अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-२७ देवता—ब्रह्मणस्पति
सूक्त-२७ देवता—ब्रह्मणस्पति
अमूः पारे पृदाक्वस्त्रिषप्ता निर्जरायवः.
तासां जरायुभिर्वयमक्ष्या ३ वपि व्ययामस्यघायोः परिपन्थिनः.. (१)
सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं एवं नागलोक में निवास
करती हैं. इन सांपों की केंचुली जरायु के समान उन से लिपटी रहती है. सांपों की उस केंचुली
के द्वारा हम दूसरों का अहित सोचने वाले शत्रुओं की आंखों को ढकते हैं. (१)
विषूच्येतु कृन्तती पिनाकमिव बिभ्रती.
विष्वक् पुनर्भूवा मनो ऽ समृद्धा अघायवः.. (२)
शिव के धनुष पिनाक के समान शत्रुओं के मारने में सक्षम आयुध धारण करती हुई,
खड्ग आदि आयुधों से शत्रुओं को फाड़ती हुई हमारी सेना मारकाट मचाती हुई आगे बढ़े.
यदि शत्रु सेना उस का सामना करने के लिए एकत्र हो, तो शत्रु सैनिकों का मन कुछ सोचने
और निश्चय करने में समर्थ न हो. ऐसी स्थिति में हमारे शत्रु राष्ट्र, कोश आदि से रहित हो
जाएं. (२)
न बहवः समशकन् नार्भका अभि दाधृषुः.
वेणोरद्गा इवाभितो ऽ समृद्धा अघायवः.. (३)
हाथी, घोड़े और रथों से युक्त बहुत से शत्रु सैनिक हमें जीतने में असमर्थ हो कर हार
जाएं. अल्प संख्या वाले शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें. बांस की ऊपरी
शाखाएं जिस प्रकार दुर्बल होती हैं, हम से पराजित हो कर धनहीन बने शत्रु उसी प्रकार
समृद्धि रहित हो जाएं. (३)
प्रेतं पादौ प्र स्फुरतं वहतं पृणतो गृहान्.
इन्द्राण्येतु प्रथमाजीतामुषिता पुरः.. (४)
हे चलने के इच्छुक व्यक्ति के चरणो! तुम आगे बढ़ो एवं शीघ्र चलने के लिए गति करो.
तुम हमें इच्छित फल देने वाले पुरुष के निवास स्थान तक पहुंचाओ. किसी से पराजित न
होने वाले इंद्र की पत्नी हमारी सेना की देवता हैं. वह हमारी सेना की रक्षा के लिए आगेआगे
चलें. (४)
सूक्त-२८ देवता—अग्नि
उप प्रागाद् देवो अग्नी रक्षोहामीवचातनः.
दहन्नप द्वयाविनो यातुधानान् किमीदिनः.. (१)
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राक्षसों के विनाशक और रोगों को दूर करने वाले अग्नि देव उन्हें नष्ट करने के लिए उन
के समीप चलें. अग्नि देव मायामय, सौम्य, हिंसक एवं भयावह रूप धारण करने वाले, दूसरों
के दोष खोजने वाले, पीड़ादायक एवं परेशान करने वाले राक्षसों को भस्म करते हुए इस
पुरुष के समीप आ रहे हैं. (१)
प्रति दह यातुधानान् प्रति देव किमीदिनः.
प्रतीचीः कृष्णवर्तने सं दह यातुधान्यः.. (२)
हे अग्नि देव! आप इन राक्षसों और दूसरों के दोष देखने वाले पिशाचों को भस्म कर
दो. हे काले मार्ग वाले अग्नि! दूसरों के प्रतिकूल आचरण करने वाली राक्षसियों को भी आप
भस्म कर दें. (२)
या शशाप शपनेन याघं मूरमादधे.
या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा.. (३)
जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों
की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का
विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें. (३)
पुत्रमत्तु यातुधानीः स्वसारमुत नप्त्यम्.
अधा मिथो विकेश्यो ३ वि घ्नतां यातुधान्यो ३ वि तृहन्तामराय्यः.. (४)
राक्षसियां अपने पुत्र, बहन और नाती को खा जाएं. राक्षसियां एकदूसरे के केश खींच
कर लड़ने के कारण बाल बिखेरें तथा मृत्यु को प्राप्त हों. दान न करने वाली राक्षसियां आपस
में लड़ कर मर जाएं. (४)
सूक्त-२९ देवता—ब्रह्मणस्पति
अभीवर्तेन मणिना येनेन्द्रो अभिवावृधे.
