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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१० देवता—इष्टका

(५)
एकशतं विष्कन्धानि विष्ठिता पृथिवीमनु.
तेषां त्वामग्र उज्जह्रुर्माणं विष्कन्धदूषणम्.. (६)
हे मणि! धरती पर एक सौ एक विघ्न हैं. देवों ने उन की शांति के लिए तुझे धारण
किया था. हे विघ्नों को दूर करने वाली मणि! मैं भी तुझे उसी उद्देश्य से धारण करता हूं. (६)
सूक्त-१० देवता—इष्टका
प्रथमा ह व्यु वास सा धेनुरभवद् यमे.
सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्.. (१)
सृष्टि के आदि में उत्पन्न एकाष्टका उषा ने अंधकार दूर कर दिया था. यह हमारे पूर्वजों
के लिए दूध देने वाली हुई थी. यह हमारे लिए भी दूध देने वाली हो और अभिमत फल प्रदान
करे. (१)
यां देवाः प्रतिनन्दन्ति रात्रिं धेनुमुपायतीम्.
संवत्सरस्य या पत्नी सा नो अस्तु सुमङ्गली.. (२)
जिस एकाष्टका संबंधी रात्रि को धेनु के रूप में समीप आती हुई देख कर हवि का भोग
देने वाले देवगण, उस की प्रशंसा करते हैं. वह एकाष्टका रात्रि संवत्सर की पत्नी है. वह हमारे
लिए कल्याण करने वाली हो. (२)
संवत्सरस्य प्रतिमां यां त्वा रात्र्युपास्महे.
सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज.. (३)
हे रात्रि! तुम संवत्सर की प्रतिमा हो. हम तुम्हारी उपासना करते हैं. तुम हमारे पुत्र, पौत्र
आदि को लंबी आयु वाला बनाओ तथा हमें गाय आदि धन से संपन्न करो. (३)
इयमेव सा या प्रथमा व्यौच्छदास्वितरासु चरति प्रविष्टा.
महान्तो अस्यां महिमानो अन्तर्वधूर्जिगाय नवगज्जनेत्री.. (४)
यह आज की एकाष्टक लक्षणा वह प्रथम उत्पन्न उषा है, जिस ने सृष्टि के आरंभ में
उत्पन्न हो कर अंधकार का विनाश किया था. वही उषा इन दिखाई देने वाली अन्य उषाओं में
अनुगत हो कर उदित होती है. इस उषा में असीमित महिमा है. इस में सूर्य, अग्नि और सोम
का निवास है. सूर्य की पत्नी, यह उषा प्राणियों को प्रकाश देती हुई सब से उत्तम रहे. (४)
वानस्पत्या ग्रावाणो घोषमक्रत हविष्कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्.
एकाष्टके सुप्रजसः सुवीरा वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (५)
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हे एकाष्टक वृक्षों से बने ऊखल! मूसल आदि ने तथा पत्थरों ने संवत्सर में तैयार होने
वाले जौ, धान आदि कूटतेपीटते हुए शब्द किया है. तुम्हारी कृपा से हम उत्तम पुत्र, पौत्रों,
शक्तिशाली सेवकों तथा धनों के स्वामी बनें. (५)
इडायास्पदं घृतवत् सरीसृपं जातवेदः प्रति हव्या गृभाय.
ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपास्तेषां सप्तानां मयि रन्तिर्स्तु.. (६)
हे जातवेद अग्नि! तुम हव्य ग्रहण करो. तुम्हारी कृपा से दूध, घी देने वाली गाएं, तेज
दौड़ने वाले घोड़े तथा गांव में होने वाले बकरी, भेड़, गधा, ऊंट आदि नाना आकार वाले सात
प्रकार के पशु मुझ से प्रेम रखें. (६)
आ मा पुष्टे च पोषे च रात्रि देवानां सुमतौ स्याम.
पूर्णा दर्वे परा पत सुपूर्णा पुनरा पत.
सर्वान् यज्ञान्त्संभुञ्जतीषमूर्जं न आ भर.. (७)
हे रात्रि! मुझे समृद्ध धन और पुत्र, पौत्र आदि का स्वामी बनाओ. तुम्हारी कृपा से मैं
देवों का भी कृपापात्र बनूं. हे दर्वी अर्थात् हवन के साधन पात्र! तू हवि से पूर्ण हो कर देवों के
पास जा और वहां से हमारे मन चाहे फल ले कर हमारे समीप आ. तू हवि से सभी यज्ञों का
पालन करता हुआ देवों के पास से अन्न और बल ला कर हमें प्रदान कर. (७)
आयमगन्त्संवत्सरः पतिरेकाष्टके तव.
सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज.. (८)
हे एकाष्टका! यह संवत्सर आ गया है. यह तेरा पति है. तू अपने पति संवत्सर के सहित
हमारी संतान को अधिक आयु वाली करती हुई हमें धन संपन्न बना. (८)
ऋतून् यज ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्.
समाः संवत्सरान् मासान् भूतस्य पतये यजे.. (९)
हे एकाष्टका! मैं वसंत आदि ऋतुओं को और उन के अधिष्ठाता देवों को हृदय के द्वारा
प्रसन्न करता हूं. मैं ऋतु संबंधी, दिनरात संबंधी और बारह मासों से संबंधित यज्ञ करता हूं. मैं
चराचर प्राणियों के स्वामी काल के निमित्त भी तेरे द्वारा यज्ञ करता हूं. (९)
ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः.
धात्रे विधात्रे समृद्धे भूतस्य पतये यजे.. (१०)
हे एकाष्टका! मैं वसंत आदि ऋतुओं, ऋतु संबंधी दिनरात, बारह मासों, संवत्सर के
धाता विधाता देवों और सभी चराचर प्राणियों के स्वामी काल के निमित्त तेरा यज्ञ करता हूं.
