सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-८६ देवता—एक वृष

यथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः.
एवा ते अग्निना यक्ष्मं वैश्वानरेण वारये.. (३)
त्वष्टा का पुत्र वृत्रासुर जिस प्रकार स्थावर और जंगम विश्व का पोषण करने वाले इन
मेघों के जलों की गति रोकता है, हे रोगी! मैं वैश्वानर अग्नि की सहायता से तेरे यक्ष्मा रोग का
उसी प्रकार निवारण करता हूं. (३)
सूक्त-८६ देवता—एक वृष
वृषेन्द्रस्य वृषा दिवो वृषा पृथिव्या अयम्.
वृषा विश्वस्य भूतस्य त्वमेकवृषो भव.. (१)
यह पुरुष इंद्र की कृपा से सेचन समर्थ हो. यह द्युलोक एवं पृथ्वीलोक में श्रेष्ठ बने. हे
श्रेष्ठता के इच्छुक पुरुष! तू संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (१)
समुद्र ईशे स्रवतामग्निः पृथिव्या वशी.
चन्द्रमा नक्षत्राणामीशे त्वमेकवृषो भव.. (२)
सागर बहने वाले जलों का स्वामी है. अग्नि देव पृथ्वी के स्वामी हैं. चंद्रमा नक्षत्रों का
स्वामी है. तुम सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनो. (२)
सम्राडस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम्.
देवानामधर्धभागसि त्वमेकवृषो भव.. (३)
हे इंद्र! तुम असुरों के स्वामी हो. तुम बैल की ठाट के समान सभी मनुष्यों में उन्नत बनो.
हे इंद्र! सभी देव मिल कर तुम्हारे बराबर होते हैं. हे श्रेष्ठता के इच्छुक मनुष्य! तू इंद्र की कृपा
से सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (३)
सूक्त-८७ देवता—ध्रुव
आ त्वाहार्षमन्तर भूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलत्.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१)
हे राजन्! हम तुम्हें अपने राष्ट्र में लाए हैं! तुम हमारे मध्य हमारे स्वामी बनो. तुम
चंचलता रहित हो कर राज्य के अधिकार पर दृढ़ बनो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. यह राष्ट्र
तुम्हारे अधिकार से भ्रष्ट न हो. (१)
इहैवैधि मा स प च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलत्.
इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे राजन्! तुम इसी राज्य सिंहासन पर सदा वर्तमान रहो. इस से कभी वंचित न बनो.
तुम पर्वत के समान निश्चल हो कर इंद्र के समान इसी राष्ट्र में स्थिर रहो. तुम अपने इस राष्ट्र
को धारण करो. (२)
इन्द्र एतमदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा.
तस्मै सोमो अधि ब्रवदयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (३)
स्थिरता प्रदान करने वाले हमारे द्वारा दिए हुए हवि से संतुष्ट इंद्र ने इस राष्ट्र में इस राजा
को स्थिर रूप से स्थापित किया है. सोम ने इस राजा को अपना कहा है. वेद राशि का पालन
करने वाले ब्रह्म देव यही कहें. (३)
सूक्त-८८ देवता—ध्रुव
ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्.
ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवो राजा विशामयम्.. (१)
आकाश जिस प्रकार स्थित है, यह पृथ्वी जिस प्रकार ध्रुव दिखाई देती है. यह दिखाई
देता हुआ विश्व जिस प्रकार ध्रुव है तथा ये सभी पर्वत जिस प्रकार स्थिर हैं, प्रजाओं का
स्वामी यह राजा भी उसी प्रकार स्थिर हो. (१)
ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः.
ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (२)
हे राजन्! राजा वरुण तुम्हारे राज्य को स्थिर करें. प्रकाश करते हुए बृहस्पति तुम्हारे
राष्ट्र को ध्रुव बनाएं. इंद्र और अग्नि तुम्हारे राष्ट्र को स्थिर बनाएं. (२)
ध्रुवो ऽ च्युतः प्र मृणीहि शत्रूनूछत्रूयतो ऽ धरान् पादयस्व.
सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीर्ध्रुवाय ते समितिः कल्पतामिह.. (३)
हे राजन्! तुम इस राष्ट्र में स्थिर और अच्युत रह कर शत्रुओं का विनाश करो तथा
शत्रुओं के समान आचरण करने वाले अन्य जनों को भी अधोमुख गिराओ. सभी दिशाएं
सौमनस्य वाली बन कर तुम्हारी सेवा में लगें. तुम्हारा यह आयोजन सभी दिशाओं में तुम्हें
स्थिरता प्रदान करने में समर्थ हो. (३)
सूक्त-८९ देवता—मंत्रों में बताए गए
इदं यत् प्रेण्यः शिरो दत्तं सोमेन वृष्ण्यम्.
ततः परि प्रजातेन हार्दिं ते शोचयामसि.. (१)
मुझ प्रेम प्राप्त करने वाले का जो यह शक्ति प्रदान करने वाला शीश है, वह मुझे सोम ने

