अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—२९ देवता—इंद्र
जो ग्रह और नक्षत्र आकाश में स्थित हैं, उन्हें इंद्र ने दृढ़ किया है, इसीलिए उन्हें कोई
नीचे नहीं गिरा सकता. (३)
अपामूर्भिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते. वि ते मदा अराविषुः.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारा स्तोत्र वर्षा के जल से सागर आदि को हर्षित करता हुआ तथा रस के
समान हमारे मुख से प्रकट होता है. सोमपान के बाद तुम्हारी शक्ति विशिष्ट हो जाती है. (४)
सूक्त—२९ देवता—इंद्र
त्वं हि स्तोमवर्धन इन्द्रा ऽ स्युक्थवर्धनः. स्तोतॄणामुत भद्रकृत्.. (१)
हे इंद्र! तुम स्तोत्रों तथा उक्थों से वृद्धि प्राप्त करते हो. तुम स्तुति करने वालों के
कल्याणकारी हो. (१)
इन्द्रमित् केशिना हरी सोमपेयाय वक्षतः. उप यज्ञं सुराधसम्.. (२)
इंद्र के हरि नाम के अश्व उन्हें हमारे सुंदर फल वाले यज्ञ में सोमपान के लिए लाएं. (२)
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः. विश्वा यदजय स्पृधः.. (३)
हे इंद्र! तुम ने जल के फेन का वज्र बना कर नमुचि राक्षस का सिर काट दिया था तथा
विरोधी सेनाओं पर विजय प्राप्त की थी. (३)
मायाभिरुत्सिस्सृप्सत इन्द्र द्यामारुरुक्षतः. अव दस्यूंरधूनुथाः.. (४)
हे इंद्र! जो असुर अपनी माया से आकाश पर चढ़ने की इच्छा करते हैं, उन्हें तुम
अधोमुख कर के गिरा देते हो. (४)
असुन्वामिन्द्र संसदं विषूचीं व्य नाशयः. सोमपा उत्तरो भवन्.. (५)
हे इंद्र! तुम सोमरस पी कर बलवान बनते हो. जहां सोमरस नहीं निचोड़ा जाता, उस
समाज को तुम नष्ट कर देते हो. (५)
सूक्त—३० देवता—इंद्र
प्र ते महे विदथे शंसिषं हरी प्र ते वन्वे वनुषो हर्यतं मदम्.
घृतं न यो हरिभिश्चारु सेचत आ त्वा विशन्तु हरिवर्पसं गिरः.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारे अश्व शीघ्रता से गमन करने वाले हैं. इस विशाल यज्ञ में मैं उन की प्रशंसा
करता हूं. तुम शत्रुओं का वध करने वाले हो. सोमपान से उत्पन्न हुई शक्ति वाले इंद्र से मैं
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अपना अभीष्ट फल मांगता हूं. जैसे अग्नि में घृत सींचा जाता है, उसी प्रकार इंद्र अपने ही
नाम के अश्वों सहित आते हुए धन की वर्षा करते हैं. (१)
हर्रिं हि योनिमभि ये समस्वरन् हिन्वन्तो हरी दिव्यं यथा सदः.
आ यं पृणन्ति हरिभिर्न धेनव इन्द्राय शूषं हरिवन्तमर्चत.. (२)
प्राचीन महर्षियों ने इंद्र को अपने यज्ञ में शीघ्रता से बुलाने के लिए उन के अश्वों को
प्रेरित किया. उन का स्तोत्र मूल रूप से इंद्र के ही निमित्त था. नव प्रसूता गाय जैसे दूध दे कर
अपने स्वामी को तृप्त करती है, उसी प्रकार यजमान सोमरस के द्वारा इंद्र को तृप्त करते हैं.
हे ऋत्विजो! शत्रु विनाशक, शक्तिशाली तथा हरि नामक अश्वों वाले इंद्र का पूजन करो. (२)
सो अस्य वज्रो हरितो य आयसो हरिनिकामो हरिरा गभस्त्योः.
