अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-३ देवता—स्वर्ग अग्नि
सूक्त-३ देवता—स्वर्ग अग्नि
पुमान् पुंसो ऽ धि तिष्ठ चर्मेहि तत्र ह्वयस्व यतमा प्रिया ते.
यावन्तावग्रे प्रथमं समेयथुस्तद् वां वयो यमराज्ये समानम्.. (१)
हे पुरुषार्थ वाले पुरुष! तू इस पशु धर्म पर चढ़ जा. तू अपने प्रिय व्यक्तियों को भी बुला
ले. पहले जितने पतिपत्नियों ने इस कार्य को किया, उन का और तुम्हारा समान फल हो. (१)
तावद् वां चक्षुस्तति वीर्याणि तावत् तेजस्ततिधा वाजिनानि.
अग्निः शरीरं सचते यदैधो ऽ धा पक्वान्मिथुना सं भवाथः.. (२)
स्वर्ग में तुम्हारे शरीरों को यह अग्नि ही संचित करेगी. उस समय तुम पक्व ओदन के
प्रभाव से इसी रूप में स्वर्ग में होओगे. तुम से उत्पन्न शिशु को भी दर्शन शक्ति तथा उसी
प्रकार का तेज प्राप्त होगा. यह शब्दात्मक यज्ञ भी इसी प्रकार अग्नि के योग्य होगा. (२)
समस्मिंल्लोके समु देवयाने सं स्मा समेतं यमराज्येषु.
पूतौ पवित्रैरुप तद्ध्वयेथां यद्यद् रेतो अधि वां संबभूव.. (३)
इस ओदन के प्रभाव से इस लोक में तुम दोनों साथ रहो. तुम यम मार्ग में तथा यह मेरे
यज्ञ में साथ ही रहो. इन पवित्र यज्ञों को पूरा करने के कारण तुम पवित्र हो चुके हो. तुम ने
जिसजिस कार्य के लिए संकेत किया, तुम उन कर्मों के फल प्राप्त करो. (३)
आपसपुत्रासो अभि सं विशध्वमिमं जीवं जीवधन्याः समेत्य.
तासां भजध्वममृतं यमाहुर्यमोदनं पचति वां जनित्री.. (४)
हे पति और पत्नियो! तुम दीर्घरूपी जल हो. इस जीवन में धन्य होते हुए प्रवेश करो.
तुम्हारा उत्पादन जल्द ही ओदन को पकाता है. तुम उसी जल के अमृतमय अंश का सेवन
करो. (४)
यं वां पिता पचति यं च माता रिप्रान्निर्मुक्त्यै शमलाच्च वाचः.
स ओदनः शतधारः स्वर्ग उभे व्याप नभसी महित्वा.. (५)
माता और पिता यदि वाणी जन्य पाप से अथवा अन्य पाप से निवृत्त होने के लिए
ओदन पकाते हैं तो वह ओदन अपनी महिमा से स्वर्ग और द्यावा पृथ्वी में व्याप्त होता है. (५)
उभे नभसी उभयांश्च लोकान् ये यज्वनामभिजिताः स्वर्गाः.
तेषां ज्योतिष्मान् मधुमान् यो अग्रे तस्मिन् पुत्रैर्जरसि सं श्रयेथाम्.. (६)
हे पति और पत्नी! यजमान आकाश और पृथ्वी पर तथा जिन लोकों में अधिकार पाते
हैं, उन में जो प्रकाशित और मधुमय लोक है. उस लोक को अथवा पृथ्वी और स्वर्ग दोनों
लोकों को प्राप्त करो तथा संतान से संपन्न होते हुए वृद्धावस्था तक जीवित रहो। (६)
प्राचींप्राचीं प्रदिशमा रभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते.
यद् वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दम्पती सं श्रयेथाम्.. (७)
हे पति और पत्नी! तुम पूर्व की ओर बढ़ो. उस स्वर्ग पर श्रद्धालु जन ही चढ़ पाते हैं.
तुम ने जो पका हुआ ओदन अग्नि पर रखा है उस की रक्षा के लिए खड़े रहो. (७)
दक्षिणां दिशमभि नक्षमाणौ पर्यावर्तेथामभि पात्रमेतत्.
