अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१ देवता—मंत्रों में कहे गए
अठारहवां कांड
सूक्त-१ देवता—मंत्रों में कहे गए
ओ चित् सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान्.
पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः.. (१)
यमी का कथन—मैं समान प्रसिद्धि वाले मित्र यम को आदर भाव के अनुकूल बनाती
हूं. समुद्र तट के समीप वाले द्वीप में चलते हुए यम अपने पुत्र को मुझ में स्थापित करें. हे
यम! तुम्हारी प्रसिद्धि सभी लोकों में है. तुम सदा तेज से दीप्त रहो. (१)
न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत् सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति.
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन्.. (२)
यम का कथन—मैं तेरा सोदर अर्थात् एक ही पेट से उत्पन्न हुआ तेरा मित्र हूं. पर मैं
भाई और बहन के समागम संबंधी मित्र भाव की इच्छा नहीं करता हूं. तू एक उदर से उत्पन्न
हो कर भी मेरी पत्नी बनने की कामना करती है. मैं ऐसे मित्रभाव को स्वीकार नहीं करता हूं.
शत्रुओं को दबाने वाले महाबली रुद्र के पुत्र मरुद्गण भी इस की निंदा करेंगे. (२)
उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित् त्यजसं मर्त्यस्य.
नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्व१मा विविश्याः.. (३)
यमी—हे यम! मरुद्गण उस मार्ग की इच्छा करते हैं, जिस का मैं ने तुम से निवेदन
किया है. इसलिए तुम अपने मन को मेरी ओर लगाओ. फिर तुम संतान को उत्पन्न करने वाले
मेरे पति बनते हुए भाई के भाव को छोड़ कर मुझ में प्रविष्ट हो जाओ. (३)
न यत् पुरा चकृमा कद्ध नूनमृतं वदन्तो अनृतं रपेम.
गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नौ नाभिः परमं जामि तन्नौ.. (४)
यम—हे यमी! असत्य बात को हम सत्य भाषण करने वाले किस प्रकार सत्य कहें?
जल को धारण करने वाले सूर्य भी आकाश में अपनी पत्नी के सहित स्थित हैं. इसलिए एक
ही माता और पिता वाले हम दोनों उन्हीं के सामने तेरी इच्छा पूर्ण करने में समर्थ न होंगे. (४)
गर्भे नु नौ जनिता दम्पति कद्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः.
नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः.. (५)
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यमी—हे यम! संतान उत्पन्न करने वाले देव ने हम दोनों को माता के उदर में ही दांपत्य
बंधन में बांध दिया है. उस देव के कर्म का जो फल है, उसे कौन निष्फल कर सकता है. त्वष्टा
देव के गर्भ में ही हमारे दंपती बनाने वाले कर्म को आकाश और पृथ्वी दोनों जानते हैं. इस
कारण यह असत्य नहीं है. (५)
को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हणायून्.
आसन्निषून् हृत्स्वसो मयोभून् य एषां भृत्यामृणधत् स जीवात्.. (६)
यम—हे यमी! सत्य का भार वहन करने के निमित्त अपनी वाणी रूप वृषभ को कौन
नियुक्त कर सकता है. कर्मठ, तेजस्वी, क्रोध और लज्जा से हीन तथा अपने शब्दों से
श्रोताओं के हृदय में बैठने वाला जो पुरुष सत्य वचनों से ही वृद्धि करता है, वह उस के फल
के कारण दीर्घजीवी होता है. (६)
को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्.
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (७)
यमी—हे यम! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है और कौन देख रहा है? फिर कौन
पुरुष इस बात को दूसरों से कह सकेगा? दिन मित्र देवता का स्थान है. ये दोनों ही विशाल हैं.
इसलिए मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम अनेक कर्मों वाले मनुष्यों के संबंध में
ऐसा किस प्रकार कहते हो. (७)
यमस्य मा यम्यं १ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय.
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद् वृहेव रथ्येव चक्रा.. (८)
मेरी इच्छा है कि पति को अपना शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान यम को
अपनी देह अर्पित करूं. वे दोनों पहिए के समान मार्ग में एकदूसरे से मिलते हैं. मैं उसी प्रकार
की हो जाऊं. (८)
न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति.
अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (९)
यम—हे यमी! देवदूत लगातार विचरण करते रहते हैं. इसलिए हे मेरी धर्म बुद्धि को नष्ट
करने की इच्छा करने वाली! तू मुझे छोड़ कर किसी अन्य को अपना पति बना तथा शीघ्र जा
कर रथ के पहिए के समान संयुक्त हो जा. (९)
रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत् सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्.
दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य विवृहादजामि.. (१०)
यमी—यम के निमित्त यजमान दिनरात आहुति दें. प्रकाश करने वाला सूर्य का तेज
नित्यप्रति इस के निमित्त उदय हो. आकाश और पृथ्वी जिस प्रकार आपस में मिले हुए हैं.
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उसी प्रकार मैं इस के भ्रातृत्व से अलग होती हुई इस से मिल जाऊं. (१०)
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि.
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (११)
यम—संभव है, आगे चल कर ऐसे ही दिन और रात आएं, जब बहन अपने बंधु भाव
को छोड़ कर पत्नी का रूप प्राप्त करने लगेगी. पर अभी ऐसा नहीं हो रहा है. इसलिए हे
यमी! तू स्त्री में गर्भ धारण करने में समर्थ किसी अन्य पुरुष की ओर अपना हाथ बढ़ा और
मुझे छोड़ कर उसी को अपना पति बनाने की इच्छा कर. (११)
किं भ्रातासद् यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निॠतिर्निगच्छात्.
काममूता बह्वे ३ तद् रपामि तन्वा मे तन्वं १ सं पिपृग्धि.. (१२)
यमी—वह भाई कैसा है, जिस के विद्यमान रहते हुए उस की बहन अपनी चाही हुई
कामना से हीन रह जाए. वह कैसी बहन है, जिस के सामने ही उस का भाई काम संतप्त हो.
इसी कारण तुम मेरी इच्छा के अनुसार आचरण करो. (१२)
न ते नाथं यम्यत्राहमस्मि न ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्याम्.
अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१३)
यम—हे यमी! मैं तेरी इस कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता. मैं तेरी देह को
स्पर्श नहीं कर सकता. इसलिए तू अब मुझे छोड़ कर किसी अन्य पुरुष से इस प्रकार का
संबंध स्थापित कर. मैं तुझे पत्नी बनाने की कामना नहीं करता हूं. (१३)
न वा उ ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्.
असंयदेतन्मनसो हृदो मे भ्राता स्वसुः शयने यच्छयीय.. (१४)
यम—हे यमी! मैं तेरे शरीर का स्पर्श नहीं कर सकता. धर्म के जानने वाले भाई और
बहन के ऐसे संबंध को पाप कहते हैं. यदि मैं ऐसा करूं तो यह कर्म मेरे हृदय, मन और प्राण
का नाश कर देगा. (१४)
बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम.
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्.. (१५)
यमी—हे यम! तेरी दुर्बलता पर मैं दुखी हूं. तेरा मन मुझ में नहीं लगा है. मैं अभी तक
तेरे मन को नहीं समझ सकी. तू किसी अन्य स्त्री से संबंधित होगा. (१५)
अन्यम् षु यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्.
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१६)
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यम—हे यमी! रस्सी जिस प्रकार घोड़े से मिलती है, बेल जैसे पेड़ से लिपट जाती है,
उसी प्रकार तू किसी अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले बनो. इस के
बाद तू अत्यधिक कल्याण वाले पुत्र को प्राप्त कर. (१६)
त्रीणि च्छन्दांसि कवयो वि येतिरे पुरुरूपं दर्शतं विश्वचक्षणम्.
आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि.. (१७)
देवताओं ने संसार को ढकने का प्रयत्न किया. जल तत्त्व देखने में प्रिय लगने वाला
तथा विश्व को देखने वाला है, वायु तत्त्व भी दर्शनीय और विश्व द्रष्टा है. ओषधि तत्त्व भी इसी
प्रकार का है. इन तीनों तत्त्वों को देवताओं ने पृथ्वी का भरणपोषण करने के लिए प्रतिष्ठित
किया है. (१७)
वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः.
विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजति यज्ञियाँ ऋतून्.. (१८)
महान अग्नि देव यजमान के निमित्त पाश आदि के द्वारा जल की वर्षा करते हैं. वे
अपनी बुद्धि के माध्यम से सब को ऐसे जान लेते हैं, जैसे वरुण देव अपनी बुद्धि से सब को
जानते हैं. ये ही अग्नि यज्ञ में देवों की पूजा करते हैं जो पूजा करने के योग्य हैं. (१८)
रपद् गन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु नो मनः.
इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (१९)
जल धारण करने वाले सूर्य की वाणी और अंतरिक्ष में विचरने वाली सरस्वती मेरे द्वारा
अग्नि की स्तुति कराएं तथा मेरे स्तुति रूप नाद में मन की रक्षा करे. इस के बाद देवमाता
अदिति मुझे फल के मध्य स्थापित करें. बंधु के समान हितकारी अग्नि मुझे उत्तम यजमान
बनाएं. (१९)
सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती.
यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (२०)
अध्वर्यु जनों ने देवताओं का आह्वान कर के अग्नि को देवों के हेतु हव्य वहन के लिए
प्रकट किया है. तभी कल्याणमयी मंत्र रूप वाणी तथा सूर्य से संबंध रखने वाली उषा यज्ञ
आदि की सिद्धि के लिए प्रकट होती है. (२०)
अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषिरः श्येनो अध्वरे.
यदि विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (२१)
जब सोम के लाए जाने के बाद यह को पूरा करने वाली अग्नि का वरण किया जाता है,
तब सोम और अग्नि के सिद्ध होने पर अग्निष्टोम आदि कर्म भी पूर्ण होते हैं. (२१)
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सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः.
विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यो ३ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (२२)
हे अग्नि! तुम यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण करते हो. जिस प्रकार हरी घास आदि को
खाने वाला पशु अपने पालने वाले को सुंदर दिखाई देता है, उसी प्रकार घृत आदि से
अपनेआप को पुष्ट करने वाले यजमान के लिए तुम दर्शनीय हो जाते हो. (२२)
उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति.
विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (२३)
हे अग्नि! आकाशरूपी अपने पिता और पृथ्वीरूपी माता को तुम यहां के लिए प्रेरित
करो. जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज को प्रेरित
करो. यह यजमान जिन देवताओं की कामना करता है, अग्नि स्वयं उस की कामना करते हैं.
वे इच्छित पदार्थ देने की बात कहते हैं और यज्ञ के हेतु यजमान के समीप आते हैं. (२३)
यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अख्यत् सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे.
इषं दधानो वहमानो अश्वैरा द्युमां अमवान् भूषति द्यून.. (२४)
हे अग्नि! जो यजमान तुम्हारी कृपा का दूसरों के सामने वर्णन करता है, वह तुम्हारी
कृपा के कारण सभी जगह प्रसिद्ध होता है. वह अन्न, अश्व आदि से युक्त होता हुआ चिरकाल
तक ऐश्वर्य से प्रतिष्ठित रहता है. (२४)
श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्.
आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्याः.. (२५)
हे अग्नि! तुम इस देव स्थान अर्थात् यज्ञशाला में हमारा आह्वान सुनो. तुम अपने जल
बरसाने वाले रथ को लाने लिए प्रस्तुत करो. जो आकाश और पृथ्वी देवताओं के पलक के
समान है, उन्हें भी अपने साथ लाओ. ऐसा कोई भी देवता शेष न रहे जो यहां न आया हो.
(२५)
यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र.
रत्ना च यद् विभाजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (२६)
हे अग्नि! तुम पूजा करने योग्य हो. जब देवताओं में स्रोतों और हवियों की संगति हो,
तब तुम स्तुति करने वालों के लिए रत्न दाता बनो तथा उन्हें बहुत धन प्रदान करो. (२६)
अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः.
अनु सूर्य उषसो अनु रश्मीननु द्यावापृथिवी आ विवेश.. (२७)
अग्नि उषा काल के साथ ही प्रकाशित होते हैं. ये दिनों के साथ भी प्रकाशित होते हैं. ये
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ही अग्नि सूर्य बन कर उषा की ओर अपनी किरणें प्रकाशित करते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि
आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रकाशित रखते हैं. (२७)
प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः.
