अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१२ देवता—विष निवारण
अर्थात् गर्भ को हम से पृथक् अर्थात् नारी में पुत्र रूपी संतान को एक वर्ष के पश्चात जन्म
लेने योग्य बनाया. (३)
सूक्त-१२ देवता—विष निवारण
परि द्यामिव सूर्यो ऽ हीनां जनिमागमम्.
रात्री जगदिवान्यूर्द्धसात् तेना ते वायरॆ विषम्.. (१)
जिस प्रकार सूर्य अंतरिक्ष में व्याप्त होता है, उसी प्रकार मैं सर्पों के जन्म को जानता हूं.
जिस प्रकार रात्रि अपने अंधकार से सारे संसार को व्याप्त कर लेती है, उसी प्रकार शरीर में
व्याप्त विष को मैं ओषधि से दूर करता हूं. (१)
यद् ब्रह्माभिर्यदृषिभिर्यद् देवैर्विदितं पुरा.
यद् भूतं भव्यमासन्वत् तेना ते वायरॆ विषम्.. (२)
जिस ओषधि को प्राचीन काल में मंत्रों ने, अगस्त्य, वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा इंद्र
आदि देवों ने जाना है, उन भूत, वर्तमान और भविष्यकाल की ओषधियों से मैं तेरे शरीर में
स्थित विष का निवारण करता हूं. (२)
मध्वा पृञ्चे नद्य १: पर्वता गिरयो मधु.
मधु परुष्णी शीपाला शमास्ने अस्तु शं हृदे.. (३)
गंगा आदि नदियां, हिमालय आदि विशाल पर्वत और छोटे पर्वत तेरे शरीर में विष
नाशक अमृत सींचें. शैवाल से युक्त परुष्णी नाम की नदी तेरे शरीर पर अमृत चुपड़े. यह
विषनाशक अमृत तेरे और मेरे हृदय के लिए सुखकारी हो. (३)
सूक्त-१३ देवता—मृत्यु
नमो देववधेभ्यो नमो राजवधेभ्यः.
अथो ये विश्यानां वधास्तेभ्यो मृत्यो नमो ऽ स्तु ते.. (१)
इंद्र आदि के हनन साधन वज्र आदि को नमस्कार है, जिस से वे हमारा त्याग कर दें.
राजा से संबंधित आयुधों को नमस्कार है. हे मृत्यु! वैश्य जातियों के वध के जो साधन हैं, उन
से बचाने के लिए हम तुझे नमस्कार करते हैं. (१)
नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः.
सुमत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्यै त इदं नमः.. (२)
हे मृत्यु! तेरा पक्षपात कर के वचन बोलने वाले दूत को तथा पराभव का वर्णन करने
वाले के लिए नमस्कार है. हे मृत्यु! तेरी अनुग्रहकारिणी बुद्धि के लिए एवं निग्रह करने वाली
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दुर्बुद्धि के लिए नमस्कार है. (२)
नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेषजेभ्य:.
नमस्ते मृत्यो मूलेभ्यो ब्राह्मणेभ्य इदं नम:.. (३)
हे मृत्यु! तुझ से संबंधित राक्षसों को नमस्कार है, जो लोगों को पीड़ा पहुंचाते हैं. तुझ से
रक्षा करने वाली ओषधियों को नमस्कार है. तुझ से संबंधित मूल पुरुषों तथा शापानुग्रह
समर्थ ब्राह्मणों के लिए नमस्कार है. (३)
सूक्त-१४ देवता—बलास
अस्थिस्रंसं परुस्रंसमास्थितं हृदयामयम्.
बलासं सर्वं नाशयाङ्गेष्ठा यश्च पर्वसु.. (१)
मंत्र की शक्ति से हड्डियों को कंपित करने वाले, शरीर के जोड़ों को ढीला करने वाले
तथा सारे शरीर में व्याप्त श्लेष्मा द्वारा किए हुए हृदय रोग की शक्ति का विनाश करे. वह रोग
खांसी और सांस से संबंधित है. (१)
निर्बलासं बलासिनः क्षिणोमि पुष्करं यथा.