तस्मिन् वां यमः पितृभिः संविदानः पक्वाय शर्म बहुलं नि यच्छात्.. (८)
हे पति और पत्नी! तुम दक्षिण की ओर जा कर इस की प्रदक्षिणा करते हुए आओ.
असमय पितरों से सहमत हुए यमराज तुम्हारे ओदन के लिए अनेक प्रकार के कल्याण प्रदान
करें. (८)
प्रतीची दिशामियमिद् वरं यस्यां सोमो अधिपा मृडिता च.
तस्यां श्रयेथां सुकृतः सचेथामधा पक्वान्मिथुना सं भवाथः.. (९)
पश्चिम दिशा में स्वामी और सुख देने वाला व्योम है, इसलिए यह दिशा श्रेष्ठ मानी जाती
है. तुम इस दिशा में पके हुए ओदन को रख कर पुण्य कर्मों का फल प्राप्त करो. फिर इस
पके हुए ओदन के प्रभाव से तुम दोनों स्वर्ग और पृथ्वी पर प्रकट होओ. (९)
उत्तरं राष्ट्रं प्रजयोत्तरावद् दिशामुदीचीं कृणवन्नो अग्रम्.
पाङ्क्तं छन्दः पुरुषो बभूव विश्वैर्विश्वाङ्गैः सह सं भवेम.. (१०)
उत्तर दिशा प्रजाओं से युक्त है. यह श्रेष्ठ दिशा हम को श्रेष्ठता प्रदान करे. पंक्ति छंद
ओदन के रूप में प्रकट होता है. हम भी पृथ्वी और स्वर्ग को अपने सभी अंगों सहित प्राप्त
हों. (१०)
ध्रुवेयं विराणनमो अस्त्वस्यै शिवा पुत्रेभ्य उत मह्यमस्तु.
सा नो देव्यदिते विश्ववार इर्य गोपा अभि रक्ष पक्वम्.. (११)
यह वरण करने योग्य तथा खंड न होने वाली पृथ्वी है. यह हमारे लिए सुख देने वाली
हो. यह हमारे पुत्रों का मंगल करे तथा नियुक्त रक्षक के समान यह ओदन की रक्षा करे. (११)
पितेव पुत्रानभि सं स्वजस्व नः शिवा नो वाता इह वान्तु भूमौ.
यमोदनं पचतो देवते इह तन्नस्तप उत सत्यं च वेत्तु.. (१२)
हे पृथ्वी! जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों का आलिंगन करता है, उसी प्रकार तुम इस
ओदन का आलिंगन करो. यहां मंगलमय वस्तु प्रवाहित हो. तुम हमारे ओदन को तपाओ तथा
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हमारे यथार्थ संकल्प को जानो. (१२)
यद्यत् कृष्णः शकुन एह गत्वा त्सरन् विषक्तं बिल आससाद.
यद्वा दास्या ३ र्द्रहस्ता समङ्क्त उलूखलं मुसलं शुम्भतापः.. (१३)
कौवे ने कपट कर के इस में बिल बनाया हो अथवा दासी ने भीगे हुए हाथ से मूसल
और उलूखल का स्पर्श कर लिया हो, तब भी यह मंगलकारक हो. (१३)
अयं ग्रावा पृथुबुध्नो वयोधाः पूतः पवित्रैरप हन्तु रक्षः.
आ रोह चर्म महि शर्म यच्छ मा दम्पती पौत्रमघं नि गाताम्.. (१४)
यह दृढ़ पाषाण हवि धारण करने वाला है. यह शुद्ध हो कर राक्षसों को नष्ट करे. हे
ओदन! तू चरम पर आता हुआ कल्याण करने वाला हो. इस दंपती के पौत्र को उन का पाप
न छू सके. (१४)
वनस्पतिः सह देवैर्न आगन् रक्षः पिशाचाँ अपबाधमानः.
स उच्छ्रायैतै प्र वदाति वाचं तेन लोकां अभि सर्वांजयेम.. (१५)
यह वनस्पति राक्षसों और पिशाचों को रोकती हुई हम को प्राप्त हुई है. वह हमें उच्च
स्वर वाला तथा सभी लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला बनाए. (१५)
सप्त मेधान् पशवः पर्यगृह्णन् य एषां ज्योतिष्माँ उत यश्चकर्श.
