अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१० देवता—इंद्र
येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः.
सद्यः सो अस्य महिमा न संनशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (४)
हे इंद्र! जिस बल से तुम ने सागर को भरने वाले प्रभूत जलों का निर्माण किया था,
तुम्हारा वह बल सब को अभीष्ट फल देता है. हम भूलोकवासी तुम्हारी जिस महिमा का गान
करते हैं, उसे दूसरे अर्थात् शत्रु भलीभांति नहीं जान सकते. (४)
सूक्त—१० देवता—इंद्र
उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते.
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१)
जो स्तुतियां प्रकट हो रही हैं, वे गाए जाने वाले मंत्रों से साध्य और न गाए जाने वाले
मंत्रों से असाध्य हैं. ये स्तुतियां अन्न प्रदान करती हैं और रक्षा करने में समर्थ हैं. जैसे रथ
रथारोही के अभिप्राय के अनुसार गमन करता है, उसी प्रकार ये स्तुतियां इंद्र को प्रसन्न करने
के लिए गमन करती हैं. (१)
कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद् धीतमानशुः.
इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियेमेधासो अस्वरन्.. (२)
मनुष्य स्तोत्रों के द्वारा इंद्र को उसी प्रकार प्राप्त होते हैं, जिस प्रकार कण्व गोत्रीय ऋषि
तीनों लोकों के स्वामी एवं फल की कामना करने वालों के द्वारा पूजित इंद्र को स्तुतियों के
कारण प्राप्त हुए थे. जिस प्रकार सूर्य अपने नियंता इंद्र को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार भृगुवंश
के ऋषि इंद्र को प्राप्त होते हैं. (२)
सूक्त—११ देवता—इंद्र
इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्कैर्विद्वद्वसुर्दयमानो वि शत्रून्.
ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधानो भूरिदात्र आपृणद् रोदसी उभे.. (१)
इंद्र देव ने शत्रुओं के नगरों को अपने पूजनीय बल से नष्ट कर दिया है और शत्रुओं की
पूर्ण रूप से हिंसा कर दी है. इंद्र ने किरणों के द्वारा अंधकार का नाश करने वाले दिन को
बढ़ाया है. इंद्र ने शत्रुओं का धन प्राप्त किया है तथा उन के पुत्र आदि की विशेष रूप से हिंसा
की है. पर्याप्त स्तोत्रों के कारण वृद्धि को प्राप्त शरीर द्वारा धन संपन्न इंद्र ने धरती और
आकाश दोनों को व्याप्त किया है. (१)
मखस्य ते तविषस्य प्र जूतिमियर्मि वाचममृताय भूषन्.
इन्द्र क्षितीनामसि मानुषीणां विशां दैवीनामुत पूर्वयावा. (२)
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हे इंद्र! मैं तुम्हारे प्रशंसनीय बल को बढ़ाने वाली स्तुतिरूपी वाणी को प्रेरित करता हूं. मैं
अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हें अलंकृत करता हूं. हे इंद्र! तुम मनुष्य संबंधी और देव संबंधी
प्रजाओं के आगे चलने वाले हो. (२)
इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनाद् वर्पणीतिः
अहन् व्यं समुशधग् वनेष्वाविर्धेना अकृणोद् रम्याणाम्.. (३)
अपने हिंसक बल का शत्रु पर प्रयोग करने वाले इंद्र देव ने सभी ओर से व्याप्त करने
वाले वृत्र को रोका और अपने शस्त्र से मायावी शत्रु का विनाश किया. इंद्र ने वृत्र असुर को
भुजाओं से हीन कर के मारा. इस के बाद उस के रमण के साधनों — पत्नी अथवा गौ आदि
को अपने अधिकार में किया. (३)
इन्द्रः स्वर्षा जनयन्नहानि जिगायोशिग्भिः पृतना अभिष्टिः.
प्रारोचयन्मनवे केतुमह्नामविन्दज्ज्योतिर्बृहते रणाय.. (४)
इंद्र स्वर्ग प्राप्त कराने वाले तथा शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं. इंद्र अंधकार का
विनाश कर के दिनों को जन्म देते हैं. इंद्र ने असुरों के साथ युद्ध कर के उन की सेनाओं को
जीता है. इंद्र ने यजमानों के अधिक सुख के लिए दिन के स्वामी सूर्य को आकाश में दीप्त
किया और उस से महान तेज प्राप्त किया है. (४)
इन्द्रस्तुजो बर्हणा आ विवेश नृवद् दधानो नर्या पुरूणि.