छिनद्म्यस्य बन्धनं मूलमुर्वार्व्वा इव.. (२)
जिस प्रकार सरोवर से कमल उखाड़ा जाता है, उसी प्रकार मैं इस रोगी पुरुष के श्लेष्मा
रोग को जड़ से नष्ट करता हूं. जिस प्रकार पकी हुई ककड़ी अपने नाल से अपनेआप अलग
हो जाती है, उसी प्रकार मैं इस रोगी के श्लेष्मा रोग का बंधन तोड़ता हूं. (२)
निर्बलासेतः प्र पताशुङ्गः शिशूको यथा.
अथो इट इव हायनो ऽ प द्राह्यवीरहा.. (३)
हे श्लेष्मा रोग! जिस प्रकार भागा हुआ शुंशुकि हरिण दूर चला जाता है तथा गया हुआ
संवत्सर फिर वापस नहीं आया, उसी प्रकार हमारे वीरों के विनाशकारी तू इस रोगी को छोड़
कर बुरी दिशा में चला जा. (३)
सूक्त-१५ देवता—वनस्पति
उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा उपस्तयः.
उपस्तिरस्तु सो ३ स्माकं यो अस्मां अभिदासति.. (१)
हे सोमपर्ण से उत्पन्न पलाश वृक्ष! तू वनस्पतियों में उत्तम है. सभी वृक्ष तेरे उपासक
अर्थात् तुझ से निम्न स्थिति वाले हैं. तेरी कृपा से हमारा वह शत्रु हमारा उपासक बने जो हमें
नष्ट करना चाहता है. (१)
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सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति.
तेषां सा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (२)
हमारे गोत्र वाला अथवा हमारे गोत्र से भिन्न जो शत्रु हमें क्षीण करना चाहता है, उन सब
में मैं उसी प्रकार उत्तम बनूं, जिस प्रकार तू सभी वृक्षों में श्रेष्ठ है. (२)
यथा सोम ओषधीनामुत्तमो हविषां कृतः.
तलाशा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (३)
जिस प्रकार पुरोडाश के प्रयोग के लिए सोमलता सभी लताओं और वनस्पतियों में श्रेष्ठ
मानी जाती है, उसी प्रकार मैं अपने गोत्र वालों में श्रेष्ठ बनूं. (३)
सूक्त-१६ देवता—मंत्र में उक्त
आबयो अनाबयो रसस्त उग्र आबयो. आ ते करम्भमद्मसि.. (१)
हे रोग निवृत्ति के लिए खाई जाने वाली सरसों एवं न खाए जाने वाले सरसों के तने!
तेरा रस अर्थात् तेल रोग निवारण में सक्षम है. हे सरसों! हम तेरा करम्भ (साग) मंत्रों से युक्त
कर के खाते हैं. (१)
विहह्लो नाम ते पिता मदावती नाम ते माता.
स हि न त्वमसि यस्त्वमात्मानमावयः.. (२)
हे सरसों के साग! तेरा पिता विहह्वल तथा माता मदावती नाम की है. तू अपना साग
मनुष्यों को खाने के लिए दे देती है, इसलिए तू अपने मातापिता के समान नहीं रहती. (२)
तौविलिके ऽ वेलयावायमैलब ऐलयीत्. बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्चापेहि निराल..