दिया है. उन के द्वारा उत्पन्न विशेष स्नेह से मैं तुम्हारे मन को संताप युक्त करता हूं. (१)
शोचयामसि ते हार्दि शोचयामसि ते मनः.
वातं धूम इव सध्य १ ङ् मामेवान्वेतु ते मनः.. (२)
हे पति और पत्नी! मैं तुम दोनों के हृदयों को परस्पर प्रेम उत्पन्न कर के संतप्त करता
हूं. मैं तुम्हारे मन को उसी प्रकार संतप्त करता हूं, जिस प्रकार धुआं वायु का अनुगमन करता
है. तुम्हारा मन इसी प्रकार मेरा अनुगामी हो. (२)
मह्यं त्वा मित्रावरुणो मह्यं देवी सरस्वती.
मह्यं त्वा मध्यं भूम्या उभावन्तौ समस्यताम्.. (३)
हे पत्नी! मित्र और वरुण देव तुम्हें मुझ से मिलाएं. सरस्वती देवी तुम्हें मुझ से मिलाएं.
धरती पर स्थित सभी प्राणी तुम्हें मुझ से मिलाएं तथा इस भूमि के ऊपर और नीचे के प्रदेश
तुम्हें मुझ से मिलाएं. (३)
सूक्त-९० देवता—रुद्र
यां ते रुद्र इषुमास्यदङ्गेभ्यो हृदयाय च.
इदं तामद्य त्वद् वयं विषूचीं वि वृहामसि.. (१)
हे रोगी! तेरे हाथ, पैर और हृदय आदि अंगों को बेधने के लिए रुद्र देव ने जो बाण
अपने धनुष पर चढ़ा कर फेंका है, आज मैं उस का प्रतिकार करने के लिए उस बाण को तुझ
से विमुख करने के लिए शरीर से दूर फेंकता हूं. (१)
यास्ते शतं धमनयो ऽ ङ्गान्यनु विष्ठिताः.
तासां ते सर्वासां वयं निर्विषाणि ह्वयामसि.. (२)
हे शूल रोगी! तेरे हाथ, पैर आदि अंगों में जो सैकड़ों धमनी नाड़ियां स्थित हैं, उन के
लिए मैं विषरहित एवं शूलहीन ओषधियां बनाता हूं. (२)
नमस्ते रुद्रास्यते नमः प्रतिहितायै. नमो विसृज्यमानायै नमो निपतितायै..
(३)
हे व्याधि रूप अस्त्र चलाने वाले रुद्र! तुम को नमस्कार है. धनुष पर चढ़े हुए तुम्हारे
बाण को नमस्कार है. धनुष से छोड़े जाते हुए तुम्हारे बाण को नमस्कार है. लक्ष्य पर गिरने
वाले तुम्हारे बाण को नमस्कार है. (३)
सूक्त-९१ देवता—यक्ष्मा का विनाश
ebook converter DEMO Watermarks*

इमं यवमष्टायोगैः षड्योगेभिरचर्कृषुः. तेना ते तन्वो ३ रपो ऽ पाचीनमप
व्यये.. (१)
ओषधि के रूप में प्रयोग में लाए जाते हुए जौ को आठ बैलों वाले तथा छः बैलों वाले
हल से जोत कर उत्पन्न किया गया है. हे रोगी! उस जौ से मैं तेरे शरीर के रोग के कारण पाप
को दूर करता हूं. (१)
न्यग्् वातो वाति न्यक् तपति सूर्यः. नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग् भवतु ते
रपः.. (२)
वायु जिस प्रकार नीचे चलती है, सूर्य जिस प्रकार नीचे तपते हैं, जिस प्रकार गायों से
नीचे की ओर दूध काढ़ा जाता है, हे रोगी! उसी प्रकार तेरे रोग का कारण पाप शांत हो जाए.
(२)
आप इद् वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः.
आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (३)
सभी ओषधियां जल का विकार हैं. इस प्रकार जल ही रोग निवारण के लिए उत्तम
ओषधि है. जल सारे संसार के लिए ओषधि रूप है, वे ही जल तेरे लिए रोग निवारक ओषधि
बनें. (३)
सूक्त-९२ देवता—बाजि अर्थात् घोड़ा
वातरंहा भव वाजिन् युज्यमान इन्द्रस्य याहि प्रसवे मनोजवाः.
युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (१)
हे रथ के जुए में जुते हुए अश्व! तू वायु के समान तेज चलने वाला बन. इंद्र की प्रेरणा
होने पर तू मन के समान वेग से गंतव्य पर पहुंच. सारे संसार को जानने वाले उनचास
मरुद्गण तुझ से मिल जाएं एवं त्वष्टा देव तेरे चरणों को वेग प्रदान करें. (१)
जवस्ते अर्वन् निहितो गुहा यः श्येने वात उत यो ऽ चरत् परीत्तः.
तेन त्वं वाजिन् बलवान् बलेनाजिं जय समने पारयिष्णुः.. (२)
हे अश्व! तेरा वेग असाधारण स्थान गुफा में छिपा है. तेरा जो वेग बाज पक्षी और वायु
में सुरक्षित है, तू उसी वेगशाली बल से बलवान हो कर हमें संग्राम में सफलता दिला. (२)
तनूष्टे वाजिन् तन्वं१ नयन्ती वाममस्मभ्यं धातवु शर्म तुभ्यम्.
अहुतो महो धरुणाय देवो दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीयात्.. (३)
हे वेगवान अश्व! सवार के शरीर को युद्धभूमि में पहुंचाता हुआ तेरा शरीर हमें धन प्राप्त
ebook converter DEMO Watermarks*