द्युम्नी सुशिप्रो हरिमन्युसायक इन्द्रे नि रूपा हरिता मिमिक्षिरे.. (३)
इंद्र का लौह निर्मित वज्र हरा है. इंद्र का सुंदर शरीर भी हरे रंग का है. इंद्र के पास हरे
रंग का ही बाण रहता है. इंद्र की पूरी साजसज्जा हरे रंग की है. (३)
दिवि न केतुरुधि धायि हर्यतो विव्यचद् वज्रो हरितो न रंह्या.
तुददहिं हरिशिप्रो य आयसः सहस्रशोका अभवद्धरिंभरः.. (४)
इंद्र का वज्र सूर्य के समान अंतरिक्ष में स्थित है. जिस प्रकार सूर्य के अश्व वेग से
आकाश को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार इंद्र का वज्र गंतव्य स्थान पर पहुंच जाता है. इंद्र ने
अपने हरे वज्र से वृत्रासुर को संतप्त किया तथा उस के सहस्रों साथियों को शोक में डाल
दिया. (४)
त्वंतमहर्यथा उपस्तुतः पूर्वेभिरिन्द्र हरिकेश यज्वभिः.
त्वं हर्यसि तव विश्वमुक्थ्य १ मसामि राधो हरिजात हर्यतम्.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारे केश हरे रंग के हैं. जहां सोम रूप हवि होता है, वहां तुम उपस्थित होते
हो. तुम स्तुतियां सुन कर हवि की इच्छा करते रहे हो और अब भी कर रहे हो. तुम अपने हरि
नाम के अश्वों सहित यज्ञ में आते हो. हे इंद्र! ये सोम, अन्न और उक्थ तुम्हारे लिए ही हैं. (५)
सूक्त—३१ देवता—इंद्र
ता वज्रिणं मन्दिनं स्तोम्यं मद इन्द्रं रथे वहतो हर्यता हरी.
पुरूण्यस्मै सवनानि हर्यत इन्द्राय सोमा हरयो दधन्विरे.. (१)
सोमरस से उत्पन्न शक्ति प्राप्त करने के लिए इंद्र के अश्व उन्हें हमारे यज्ञ में ला रहे हैं.
तीनों सवनों में निचोड़े गए सोम इंद्र को धारण करते हैं. (१)
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अरं कामाय हरयो दधन्विरे स्थिराय हिन्वन् हरयो हरी तुरा.
अर्वद्भिर्यो हरिभिर्जोषमीयते सो अस्य कामं हरिवन्त्मानशे.. (२)
हरे रंग वाले सोम युद्धों में अटल रहने वाले इंद्र को धारण करते हैं. सोम ही इंद्र के घोड़ों
को यज्ञ की ओर जाने के लिए प्रेरित करते हैं. जो इंद्र अपने अश्वों द्वारा वेग से यज्ञ में आते हैं,
वे सोमरस वाले यजमान के पास पहुंच जाते हैं. (२)
हरिश्च्मशारुर्हरिकेश आयसस्तुरस्पेये यो हरिपा अवर्धत.
अर्वद्भिर्यो हरिभिर्वाजिनीवस्रुरति विश्वा दुरिता पारिषद्वरी.. (३)
इंद्र के केश, दाढ़ी और मूंछें सभी हरे रंग के हैं. इंद्र संस्कारित होने पर सोमरस को पीते
हुए वृद्धि प्राप्त करते हैं. इंद्र सोमरस को पीने के लिए अपने तेज चलने वाले घोड़ों से
सोमपान करने आते हैं. हवि उन का धन है. इंद्र अपने रथ में घोड़ों को जोड़ कर हमारे सभी
पाप नष्ट करें. (३)
सुवेव यस्य हरिणी विपेततुः शिप्रे वाजाय हरिणी दविध्वतः.
प्र यत् कृते चमसे मर्मृजद्धरी पीत्वा मदस्य हर्यतस्यान्धसः.. (४)
यज्ञ में जिस प्रकार वे चलते हैं, उसी प्रकार सोमरस का पान करने के लिए इंद्र की हरे
रंग की चिबुक अर्थात् ठुड्डी चलती है. जब चमस सोमरस से भर जाता है, तब उसे पीने के
लिए इंद्र की ठुड्डी फड़कने लगती है. उस समय इंद्र अपने घोड़ों का परिमार्जन अर्थात्
सफाई करते हैं. (४)
उत स्म सद्म हर्यतस्य पस्त्यो ३ रत्यो न वाजं हरिवाँ अचिक्रदत्.
