऊपर के स्थान से
उत्पन्न तथा स्वर्ग से उत्पन्न शंख पाप से हमारी रक्षा करे. (१)
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यो अग्रतो रोचनानां समुद्रादधि जज्ञिषे.
शङ्खेन हत्वा रक्षांस्यत्रिणो वि षहामहे.. (२)
हे शंख! तू प्रकाशित होने वाले नक्षत्रों के आगे वर्तमान होता है तथा सागर के ऊपर
वाले भाग पर जन्म लेता है. हम तेरे द्वारा राक्षसों और पिशाचों को पराजित करते हैं. (२)
शङ्खेनामीवाममतिं शङ्खेन्रोत सदान्वा:.
शङ्खो नो विश्वभेषज: कृशन: पात्वंहस:.. (३)
हम मणि के रूप में प्राप्त शंख से रोग और सभी अनर्थों के मूल अज्ञान के साथसाथ
दरिद्रता को भी पराजित करते हैं. सभी उपद्रवों का विनाशक और स्वर्ण से उत्पन्न शंख पाप
से हमारी रक्षा करे. (३)
दिवि जातः समुद्रजः सिन्धुतस्पर्याभृतः.
स नो हिरण्यजा: शङ्ख आयुष्यतरणो मणि:.. (४)
शंख पहले स्वर्गलोक में और उस के बाद समुद्र में उत्पन्न हुआ. नदी के उद्गम स्थान से
लाया हुआ तथा स्वर्ण निर्मित शंख और शंख से निर्मित मणि हमारी आयु वृद्धि करने वाली
हो. (४)
समुद्राज्जातो मणिवृ॑त्राज्जातो दिवाकर:.
सो अस्मान्त्सर्वतः पातु हेत्या देवासुरेभ्य:.. (५)
समुद्र अथवा आकाश से उत्पन्न मणि शंख का उपादान है अर्थात् मणि से ही शंख का
निर्माण होता है. यह मणि निर्मित शंख बादलों से बाहर निकले सूर्य के समान चमकता है.
शंख से निर्मित यह मणि हमें देवों और असुरों के भय से बचाए. (५)
हिरण्यानामेको ऽ सि सोमात् त्वमधि जज्ञिषे.
रथे त्वमसि दर्शत इषधौ रोचनस्त्वं प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६)
हे शंख! तू स्वर्ण, रजत आदि भास्वर द्रव्यों में प्रमुख है, क्योंकि तू अमृतमय चंद्रमंडल
से उत्पन्न हुआ है. युद्धों में तू रथों पर दिखाई देने योग्य है. तरकश में भरा हुआ तू दीप्त
दिखाई देता है. इस प्रकार का शंख अथवा शंख से निर्मित मणि हमारी आयु को बढ़ाए. (६)
देवानामस्थि कृशनं बभूव तदात्मन्वच्चरत्यप्स्व १ न्तः.
तत् ते बध्नाम्यायुषे वर्च॑से बलाय दीर्घायुत्वाय
शतशारदाय कार्शनस्त्वाभि रक्षतु.. (७)
इंद्र आदि देवों का जो रक्षक था, वह स्वर्ण शंख का कारण हुआ अर्थात् स्वर्ण से शंख
का निर्माण हुआ. वह स्वर्ण शंख के रूप में शरीर धारण कर के जलों के भीतर विद्यमान
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