(३)
हे तौविलिक नाम की पिशाची! तू रोगों का कारण है. तू हमारे रोग को पराजित कर के
लौटा दे. तेरे द्वारा होने वाला ऐलय नाम का नेत्र रोग दूर चला जाए. हे बभ्रु, बभ्रुवर्ण तथा
निराल नामक रोग! तुम इस पुरुष के शरीर से भाग जाओ. (३)
अलसालासि पूर्वा सिलाञ्जालास्युत्तरा. नीलागलसाला.. (४)
पौधों की मंजरी अलसाला प्रथम उत्पन्न होने के कारण पूर्व है और बाद में उत्पन्न होने
के कारण सिलांजाला उत्तरा है. नीलागलसाला इन के मध्य वाली है. (४)
सूक्त-१७ देवता—गर्भ बृंहण
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यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (१)
हे नारी! जिस प्रकार विशाल पृथ्वी प्राणियों के शरीर को धारण करती है, उसी प्रकार
तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (१)
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान् वनस्पतीन्.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (२)
यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव
के समय जन्म लेने के हेतु स्थित रहे. (२)
यथेयं पृथिवी मही दाधार पर्वतान् गिरीन्.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (३)
हे नारी! जिस प्रकार यह विशाल पृथ्वी पर्वतों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ
भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (३)
यथेयं पृथिवी मही दाधार विष्ठितं जगत्.
एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (४)
हे नारी! यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार चराचर जगत् को धारण करती है. उसी प्रकार
तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (४)
सूक्त-१८ देवता—ईर्ष्या विनाशन
ईर्ष्याया ध्राजिं प्रथमां प्रथमस्या उतापराम्.
अग्निं हृदयं १ शोकं तं ते निर्वापयामसि.. (१)
हे ईर्ष्या करने वाले पुरुष! तेरी ईर्ष्यापूर्ण मति यह है कि इस स्त्री को कोई देख न ले.
इस मति को शांत करते हुए हम तेरे हृदय विदारक शोक एवं क्रोध को शांत करते हैं. (१)
यथा भूमिर्मृतमना मृतान्मृतमनस्तरा. यथोत मम्रुषो मन एवेष्योर्मृतं मनः..
(२)
सब प्राणियों से अधिष्ठित पृथ्वी शांत मन वाली और सब के शरीर से भी उदात्त मन
वाली होती है. जिस प्रकार मृत पुरुष का मन ईर्ष्या रहित होता है, उसी प्रकार स्त्री विषयक
ईर्ष्यायुक्त पुरुष का मन भी शांत हो जाए. (२)
अदो यत् ते हृदि श्रितं मनस्कं पतयिष्णुकम्.
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ततस्त ईर्ष्यां मुञ्चामि निरूष्माणं दृतेरिव.. (३)
हे ईर्ष्याग्रस्त पुरुष! लोहार जिस प्रकार भस्त्रा अर्थात् धौंकनी से सांस बाहर निकालता
है, वैसे ही मैं तेरे हृदय से ईर्ष्या दूर करता हूं. (३)
सूक्त-१९ देवता—मंत्र में उक्त
पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धिया.
पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातु मा.. (१)
देवगण मुझे पवित्र करें. मनुष्य मुझे बुद्धि अथवा कर्म के द्वारा पवित्र करें. सभी प्राणी
मुझे पवित्र करें और अंतरिक्ष में विचरण करने वाली वायु मुझे पवित्र करे. (१)
पवमानः पुनातु मा क्रत्वे दक्षाय जीवसे. अथो अरिष्टतातये.. (२)
निचोड़ा जाता हुआ सोम मुझे यज्ञ कर्म के लिए, बल प्राप्ति के लिए, जीवन के लिए
तथा अहिंसा करने के लिए पवित्र करे. (२)
उभाभ्यां देव सवितः पवित्रेण सवेन च. अस्मान् पुनीहि चक्षसे.. (३)
हे सब के प्रेरक सविता देव! तुम्हारा तेज पवित्र करने का साधन है. अपने तेज और
प्रेरणा से हमें इहलोक और परलोक के सुख के साधन यज्ञ के लिए शुद्ध करो. (३)
सूक्त-२० देवता—यक्ष्मा नाशक
अग्नेरिवास्य दहत एति शुष्मिण उतेव मत्तो विलपन्नपायति.
