अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१०७ देवता—विश्वजित्
मध्ये ह्रदस्य नो गृहाः पराचीना मुखा कृधि.. (२)
हमारा वह घर जल का स्थान एवं सागर का निवेश बने. हमारे घर गहरे तालाबों के मध्य में हों. हे अग्नि! तुम अपने ज्वाला रूपी मुख हमारी ओर से फेर लो. (२)
हिमस्य त्वा जरायुणा शाले परि व्ययामसि.
शीतह्रदा हि नो भुवो ऽ निष्कृणोतु भेषजम्.. (३)
हे शाला! हम तुझे हिमालय के शीतल जल से इस प्रकार घेरते हैं, जिस प्रकार जरायु गर्भ को तथा शैवाल जल को घेरता है. हे शाला! तू हमारे लिए शीतल जल वाली बन जा. हमारी प्रार्थना सुन कर अग्नि हमारे घरों को जलने से बचाने वाली ओषधि बनें. (३)
सूक्त-१०७ देवता—विश्वजित्
विश्वजित् त्रायमाणायै मा परि देहि.
त्रायमाणे द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (१)
हे विश्वजित् देव! जगत् का पालन करने वाली देवी के लिए रक्षा के हेतु मुझ स्वस्त्ययन इच्छुक को दो. हे त्रायमाणा नामक देवी! हमारे दो पैरों वाले सभी पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करो तथा मेरे सभी चौपायों की भी रक्षा करो. (१)
त्रायमाणे विश्वजिते मा परि देहि.
विश्वजिद् द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (२)
हे पालन करने वाली देवी त्रायमाणा! मुझे विश्वजित् नाम के देवता को दे दो. हे सब को जीतने वाले! हमारे दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और सभी चौपायों की रक्षा करो. (२)
विश्वजित् कल्याण्यै मा परि देहि.
कल्याणि द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (३)
हे विश्वजित्! मुझे सर्वमंगलकारिणी देवी को दे दो. हे कल्याणी! हमारे सभी दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और चौपायों की रक्षा करो. (३)
कल्याणि सर्वविदे मा परि देहि.
सर्वविद् द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (४)
हे कल्याणी! मुझे सब कुछ जानने वाले देव को दे दो. हे सर्वहित! हमारे सभी दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और चौपायों की रक्षा करो. (४)
सूक्त-१०८ देवता—मेधा, अग्नि
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त्वं नो मेधे प्रथमा गोभिरश्वेभिरा गहि.
त्वं सूर्यस्य रश्मिभिस्त्वं नो असि यज्ञिया.. (१)
हे देव और मनुष्य आदि के द्वारा उपासना की जाती हुई मेधा देवी! तुम हमें देने के लिए
गाय और अश्वों के साथ आओ. तुम सूर्य की किरणों के समान अपनी व्याप्ति की सामर्थ्य के
साथ हमारे समीप आओ. तुम हमारे लिए यज्ञ के योग्य हो. (१)
मेधामहं प्रथमां ब्रह्मणवतीं ब्रह्मजूतामृषिष्टुताम्.
प्रपीतां ब्रह्मचारिभिर्देवानामवसे हुवे.. (२)
मैं वेदों से युक्त एवं देव, मनुष्य आदि के द्वारा पूजी जाती हुई मेधा देवी का आह्वान
करता हूं. ब्राह्मणों के द्वारा सेवित, ऋषियों के द्वारा स्तुति की गई और ब्रह्मचारियों द्वारा
सेवित मेधा देवी को मैं इंद्र आदि की रक्षा पाने के लिए बुलाता हूं. (२)
यां मेधामृभवो विदुर्यां मेधामसुरा विदुः.
ऋषयो भद्रां मेधां यां विदुस्तां मय्या वेशयामसि.. (३)
ऋभु नाम के देव जिस मेधा को जानते थे, जिस मेधा को राक्षस जानते थे तथा वसिष्ठ
आदि ऋषि वेद शास्त्र विषयक जिस मेधा को जानते थे, उसे हम अपने में स्थापित करते हैं.
