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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-४ देवता—जल

यथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वन्:.
एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (९)
जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है,
वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (९)
सूक्त-४ देवता—जल
अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्. पृंचतीर्मधुना पय:.. (१)
यज्ञ करने के इच्छुक जन अपनी माताओं और बहनों के समान जल, सोमरस, दूध एवं
घृत आदि यज्ञ सामग्री ले कर आते हैं. (१)
अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्य: सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२)
जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे
यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए. (२)
अपो देवीरुप ह्वये यत्र गाव: पिबन्ति न:. सिन्धुभ्य: कृत्वं हवि:.. (३)
मैं स्वच्छ एवं देवता रूप जलों का आह्वान करता हूं. जल से पूर्ण जलाशयों अर्थात्
नदियों और तालाबों में हमारी गाएं जल पीती हैं. (३)
अप्स्व १ न्तरमृतमप्सु भेषजम्.
अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनो गावो भवथ वाजिनी:.. (४)
जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे
घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें. (४)
सूक्त-५ देवता—जल
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१)
हे जल! आप सभी प्रकार का सुख देने वाले हैं. अन्न आदि सुखों का उपभोग करने के
इच्छुक हम सब को आप उन के उपभोग की शक्ति प्रदान करें. आप हमें महान एवं रमणीय
आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें. (१)
यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न:. उशतीरिव मातर:.. (२)
जिस प्रकार माताएं अपनी इच्छा से दूध पिला कर बालकों को पुष्ट करती हैं, उसी
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प्रकार हे जल! आप अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं. (२)
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च न:.. (३)
हे जल! हम जिस अन्न आदि को पा कर तृप्त होते हैं, उसे प्राप्त करने के लिए हम आप
को पर्याप्त रूप में पाएं. हे जल! आप पर्याप्त रूप में आ कर हमें तृप्त करें. (३)
ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्. अपो याचामि भेषजम्.. (४)
मैं धनों के स्वामी एवं सुख साधन प्रदान कर के गतिशील मनुष्यों को एक स्थान पर
बसाने वाले जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं. (४)
सूक्त-६ देवता—जल
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु न:.. (१)
दिव्यगुणों वाला जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो. जल हमारे चारों
ओर कल्याण की वर्षा करे एवं पीने के लिए उपलब्ध हो. (१)
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा. अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. (२)
मुझे सोम ने बताया है कि सारी ओषधियां एवं अग्नि जल में निवास करती हैं. अग्नि
सारे संसार का कल्याण करने वाली है. (२)
आप: पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे ३ मम. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (३)
हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समय
तक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो. (३)
शं न आपो धन्वन्‍या ३: शमु सन्त्वनूप्या:.
शं न: खनित्रिमा आप: शमु या: कुम्भ आभृता: शिवा न: सन्तु वार्षिकी:..
(४)
जल हमें मरु भूमि में सुखकारी हों. जिन स्थानों में जल की प्राप्ति सुलभ है, वहां के
जल हमारा कल्याण करें. कुआं, बावड़ी आदि खोद कर प्राप्त किए गए जल हमारे लिए
कल्याणकारी हों. घड़े में भर कर लाया गया जल हमें सुख दे. वर्षा से प्राप्त होने वाला जल
हमारे लिए सुखकारी हो. (४)
सूक्त-७ देवता—अग्नि और इंद्र
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स्तुवानमग्न आ वह यातुधानं किमीदिनम्.
त्वं हि देव वन्दितो हन्ता दस्योर्बभूविथ.. (१)
हे अग्नि! हम जिन देवों की स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हमारे समीप लाओ एवं हमें मारने
की इच्छा से घूमने वाले राक्षसों को हम से दूर भगाओ. हे दिव्य गुणों वाले अग्नि! हमारे
नमस्कार आदि से प्रसन्न तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो. (१)
आज्यस्य परमेष्ठिन् जातवेदस्तनूवशिन्.
अग्ने तौलस्य प्राशान यातुधानान् वि लापय.. (२)
हे स्वर्ग आदि उत्तम स्थानों में निवास करने वाले, हे जातवेद एवं हे जलशक्ति रूप में
सब के शरीरों में स्थित अग्नि! हमारे द्वारा सुवा आदि से नाप कर दिए गए घृत का भोजन
कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए. (२)
वि लपन्तु यातुधाना अत्रिणो ये किमीदिनः.
अथेदमग्ने नो हविरिन्द्रश्च प्रति हर्यतम्.. (३)
हे अग्नि! आप और परम ऐश्वर्य वाले इंद्र, हमारे दिए गए हवि को प्रसन्नतापूर्वक
स्वीकार करें. राक्षस, सब का भक्षण करने वाले दस्यु एवं इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट
हो जाएं. (३)
अग्निः पूर्व आ रभतां प्रेन्द्रो नुदतु बाहुमान्.
ब्रवीतु सर्वो यातुमान् अयमस्मीत्येत्य.. (४)
सब से पहले अग्नि देव राक्षसों को दंड देना आरंभ करें. इस के पश्चात शक्तिशाली
भुजाओं वाले इंद्र राक्षसों को दूर भगाएं. अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर
आत्मसमर्पण करें और अपना परिचय दें कि मैं अमुक हूं. (४)
पश्याम् ते वीर्यं जातवेदः प्र णो ब्रूहि यातुधानान् नृचक्षः.
त्वया सर्वे परितप्ताः पुरस्तात् त आ यन्तु प्रब्रुवाणा उपेदम्.. (५)
हे सब को जानने वाले अग्नि! हम आप का पराक्रम देखें. हे उपासना के योग्य अग्नि!
हमारी इच्छानुसार राक्षसों से कहिए कि वे हमें दुःख न दें. आप के द्वारा सताए हुए राक्षस
अपना परिचय देते हुए हमारी शरण में आएं. (५)
आ रभस्व जातवेदो ऽ स्माकार्थाय जज्ञिषे.
दूतो नो अग्ने भूत्वा यातुधानान् वि लापय.. (६)
हे सब को जानने वाले अग्नि! तुम राक्षसों के विनाश का कार्य आरंभ करो, क्योंकि तुम
हमारे प्रयोजन पूर्ण करने के लिए उत्पन्न हुए हो. हे अग्नि! तुम हमारे दूत बन कर राक्षसों को
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