अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—५९ देवता—अग्नि
योग्य हैं, इन दोनों के भाग के रूप में हवि प्रदान किया जाता है. जितने महान देव हैं, वे
अपनीअपनी पत्नियों, इंद्राणी आदि के साथ इस यज्ञ में आ कर हवि प्राप्त करें तथा तृप्त हों.
(६)
सूक्त—५९ देवता—अग्नि
त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा. त्वं यज्ञेष्वीड्यः.. (१)
हे अग्नि! तुम यज्ञकर्मों का पालन करने वाली हो. तुम मनुष्यों में जठराग्नि के रूप में
सभी ओर व्याप्त हो. तुम दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञों की स्तुति के योग्य हो. (१)
यद् वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टारासः.
अग्निष्टद् विश्वादा पृणातु विद्वान्त्सोमस्य यो ब्राह्मणाँ आविवेश.. (२)
हे देवो! अपने व्रतों को न जानने वाले हम जानने वालों को नष्ट करते हैं. उस लुप्त कर्म
को जानती हुई अग्नि पूर्ण करे. वह अग्नि सोम के संबंध से ब्राह्मणों के सम्मुख जाती है. (२)
आ देवानामपि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनुप्रवोढुम्.
अग्निर्विद्वान्त्स यजात् स इद्धोता सो ऽ ध्वरान्त्स ऋतून् कल्पयाति.. (३)
जिस मार्ग पर चल कर देवों को प्राप्त किया जाता है, हम उस मार्ग पर चलें. हम जो
अनुष्ठान कर सकते हैं, उसे करने के हेतु देवों के मार्ग पर गमन करें. जानने वाली अग्नि उस
मार्ग को देवों को प्राप्त कराएं. वही अग्नि देवों और मनुष्यों का आह्वान करने वाली है. अग्नि
यज्ञों तथा ऋतुओं को सुरक्षित करें. (३)
सूक्त—६० देवता—याग आदि
वाङ्म आसन्नसोः प्राणश्चक्षुरक्ष्णोः श्रोत्रं कर्णयोः.
अपलिताः केशा अशोणा दन्ता बहु बाह्वोर्बलम्.. (१)
मेरे मुख में वाणी हो. मेरी नासिका में प्राण रहें. मेरी आंखों में देखने की शक्ति रहे. मेरे
कानों में सुनने की शक्ति हो. मेरे केश श्वेत न हों. मेरे दांत कभी न टूटें. मेरी भुजाओं में
अधिक बल रहे. (१)
ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जवः पादयोः.
प्रतिष्ठा अरिष्टानि मे सर्वात्मानिभृष्टः.. (२)
मेरे उरुओं में ओज रहे, जंघाओं में वेग रहे तथा चरणों में चलने की शक्ति रहे. मेरी
आत्मा अहिंसित रहे तथा मेरे सभी अंग पाप रहित हों. (२)
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सूक्त—६१ देवता—ब्रह्मणस्पति
तनूस्तन्वा मे सहे दतः सर्वमायुरशीय.
स्योनं मे सीद पुरुः पृणस्व पवमानः स्वर्गे.. (१)
मैं जीवनभर अपने दांतों से खाता रहूं. मैं शत्रुओं को अपने शरीर से दबाने में समर्थ रहूं.
हे अग्नि! तुम मेरे घर में सुख से प्रतिष्ठित रहो. तुम स्वर्ग में भी मुझे सुख से संपन्न बनाओ.
(१)
सूक्त—६२ देवता—ब्रह्मणस्पति
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु.
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये.. (१)
हे अग्नि! तुम मुझे देवों का प्रिय बनाओ. मुझे राजाओं का भी प्रिय करो. मैं सभी देखने
वालों का, शूद्रों का और आर्यों का प्रिय बनूं. अर्थात् सब का प्रिय बनूं. (१)
सूक्त—६३ देवता—ब्रह्मणस्पति
उत् तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान् यज्ञेन बोधय.