अचेतयद् धिय इमा जरित्रे प्रेमं वर्णमतिरच्छुक्रमासाम्.. (५)
जैसे युद्ध का इच्छुक वीर शत्रु सेना में प्रवेश करता है, उसी प्रकार इंद्र भी यजमानों के
हित के लिए असुरों की विशाल सेनाओं में प्रवेश करते हैं तथा स्तुति करने वालों के लिए
उषाओं का उदय करते हैं. इंद्र ही उषाओं के श्वेत रंग को बढ़ाते हैं. (५)
महो महानि पनयन्त्यस्येन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि.
वृजनेन वृजिनान्त्सं पिपेष मायाभिर्दस्यूँरभिभूत्योजाः.. (६)
इंद्र ने जो अनेक प्रशंसनीय कार्य किए हैं, श्रोता उन की प्रशंसा करते हैं. शत्रुओं को वश
में करने वाले इंद्र ने पापी राक्षसों को अपने अस्त्रों से नष्ट कर दिया है तथा शक्तिशाली असुरों
का विनाश कर दिया. (६)
युधेन्द्रो मह्ना वरिवश्चकार देवेभ्यः सत्पतिश्चर्षणिप्राः.
विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति.. (७)
किसी की सहायता न ले कर इंद्र ने अकेले ही अपने स्तुतिकर्ताओं को धन प्राप्त
कराया. इंद्र यजमानों की सदा रक्षा करते हैं और मनुष्यों को इच्छित फल देते हैं. यज्ञ आदि
कर्म करने वाले मनुष्य इंद्र का वरण करते हैं. (७)
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सत्रासाहं वरेण्यं सहोदां ससवांसं स्वरपश्च देवीः.
ससान यः पृथिवीं द्यामुतेमामिन्द्रं मदन्त्यनु धीरणासः.. (८)
बल प्रदान करने वाले, शत्रु सेना को पराजित करने वाले एवं स्वर्गीय जलों के
सेवनकर्ता इंद्र ने मनुष्यों को धरती तथा आकाश दिए हैं. उन इंद्र की स्तुति करने वाले और
यज्ञ कर्ता यजमान हवि दे कर उन्हें प्रसन्न करते हैं. (८)
ससानात्याँ उत सूर्यं ससानेन्द्रः ससान पुरुभोजसं गाम्.
हिरण्ययमुत भोगं ससान हत्वी दस्यून् प्रार्यं वर्णमावत्.. (९)
इंद्र ने मनुष्यों के उपभोग के लिए घोड़े, हाथी और ऊंट दिए हैं. गायों, भैंसों तथा सोने
के आभूषणों को भी इंद्र ने ही दिया है. इंद्र ने सूर्य को प्रकाशित किया है तथा राक्षसों का
विनाश कर के सभी वर्णों का पालन किया है. (९)
इन्द्र ओषधीरसनोदहानि वनस्पतीँरसनोदन्तरिक्षम्.
बिभेद वलं नुनुदे विवाचो ऽ थाभवद् दमिताभिक्रतूनाम्.. (१०)
इंद्र ने प्राणियों के उपभोग के लिए जौ, गेहूं आदि की रचना की है. इंद्र ने ही वनस्पतियों
एवं दिवसों की रचना की है. उन्हीं ने सब के उपकारकर्ता अंतरिक्ष की रक्षा की है. इंद्र ने बल
नाम के असुर को चीर डाला तथा विरोधियों का अनुष्ठान करने वालों का मर्दन किया. (१०)
शुंन हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन् भरे नृतमं वाजसातौ.
शृण्वन्तमूग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम्.. (११)
हम धन और ऐश्वर्य वाले तथा सुखदाता इंद्र को इस संग्राम में बुलाते हैं. जिस युद्ध से
अन्न प्राप्त होता है, हम उस में अपनी रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान करते हैं. शत्रुओं का नाश
करने वाले और धनों के विजेता इंद्र का हम आह्वान करते हैं. (११)
सूक्त—१२ देवता—इंद्र
उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ.
आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम अन्न प्राप्ति की इच्छा से स्तोत्रों का उच्चारण करो. हे यजमान वसिष्ठ!
अपने ऋत्विजों के साथ हवि आदि साधनों से इष्टदेव की पूजा करो. जिस इंद्र ने अपने बल
से सभी प्राणियों का विस्तार किया है, वे इंद्र परिचर्या करते हुए मुझ वसिष्ठ के वचनों को यहां
आ कर सुने. (१)
अयामि घोष इन्द्र देवजामिरिरज्यन्त यच्छुरुधो विवाचि.
नहि स्वमायुश्चिकिते जनेषु तानींदहांस्यति पर्ष्यस्मान्.. (२)
हे इंद्र! मैं उस स्तोत्र का उच्चारण करता हूं जो देवों को बंधु के समान प्रिय है. इस स्तोत्र
के द्वारा उस सोम की वृद्धि होती है जो यजमान को स्वर्ग का फल देने वाला है. मनुष्यों के
मध्य रहने वाला यह यजमान अपनी आयु नहीं जानता है. हमें इतनी दीर्घ आयु प्रदान करो,
जिस से यह तुम्हारे लिए यज्ञ आदि का अनुष्ठान कर सके. आयु का नाश करने वाले जो पाप
हैं, उन्हें इस से दूर रखो. (२)
युजे रथं गवेषणं हरिभ्यामुप ब्रह्माणि जुजुषाणमस्थुः.
वि बाधिष्ट स्य रोदसी महित्वेन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघन्वान्.. (३)
इंद्र गौओं को प्राप्त कराने वाले अपने रथ में हरि नाम के अश्वों को जोड़ते हैं. हमारे
स्तोत्र सभी के द्वारा सेवा किए जाते हुए इंद्र को प्राप्त होते हैं. इंद्र ने अपनी महिमा से धरती
और आकाश को आक्रांत किया है. इंद्र ने अपने शत्रुओं अर्थात् वृत्र आदि राक्षसों को इस
प्रकार मारा है कि वे शेष नहीं रहे हैं. (३)
आपश्चित् पिप्यु स्तर्यो ३ न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त इन्द्र.
याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्वं हि धीभिर्दायसे वि वाजान्.. (४)
हे इंद्र! यह निचोड़ा गया सोमरस गायों के समान वृद्धि को प्राप्त हो रहा है. हे इंद्र!
तुम्हारी स्तुति करने वाले ऋत्विज् यज्ञमंडप में पहुंच चुके हैं, इसलिए तुम हमारे स्तोत्र को
सुनने के लिए आओ. वायु देव यज्ञस्थलों में जाने के लिए जिस प्रकार अपने अश्वों की ओर
जाते हैं, तुम भी उसी प्रकार संतुष्ट हो कर हमें अन्न देने के लिए आओ. (४)
ते त्वा मदा इन्द्र मादयन्तु शुष्मिणं तुविराधसं जरित्रे.
एको देवत्रा दयसे हि मर्तानस्मिञ्छूर सवने मादयस्व.. (५)
हे इंद्र! संस्कार किए गए सोम तुम्हें मदयुक्त करें. तुम बलशाली और स्तोताओं को
अधिक धन देने वाले हो. देवों के मध्य अकेले तुम्हीं ऐसे हो जो मनुष्यों पर दया करते हो. हे
इंद्र! इस यज्ञ में मनचाहा फल दे कर हमें प्रसन्न करो. (५)
एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
स न स्तुतो वीरवद् धातु गोमद् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
वसिष्ठ कुल के ऋषि कामनाओं की वर्षा करने वाले और हाथ में वज्र धारण करने वाले
इंद्र की पूजा स्तोत्रों से करते हैं. वे इंद्र हमारे स्तोत्रों के द्वारा पूजित हो कर हमें पुत्रों एवं गायों
से युक्त धन प्रदान करें. हे देवो! आप भी इंद्र का अनुकरण करते हुए क्षेमों से सदा हमारी
रक्षा करें. (६)
ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोमपावा.
युक्त्वा हरिभ्यामुप यासदर्वाङ् माध्यंदिने सवने मत्सदिन्द्रः.. (७)
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