अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१८ देवता—अग्नि
हे अग्नि देव! तुम चक्षु हो, इसीलिए मुझे चक्षु अर्थात् देखने की शक्ति प्रदान करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (६)
परिपाणमसि परिपाणं मे दाः स्वाहा.. (७)
हे अग्नि देव! तुम सभी प्रकार से पालन करने वाले हो, इसीलिए मेरा पालन करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (७)
सूक्त-१८ देवता—अग्नि
भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा.. (१)
हे अग्नि देव! तुम शत्रु का विनाश करने वाले हो, इसीलिए मुझे शत्रु नाश की शक्ति
प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (१)
सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा.. (२)
हे अग्नि देव! तुम विरोधियों का नाश करने वाले हो, इसीलिए तुम मुझे विरोधियों का
विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (२)
अरायक्षयणमस्यरायचातनं मे दाः स्वाहा.. (३)
हे अग्नि देव! तुम दान न करने वालों का विनाश करने वाले हो, इसीलिए मुझे भी दान
न करने वालों का विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ
हो. (३)
पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा.. (४)
हे अग्नि देव! तुम मांस भक्षण करने वाले पिशाचों का नाश करने वाले हो, इसीलिए
मुझे भी पिशाचों का विनाश करने की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया
हुआ हो. (४)
सदान्वाक्षयणमसि सदान्वाचातनं मे दाः स्वाहा.. (५)
हे अग्नि देव! तुम आक्रोश करने वाली पिशाचियों का विनाश करने वाले हो, इसीलिए
मुझे भी पिशाचियों के विनाश की शक्ति प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो.
(५)
सूक्त-१९ देवता—अग्नि
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अग्ने यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो तपाने की शक्ति है, उस से उस को संतप्त करो जो हम से द्वेष
करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (१)
अग्ने यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो संहार की शक्ति है, उस के द्वारा उस का संहार करो जो हम से
द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं. (२)
अग्ने यत् ते ते ऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस के द्वारा उन्हें जलाने के लिए दीप्त बनो जो हम
से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
अग्ने यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे अग्नि देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोकमग्न करने की शक्ति है, उस के द्वारा तुम उन्हें
शोक मग्न करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
अग्ने यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(५)
हे अग्नि देव! तुम्हारा जो तेज है, उस से उन लोगों को तेजहीन बनाओ जो हम से द्वेष
करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं (५)
सूक्त-२० देवता—वायु
वायो यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे वायु देव! तुम्हारी जो संताप पहुंचाने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप पहुंचाओ जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
वायो यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे वायु देव! तुम्हारी जो छीनने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन लोगों के प्रति करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (२)
वायो यत् ते ऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे वायु देव! तुम्हारा जो वेग है, उस का प्रयोग उन के प्रति करो जो हम से द्वेष रखते हैं
अथवा हम जिन से द्वेष रखते हैं. (३)
वायो यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे वायु देव! तुम्हारी जो दूसरों को शोक मग्न करने की शक्ति है, उस का प्रयोग उन
लोगों के प्रति करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
वायो यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः..
(५)
हे वायु देव! तुम्हारा जो तेज है, उस के द्वारा उन्हें तेजहीन बनाओ, जो हम से द्वेष करते
हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
सूक्त-२१ देवता—सूर्य
सूर्य यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (१)
हे सूर्य देव! आप की जो तप्त करने की शक्ति है, उस से उन्हें संताप पहुंचाओ, जो हम
से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
सूर्य यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (२)
हे सूर्य देव! आप की जो सुख, शांति एवं शक्ति हरण करने वाली शक्ति है, उस से उन
लोगों की सुख, शांति एवं शक्ति का हरण करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से
द्वेष करते हैं. (२)
सूर्य यत् ते ऽ र्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (३)
हे सूर्य देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस से उन्हें जलाओ जो हम से द्वेष करते हैं अथवा
हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
सूर्य यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (४)
हे सूर्य देव! तुम्हारी जो शोक मग्न करने की शक्ति है, उस से उन्हें शोक मग्न करो जो
हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (४)
सूर्य यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (५)
हे सूर्य देव! आप का जो तेज है, उस से उन्हें तेजहीन बनाओ जो हम से द्वेष करते हैं
अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (५)
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