प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (२८)
ये अग्नि उषाकाल में नित्य प्रकाशित होते तथा दिन के समय भी प्रकाश वाले रहते हैं.
ये ही सूर्यात्मक अग्नि अनेक प्रकार से प्रकट होने वाली किरणों में भी प्रकाश भरते हैं. ये
आकाश और पृथ्वी दोनों को प्रकाश से भर देते हैं. (२८)
द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा.
देवो यन्मर्त्तान् यजथाप कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (२९)
आकाश और पृथ्वी मुख तथा सत्य वाणी हैं. जब अग्नि देव यजमान के समीप आ कर
यज्ञ संपन्न करने के लिए बैठे, तब ये आकाश और पृथ्वी स्तुति सुनने के योग्य हैं. (२९)
देवो देवान् परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्.
धूमकेतुः समिधा भ्राऋजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (३०)
हे अग्नि! तुम प्रचंड ज्वालाओं से संपन्न हो. तुम पूज्य देवताओं को यज्ञ के द्वारा अपने
वश में करते हुए तथा उन के पूजन की इच्छा करते हुए उन के पास हवि को पहुंचाओ. तुम
धूम रूप ध्वजा वाले, समिधाओं से दीप्त होने वाले, देव वाहक तथा पूजा के पात्र हो. तुम
हमारी हवि को देवों के समीप पहुंचाओ. (३०)
अर्चामि वां वर्धयापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे.
अहा यद् देवा असुनीतिमायन् मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (३१)
हे आकाश और पृथ्वी के अधिष्ठाता देवताओ! मैं यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए तुम्हारी
स्तुति करता हूं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम दोनों मेरी स्तुति को सुनो तथा जब ऋत्विज्
अपने यज्ञ कार्य में लगा हो, तब तुम जल प्रदान के द्वारा हमारी वृद्धि करो. (३१)
स्वावृग् देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी.
विश्वे देवा अनु तत् ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३२)
अमृत के समान उपकार करने वाला जल जब किरणों से प्रकट होता है, तब ओषधियां
आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होती हैं. जब अग्नि की दीप्तियां अंतरिक्ष से टपकने वाले जल
का दोहन करती हैं, तब हे अग्नि! उस जल का सब अनुगमन करते हैं जो तुम्हारे द्वारा प्रकट
किया जाता है. (३२)
किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद.
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मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छलोको न यातामपि वाजो अस्ति.. (३३)
देवताओं में क्षत्रिय संबंधी शक्ति वाले यम हमारे हव्य का कुछ भाग ग्रहण करें. कहीं
हम से उस कार्य का अतिक्रमण हो गया जो यम को प्रसन्न करने में सक्षम है तो यहां देवों का
आह्वान करने वाले अग्नि विराजमान हैं. वे ही हमारे अपराध को दूर करेंगे. हमारे पास स्तुति
के समान हवि भी है. उस के द्वारा हम अग्नि को संतुष्ट कर के यम के अपराध से छूट सकते
हैं. (३३)
दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति.
यमस्य यो मनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन्.. (३४)
यहां पर यम का नाम लेना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि उन की बहन ने उन की पत्नी बनने
की इच्छा की थी. फिर भी जो इन यम की स्तुति करे, हे अग्नि! तुम उस निंदा को भुलाते हुए
उस स्तोता की रक्षा करो. (३४)
यस्मिन् देवा विदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते.
सूर्ये ज्योतिरदधुर्मास्य १ क्तून् परि द्योतनिं चरतो अजस्रा.. (३५)
जिस अग्नि के यज्ञ पूर्ण कराने वाले रूप से प्रतिष्ठित होने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा
जिस के कारण मनुष्य सूर्यलोक में निवास करते हैं, जिस अग्नि ने ही देवताओं के प्रकाशमान
तेज को तीनों लोकों में प्रतिष्ठित किया है तथा अंधकार का नाश करने वाली किरणों को
जिस से लेकर चंद्रमा में स्थापित किया है, सूर्य और चंद्रमा ऐसे तेजस्वी अग्नि की निरंतर
पूजा करते हैं. (३५)
यस्मिन् देवा मन्मनि संचरन्त्यपीच्ये ३ न वयमस्य विद्म.
