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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-३४ देवता—जंगिड़ वनस्पति

व्यथित कर के सूर्य के समान चारों दिशाओं को प्रकाशित करो. (५)
सूक्त-३४ देवता—जंगिड़ वनस्पति
जङ्गिडो ऽ सि जङ्गिडो रक्षितासि जङ्गिड:.
द्विपाच्चतुष्पादस्माकं सर्वं रक्षतु जङ्गिड:.. (१)
हे जंगिड़ नाम की ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी! तुम कृत्या नाम की राक्षसी को तथा उस
के द्वारा किए हुए कर्मों को निगल लेती हो. इस आधार पर तुम सभी भयों से रक्षा करने वाली
होती हो. हे जंगिड़! तुम हमारे दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि की तथा चार पैरों वाले गाय, अश्व
आदि पशुओं की रक्षा करो. (१)
या गृत्स्यस्त्रिपञ्चाशी: शतं कृत्याकृतश्च ये.
सर्वान् विनक्तु तेजसो ऽ रसांजङ्गिडस्करत्.. (२)
तिरेपन प्रकार की जो हानि पहुंचाने वाली राक्षसियां, कृत्याएं है तथा पुतलियां बनाने
वाले जो सैकड़ों जादूटोना करने वाले हैं, जंगिड नाम की ओषधि से बनी हुई मणि उन सभी
को नष्ट शक्ति वाला तथा रसहीन करे. (२)
अरसं कृत्रिमं नादमरसा: सप्त विस्रस:.
अपेतो जङ्गिडामतिमिशुमस्तेव शातय.. (३)
अभिचार अर्थात् जादूटोना करने वाले के द्वारा उत्पन्न की गई हानि को यह जंगिड मणि
सारहीन करे. सात छेदों—नाक, नेत्र, कान तथा मुख में उत्पन्न किए गए अभिचार कर्म को
यह जंगिड मणि नष्ट करे. बाण फेंकने वाला शत्रुओं को जिस प्रकार नष्ट कर देता है, उसी
प्रकार जंगिड मणि हम से दुर्बुद्धि और दरिद्रता को दूर करे. (३)
कृत्यादूषण एवायमथो अरातिदूषण:.
अथो सहस्वाज्जङ्गिड: प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (४)
यह जंगिड़ मणि शत्रु के द्वारा उत्पन्न कृत्या राक्षसी का निराकरण करने वाली है तथा
शत्रु को नष्ट करने का साधन है. यह जंगिड़ मणि ऊपर बताए हुए कार्यों की शक्ति से युक्त है.
यह हमारी आयु को बढ़ाए. (४)
स जङ्गिडस्य महिमा परि ण: पातु विश्वतः.
विष्कन्धं येन सासह संस्कन्धमोज ओजसा.. (५)
जंगिड़ मणि का यह महत्त्व सभी ओर से हमारी रक्षा करे. यह मणि विस्कंद नाम के
वातरोग को अपने बल से नष्ट करती है. (५)
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त्रिष्ट्वा देवा अजनयन् निष्ठितं भूम्यामधि.
तमु त्वाङ्गिरा इति ब्राह्मणाः पूर्व्या विदुः.. (६)
इस समय धरती पर स्थित तुम को इंद्र आदि देवों ने तीन बार उत्पन्न किया था. इस
प्रकार के तुम को अंगिरा गोत्रीय ऋषि एवं ब्राह्मण जानते थे. (६)
न त्वा पूर्वा ओषधयो न त्वा तरन्ति या नवाः.
विबाध उग्रो जङ्गिडः परिपाणः सुमङ्गलः.. (७)
हे जंगिड़ मणि! सृष्टि के आदि में उत्पन्न ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां तुम से श्रेष्ठ नहीं
हैं. नई ओषधियां भी तुम से श्रेष्ठ नहीं हैं. हे शत्रुसेना आदि को बाधा उत्पन्न करने वाली
जंगिड मणि! तुम उग्र, चारों ओर से रक्षा करने वाली तथा भलीभांति मंगलकारी हो. (७)
अथोपदान भगवो जङ्गिडामितवीर्य. पुरा त उग्रा ग्रसत उपेन्द्रो वीर्यं ददौ..
(८)
हे कृत्या राक्षसी को दूर करने में स्वीकृत! हे अधिक माहात्म्य वाली! हे असीमित शक्ति
वाली जंगिड़ मणि! अधिक शक्ति वाले प्राणी तुम्हें खा लेंगे, ऐसा जान कर इंद्र ने तुम्हें अधिक
बल प्रदान किया है. (८)
उग्र इत् ते वनस्पत इन्द्र ओज्मानमा दधौ.
अमीवाः सर्वाश्चातयंजहि रक्षांस्योषधे.. (९)
हे जंगिड़ नाम की वनस्पति अर्थात् जड़ीबूटी! तुम अधिक शक्ति वाली ही हो. इंद्र ने तुम
में बल धारण किया है, इस कारण हे जंगिड़ ओषधि! तुम सभी रोगों का नाश करती हुई
राक्षसों को नष्ट करो. (९)
आशीरीकं विशिरीकं बलासं पृष्ट्यामयम्.