त्रयस्त्रिंशद् देवतास्तान्सचन्ते स नः स्वर्गमभि नेष लोकम्.. (१६)
इन चावलों में जो पतला, परंतु अधिक चमकता हुआ है, ऐसे सात चावलों को लोगों ने
पशु के समान ग्रहण किया है. यह तैंतीस देवताओं के द्वारा सेवन करने योग्य है. यह ओदन
हम को स्वर्ग में पहुंचाए. (१६)
स्वर्गं लोकमभि नो नयासि सं जायया सह पुत्रैः स्याम.
गृह्णामि हस्तमनु मैत्वत्र मा नस्तारीन्निर्ऋतिर्मो अरातिः.. (१७)
हे ओदन! तू हमें स्वर्ग में लिए जा रहा है. वहां हम स्त्रीपुरुषों सहित प्रकट हों. पाप
देवता निर्ऋति और शत्रु वहां हम को अपने वश में न करें इसलिए तू अनुगमन कर. मैं तेरे
हाथ को पकड़ रहा हूं. (१७)
ग्राहिं पाप्मानमति ताँ अयाम तमो व्यस्य प्र वदासि वल्गु.
वानस्पत्य उद्यतो मा जिहिंसीर्मा तण्डुलं वि शरीर्देवयन्तम्.. (१८)
हे वनस्पति! तुम पाप से उत्पन्न होने वाले अंधकार को दूर करते हुए मधुर शब्द करती
हो. हम अपने पापों से पार हो जाएं. यह वनस्पति मेरी हिंसा न करे और न मुझे देवमार्ग प्राप्त
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कराने वाले चावलों की हिंसा करे. (१८)
विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्त्सयोनिर्लोकमुप याह्येतम्.
वर्षवृद्धमुप यच्छ शूर्पं तुषं पलावानाप तद् विनक्तु.. (१९)
हे ओदन! तू घृतपृष्ठ अर्थात् घी की पीठ वाला हो कर मत आ. तू परलोक में हमारे साथ
प्रकट होने के लिए हमारे पास आ और वर्षा ऋतु में प्रवृद्ध उपकरण वाले रूप को प्राप्त हो.
वह तुझ से भूसी को अलग करे. (१९)
त्रयो लोका: संमिता ब्राह्मणेन द्यौरेवासौ पृथिव्य१न्तरिक्षम्.
अंशून् गृभीत्वान्वारभेथामा प्यायन्तां पुनरा यन्तु शूर्पम्.. (२०)
आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी इन तीनों लोकों को ब्राह्मण प्राप्त कराता है. हे पति और
पत्नी! तुम चावलों को फटकना आरंभ करो. यह धान उछालते हुए सूप को प्राप्त हो. (२०)
पृथग् रूपाणि बहुधा पशूनामेकरूपो भवसि सं समृद्ध्या.
एतां त्वचं लोहिनीं तां नुदस्व ग्रावा शुम्भाति मलग इव वस्त्रा.. (२१)
हे धान! पशु विभिन्न रूपों वाले होते हैं, परंतु तू एक ही रूप वाला है. तू पाषाण के
द्वारा अपनी भूसी का त्याग कर. (२१)
पृथिवीं त्वा पृथिव्यामा वेशयामि तनू: समानी विकृता त एषा.
यद्यद् द्युत्तं लिखितमर्पणेन तेन मा सुस्रोर्ब्रह्मणापि तद् वपामि.. (२२)
हे मूसल! तू पृथ्वी का बना हुआ है. इसलिए तू पृथ्वी ही है. पृथ्वी की तथा तेरी देह एक
समान है. इसलिए मैं पृथ्वी को ही पृथ्वी पर मार रहा हूं. हे ओदन! मूसल के प्राप्त होने से तेरे
अंग में जो पीड़ा हो रही है, उस पीड़ा से तू भूसी से अलग हो कर छूट जा. मैं तुझे मंत्र द्वारा
अग्नि को अर्पित करता हूं. (२२)
जनित्रीव प्रति हर्यासि सूनुं सं त्वा दधामि पृथिवीं पृथिव्या.