(३)
यामृषयो भूतकृतो मेधां मेधाविनो विदुः.
तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कृणु.. (४)
जिस मेधा को पृथ्वी आदि तत्त्वों का निर्माण करने में समर्थ, मंत्र द्रष्टा एवं प्रसिद्ध ऋषि
जानते हैं. हे अग्नि! उसी मेधा के द्वारा तुम मुझे मेधावी बनाओ. (४)
मेधां सायं मेधां प्रातर्मेधां मध्यन्दिनं परि.
मेधां सूर्यस्य रश्मिभिर्वचसा वेशयामहे.. (५)
मैं प्रातःकाल, सायंकाल और मध्याह्न काल में मेधा देवी की स्तुति करता हूं. मैं सूर्य की
किरणों के साथ दिन में स्तुति वचनों के द्वारा उस महानुभावा मेधा को अपने में स्थापित
करता हूं. (५)
सूक्त-१०९ देवता—पिप्पली
पिप्पली क्षिप्तभेषज्यु ३ तातिविद्धभेषजी.
तां देवाः समकल्पयन्नियं जीवितवा अलम्.. (१)
पिप्पली अर्थात् पीपल ने सभी ओषधियों का तिरस्कार कर दिया है तथा सभी रोगों को
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पीड़ित किया है. इंद्र आदि देवों ने अमृत मंथन के समय इस का निर्माण किया था, क्योंकि
यही एक ओषधि सभी रोगों के निवारण में समर्थ है. (१)
पिप्पल्य १: समवदन्तायतीर्जननादधि.
यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. (२)
पिप्पलियों ने सागर मंथन के समय अपने जन्म के पश्चात आ कर आकाश में संभाषण
किया कि जीवित पुरुष को हम ओषधि के रूप में व्याप्त करते हैं. वह पुरुष नष्ट न हो. (२)
असुरास्त्वा न्यखनन् देवास्त्वोदवपन् पुनः.
वातीकृतस्य भेषजीमथो क्षिप्तस्य भेषजीम्.. (३)
हे पिप्पली! असुरों ने तुझे खोदा तथा देवों ने सभी प्राणियों के हित के लिए तुझे
उखाड़ा. तुम वातरोग से पीड़ित की ओषधि बनी हुई आक्षेपक अर्थात् मिरगी नाम के वातरोग
की ओषधि हो. (३)
सूक्त-११० देवता—अग्नि
प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि.
स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रायस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व.. (१)
सभी देवों की आत्मा होने के कारण ये अग्नि चिरंतन हैं. ये स्तुति के योग्य एवं यज्ञों में
देवों को बुलाने वाले हैं. हे अग्नि! इस प्रकार तुम नवीन बने रहते हो. तुम अपने शरीर को घृत
आदि से पूर्ण करो तथा हमारे लिए सौभाग्य प्रदान करो. (१)
ज्येष्ठघ्न्यां जातो विचृतोर्यमस्य मूलबर्हणात् परि पाह्येनम्.
अत्येनं नेषद् दुरितानि विश्वा दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (२)
ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न पुत्र पिता, बड़े भाई आदि का हंता होता है. मूल नक्षत्र में उत्पन्न
पुत्र पूरे कुल की हिंसा करता है. इसलिए इस कुमार के यम द्वारा किए जाने वाले संतान के
मूलोच्छेद से रक्षा करो. सौ वर्ष तक जीवित रहने के दीर्घ जीवन के लिए सभी पाप इस
कुमार से दूर चले जाएं. (२)
व्याघ्रेऽहन्यजनिष्ट वीरो नक्षत्रजा जायमानः सुवीरः.
स मा वधीत् पितरं वर्धमानो मा मातरं प्र मिनीज्जनित्रीम्.. (३)
बाघ के समान क्रूर एवं पाप नक्षत्र में वीर पुत्र ने जन्म लिया. दुष्ट नक्षत्र में उत्पन्न यह
पुत्र जन्म लेते ही उत्तम शक्ति वाला बने. यह पुत्र बड़ा हो कर पिता का वध न करे तथा जन्म
देने वाली माता की हिंसा न करे. (३)
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