तक्मानं विश्वशारदमरसां जङ्गिडस्करत्.. (१०)
सभी प्रकार से हिंसक आशीरीक रोग को, विशेष रूप से हिंसक विशिरीक रोग को, बल
का नाश करने वाले बलास रोग को, सभी अंगों में व्याप्त पृष्ठम रोग को, तक्मा रोग को तथा
विश्वशारद रोग को जंगिड मणि पीड़ा पहुंचाने में असमर्थ बनाए. (१०)
सूक्त-३५ देवता—जंगिड़ वनस्पति
इन्द्रस्य नाम गृह्णन्त ऋषयो जङ्गिडं ददुः.
देवा यं चक्रुर्भेषजमग्रे विष्कन्धदूषणम्.. (१)
प्राचीन ऋषियों ने इंद्र का नाम लेते हुए रक्षा के इच्छुक मनुष्यों को जंगिड़ मणि दी.
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सृष्टि को आदि में इंद्र आदि देवों ने जंगिड़ ओषधियों को विष्कंध नाम के महारोग नष्ट करने
वाली बनाया था. (१)
स नो रक्षतु जङ्गिडो धनपालो धनेव.
देवा यं चक्रुर्ब्राह्मणाः परिपाणमरातिहम्.. (२)
राजा का धनाध्यक्ष जिस प्रकार धन की रक्षा करता है, उसी प्रकार जंगिड मणि हमारी
रक्षा करे. जंगिड मणि को देवों तथा ब्राह्मणों ने सभी प्रकार से रक्षक और शत्रुओं का विनाश
करने वाला बनाया है. (२)
दुर्हार्दः संघोरं चक्षुः पापकृत्वानमागमम्.
तांस्त्वं सहस्रचक्षो प्रतीबोधेन नाशय परिपाणो ऽ सि जङ्गिडः.. (३)
हे जंगिड़ मणि! तुम दुष्ट हृदय वाले शत्रु का नाश करो. तुम अति भयानक व्यक्ति का
नाश करो. हिंसा आदि पाप करने वाले का तुम नाश करो. हे हजार नेत्रों वाली जंगिड़ मणि!
तुम उन शत्रुओं को अपनी प्रतिकूल बुद्धि से नष्ट करो. हे जंगिड़! तुम सभी प्रकार से रक्षा
करने वाली हो. (३)
परि मा दिवः परि मा पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात् परि मा वीरुद्भ्यः.
परि मा भूतात् परि मोत भव्याद् दिशोदिशो जङ्गिडः पात्वस्मान्.. (४)
यह जंगिड़ मणि मुझे द्युलोक अर्थात् स्वर्ग से होने वाले भय से, पृथ्वी से होने वाले भय
से, अंतरिक्ष के राक्षसों आदि के भय से तथा वृक्षों से होने वाले भय से बचाएं. यह जंगिड़
मणि मुझे अतीत काल के प्राणियों से एवं भविष्य में होने वाले प्राणियों से बचाए. जंगिड़
मणि सभी दिशाओं में होने वाले भयों से हमारी रक्षा करे. (४)
य ऋष्णावो देवकृता य उतो ववृते ऽ न्यः.
सर्वांस्तान् विश्वभेषजो ऽ रसां जङ्गिडस्करात्.. (५)
देवों के द्वारा बनाए हुए जो हिंसक पुरुष हैं तथा मनुष्य आदि के द्वारा प्रेरित जो बाधक
हैं, उन सभी भेषजों अर्थात् ओषधियों को जंगिड़ मणि शक्तिहीन करे. (५)
सूक्त-३६ देवता—शतवार
शतवारो अनीनशद् यक्ष्मान् रक्षांसि तेजसा.
आरोहन् वर्चसा सह मणिर्दुर्णामचातनः.. (१)
शतवार नाम की विशेष ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी अपनी महिमा से यक्ष्मा अर्थात् टी.
बी. रोग को नष्ट करे. यह मणि राक्षसों का भी विनाश करे. त्वचा के दोषों को नष्ट करने वाली
शतवार मणि अपनी दीप्ति के साथ पुरुष की भुजा पर विराजमान हो. (१)
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शृङ्गाभ्यां रक्षो नुदते मूलेन यातुधान्यः.
मध्येन यक्ष्मं बाधते नैनं पाप्माति तत्रति.. (२)
यह शतवार मणि! अपने सींगों अर्थात् अगले भागों से अंतरिक्ष में स्थित राक्षसों को
भगाती है तथा अपनी जड़ अर्थात् नीचे वाले भाग से राक्षसियों को दूर करती है. यह मणि
अपने मध्य भाग से यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. रोग को दूर करती है. पाप इस का अतिक्रमण नहीं
कर पाता. (२)
ये यक्ष्मासो अर्भका महान्तो ये च शब्दिनः.