अन्यमस्मदिच्छतु कं चिद्व्रतस्तपुर्वधाय नमो अस्तु तक्मने.. (१)
गीले और सूखे सब को जलाने वाली दावाग्नि के समान अंगों को जलाने वाले इस ज्वर
का दाह सारे शरीर में व्याप्त है. उस समय व्यक्ति उन्मत्त के समान विलाप करता हुआ इस
लोक से चला जाता है. इस प्रकार का प्रबल पित्त ज्वर हमें त्याग कर किसी चरित्रहीन पुरुष
के पास चला जाए. (१)
नमो रुद्राय नमो अस्तु तक्मने नमो राज्ञे वरुणाय त्विषीमते.
नमो दिवे नमः पृथिव्यै नम ओषधीभ्यः.. (२)
ज्वर के अभिमानी देव रुद्र के लिए नमस्कार है. ज्वर के लिए नमस्कार है. दीप्तिशाली
एवं स्वामी वरुण के लिए नमस्कार है. द्युलोक तथा पृथ्वी के लिए नमस्कार है. पृथ्वी पर
उत्पन्न ओषधियों को नमस्कार है. (२)
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अयम् यो अभिशोचयिष्णुर्विश्वा रूपाणि हरिता कृणोषि.
तस्मै ते ऽरुणाय बभ्रवे नमः कृणोमि वन्द्याय तक्मने.. (३)
सभी ओर से पूरे शरीर को शोकयुक्त करता हुआ, जो यह पित्त ज्वर है, वह सभी
प्राणियों का रक्त दूषित कर के उन्हें हल्दी के समान पीला बना देता है. उस रक्त वर्ण एवं
पीत वर्ण तथा सेवा करने योग्य ज्वर को नमस्कार है. (३)
सूक्त-२१ देवता—चंद्रमा
इमा यास्तिस्रः पृथिवीस्तासां ह भूमिरुत्तमा.
तासामधि त्वचो अहं भेषजं समु जग्रभम्.. (१)
ये जो पृथ्वी आदि तीन लोक हैं, उन में यह पृथ्वी उत्तम है, जिस पर हम स्थित हैं. पृथ्वी
की त्वचा के समान ऊपर वर्तमान जो भूमि है, मैं उस पर उत्पन्न ओषधियों का संग्रह करता
हूं. (१)
श्रेष्ठमसि भेषजानां वसिष्ठं वीरुधानाम्.
सोमो भग इव यामेषु देवेषु वरुणो यथा.. (२)
हे हरिद्रा! तू अमोघ शक्ति के कारण अन्य भेषजों में उसी प्रकार प्रशंसनीय है तथा
वीरुधों में मुख्य है, जैसे रात्रि और दिन के काल विभाग के कारण चंद्रमा एवं सूर्य मुख्य हैं.
(२)
रेवतीरनाधृषः सिषासवः सिषासथ. उत स्थ केशदृंहणीरथो ह
केशवर्धनीः.. (३)
हे धनवती ओषधियो! तुम किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तुम आरोग्य देने के लिए
इच्छुक हो, इसलिए मुझे आरोग्य प्रदान करो. तुम केशों को दृढ़ बनाने वाली हो, इसलिए मेरे
केशों को दृढ़ करो. (३)
सूक्त-२२ देवता—आदित्य रश्मि, मरुत्
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति.
त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्यू दुः.. (१)
कृष्ण वर्ण अंतरिक्ष को पा कर सूर्य की किरणें पृथ्वी के पदार्थों का रस ग्रहण करती हुई
द्युलोक में पहुंच जाती हैं. वे सूर्य किरणें जल को सूर्य मंडल से वृष्टि के रूप में लाती हैं और
बाद में धरती को जल से गीला कर देती हैं. (१)
पयस्वतीः कृणुथाप ओषधीः शिवा यदेजथा मरुतो रुक्मवक्षसः.
