अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१० (२) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सामन्त्रणे न्यक्रामत्.. (१२)
उस विराट् ने पुनः उत्क्रम किया और वह आमंत्रण में प्रवेश कर गया. (१२)
यन्त्यस्यामन्त्रणमामन्त्रणीयो भवति य एवं वेद.. (१३)
जो इस बात को जानता है, वह आमंत्रणीय अर्थात् आमंत्रण के योग्य बन जाता है और
सभी जन उस का आमंत्रण स्वीकार करते हैं. (१३)
सूक्त-१० (२) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सा ऽ न्तरिक्षे चतुर्धा विक्रा ऽ न्तातिष्ठत्.. (१)
उस विराट् ने अंतरिक्ष में उत्क्रमण किया और उत्क्रमण कर के वह चार प्रकार से स्थित
हुआ. (१)
तां देवमनुष्या अब्रुवन्नियमैव तद् वेद यदुभय उपजीवेमेमामुप ह्वयामहा
इति.. (२)
इस से देवों और मनुष्यों ने कहा— “इसे जो जानता है, वे दोनों ज्ञाता और गेय के सहारे
जीवित हैं. हम उन का आह्वान करते हैं.” (२)
तामुपाह्वयन्त.. (३)
उन्होंने उसे बुलाया. (३)
ऊर्ज एहि स्वध एहि सूनृत एहीरावत्येहीति.. (४)
हे ऊर्जा! यहां आओ. हे स्वधा! हमारे समीप आओ. हे सूनृता! यहां आओ. हे इरावती!
हमारे समीप आओ. (४)
तस्या इन्द्रो वत्स आसीद् गायत्र्यभिधान्यभ्रमूध:.. (५)
इंद्र उस का बछड़ा बना, गायत्री उस की रस्सी बनी और मेघ उस के थन बनें. (५)
बृहच्च रथन्तरं च द्वौ स्तनावास्तां यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च द्वौ.. (६)
बृहत् साम और रथंतर साम उस गाय के दो थन थे. उस गाय के शेष दो थन—
यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य. (६)
ओषधीरेव रथन्तरेण देवा अदुहन् व्यचो बृहता.. (७)
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देवों ने गाय के रथंतर रूपी थन से जड़ीबूटियों को और बृहत सामरूपी थन से व्यच को
दुहा. (७)
अपो वामदेव्येन यज्ञं यज्ञायज्ञियेन.. (८)
देवों ने वामदेव्य सामरूपी थन से जल का और यज्ञिय रूपी थन से यज्ञ का दोहन
किया. (८)
ओषधीरेवास्मै रथंतरं दुहे व्यचो बृहत्.. (९)
इस बात को जो जानता है, उस के लिए रथंतर साम जड़ीबूटियां और बृहत् साम
अर्थात् व्याप्त आकाश प्रदान करते हैं. (९)
अपो वामदेव्यं यज्ञं यज्ञायज्ञियं य एवं वेद.. (१०)
इस बात को जानने वाले के लिए वामदेव्य साम जल और यज्ञायज्ञिय साम यज्ञ प्रदान
करते हैं. (१०)
सूक्त-१० (३) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सा वनस्पतीनागच्छत् तां वनस्पतयो ऽ घ्नत सा संवत्सरे
संभवत्.. (१)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह वनस्पतियों के समीप पहुंचा. वनस्पतियों ने उस
का हनन किया तो वह संवत्सर बन गया. (१)
तस्माद् वनस्पतीनां संवत्सरे वृक्णमपि रोहति.
वृश्चते ऽ स्याप्रियो भ्रातृव्यो य एवं वेद.. (२)
इसी कारण वनस्पतियों का कटा हुआ भाग संवत्सर अर्थात् एक वर्ष में उत्पन्न हो जाता
है. जो इस बात को जानता है, उस का शत्रु नाश को प्राप्त होता है. (२)
सोदक्रामत् सा पितॄनागच्छत् तां पितरोऽघ्नत सा मासि संभवत्.. (३)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह पितरों के समीप पहुंचा. पितरों ने उस का हनन
किया तो वह विराट् मास बन गया. (३)
तस्मात् पितृभ्यो मास्युपमास्यं ददति प्र पितृयाणं पन्थां जानाति य एवं
वेद.. (४)
इसीलिए प्रतिमास पितरों की उपासना कर के उन्हें भोजन दिया जाता है. जो इस बात
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को जानता है, वह पितृयान मार्ग का ज्ञाता होता है. (४)
सोद्रक्रामत् सा देवानागच्छत् तां देवा अघ्नत सार्धमासे समभवत्.. (५)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह देवों के समीप पहुंचा. देवों ने उस का हनन
किया, तब पक्ष उत्पन्न हुआ. (५)
तस्माद् देवेभ्यो ऽ र्धमासे वषट् कुर्वन्ति प्र देवयानं पन्थां जानाति य एवं
वेद.. (६)
इसीलिए आधा मास अर्थात् पखवाड़े में देवों के लिए वषट् करते हैं. जो इस बात को
जानता है, वह देवयान मार्ग का ज्ञात होता है. (६)
सोद्रक्रामत् सा मनुष्या३नागच्छत् तां मनुष्या अघ्नत सा सद्यः समभवत्..