तेनास्मान् ब्रह्मणस्पते ऽ भि राष्ट्राय वर्धय.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करने वाली जिस मणि को धारण कर के इंद्र
उन्मत्त हुए हैं, उसी मणि के द्वारा शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ. आप की
कृपा से हम संपन्न जनों द्वारा सुरक्षित राष्ट्र में शत्रुओं के भय से रहित हों. (१)
अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः.
अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो नो दुरस्यति.. (२)
हे अभीवर्त मणि! तुम हमारे शत्रुओं के सामने डट कर उन्हें पराजित करो. जो हमारे
राष्ट्र, धन आदि का अपहरण कर के हमारे प्रति शत्रुता का व्यवहार करते हैं, उन के सामने
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डट कर तुम उन को पराजित करो. जो हम से युद्ध करने के लिए सेना सजाते हैं अथवा हमारे
प्रति अभिचार (जादूटोने) के रूप में शत्रुता करते हैं, तुम उन्हें भी पराजित करो. (२)
अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृधत्.
अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि.. (३)
हे अभीवर्त मणि! सविता देव ने तुम्हारी वृद्धि की है और सोम देव ने तुम्हें समृद्ध बनाया
है. हे मणि! सभी प्राणियों ने तुम्हारी वृद्धि की है. जो व्यक्ति तुम्हें धारण करता है, वह सभी
साधनों से संपन्न हो जाता है. (३)
अभीवर्तो अभिभवः सपत्नक्षयणो मणिः.
राष्ट्राय मह्यं बध्यतां सपत्नेभ्यः पराभुवे.. (४)
शत्रुओं की पराजय करने वाली एवं राक्षसों का विनाश करने वाली अभीवर्त मणि राष्ट्र
की समृद्धि और शत्रुओं के विनाश के लिए मेरे हाथ में बांधो. (४)
उदसौ सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः.
यथाहं शत्रुहो ऽ सान्यसपत्नः सपत्नहा.. (५)
आकाश मंडल में दिखाई देने वाले एवं सभी प्राणियों के प्रेरक सूर्य देव उदित हो गए हैं.
अपनी विजय की एवं शत्रुओं की पराजय की कामना करने वाली मेरी वेद रूपी वाणी भी
प्रकट हो गई है. अभीवर्त मणि को धारण करने वाला मैं जिस प्रकार शत्रुओं को मारने वाला
बनूं, ऐसा सुयोग उपस्थित हो. मैं शत्रुरहित हो जाऊं. यदि मेरा कोई शत्रु हो भी तो उसे मैं
पराजित करूं. (५)
सपत्नक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विषासहिः.
यथाहमेषां वीराणां विरांजानि जनस्य च.. (६)
हे मणि! मैं तुम्हारे प्रभाव से शत्रुओं का नाशक, प्रजाओं का पालक, अपने राष्ट्र का
स्वामी एवं शत्रुओं को वश में करने वाला बनूं. मैं शत्रु सेना के वीरों एवं उन की प्रजाओं पर
शासन करने में समर्थ बनूं. (६)
सूक्त-३० देवता—विश्वे देव
विश्वे देवा वसवो रक्षतेममुतादित्या जागृत यूयमस्मिन्.
मेमं सनाभिरुत वान्यनाभिर्मेमं प्रापत् पौरुषेयो वधो यः.. (१)
हे विश्वे देव! वसु एवं आदित्य देवो! दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष की
रक्षा करो एवं दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष के विषय में सावधान रहो. इस का
सजातीय अथवा विजातीय शत्रु इस के पास तक न आ सके. कोई भी इस की हिंसा करने में
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समर्थ न हो. (१)
ये वो देवाः पितरो ये च पुत्राः सचेतसो मे शृणुतेदमुक्तम्.
सर्वेभ्यो वः परि ददाम्येतं स्वस्त्ये नं जरसे वहाथ.. (२)
हे देवो! आप के जो पितर एवं पुत्र हों, वे भी इस पुरुष के विषय में की गई मेरी प्रार्थना
पर ध्यान दें. दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष को मैं आप सब को सौंपता हूं. इस
की वृद्धावस्था तक आप इस का कल्याण करें. (२)
ये देवा दिविष्ठ ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष ओषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः.