उखा कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषिक्ता.. (२३)
माता जिस प्रकार अपने पुत्र को प्राप्त करती है, उसी प्रकार मैं मूसल रूपी पृथ्वी को
पृथ्वी से मिलाता हूं. वेदी में भी ओखली रूपी कुंभी अर्थात् पकाने वाला पात्र है, इसलिए तू
व्यथित मत हो. तू यज्ञ के आयुधों द्वारा घृत से युक्त की जा चुकी है. (२३)
अग्नि: पचन् रक्षतु त्वा पुरस्तादिन्द्रो रक्षतु दक्षिणतो मरुत्वान्.
वरुणस्त्वा दृंहाद्धरुणे प्रतीच्या उत्तरात् त्वा सोम: सं ददातै.. (२४)
अग्नि पाचन अर्थात् पकाने के कर्म में तेरी रक्षक हो. इंद्र पूर्व से, मरुद्गण दक्षिण से,
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वरुण पश्चिम से तथा सोम उत्तर दिशा की ओर से तेरी रक्षा करें. (२४)
पूताः पवित्रैः पवन्ते अभ्राद् दिवं च यन्ति पृथिवीं च लोकान्.
ता जीवला जीवधन्याः प्रतिष्ठाः पात्र आसिक्ताः पर्यग्निरिन्धाम्.. (२५)
पुण्य कर्मों द्वारा शुद्ध हुए जल तुझे शुद्ध करने वाले हों. वे मेघों द्वारा आकाश में जाते
और फिर पृथ्वी पर आ कर मनुष्यों की सेवा करते हैं. जल पृथ्वी से पुनः अंतरिक्ष में पहुंचते
हैं तथा प्राणियों को सुखी करने वाले पात्र में स्थित होते हैं. अग्नि इन आसक्त होने वाले जलों
को सभी ओर दीप्त करें. (२५)
आ यन्ति दिवः पृथिवीं सचन्ते भूम्याः सचन्ते अध्यन्तरिक्षम्.
शुद्धाः सतीस्ता उ शुम्भन्त एव ता नः स्वर्गमभि लोकं नयन्तु.. (२६)
आकाश से आने वाले ये जल पृथ्वी की सेवा करते हैं तथा पृथ्वी से पुनः आकाश में
पहुंचते हैं. ये पवित्र जल पवित्रता देने वाले हैं. ये जल हम को स्वर्ग की प्राप्ति कराएं. (२६)
उतेव प्रभ्वीरुत संमितास उत शुक्राः शुचयश्चामृतासः.
ता ओदनं दंपतिभ्यां प्रशिष्टा आपः शिक्षन्तीः पचता सुनाथाः.. (२७)
ये जल श्वेत रंग वाले, दमकते हुए एवं अमृत के समान हैं. हे जलो! इस दंपती द्वारा
डाले जाने पर ओदन को शुद्ध करते हुए पकाओ. (२७)
संख्याता स्तोकाः पृथिवीं सचन्ते प्राणापानैः संमिता ओषधीभिः.
असंख्याता ओप्यमानाः सुवर्णाः सर्वं व्यापुः शुचयः शुचित्वम्.. (२८)
प्राण, अपान तथा समान स्वरूप ओषधियों से युक्त पृथ्वी का सेचन करते हैं और
शोभन वर्ण वाले जीवों में प्रविष्ट असंख्य जल शुद्धता देते हुए प्राप्त होते हैं. (२८)
उद्योधन्त्यभि वल्गन्ति तप्ताः फेनमस्यन्ति बहुलांश्च बिन्दून्.
योषेव दृष्ट्वा पतिमुत्वियायैतैस्तण्डुलैर्भवता समापः.. (२९)
ताप देने पर ये जल शब्द करते हैं तथा बूंदों को उड़ाते हुए युद्ध सा करते हैं. हे जलो!
जिस प्रकार पति को देख कर पत्नी उस से मिल जाती है, उसी प्रकार तुम ऋतु में होने वाले
यज्ञ के निमित्त चावलों में मिल जाओ. (२९)
उत्थापय सीदतो बुध्न एनानद्भिरात्मानमभि सं स्पृशन्ताम्.
अमासि पात्रैरुदकं यदेतन्मितास्तण्डुलाः प्रदिशो यदीमाः.. (३०)
हे ओदन की अधिष्ठात्री देवी! मूसल की जड़ से व्यथित होते हुए इन चावलों को
उठाओ. ये जल से मिलें. हे यजमान! तू जल को पात्रों द्वारा नाप रहा है. इधर ये चावल भी
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