(७)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह मनुष्यों के समीप पहुंचा. मनुष्यों ने उस का
हनन किया तो वह तुरंत ही प्रकट हो गया. (७)
तस्मान्मनुष्येभ्य उभयद्युरुप हरन्त्युपास्य गृहे हरन्ति य एवं वेद.. (८)
इसीलिए मनुष्यों के लिए दूसरे दिन अपहरण करते हैं. जो इस बात को जानता है, उस
के घर में प्रतिदिन अन्न पहुंचाया जाता है. (८)
सूक्त-१० (४) देवता—विराट्
सोद्रक्रामत् सा ऽ सुरानागच्छत् तामसुरा उपाह्वयन्त माय एहीति.. (१)
उस विराट् ने पुनः उत्क्रमण किया और वह असुरों के समीप पहुंचा. असुरों ने उस का
आह्वान किया कि हमारे समीप आओ. (१)
तस्या विरोचनः प्राह्लादिर्वत्स आसीदयस्पात्रं पात्रम्.. (२)
प्रथम आह्वान करने वाला विरोचन उस का वत्स हुआ. लोहे का पात्र उस का पात्र बना.
(२)
तां द्विमूर्धा ऽ र्त्त्यो ऽ धोक् तां मायामेवाधोक्.. (३)
दो सिरों वाले ऋतुपुत्र ने उस का तथा माया का दोहन किया. (३)
तां मायामसुरा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (४)
असुर उसी माया के उपजीवी हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब के उपजीवन के
योग्य है. (४)
सोदक्रामत् सा पितॄनागच्छत् तां पितर उपाह्वयन्त स्वध एहीति.. (५)
वह विराट् उत्क्रमण कर के पितरों के समीप पहुंचा. पितरों ने उस का आह्वान किया—
“हे स्वधा, आओ.” (५)
तस्या यमो राजा वत्स आसीद् रजतपात्रम् पात्रम्.. (६)
राजा यम उस के वत्स हुए तथा चांदी का पात्र उस का पात्र हुआ. (६)
तामन्तको मार्त्यवो ऽ धोक् तां स्वधामेवाधोक्.. (७)
मृत्यु के देवता यमराज ने उस का तथा स्वधा का भी दोहन किया. (७)
तां स्वधां पितर उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (८)
पितर उस स्वधा के उपजीवी बनते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब के उपजीवन
के योग्य बनता है. (८)
सोदक्रामत् सा मनुष्या ३ नागच्छत् तां मनुष्या ३ उपह्वयन्तेरावत्येहीति..
(९)
वह विराट् उत्क्रमण कर के मनुष्यों के समीप आया. मनुष्यों ने उस का आह्वान करते
हुए कहा, “हे इरावती, यहां आओ.” (९)
तस्या मनुर्वैवस्वतो वत्स आसीत् पृथिवी पात्रम्.. (१०)
वैवस्वत मनु उस के वत्स थे और पृथ्वी उस का पात्र बनी. (१०)
तां पृथी वैन्यो ऽ धोक् तां कृषिं च सस्यं चाधोक्.. (११)
वेन के पुत्र पृथु ने उस पृथ्वी का दोहन करते हुए उस से फसलें और कृषि प्राप्त की.
(११)
ते कृषिं च सस्यं च मनुष्या ३ उप जीवन्ति
कृष्ट्राधिरुपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१२)
मनुष्य उस कृषि और फसल के सहारे जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह
कृषि कर्म में कुशल होता है तथा उस के सहारे सब जीवन यापन करते हैं. (१२)
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सोदक्रामत् सा सप्तऋषीनागच्छत् तां
सप्तऋषय उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वत्येहीति.. (१३)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह सात ऋषियों के समीप पहुंचा. सात ऋषियों ने
उस का आह्वान करते हुए कहा—"ब्रह्मणस्पति, आओ." (१३)
तस्याः सोमो राजा वत्स आसीच्छन्दः पात्रम्.. (१४)
राजा सोम उस के वत्स थे और छंद उस का पात्र था. (१४)
तां बृहस्पतिराङ्गिरसो ऽ धोक् तां ब्रह्म च तपश्चाधोक्.. (१५)
आंगिरस बृहस्पति ने उस का दोहन किया तथा उस के ब्रह्म और तप का भी दोहन
किया. (१५)
तद् ब्रह्म च तपश्च सप्तऋषय उप जीवन्ति
ब्रह्मवर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६)
उस ब्रह्म और तप के उपजीवी सात ऋषि होते हैं. जो इस बात को जानता है, वह
ब्रह्मवर्चस्व वाला होता है और सभी प्राणियों को उपजीवन देता है. (१६)
सूक्त-१० (५) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सा देवानागच्छत् तां देवा उपाह्वयन्तोज॑ एहीति.. (१)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह देवों के समीप पहुंचा. देवों ने उस का आह्वान
