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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

शतं जीवन्तः शरदः पुरूचीस्तिरो मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (२३)

इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम्.
शतं जीवन्तः शरदः पुरूचीस्तिरो मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (२३)
हे मनुष्यो! तुम अपनी मृत्यु को पत्थर से दबाओ. मैं तुम्हें पत्थर रूपी कवच देता हूं.
उसे कोई अन्य प्राप्त न करे. तुम सौ वर्षों तक जीवित रहो. (२३)
आ रोहतायुर्जरसं वृणाना अनुपूर्वं यतमाना यति स्थ.
तान् वस्त्वष्टा सुजनिमा सजोषाः सर्वमायुर्नयतु जीवनाय.. (२४)
हे मनुष्यो! तुम वृद्धावस्था की दीर्घ आयु को प्राप्त करो. तुम सुंदर जन्म वाले और मान
प्रीति वाले हो. त्वष्टा तुम्हें दीर्घ जीवन के हेतु पूर्ण आयु प्रदान करें. (२४)
यथाहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथर्तव ऋतुभिर्यन्ति साकम्.
यथा न पूर्वमपरो जहात्येवा धातुरायूंषि कल्पयैषाम्.. (२५)
जिस प्रकार ऋतुएं एक के पीछे दूसरी आती हैं, जैसे दिन एक के पीछे दूसरे आते हैं,
जैसे बाद वाला पहले का त्याग नहीं करता, हे माता! उसी प्रकार प्रकार इन्हें आयुष्मान
बनाओ. (२५)
अश्मन्वती रीयते सं रभध्वं वीरयध्वं प्र तरता सखायः.
अत्रा जहीत ये असन् दुरेवा अनमीवानुत्तरेमाभि वाजान्.. (२६)
हे मनुष्यो! यह नदी पाषाणों से युक्त बह रही है. वीरतापूर्वक इस नदी के पार हो जाओ.
अपने पापों को तुम इसी नदी में डाल दो. इस के बाद हम रोग निवारक वेगों को प्राप्त करें.
(२६)
उत्तिष्ठता प्र तरता सखायो ऽ श्मन्वती नदी स्यन्दत इयम्.
अत्रा जहीत ये असन्नशिवाः शिवान्तस्योनानुत्तरेमाभि वाजान्.. (२७)
हे मित्रो! हे मित्रो! उठो और तैरना आरंभ करो. पत्थरों वाली सरिता तेजी से बह रही
है. जो अकल्याणकारी हैं. उन्हें हम यहीं पर त्याग दें. हम नदी को पार करके सुख देने वाले
अन्नों की प्राप्ति करें. (२७)
वैश्वदेवी वर्चस आ रभध्वं शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः.
अतिक्रामन्तो दुरिता पदानि शतं हिमाः सर्ववीरा मदेम.. (२८)
हे पवित्र देवों वाली अग्नियो! तुम शुद्ध होने के समय सब देवताओं का स्तवन करो.
ऋग्वेद के पदों से पापों को लांघते हुए हम सौ हेमन्तों तक पुत्रादि सहित आनंदित रहें. (२८)
उदीचीनैः पथिभिर्वायुमद्भिरतिक्रामन्तो ऽ वरान् परेभिः.
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त्रिः सप्त कृत्व ऋषयः परेता मृत्युं प्रत्यौहन् पदयोपनेन.. (२९)
परलोक गमन में वायु से पूर्ण उत्तरायण मार्ग में जाने वाले ऋषियों ने निकृष्ट मार्गों को
लांघा था. उन्होंने मृत्यु को भी इक्कीस बार पार किया था. (२९)
मृत्योः पदं योपयन्त एत द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.
आसीना मृत्युं नुदता सधस्थे ऽ थ जीवासो विदथमा वदेम.. (३०)
मृत्यु के लक्ष्य को भ्रमित करने वाले ऋषि आयु से परिपूर्ण हैं. तुम भी इस मृत्यु को
भगाओ. फिर हम जीवन में यज्ञ की स्तुति करें. (३०)
इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषां सं स्पृशन्ताम्.
अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (३१)
ये स्त्रियां सुंदर पतियों से युक्त रहें. ये विधवा न हों. ये अश्रुओं से रहित और घृत से युक्त
हों. ये सुंदर अलंकारों को धारण करने वाली हों तथा संतानोत्पत्ति के हेतु मनुष्य योनि में ही
रहें. (३१)
व्याकरोमि हविषाहेमतौ तौ ब्रह्मणा व्य१हंकल्पयामि.
स्वधां पितृभ्यो अजरां कृणोमि दीर्धेणायुषा समिमान्त्सृजामि.. (३२)
मैं उन दोनों को मंत्र शक्ति के द्वारा सामर्थ्य वाला बनाता हूं. मैं पितरों की स्वधा को
जीर्णता युक्त करता हुआ उन्हें दीर्घ आयु वाला बनाता हूं. (३२)
यो नो अग्निः पितरो हृत्स्व १ न्तराविवेशामृतो मर्त्येषु.