मही चिद्धि धिषणाहर्यदोजसा बृहद् वयो दधिषे हर्यतश्चिदा.. (५)
इंद्र का निवास द्यावा पृथ्वी में है. जिस प्रकार घोड़ा युद्ध क्षेत्र में अग्रसर होता है, उसी
प्रकार इंद्र अपने घोड़ों पर चढ़ कर यज्ञशाला की ओर बढ़ते हैं. हे इंद्र! हमारा स्तोत्र तुम्हारी
कामना करता है. तुम भी यजमान की कामना करते हुए उसे असीमित धन देते हो. (५)
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
आ रोदसी हर्यमाणो महित्वा नव्यंनव्यं हर्यसि मन्म नु प्रियम्.
प्र पस्त्यमसुर हर्यतं गोराविष्कृधि हरये सूर्याय.. (१)
हे इंद्र! तुम अपनी महिमा से आकाश और धरती को व्याप्त करते हो. तुम सदा नवीन
रहते हो. तुम हमारे प्रिय स्तोत्र की इच्छा करते हो. तुम पणियों द्वारा चुराई गई गायों को रखने
का स्थान सूर्य को बता देते हो. ऐसी कृपा करो कि सूर्य स्तुति करने वालों को वह गोष्ठ अर्थात्
गायों को रखने का स्थान दे दें. (१)
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आ त्वा हर्यन्तं प्रयुजो जनानां रथे वहन्तु हरिशिप्रमिन्द्र.
पिबा यथा प्रतिभृतस्य मध्वो हर्यन् यज्ञं सधमादे दशोणिम्.. (२)
हे इंद्र! तुम सोमरस पीने के इच्छुक हो. सोमरस पीने से तुम्हारी ठुड्डी हरे रंग की हो
गई है. तुम्हारे रथ में जुड़े हुए घोड़े तुम को यहां लाएं. चमस आदि पात्रों में रखे हुए सोम वाले
घर में आ कर तुम सोम को पी सको, इसलिए तुम्हारे अश्व तुम्हें यहां ले आएं. (२)
अपा: पूर्वेषां हरिव: सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते.
ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषञ्जठर आ वृषस्व.. (३)
हे इंद्र! तुम प्रातः सवन में सोम को पी चुके हो. यह माध्यंदिन सवन भी तुम्हारा ही है.
इस सवन में तुम सोम का पान करते हुए प्रसन्न बनो. तुम इस पूरे सोमरस को एक साथ ही
अपने पेट में भर लो. (३)
सूक्त-३३ देवता—इंद्र
अप्सु धूतस्य हरिव: पिबेह नृभि: सुतस्य जठरं पृणस्व.
मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाह:.. (१)
हे इंद्र! अध्वर्यु जनों ने इस सोम का संस्कार किया है. तुम इसे पी कर अपना पेट भर
लो. जिस सोम को पत्थर कूट चुके हैं, उसे पीते हुए तुम हर्ष युक्त बनो. (१)
प्रोग्रां पीतिं वृष्ण इयर्मि सत्यां प्रयै सुतस्य हर्यश्व तुभ्यम्.
इन्द्र धेनाभिरिह मादयस्व धीभिर्विश्वाभि: शच्या गृणान:.. (२)
हे इंद्र! तुम इच्छित फल की वर्षा करते हो. मैं तुम्हें सोम की प्रचंड शक्ति प्राप्त करने के
लिए प्रेरित करता हूं. तुम यज्ञ कार्य में आ कर स्तुतियों से प्रशंसित और हवि से तृप्त बनो.
(२)
ऊती शचीवस्तव वीर्येण वयो दधाना उशिज ऋतज्ञा:.
प्रजावदिन्द्र मनुषो दुरोणे तस्थुर्गृणन्तः सधमाद्यास:.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा पुत्र आदि रूप संतान तथा अन्न से युक्त सत्य के ज्ञाता तथा तुम्हें
चाहने वाले ऋत्विज् यजमान के घर में तुम्हारी स्तुति करते हुए बैठें. (३)
सूक्त-३४ देवता—इंद्र
यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत्.
यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्यसेतां नृम्णस्य मह्ना स जनास इन्द्र:.. (१)
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