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ऊर्जां च तत्र सुमतिं च पिन्वत यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु.. (२)
हे मरुद्गण! स्वर्ण से बने आभूषण वक्ष स्थल पर धारण कर के तुम जब चलते हो तो
जलों को रसमय और ओषधियों को सुखकारी बनाते हो. हे नेता मरुद्गण! तुम जहां पर वर्षा
का जल गिराते हो, उस देश में बल कारक अन्न और बुद्धियुक्त प्रजा का पोषण करो. (२)
उदप्रुतो मरुतस्ताँ इयर्त वृष्ट्या विश्वा निवतस्पृणाति.
एजाति ग्लहा कन्येव तुन्नैरुं तुन्दाना पत्येव जाया.. (३)
हे मरुद्गण! तुम जल बरसाने वाले उन मेघों को प्रेरित करो, जिन से संबंधित वर्षा
सभी फसलों को और सरिताओं को पुष्ट करती है. जिस प्रकार दरिद्र मातापिता अपनी कन्या
को देख कर दुःखी होते हैं, मेघ उसी प्रकार अपनी गर्जना से लोगों को भयभीत और कंपित
करते हैं. पत्नी जिस प्रकार पति से बातचीत करती हुई उसे अन्न आदि प्रदान करती है, मेघ
गर्जन रूपी वाणी उसी प्रकार गमनशील मेघ से बात करती है. (३)
सूक्त-२३ देवता—जल
सस्रुषीस्तदपसो दिवा नक्तं च सस्रुषीः. वरेण्यक्रतुरहमपो देवीरुप ह्वये..
(१)
उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत् के
रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१)
ओता आपः कर्मण्या मुञ्चन्वित्त्वितः प्रणीतये. सद्य कृण्वन्त्वेतवे.. (२)
सदैव बहने वाले, लौकिक और वैदिक कर्मों के साधन जल हमें उत्तम फल शीघ्र पाने
के लिए सभी पापों से बचाएं. (२)
देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः. शं नो भवन्त्वप ओषधीः
शिवाः.. (३)
प्रकाशित होने वाले एवं सब के प्रेरक सूर्य की प्रेरणा होने पर मनुष्य लौकिक और
वैदिक कर्म करे. जल हमारे लिए कल्याणकारी हों और ओषधियां हमारे पापों को शांत करें.
(३)
सूक्त-२४ देवता—जल
हिमवतः प्रस्रवन्ति सिन्धौ समह संगमः.
आपो ह मह्यं तद् देवीर्ददन् हृद्द्योतभेषजम्.. (१)
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पाप नाशक गंगा आदि नदियों का जल हिमालय से निकलता है और सागर में मिलता
है. इस प्रकार का दिव्य जल हृदय की जलन मिटाने वाली ओषधियां प्रदान करे. (१)
यन्मे अक्ष्योराद्योत पाष्ण्योः प्रपदोश्च यत्.
आपस्तत् सर्व निष्करन् भिषजां सुभिषक्तमाः.. (२)
जो रोग मेरी आंखों को व्यथित करते हैं, जो मेरे घुटनों और जांघों में आश्रय लेते हैं,
व्याधि विनाशकों में कुशल दिव्य जल उन सब को नष्ट करें. (२)
सिन्धुपत्नीः सिन्धुराज्ञीः सर्वा या नद्य १ स्थन.
दत्त नस्तस्य भेषजं तेना वो भुनजामहै.. (३)
हे जलो! सागर तुम्हारा पति है और तुम सागर रूपी राजा की पत्नियां हो. तुम सब नदी
रूप हो जाओ. तुम सब मुझे उस रोग को दूर करने की ओषधि दो, जिस से मैं निरोग हो
सकूं. (३)
सूक्त-२५ देवता—गंडमालाविनाशन
पञ्च च याः पञ्चाशच्च संयन्ति मन्या अभि.
इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (१)
गले के ऊपरी भाग में स्थित पचपन प्रकार की गंड मालाएं गले के ऊपरी भाग की
धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा
कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (१)
सप्त च याः सप्ततिश्च संयन्ति ग्रैव्या अभि.
इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (२)
गरदन की नसों में स्थित सतहत्तर प्रकार की गंडमालाएं गरदन की धमनियों को व्याप्त
करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो
जाते हैं. (२)
नव च या नवतिश्च संयन्ति स्कन्ध्या अभि.
इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (३)
कंधों की नसों में स्थित निन्यानवे प्रकार की गंडमालाएं कंधों की धमनियों को व्याप्त
करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो
जाते हैं. (३)
सूक्त-२६ देवता—पाप्मा
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अव मा पाप्मन्त्सृज वशी सन् मृडयासि नः.
आ मा भद्रस्य लोके पाप्मन् धेह्यविह्रतम्.. (१)
हे पाप के अभिमानी देव! मुझे छोड़ दो. तुम सब को वश में करने वाले हो. तुम मुझे
सुख दो. हे पाप्मा! पीड़ारहित मुझ को पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले लोक में
स्थापित करो. (१)
यो नः पाप्मन् न जहासि तमु त्वा जाहिमो वयम्.
पथामनु व्यावर्तनेऽन्यं पाप्मानु पद्यताम्.. (२)
हे पाप्मा! यदि मुझे नहीं छोड़ोगे तो मैं इस अनुष्ठान द्वारा तुम्हें बलपूर्वक चार मार्गों के
संगम रूप चौराहे पर छोडूंगा. वहां छोड़ा हुआ पाप हमारे शत्रुओं में प्रवेश करे. (२)
अन्यत्रास्मन्न्युच्यतु सहस्राक्षो अमर्त्यः.
यं द्वेषाम तमृच्छतु यमु द्विष्मस्तमिज्जहि.. (३)
इंद्र के समान अमर रहने वाला एवं बली पाप उसी को प्राप्त हो, जिस से हम द्वेष करते
हैं. हे पाप! जो हमारा शत्रु है, तू उसी के पास जा. (३)
सूक्त-२७ देवता—यम
देवाः कपोत इषितो यदिच्छन् दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम.
तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१)
हे देवो! पाप देवता द्वारा भेजा गया दूत कबूतर हम को पीड़ित करने की इच्छा करता
हुआ हमारे घर आया है. उसे लौटाने के लिए हम हवि के द्वारा तुम्हारी अर्चना करते हैं. हमारे
दुपायों अर्थात् उत्तराधिकारियों और चौपायों अर्थात् पशुओं का कल्याण हो. (१)
शिवः कपोत इषितो नो अस्त्वनागा देवाः शकुनो गृहं नः.
अग्निर्हिं विप्रो जुषतां हविर्नः परि हेतिः पक्षिणी नो वृणक्तु.. (२)
हे देवो! पाप देवता द्वारा भेजा हुआ कबूतर हमारे लिए सुखकारी हो तथा घरों को
पीड़ित न करे, क्योंकि यह अनपराधक है. इस के लिए मेधावी अग्नि हमारे हवि को स्वीकार
करें. उस की कृपा से पंखों वाला कबूतर नाम का आयुध हमें छोड़ दे. (२)
हेतिः पक्षिणी न दभात्यस्मानाष्ट्री पदं कृणुते अग्निधाने.
शिवो गोभ्य उत पुरुषेभ्यो नो अस्तु मा नो देवा इह हिंसीत् कपोतः.. (३)
पंखों वाला आयुध अर्थात् कबूतर हमें न मारे. वह दावाग्नि से व्याप्त वन में चला जाए.
हे देवो! वह कबूतर हमारी गायों और पुरुषों को सुख देने वाला हो. वह कबूतर हमारी हिंसा
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