मय्यहं तं परि गृह्णामि देवं मा सो अस्मान् द्विक्षत मा वयं मत्.. (३३)
हे पितरो! नष्ट न होने वाले फल को देने वाले अग्नि हमारे हृदय में विराजमान हैं. वे हम
सब से द्वेष करने वाले न हों. हम भी उन के प्रति द्वेष न करें. (३३)
अपावृत्य गार्हपत्यात् क्रव्यादा प्रेत दक्षिणा.
प्रियं पितृभ्य आत्मने ब्रह्मभ्यः कृणुता प्रियम्.. (३४)
हे प्राणियो! मंत्रों के द्वारा इस गार्हपत्य अग्नि से दूर हटो तथा क्रव्याद अग्नि से दक्षिण
दिशा को जाओ. वहां तुम्हारे लिए और पितरों के लिए जो प्रिय हो, वही कार्य करो. (३४)
द्विभागधनमादाय प्र क्षिणात्यवर्त्या.
अग्निः पुत्रस्य ज्येष्ठस्य यः क्रव्यादनिराहितः.. (३५)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को तथा अपने धन को
लेता हुआ क्षय का पात्र होता है. (३५)
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यत् कृषते यद् वनुते यच्च वस्नेन विन्दते.
सर्वं मर्त्यस्य तन्नास्ति क्रव्याच्चेदनिराहितः.. (३६)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि का सेवन करना न छोड़े, उस की कृषि, सेवनीय वस्तु, बहुमूल्य
वस्तु आदि जो उस के पास है, वे शून्य के समान रह जाती हैं. (३६)
अयज्ञियो हतवर्चा भवति नैनेन हविरत्तवे.
छिनत्ति कृष्या गोर्धनाद् यं क्रव्यानुवर्त्त.. (३७)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह यज्ञ करने का अधिकारी नहीं रहता. उस
का तेज नष्ट हो जाता है तथा आहूत अर्थात् बुलाए गए देवता उस के पास नहीं आते. (३७)
मुहुर्गृध्यैः प्र वदत्यार्तिं मर्त्यो नीत्य.
क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादनुविद्वान् वितावति.. (३८)
क्रव्याद अग्नि जिस के पास रह कर ताप देता है, वह पुरुष अत्यंत व्यथा को प्राप्त होता
है. आवश्यक वस्तुओं के समेत उसे बारबार दीन वचन कहने पड़ते हैं. (३८)
ग्राह्या गृहाः सं सृज्यन्ते स्त्रिया यन्म्रियते पतिः.
ब्रह्मैव विद्वानेष्यो ३ यः क्रव्यादं निरादधत्.. (३९)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को पूर्ण रूप से ग्रहण करता है, उस के लिए घर कारागार के
समान बन जाता है और स्त्री का पति मृत्यु को प्राप्त होता है. उसे विद्वान् मनुष्य का आदेश
मानना चाहिए. (३९)
यद् रिप्रं शमलं चकृम यच्च दुष्कृतम्.
आपो मा तस्माच्छुम्भन्त्वग्नेः संकसुकाच्च यत्.. (४०)
हम जो पाप कर चुके हैं, उस पाप से तथा शव भक्षक अग्नि के स्पर्श के दोष से मुझे
जल बचाएं. (४०)
ता अधरादुदीचीराववृत्रन् प्रजानतीः पथिभिर्देवयानैः.
पर्वतस्य वृषभस्याधि पृष्ठे नवाश्चरन्ति सरितः पुराणीः.. (४१)
जल देव मार्ग के द्वारा दक्षिण से उत्तर को जाते हैं तथा नवीन बन कर वर्षा के रूप
पर्वत पर नदी का रूप धारण कर लेते हैं. (४१)
अग्ने अक्रव्यान्निः क्रव्यादं नुदा देवयजनं वह.. (४२)
हे गार्हपत्य अग्नि! तुम क्रव्याद अग्नि को हम से दूर करो तथा देव पूजन की सामग्री को
वहन करो. (४२)
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इमं क्रव्यादा विवेशायं क्रव्यादमन्वगात्.
व्याघ्रौ कृत्वा नानानं तं हरामि शिवापरम्.. (४३)
इस पुरुष ने क्रव्याद अग्नि का अपने घर में प्रवेश कर लिया है तथा यह उसी का
अनुगामी हो गया है. मैं उन दोनों को बाधक के समान मानता हूं तथा इस क्रव्याद अग्नि को
अलग करता हूं. (४३)
अन्तर्धिर्देवानां परिधिर्मनुष्याणामग्निार्हपत्य उभयानन्तरा श्रितः.. (४४)
देवताओं के भीतरी और मनुष्यों के परिधि रूप गार्हपत्य अग्नि देवताओं और मनुष्यों
के मध्यस्थ हैं. (४४)
जीवानामायुः प्र तिर त्वमग्ने पितॄणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः.