ते कृणुत जरसमायुरस्मै शतमन्वान् परि वृणक्तु मृत्यून्.. (३)
जो देव स्वर्ग में एवं पृथ्वी पर निवास करते हैं, वायु आदि जो देव अंतरिक्ष में गमन
करते हैं तथा जो देव ओषधियों, पशुओं एवं जलों में स्थित हैं, वे सब देव इस दीर्घ आयु की
कामना करने वाले पुरुष को वृद्धावस्था पर्यंत आयु प्रदान करें एवं इसे मृत्यु से बचाएं. (३)
येषां प्रयाजा उत वानुयाजा हुतभागा अहुतादश्च देवाः.
येषां वः पञ्च प्रदिशो विभक्तास्तान् वो अस्मै सत्रसदः कृणोमि.. (४)
जिस देव के निमित्त पंचयाग किए जाते हैं, वह अग्नि देव; जिन देवों के निमित्त बाद
वाले तीन यज्ञ किए जाते हैं, वह इंद्र आदि देव; जो बलि का अपहरण करते हैं, दिशाओं के
स्वामी देव हैं, इन सब को एवं इन के अतिरिक्त जो देव हैं, उन को भी मैं इस दीर्घ आयु चाहने
वाले पुरुष के समीप बैठने के लिए नियुक्त करता हूं. (४)
सूक्त-३१ देवता—आशापाल अर्थात्
वास्तोष्पति
आशानामाशापालेभ्यश्चतुर्भ्यो अमृतेभ्यः.
इदं भूतस्याध्यक्षेभ्यो विधेम हविषा वयम्.. (१)
पूर्व आदि दिशाओं की रक्षा करने वाले एवं कभी न मरने वाले इंद्र, यम आदि चार देवों
के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं. वे देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं. (१)
य आशानामाशापालाश्चत्वार स्थन देवाः.
ते नो निर्ऋत्याः पाशेभ्यो मुञ्चतांहसो अंहसः.. (२)
जो दिशाओं का पालन करने वाले इंद्र आदि चार देव हैं, वे हमें मृत्यु देव के पाशों से
छुड़ाएं तथा पापों से हमारी रक्षा करें. (२)
अस्रामस्तवा हविषा यजाम्यश्लोणस्तवा घृतेन जुहोमि.
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य आशानामाशापालस्तुरीयो देवः स नः सुभूतमेह वक्षत्.. (३)
हे धन देने वाले देव कुबेर! मैं अपने अभिमत धन आदि प्राप्त करने के लिए हवि से इंद्र
आदि देवों की प्रसन्नता के लिए हवन करता हूं. दिशाओं की रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों में
जो चौथे देव कुबेर हैं, वे इस यज्ञ में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें. (३)
स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः.
विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव दृशेम सूर्यम्.. (४)
हमारी माता, हमारे पिता, हमारी गायों और सारे संसार का कल्याण हो. हमारी माता
आदि उत्तम धन एवं श्रेष्ठ ज्ञान वाले हैं. हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें. (४)
सूक्त-३२ देवता—द्यावा पृथिवी
इदं जनासो विदथ महद् ब्रह्म वदिष्यति.
न तत् पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः.. (१)
हे जानने के इच्छुक जनो! इस बात को जानो कि वह जल रूप ब्रह्म पृथ्वी पर नहीं
रहता और न वह आकाश में निवास करता है. उसी जल के कारण सभी वृक्ष एवं लताएं
जीवित रहती हैं. (१)
अन्तरिक्ष आसां स्थाम श्रान्तसदामिव.
आस्थानमस्य भूतस्य विदुष्टद् वेधसो न वा.. (२)
जिस प्रकार गंधर्वों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण
रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो
भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं
जानते. (२)
यद् रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरतक्षतम्.
आर्द्रं तदद्य सर्वदा समुद्रस्येव स्रोत्याः.. (३)
हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले
बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का
जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार
सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं. (३)
विश्वमन्यामभीवार तदन्यस्यामधिश्रितम्.
दिवे च विश्ववेदसे पृथिव्यै चाकरं नमः.. (४)
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