आयुः प्राणं प्रजां पशून् कीर्तिं यजमानं च वर्धय.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! उठो और देवों को मेरे यज्ञों का ज्ञान कराओ. तुम इस यजमान की
आयु, प्राण, प्रजा, पशु तथा कीर्ति को बढ़ाओ. तुम इस यजमान की वृद्धि करो. (१)
सूक्त—६४ देवता—अग्नि
अग्ने समिधमाहार्षं बृहते जातवेदसे.
स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्र यच्छतु.. (१)
मैं महान और जातवेद अग्नि के लिए प्रज्वलित होने का साधन समिधाएं लाया हूं.
समिधाओं से वृद्धि को प्राप्त जातवेद अग्नि मुझे श्रद्धा और बुद्धि प्रदान करें. (१)
इध्मेन त्वा जातवेदः समिधा वर्धयामसि.
तथा त्वमस्मान् वर्धय प्रजया च धनेन च.. (२)
हे जातवेद अग्नि! हम प्रज्वलित होने के साधन समिधाओं के द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम
हमें प्रजा और धन से बढ़ाओ. (२)
यदग्ने यानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि.
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सर्वं तदस्तु मे शिवं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (३)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए जो यज्ञ के योग्य और यज्ञ के अयोग्य काष्ठ (लकड़ी) प्रदान
करता हूं, वह सब मेरे लिए कल्याणकारी हो अर्थात् उन से मेरा कल्याण हो. हे अतिशय युवा
अग्नि! तुम मेरे द्वारा दिए गए काष्ठ (लकड़ी) को स्वीकार करो. (३)
एतास्ते अग्ने समिधस्त्वमिद्धः समिद् भव.
आयुरस्मासु धेह्यामृतत्वमाचार्याय.. (४)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए ये समिधाएं लाया हूं. उन समिधाओं के द्वारा तुम प्रज्वलित
होओ. तुम हम सब में आयु और जीवन का आधान करो. तुम हमारे उपाध्याय के लिए अमृत
प्रदान करो. (४)
सूक्त—६५ देवता—सूर्य, जातवेद, वज्र
हरिः सुपर्णो दिवमारुहो ऽ र्चिषा ये त्वा दिप्सन्ति दिवमुत्पतन्तम्.
अव तां जहि हरसा जातवेदो ऽ बिभ्यदुग्रो ऽ र्चिसा दिवमा रोह सूर्य.. (१)
हे सूर्य! तुम अंधकार का नाश करने वाले तथा उत्तम पालन वाले हो. तुम अपने तेज से
द्युलोक अर्थात् आकाश पर बढ़ते हो. आकाश पर चढ़ते हुए तुम को जो शत्रु तिरस्कृत करना
चाहते हैं, हे जातवेद सूर्य! उन्हें तुम अपने शत्रु विनाशक तेज से नष्ट करो. इस के पश्चात
शत्रुओं से भयभीत न होते हुए तुम अपने तेज से आकाश में स्थित बनो. (१)
सूक्त—६६ देवता—सूर्य, जातवेद
अयोजाला असुरा मायिनो ऽ यस्मयैः पाशैरङ्किनो ये चरन्ति.