सुगार्हपत्यो वितपन्नरातिमुषामुषां श्रेयसीं धेह्यस्मै.. (४५)
हे अग्नि! तुम जीवितों की आयु की वृद्धि करो तथा मृतकों को देवलोक में भेजो.
गार्हपत्य अग्नि शत्रुओं को जलाएं. हे गार्हपत्य अग्नि! तुम मंगलमयी उषा को हम में प्रतिष्ठित
करो. (४५)
सर्वानग्ने सहमानः सपत्नानैषामूर्जं रयिमस्मासु धेहि.. (४६)
हे अग्नि! तुम सब शत्रुओं को वश में करते हुए उन के बल और धन को हम में प्रतिष्ठित
करो. (४६)
इममिन्द्रं वह्निं पप्रिमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद् दुरितादवद्यात्.
तेनाप हत शरमापतन्तं तेन रुद्रस्य परि पातास्ताम्.. (४७)
इन ऐश्वर्य वाली अग्नि का स्तवन करो. ये तुम्हें पाप से मुक्त करें. उन के द्वारा तुम रुद्र
के बाण को दूर हटाते हुए अपनी रक्षा करो. (४७)
अनडुवाहं प्लवमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद् दुरितादवद्यात्.
आ रोहत सवितुर्नावमेतां षड्भिरुर्वीभिरमतिं तरेम.. (४८)
हवि रूप माता की वाहक अग्नि का स्तवन करो. वे पाप से तुम्हारी रक्षा करें. अग्नि
सविता की नौका पर चढ़ कर छह देवियों के द्वारा हमें बुद्धि से बचाएंगे. (४८)
अहोरात्रे अन्वेषि बिभ्रत क्षेम्यस्तिष्ठन् प्रतरणः सुवीरः.
अनातुरान्तसुमनसस्तल्प बिभ्रज्जयोगेव नः पुरुषगन्धिरेधि.. (४९)
हे गार्हपत्य अग्नि! तुम दिन और रात के आश्रय रूप होते हुए हमें प्राप्त हो. तुम
कल्याणप्रद होते हुए हमें पुत्र, पौत्रादि से युक्त करते हो. तुम्हारी आराधना सुगम है. तुम हमें
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नीरोग तथा हर्ष युक्त करो तथा पर्यंक (पलंग) पर चढ़ाते हुए दीर्घ काल तक प्रदीप्त होते रहो.
(४९)
ते देवेभ्य आ वृश्चन्ते पापं जीवन्ति सर्वदा.
क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादश्व इवानुवपते नडम्.. (५०)
जिन का पाप अश्व द्वारा घास को कुचलने के समान क्रव्याद अग्नि को कुचलता है,
पाप से अपनी जीविका चलाने वाले वे पुरुष देवयान के घातक हैं. तू इस पशु धर्म पर चढ़.
(५०)
ये ऽ श्रद्ध्रा धनकाम्या क्रव्यादा समासते.
ते वा अन्येषां कुम्भीं पर्यादधति सर्वदा.. (५१)
जो मनुष्य धन की इच्छा से क्रव्याद अग्नि की सेवा करते हैं, वे पुरुष सदा दूसरों की
रक्षा करते हैं. (५१)
प्रेव पिपतिषति मनसा मुहुरा वर्तते पुनः.
क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादनुविद्वान् वितावति.. (५२)
जिस पुरुष के पास आ कर क्रव्याद अग्नि तपती है, वह बारबार आवागमन के चक्र में
पड़ा रहता है तथा अधोगति को प्राप्त होता है. (५२)
अविः कृष्णा भागधेयं पशूनां सीसं क्रव्यादपि चन्द्रं त आहुः.
माषाः पिष्टा भागधेयं ते हव्यमरण्यान्या गह्वरं सचस्व.. (५३)
हे क्रव्याद अग्नि! काली भेड़, सीसा और चंद्रमा को तेरा भाग माना जाता है तथा पिसे
हुए उरद भी तेरे हव्य रूप हैं. अतः तू फिर जंगल में पहुंच जा. (५३)
इषीकां जरतीमिष्ट्वा तिल्पिञ्जं दण्डनं नडम्.
तमिन्द्र इध्मं कृत्वा यमस्याग्निं निरादधौ.. (५४)
पुरानी सींक, दंड, तिलों का ढेर तथा सरकंडे को इंद्र ने ईंधन बनाया और उस के द्वारा
यम की इस अग्नि को पृथक् कर दिया. (५४)
प्रत्यञ्चमर्कं प्रत्यर्पयित्वा प्रविद्वान् पन्थां वि ह्या विवेश.
परामीषामसूनू दिदेश दीर्घेणायुषा समिमान्त्सृजामि.. (५५)
गार्हपत्य अग्नि सूर्य को अर्पित हो कर देवयान मार्ग में प्रविष्ट हुई थी और जिन के प्राणों
को नष्ट कर दिया, मैं उन यजमानों को चिर आयु से युक्त करता हूं. (५५)
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