मित्रा नो अत्रादितिरनागान्त सविता देवो वरुणाय वोचत्.. (३६)
वरुण के जिस स्थान में देवता घूमते हैं, उस स्थान से हम परिचित नहीं हैं. देवगण उस
स्थान से हमारे निर्दोष होने की बात कहें. सविता अदिति, आकाश तथा मित्र देवता भी अग्नि
की कृपा से हम को निर्दोष कहें. (३६)
सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. स्तुष ऊ षु नृतमाय धृष्णवे..
(३७)
हम सखा रूप इंद्र के लिए दृढ़ कार्य करने की इच्छा रखते हैं. उन शत्रुओं का मर्दन
करने वाले महान नेता और वज्रधारी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (३७)
शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा. मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि.. (३८)
हे वृत्र राक्षस का विनाश करने वाले इंद्र! तुम जिस प्रकार वृत्र राक्षस का हनन करने
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वाले रूप में प्रसिद्ध हो, उसी प्रकार अपने धन के कारण भी विख्यात हो. तुम अपना धन
मुझे प्रदान करो. (३८)
स्तेगो न क्षामत्येषि पृथिवीं मही नो वाता इह वान्तु भूमौ.
मित्रो नो अत्र वरुणो युज्यमानो अग्निर्वने न व्यसृष्ट शोकम्.. (३९)
वर्षा ऋतु में मेढक जिस प्रकार पृथ्वी को लांघ जाता है, उसी प्रकार तुम पृथ्वी को लांघ
कर ऊपर जाते हो. अग्नि की कृपा से वायु हमारे लिए सुखकर हो. मित्र एवं वरुण देवता भी
हमें सुख देने वाले कार्य में लगें. अग्नि जिस प्रकार तिनकों आदि को भस्म करते हैं, उसी
प्रकार हमारे शोक को समाप्त करें. (३९)
स्तुहि श्रुतं गर्तसदं जनानां राजानं भीममुपहत्नमुग्रम्.
मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यमस्मत् ते नि वपन्तु सेन्यम्.. (४०)
हे स्तोता! उन रुद्र देवता की स्तुति करो, जिन का निवास स्थान श्मशान में है, जो
पिशाच आदि के स्वामी हैं तथा जो पराक्रमी, भय उत्पन्न करने वाले तथा समीप आ कर
हिंसित करने वाले हैं. हे दुःख का नाश करने वाले इंद्र! तुम हमारी स्तुति से प्रसन्न हो कर हमें
सुख प्रदान करो. तुम्हारी सेना हम को त्याग कर उन पर आक्रमण करे जो हम से द्वेष रखते
हैं. (४०)
सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने.
सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (४१)
मृतक संस्कार करने वाले तथा अग्नि की इच्छा करते हुए पुरुष सरस्वती का आह्वान
करते हैं. हम ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों में भी सरस्वती को बुलाते हैं. देवी सरस्वती हवि प्रदान
करने वाले यजमान को मनचाहा धन दें. (४१)
सरस्वतीं पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः.
आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वमनमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (४२)
वेदी की दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित पितर भी सरस्वती का आह्वान करते हैं. हे पितरो!
तुम इस यज्ञ में विराजमान होते हुए प्रसन्न रहो. तुम सरस्वती को प्रसन्न करो तथा हवियों को
प्राप्त कर के संतुष्ट बनो. हे सरस्वती! तुम पितरों के द्वारा बुलाई गई हो. तुम हम में ऐसे अन्न
को स्थापित करो जो रागरहित और हमारा इच्छित है. (४२)
सरस्वति या सरथं ययाथोक्यैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती.
सहस्रार्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (४३)
हे सरस्वती! तुम अपनेआप को तृप्त करती हुई पितरों सहित एक ही रथ पर आती हो.
अनेक व्यक्तियों तथा प्रजाओं को तृप्त कर के अन्न के भाग को और अन्न के बल को मुझ
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यजमान को प्रदान करो. (४३)
उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः.