सर्वान् दुर्नामहा मणिः शतवारो अनीनशत्.. (३)
जो उत्पन्न हुए अर्थात् प्रारंभिक अवस्था वाले यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. रोग हैं, जो बढ़े हुए
यक्ष्मा तथा जो कष्ट से चिकित्सा योग्य यक्ष्मा रोग हैं, इन सभी बुरे नाम वाले रोगों को शतवार
मणि नष्ट कर देती है. (३)
शतं वीरानजनयच्छतं यक्ष्मानपावपत्.
दुर्नाम्नः सर्वान् हत्वाव रक्षांसि धुनुते.. (४)
धारण की जाती हुई यह शतवार मणि सौ वीर पुत्रों को जन्म देती है तथा यक्ष्मा नाम के
सौ रोगों को दूर भगाती है. यह सभी बुरे नाम वाले राक्षसों को नष्ट कर के ऐसा कर देती है
कि ये पुनः उपद्रव न कर सकें. (४)
हिरण्यशृङ्ग ऋषभः शातवारो अयं मणिः.
दुर्नाम्नः सर्वांस्तृड्ढवाव रक्षांस्यक्रमीत्.. (५)
सोने के समान चमकने वाले अग्र भाग वाली शतवार ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी सभी
ओषधियों में श्रेष्ठ है. यह सभी अयश वाले जनों को तिनके के समान नष्ट कर के राक्षसों पर
आक्रमण करे. (५)
शतमहं दुर्नाम्नीनां गन्धर्वाप्सरसां शतम्.
शतं शश्वन्वतीनां शतवारेण वारये.. (६)
मैं कोढ़, दाद आदि सौ व्याधियों, सौ गंधर्वों तथा सौ अप्सराओं को दूर करता हूं.
बारबार पीड़ा देने के लिए आने वाली सैकड़ों अपस्मार अर्थात पागलपन आदि व्याधियों को
शतवार ओषधि से दूर करता हूं. (६)
सूक्त-३७ देवता—अग्नि
इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन् भर्गो यशः सह ओजो वयो बलम्.
त्रयस्त्रिंशद् यानि च वीर्याणि तान्यग्निः प्र ददातु मे.. (१)
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अग्नि देव के द्वारा दी हुई यह दीप्ति आए. तेज एवं यश के साथ ओज, यौवन और बल
आए. तैंतीस प्रकार के जो कार्य अर्थात् वीरतापूर्ण सामर्थ्य हैं, अग्नि उन्हें मुझे प्रदान करें. (१)
वर्च आ धेहि मे तन्वां ३ सह ओजो वयो बलम्.
इन्द्रियाय त्वा कर्मणे वीर्याय प्रति गृह्णामि शतशारदाय.. (२)
हे अग्नि! मेरे शरीर में शत्रुओं को पराजित करने वाला तेज हो तथा तेज के साथ मुझे
पूर्ण आयु और बल प्रदान करो. मैं ज्ञानेंद्रियों तथा कर्मेंद्रियों की दृढ़ता के लिए तुझे स्वीकार
करता हूं. मैं अग्निहोत्र आदि कर्म के लिए वायु पर विजय प्राप्त करने वाले कार्य के लिए तथा
सौ वर्ष का जीवन प्राप्त करने के लिए तुझे ग्रहण करता हूं. (२)
ऊर्जे त्वा बलाय त्वौजसे सहसे त्वा.
अभिभूयाय त्वा राष्ट्रभृत्याय पर्यूहामि शतशारदाय.. (३)
हे स्वीकार किए गए पदार्थ! मैं तुम्हें अन्न प्राप्ति के लिए, बल प्राप्ति के लिए, तेज प्राप्ति
के लिए, धन प्राप्ति के लिए, शत्रु जय के लिए तथा राज्य के भरणपोषण के लिए सौ वर्षों की
अवधि हेतु ग्रहण करता हूं. (३)
ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः.
धात्रे विधात्रे समृधे भूतस्य पतये यजे.. (४)
हे पदार्थ! मैं तुझे ग्रीष्म आदि ऋतुओं को प्रसन्न करने के लिए, ऋतु संबंधी देवताओं
को प्रसन्न करने के लिए, चैत्र आदि मासों को प्रसन्न करने के लिए, संवत्सरों को प्रसन्न करने
के लिए, धाता और विधाता तथा सभी प्राणियों के स्वामी समृध को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ
करता हूं. (४)
सूक्त-३८ देवता—गुग्गुलु
न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते.
यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते.. (१)
उस राजा को यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. नाम का रोग पीड़ित नहीं करता और दूसरों के द्वारा
अभिशाप उस पर प्रभाव डालता है, जिस राजा को गूगल नाम की ओषध की सुखदायक गंध
व्याप्त करती है. (१)
विष्वञ्चस्तस्माद् यक्ष्मा मृगा अश्वा इवेरते.
यद् गुल्गुलु सैन्धवं यद् वाप्यासि समुद्रियम्.. (२)
गूगल की गंध सूंघने वाली यह यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. नाम की व्याधि हिरन और घोड़े के
समान सभी दिशाओं में तीव्र गति से भागती है. गुग्गुल या तो सिंधु देश में उत्पन्न हो अथवा
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