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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-९७ देवता—इंद्र

सूक्त-९७ देवता—इंद्र
वयमेनमिदा ह्योपीपेमेह वज्रिणम्.
तस्मा उ अद्य समना सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते.. (१)
हे स्तोताओ! हम ने इंद्र को सोमरस से पुष्ट किया है. तुम भी प्रसन्न मन से उन्हें संस्कार
किया हुआ सोम प्रदान करो तथा उन्हें स्तोत्रों के द्वारा सुसज्जित करो. (१)
वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषु भूषति.
सेमं न स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया.. (२)
इंद्र का भेड़िया शत्रुओं को भगा देता है तथा भेड़ों को मथ डालता है. हे इंद्र! तुम
अपनी श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा इस यज्ञ में आओ तथा स्तुतियों को सुनो. (२)
कद् न्व १ स्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्.
केनो नु कं श्रोमतेन न शुश्रुवे जनुषः परि वृत्रहा.. (३)
यह किस ने नहीं सुना है कि इंद्र ने वृत्र राक्षस का नाश किया. ऐसा कोई पराक्रम नहीं
है, जो इंद्र में न हो. (३)
सूक्त-९८ देवता—इंद्र
त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः.
त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१)
हे इंद्र! स्तुति करने वाले हम अन्न प्राप्ति से संबंधित यज्ञ में तुम्हें ही बुलाते हैं. तुम
सज्जनों के रक्षक और जलों को प्रेरित करने वाले हो. (१)
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः.
गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२)
हे इंद्र! तुम हमारे द्वारा पूजित हो कर विजय की इच्छा करने वाले नरेश के अश्व, रथ,
गाय आदि प्रदान करो. हे इंद्र! तुम अपने हाथों में वज्र धारण करने वाले हो. (२)
सूक्त-९९ देवता—इंद्र
अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः.
समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम्.. (१)
हे इंद्र! तुम ने पहले सोमरस पिया था, उसी प्रकार सोमरस पीने के लिए ऋभु और रुद्र
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देवता तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१)
अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि.
अद्या तमस्य महिमानमायवो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (२)
तैयार किए हुए सोम रस के द्वारा हर्ष प्राप्त होने पर वे इंद्र यजमान के धन और बल की
वृद्धि करते हैं. स्तुति करने वाले ये जन उन इंद्र की महिमा को ही पहले के समान गाते हैं. (२)
सूक्त-१०० देवता—इंद्र
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान् महः ससृज्महे. उदेव यन्त उदभिः..
(१)
हे इंद्र! जिस प्रकार जल की कामना करते हुए मनुष्य जल में जल को मिलाते हैं, उसी
प्रकार तुम्हारी कामना करने वाले मनुष्य तुम्हें सोम रूपी जलों से मिलाते हैं. (१)
वार्ण त्वा यव्याभिर्वधंन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वांसं चिदद्रिवो दिवेदिवे..
(२)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम प्रत्येक स्तुति पर अपनी वृद्धि की कामना करते हो, इसलिए ये मंत्र
तुम्हें जल की भांति वृद्धियुक्त बनाते हैं. (२)
युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे. इन्द्रवाहा वचोयुजा.. (३)
युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाले इंद्र के यशोगान संबंधी मंत्रों से रथ में जुड़ने वाले इंद्र
के घोड़े रथ में जुड़ते हैं. (३)
सूक्त-१०१ देवता—अग्नि
अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१)
मैं सब के ज्ञाता, होता और यज्ञों को उत्तम बनाने वाले अग्नि का वरण करता हूं. (१)
अग्निर्माग्न हवीमभिः सदा हवन्त विशपतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२)
हव्यवाहक, बहुतों के प्रिय तथा प्रजापति अग्नि को यजमान हवि प्रदान करते हैं. इस
कारण हम भी अग्नि को हवि देते हैं. (२)
अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३)
हे अग्नि! ऋत्विज् के हेतु प्रदीप्त होते हुए तुम हमारे होता हो, इसलिए तुम देवों को
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