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४४)
अवस्था एवं गुणों में श्रेष्ठ, निकृष्ट एवं मध्यम श्रेणी के पितर भी उठें. ये पितर सोम का
भक्षण करने वाले हैं. ये प्राण से उपलक्षित शरीर को प्राप्त होने वाले, अहिंसक और पदार्थ के
ज्ञाता हैं. बुलाए जाने पर ये पितर हमारी रक्षा करें. (४४)
आहं पितॄन्त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः.
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (४५)
मैं कल्याण करने वाले पितरों के सामने उपस्थित होता हूं. मैं यज्ञ की रक्षा करने वाले
अग्नि के सामने उपस्थित होता हूं. इसलिए जो पितर बर्हिषद अर्थात् कुशाओं पर बैठने वाले
हैं, वे स्वधा के साथ सोमरस पीते हैं. हे अग्नि! उन्हें मेरे समीप बुलाओ. (४५)
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो ये अपरास ईयुः.
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु दिक्षु.. (४६)
जो पितर पहले पितरलोक को प्राप्त हुए थे तथा जो अब वहां गए हैं, जो अभी
पृथ्वीलोक में ही हैं तथा जो भिन्नभिन्न दिशाओं में हैं, उन सभी पितरों को नमस्कार है. (४६)
मातली कव्यैर्यमो अङ्गिारोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः.
यांश्च देवा वावृधुर्यै च देवांस्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४७)
मातलि नाम वाले पितृ देवता यजमान के द्वारा दिए गए हवि से कव्य नाम वाले पितरों
के साथ वृद्धि पाते हैं. पितरों के नेता यम नाम के देव यजमान को इस हवि से अंगिरा नाम के
पितरों के साथ बढ़ते हैं. मातलि आदि देवता जिन पितरों के यज्ञ में प्रबुद्ध करते हैं तथा जो
कव्यादि की आहुति से प्रबुद्ध करते हैं, वे पितर आह्वान काल में हमारी रक्षा करें. (४७)
स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवां उतायम्.
उतो न्व १ स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (४८)
यह सोमरस निश्चित रूप से स्वादिष्ट है, यह सोमरस माधुर्य गुण से युक्त है. यह सोमरस
पीने में निश्चित रूप से तीखा लगता है. यह सोम उत्तम स्वाद वाला है. इस को पीने के इच्छुक
इंद्र को संग्राम में कोई भी सहन नहीं कर पाता. तात्पर्य यह है कि संग्राम में इंद्र के सामने
कोई भी नहीं टिक पाता है. (४८)
परेयिवांसं प्रवतो महीरिति बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्.
वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (४९)
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पृथ्वी को लांघ कर दूर देश में गमन करने वाले अनेक पितरों के मार्ग पर चलने वाले
विवस्वान् अर्थात् सूर्य के पुत्र मृतकों के धाम रूप यमराज को रखते हैं. (४९)
यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ.
यत्रा नः पूर्वे पितरः परेता एना जज्ञानाः पथ्या ३ अनु स्वाः.. (५०)
यम ने सब से पहले हमारे मार्ग को जाना. यह मार्ग अपसरण अर्थात् छुटकारे के लिए
नहीं है. इस मार्ग से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. जहां पर हमारे पूर्वज पितर गए हैं, इस
मार्ग को न जानने वाले प्राणी अपनेअपने कर्मों के अनुसार जाते हैं. (५०)
बर्हिषदः पितर ऊत्य १ र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्.
त आ गतावसा शांतमेनाधा नः शं योररपो दधात.. (५१)
हे यज्ञ में आए हुए एवं कुशों पर बैठे हुए पितरो! तुम हमारी रक्षा करने के लिए हमारे
सामने आओ. ये हवियां तुम्हारे निमित्त हैं. तुम इन का सेवन करो. तुम अपने कल्याणकारी
रक्षा साधनों के साथ आओ तथा राग का शमन करने वाले तथा पाप का नाश करने वाले बल
को हम में स्थापित करो. (५१)
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येदं नो हविरभि गृणन्तु विश्वे.