करते हुए कहा—"हे ऊर्जा, आओ." (१)
तस्या इन्द्रो वत्स आसीच्चमसः पात्रम्.. (२)
उस के वत्स इंद्र हुए और चमस उस का पात्र था. (२)
तां देवः सविता ऽ धोक् तामूर्जामेवाधोक्.. (३)
सविता देव ने उस का दोहन किया और ऊर्जा को दुहा. (३)
तामूर्जां देवा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (४)
देवगण उस ऊर्जा के सहारे जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को
जीने का सहारा देने योग्य बनता है. (४)
सोदक्रामत् सा गन्धर्वाप्सरस आगच्छत्
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तां गन्धर्वाप्सरस उपाह्वयन्त पुण्यगन्ध एहीति.. (५)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह गंधर्वों तथा अप्सराओं के समीप पहुंचा. गंधर्वों
और अप्सराओं ने उस का आह्वान करते हुए कहा—“हे पुण्य गंध, आओ.” (५)
तस्याश्चित्ररथः सौर्यवर्चसो वत्स आसीत् पुष्करपर्णं पात्रम्.. (६)
सूर्यवर्चस का पुत्र उस का वत्स था और पुष्करपर्ण अर्थात् सरोवर का पत्ता उस का
पात्र था. (६)
तां वसुरुचिः सौर्यवर्चसो ऽ धोक् तां पुण्यमेव गन्धमधोक्.. (७)
सूर्यवर्चस के पुत्र वसुरुचि ने उस का दोहन किया और पुण्यगंध को ही दुहा. (७)
तं पुण्यं गन्धं गन्धर्वाप्सरस उप जीवन्ति पुण्यगन्धिरुपजीवनीयो
भवति य एवं वेद.. (८)
गंधर्व और अप्सराएं उस पुण्यगंध को अपने जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात
को जानता है, वह सब को जीवन का आश्रय देने वाला बनता है. (८)
सोदक्रामत् सेतरजनानागच्छत् तामितरजना उपाह्वयन्त तिरोध एहीति..
(९)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह अन्य जनों के समीप गया. अन्य जनों ने उस का
आह्वान करते हुए कहा—“हे तिरोधा, आओ.” (९)
तस्याः कुबेरो वैश्रवणो वत्स आसीदामपात्रं पात्रम्.. (१०)
विश्रवा ऋषि के पुत्र कुबेर उस के वत्स थे और मिट्टी का कच्चा पात्र उस का पात्र था.
(१०)
तां रजतनाभिः काबेरकोऽधोक् तां तिरोधामेवाधोक्.. (११)
रजत नाभि काबेरक ने उस का दोहन किया और उस से तिरोधा को दुहा. (११)
तां तिरोधामितरजना उप जीवन्ति तिरो धत्ते सर्वं पाप्मानमुपजीवनीयो
भवति य एवं वेद.. (१२)
अन्य जन तिरोधा को जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब
के पापों को तिरोहित करता है और सब को जीवन का सहारा देने वाला बनता है. (१२)
सोदक्रामत् सा सर्पानागच्छत् तां सर्पा उपाह्वयन्त विषवत्येहीति.. (१३)
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उस विराट ने उत्क्रमण किया और वह सर्पों के समीप पहुंचा. सर्पों ने उस का आह्वान
करते हुए कहा—"हे विषवाले आओ.” (१३)
तस्यास्तक्षको वैशालेयो वत्स आसीदलाबुपात्रं पात्रम्.. (१४)
वैशालेय तक्षक उस का वत्स और अलाबु उस का पात्र था. (१४)
तां धृतराष्ट्र ऐरावतो ऽ धोक् तां विषमेवाधोक्.. (१५)
ऐरावत संबंधी सर्प ने उस का दोहन किया और विष का दोहन किया. (१५)
तद् विषं सर्पा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६)
उस विष के सहारे सर्प जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीवन
का सहारा देने वाला बनता है. (१६)
सूक्त-१० (६) देवता—विराट्
तद् यस्मा एवं विदुषे ऽ लाबुनाभिषिञ्चेत् प्रत्याहन्यात्.. (१)
जो इस को जानने वाले को अलाबु के द्वारा सींचता है, वह उस का हनन कर देता है.
(१)
न च प्रत्याहन्यान्मनसा त्वा प्रत्याहन्मीति प्रत्याहन्यात्.. (२)
वैसे तो इस का हनन नहीं करता, पर जब मन से सोचता है कि उस का हनन करूं तो
हनन कर देता है. (२)
यत् प्रत्याहन्ति विषमेव तत् प्रत्याहन्ति.. (३)
जो विषकारी विनाश करते हैं, वे ही विनाश करवाते हैं. (३)
विषमेवास्याप्रियं भ्रातृव्यमनुविषिच्यते य एवं वेद.. (४)
जो इस बात को जानता है, उस का विष ही प्रिय होता है. वह अपने भाई के पुत्र का ही
सिंचन करता है. (४)
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