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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 764

हे प्रश्न! हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (३)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्ऋत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (४)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम निर्ऋति अर्थात् पाप देवता के पुत्र हो तथा
यम देव के साधन हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हारे इस रूप को
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ. (४)
विद्म ते स्वप्न जनित्रमभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (५)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम मृत्यु और अभूति अर्थात् दरिद्रता के पुत्र
हो. हे स्वप्न! हम तुम्हें भलिभांति जानते हैं. तुम हमारी बुरे स्वप्नों से रक्षा करो. (५)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्भूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (६)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम निर्भूति अर्थात् निर्धनता के पुत्र और
यमराज के साधन हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं, इसलिए तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ.
(६)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं पराभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (७)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम पराभूति अर्थात् पराजय के पुत्र और
यमराज के साधन हो. तुम यमराज के साधन और मृत्यु हो. हम तुम्हारे स्वरूप को भलीभांति
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (७)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (८)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम इंद्रिय विकारों के पुत्र और यम के साधन
हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न
से बचाओ. (८)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (९)
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