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद् व आगः पुरुषता कराम.. (५२)
हे पितरो! घुटने सिकोड़ कर वेदी की दक्षिण दिशा में बैठे हुए तुम हमारी हवि की
प्रशंसा करो. हमारे किसी भी छोटे अथवा बड़े अपराध के कारण हमारी हिंसा मत करना.
मनुष्य स्वभाव के कारण हम से अपराध का होना असंभव नहीं है. (५२)
त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोति तेनेदं विश्वं भुवनं समेति.
यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश.. (५३)
सिंचित वीर्य को पुरुष आदि की आकृति में बदलने वाले त्वष्टा ने अपनी पुत्री सरण्यु का
विवाह किया. उसे देखने के लिए पूरा विश्व एकत्र हुआ. यम की माता सरण्यु जब सूर्य से
विवाह हुआ, तब सूर्य की अधिक प्रभाव वाली पत्नी उन के समीप से अदृश्य हो गई. (५३)
प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्यायैर्यैना ते पूर्वे पितरः परेताः.
उभा राजानौ स्वधया मदन्तौ यमं पश्यासि वरुणं च देवम्.. (५४)
हे प्रेत! जिस अर्थी को मनुष्य उठाते हैं. उस से यम के मार्ग को गमन करो. तुम्हारे पूर्व
पुरुष इसी मार्ग से गए हैं. वहां देवताओं में अग्नि के समान कर्म करने वाले वरुण और यम
दोनों हैं. वे हमारे द्वारा दी गई हवियों से प्रसन्न हो रहे हैं. इस लोक में तुम यम और वरुण के
दर्शन करोगे. (५४)
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अपेत वीत वि च सर्पतातो ऽ स्मा एतं पितरो लोकमक्रन्.
अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै.. (५५)
हे राक्षसो! तुम इस स्थान से भागो. तुम चाहे यहां पर पहले से रहते हो अथवा नए
आकर रहने लगे हो, तुम यहां से चले जाओ, क्योंकि यह स्थान इस प्रेत के लिए दिन, रात
और जल के सहित रहने के लिए यम ने प्रदान कियाहै. (५५)
उशन्तस्त्वेधीमहुशन्तः समिधीमहि.
उशन्नुशत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (५६)
हे अग्नि! इस पितृ यज्ञ को संपन्न करने के लिए हम तुम्हारी कामना करते हैं तथा
तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम भलीभांति प्रदीप्त हो कर स्वधन की इच्छा करने वाले पितरों
को लिए हवि भक्षण करने आओ. (५६)
द्युमन्तस्त्वेधीमहि द्युमन्तः समिधीमहि.
द्युमान् द्युमत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (५७)
हे अग्नि! हम तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम्हारी कृपा से हम यशस्वी हो गए हैं. हम तुम्हें
प्रदीप्त करते हैं. तुम हमारी हवि स्वीकार कर के उसे भक्षण करने के लिए पितरों के यहां ले
आओ. (५७)
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः.
तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (५८)
प्राचीन अंगिरा ऋषि हमारे पितर हैं. नवीन स्तोक वाले अथर्वा तथा भृगु हमारे पितर हैं.
ये सब सोमरस का पान करने वाले हैं. हम उन की कृपा दृष्टि में रहें. वे हम से प्रसन्न रहें.
(५८)
अङ्गिरोभिर्यज्ञियेरा गहीह यम वैरूपैरिह मादयस्व.
विवस्वन्तं हुवे यः पिता ते ऽ स्मिन् बर्हिष्या निषद्य.. (५९)
हे यम! अंगिरा नाम के यज्ञ संबंधी पितरों के साथ यहां आ कर तृप्त बनो. मैं तुम को ही
नहीं, तुम्हारे पिता सूर्य को भी बुलाता हूं, जिस से वे इस कुश के आसन पर बैठ कर हवि
ग्रहण करें. मैं इस प्रकार तुम्हें आहूत करता हूं. (५९)
इमं यम प्रस्तरमा हि रोहाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः.
आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन् हविषो मादयस्व.. (६०)
हे यम! तुम अंगिरा नाम वाले पितरों के समान मति वाले बन कर कुश के इस आसन
पर बैठो. महर्षियों के मंत्र तुम्हें बुलाने में समर्थ हों. तुम हवि प्राप्त कर के प्रसन्न बनो. (६०)
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