(१०)
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इडया जुह्वतो वयं देवान् घृतवता यजे.
गृहान्लुभ्यतो वयं सं विशेमोप गोमतः.. (११)
हम गाय के घी से युक्त हवि के द्वारा यज्ञ करते हुए देवों को प्रसन्न करते हैं. उन देवों की
कृपा से हम सभी अभिलषित वस्तुओं एवं अनेक गायों से युक्त घरों को प्राप्त कर के उन में
सुख से निवास करें. (११)
एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भं महिमानमिन्द्रम्.
तेन देवा व्यसहन्त शत्रून् हन्ता दस्यूनामभवच्छचीपतिः.. (१२)
सब की स्वामिनी एकाष्टका ने तपस्या के द्वारा महिमा युक्त इंद्र को जन्म दिया. इंद्र की
सहायता से देवों ने शत्रुओं को पराजित किया. शची देवी के पति वह इंद्र, दस्यु जनों के
विनाशक हुए. (१२)
इन्द्रपुत्रे सोमपुत्रे दुहितासि प्रजापतेः.
कामानस्माकं पूरय प्रति गृह्णाहि नो हविः.. (१३)
हे इंद्र और सोम की माता एकाष्टका! तू प्रजापति की पुत्री है. तू हमारे द्वारा दी हुई हवि
को स्वीकार करती हुई हमें सतान तथा पशुओं से संपन्न बना. (१३)
सूक्त-११ देवता—इंद्र, अग्नि आदि
मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्.
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (१)
हे व्याधिग्रस्त मनुष्य! मैं हवि के अन्न द्वारा तुझे उस यक्ष्मा रोग से मुक्त करता हूं जो मेरे
जाने बिना ही तेरे शरीर में प्रवेश कर गया है. राजा सोम को जिस राजयक्ष्मा ने गृहीत किया
था, दीर्घ जीवन के लिए उस से भी मैं तुझे मुक्त करता हूं. हे इंद्र और अग्नि! जिस पिशाचिनी
ने इस बालक को पकड़ लिया है, आप दोनों उस से इस बालक को छुड़ाइए. (१)
यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव.
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय.. (२)
यह व्याधिग्रस्त मनुष्य चाहे क्षीण आयु वाला हो गया हो अथवा इस लोक को छोड़ कर
मृत्यु के देव यमराज के समीप चला गया हो अर्थात् चाहे उस की चिकित्सा असंभव हो-इस
प्रकार के पुरुष को भी मैं मृत्यु के पास से वापस ला कर सौ वर्ष जीवित रहने के लिए
शक्तिशाली बनाता हूं. (२)
सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.
इन्द्रो यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (३)
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जो हवि देखने की शक्ति प्रदान करती है तथा जिस से सुनने आदि की सैकड़ों शक्तियां
प्राप्त होती हैं, उस हवि की शक्ति से मैं इस रोगी को मृत्यु से लौटा लाया हूं. उस हवि में सौ
वर्ष जीने का फल प्रदान करने की शक्ति है. मैं हवि के द्वारा इंद्र को इस कारण प्रसन्न करता
हूं कि ये इस पुरुष को सैकड़ों वर्ष तक की आयु का विनाश करने वाले पापों से छुटकारा
दिलाएं. इस प्रकार यह सौ वर्ष तक जीवित रह सके. (३)
शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्.
शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.. (४)
हे रोग से मुक्त पुरुष! तुम प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करते हुए सौ शरद ऋतुओं, सौ हेमंत
ऋतुओं और सौ वसंत ऋतुओं तक जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति तुम्हें सौ
वर्ष की आयु प्रदान करें. सैकड़ों वर्ष की आयु प्रदान करने वाले हवि के द्वारा मैं इसे मृत्यु के
पास से लौटा लाया हूं. (४)
प्र विशतं प्राणापानावन्डवाहाविव व्रजम्.
व्य १न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम्.. (५)
हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार वृषभ अपनी पशुशाला में प्रवेश करता है, उसी
प्रकार तुम इस क्षय रोग से ग्रस्त रोगी के शरीर में प्रवेश करो. इस राजयक्ष्मा के अतिरिक्त, जो
मृत्यु के हेतु सैकड़ों रोग कहे गए हैं, वे भी इस रोगी से विमुख हो जाएं. (५)
इहैव स्तं प्राणापानौ माप गातमितो युवम्.
शरीरमस्याङ्गानि जरसे वहतं पुनः.. (६)
हे प्राण और अपान वायु! तुम इस के शरीर में ही रहो, इस के शरीर से अकाल में ही
मत निकलो. इस रोगी व्यक्ति के शरीर के हस्त, चरण आदि अंगों को तुम वृद्धावस्था तक मत
त्यागो. (६)
जरायै त्वा परि ददामि जरायै नि धुवामि त्वा.
जरा त्वा भद्रा नेष्ट व्य १ न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम्.. (७)
हे रोग मुक्त पुरुष! मैं तुझे वृद्धावस्था को देता हूं अर्थात् तुझे वृद्धावस्था तक जीवित
रहने वाला बनाता हूं. मैं वृद्धावस्था तक रोगों से तेरी रक्षा करता हूं. वह वृद्धावस्था तुझे
कल्याण प्राप्त कराए. (७)
अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्वा.
यस्त्वा मृत्युरभ्यधत्त जायमानं सुपाशया.
तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद् बृहस्पतिः.. (८)
हे रोग मुक्त पुरुष! जिस प्रकार गर्भाधान में समर्थ बैल को रस्सी से बांधा जाता है, उसी
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