तांस्ते रन्धयामि हरसा जातवेदः सहस्रऋष्टिः सपत्नान् प्रमृणन् पाहि
वज्रः.. (१)
हे जातवेद सूर्य! जो मायावी असुर लोहे का जाल ले कर तथा लोहे के बने फंदे हाथ में
ले कर उत्तम कर्म करने वालों को मारने के लिए घूमते हैं, उन्हें मैं तुम्हारे तेज के द्वारा अपने
वश में करता हूं. हे हजार संख्या वाले आयुधों से युक्त तथा वज्रधारी! तुम शत्रुओं को अधिक
मात्रा में नष्ट करो तथा हमारा पालन करो. (१)
सूक्त—६७ देवता—सूर्य
पश्येम शरदः शतम्.. (१)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक देखते रहें. (१)
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जीवेम शरदः शतम्.. (२)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक जीवित रहें. (२)
बुध्येम शरदः शतम्.. (३)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक बुद्धि युक्त रहें. (३)
रोहेम शरदः शतम्.. (४)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक वृद्धि करते रहें. (४)
पूषेम शरदः शतम्.. (५)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक पुष्ट रहें. (५)
भवेम शरदः शतम्.. (६)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक पुत्र आदि से युक्त रहें. (६)
भूयेम शरदः शतम्.. (७)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक संतान वाले रहें. (७)
भूयसीः शरदः शतात्.. (८)
हे सूर्य देव! हम सौ वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रहें. (८)
सूक्त—६८ देवता—मंत्र में बताए गए
अव्यसश्च व्यचसश्च बिलं वि ष्यामि मायया.
ताभ्यामुद्धृत्य वेदमथ कर्माणि कृण्महे.. (१)
मैं सभी के शरीरों में व्याप्त व्यान वायु और व्यक्तिगत रूप से व्याप्त प्राण वायु के मूल
आधार को कर्म के द्वारा विस्तृत करता हूं. हम उन व्यान और प्राण वायु के द्वारा अक्षरात्मक
वेद को परा, पश्यंती और वैखरी वाणियों के क्रम से प्रत्यक्ष कर के यज्ञ कर्म करते हैं. (१)
सूक्त—६९ देवता—आप अर्थात् जल
जीवा स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (१)
हे देवगण! आप आयु वाले हैं. आप की कृपा से मैं भी आयु वाला बनूं. मैं पूर्ण आयु
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अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (१)
उपजीवा स्थोप जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (२)
हे देवगण! आप अधिक जीवन वाले हैं. आप की कृपा से मैं भी अधिक जीवन वाला
बनूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (२)
संजीवा स्थ सं जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (३)
हे देवगण! आप जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं करते हैं. मैं भी आप की कृपा से
जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ न करूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (३)
जीवला स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (४)
हे इंद्र! तुम सभी ऐश्वर्यों के प्रकाशक हो. मैं भी तुम्हारी कृपा से पूर्ण ऐश्वर्य का प्रकाशक
बनूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (४)
सूक्त—७० देवता—मंत्र में कथित इंद्र
आदि
इन्द्र जीव सूर्य जीव देवा जीवा जीव्यासमहम्. सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (१)
हे इंद्र! तुम जीवित रहो. हे सूर्य! तुम जीवित रहो. हे इंद्र आदि देवो! तुम जीवित रहो. मैं
भी आप की कृपा से जीवित रहूं. मैं पूर्ण आयु अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (१)
सूक्त—७१ देवता—गायत्री
स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्.
आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्.
मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्.. (१)
वेद का अध्ययन करने वाले अथवा गायत्री का जप करने वाले मैं ने इच्छाओं को पूर्ण
करने वाली, पापों से छुड़ाने वाली एवं वेदों की माता सावित्री की स्तुति की है. ब्राह्मणों को
पवित्र करने वाली सावित्री हमें प्रेरित करे. वह सावित्री देवी मुझे आयु, प्राण, प्रजा, पशु,
कीर्ति और ब्रह्म तेज दे कर ब्रह्म लोक को गमन करे. (१)
सूक्त—७२ देवता—परमात्मा और देव
यस्मात् कोशादुदभराम वेदं तस्मिन्नन्तरव दध्म एनम्.
कृतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेह.. (१)
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हम ने मूल आधार रूप कोश से वेदों का उद्धार किया है, हम ने वेदों का उद्धार यज्ञ
कार्य के हेतु किया है. हम वेदों को उसी स्थान पर स्थापित करते हैं. परमात्मा की शक्ति रूप
वेदों से हम ने जो यज्ञादि कर्म किए हैं, हे देवो! उस मन चाहे कर्म के फल के द्वारा तुम मेरा
पालन करो. (१)